P&G 99 (Hindi)


आपकी कंपनी क्यों हमेशा एक ही 'पुराने आइडिया' को घसीट रहे हैं? जब बाकि लोग Lateral Thinking से हर रोज़ करोड़ों के नए आइडिया छाप रहे हैं, आप अभी भी 'बॉक्स' में फँसे हैं। यह 'सोचने की सुस्ती' आपको डुबो देगी! Serious Creativity में 3 ऐसे सीक्रेट्स हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपने दिमाग़ को न्यू आइडियाज़ के लिए Unlock कर देंगे। ये 3 लेसन्स आपकी रचनात्मकता (Creativity) को हमेशा के लिए ट्रांसफॉर्म कर देंगे।


Lesson : एक आदमी नहीं, 'सिस्टम' CEO है – सिस्टम ही सब कुछ है

ज़्यादातर छोटे और मध्यम स्तर के बिज़नेस में एक बड़ी प्रॉब्लम होती है: वह किसी 'एक आदमी' (One Person) पर निर्भर होते हैं। अगर CEO छुट्टी पर चला जाए, या कोई टॉप मैनेजर बीमार पड़ जाए, तो कंपनी 'रुक' जाती है। यह कंपनी नहीं है, यह एक 'वन-मैन शो' है। यह मॉडल 'तेज़' तो है, पर 'टिकाऊ' (Sustainable) नहीं है।

Procter and Gamble (P&G) की सफलता का सबसे बड़ा सीक्रेट उसके 99 प्रिंसिपल्स में छिपा है: "काम के हर हिस्से को 'सिस्टम' और 'प्रिंसिपल' से चलाना, ताकि कंपनी लीडर्स पर नहीं, बल्कि मज़बूत प्रोसेस पर चले।"

'सिस्टम' का मतलब है कि कोई भी 'नया' आदमी अगर आपकी कंपनी में आए, तो वह 'रूल्स' को पढ़कर जान जाए कि 'काम कैसे होता है', 'फै़सला कैसे लिया जाता है', और 'कस्टमर से कैसे बात की जाती है'।

यह सिस्टम सिर्फ़ 'रूल बुक' नहीं है। यह एक 'संस्कृति' है जहाँ हर आदमी 'बिना पूछे' जानता है कि उसे क्या करना है। जब 'सिस्टम' मज़बूत होता है, तो 'लीडर' बदल भी जाए, तो कंपनी की परफ़ॉर्मेन्स कभी नहीं गिरती।

आइए, इसे एक फनी एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। मिलिए मिस्टर चोपड़ा से। मिस्टर चोपड़ा एक बिज़नेस के मालिक थे। उनके बिज़नेस का हर काम 'मिस्टर चोपड़ा' से होकर जाता था। 'मीटिंग' का टाइम चोपड़ा तय करते थे। 'प्रॉडक्ट का डिज़ाइन' चोपड़ा तय करते थे। 'सैलरी' चोपड़ा तय करते थे।

एक बार मिस्टर चोपड़ा को अर्जेंट 10 दिन की छुट्टी लेनी पड़ी। क्या हुआ? 10 दिन में कंपनी का कोई भी 'बड़ा फै़सला' नहीं हो पाया। कस्टमर की शिकायतें बढ़ गईं, और नया प्रॉडक्ट लॉन्च 'रुक' गया।

मिस्टर चोपड़ा ने 'कंट्रोल' को चुना, 'ग्रोथ' को नहीं। उन्होंने एक ऐसा 'सिस्टम' बनाया जहाँ वह ख़ुद सबसे बड़े 'बॉटलनेक' (Bottleneck) थे।

P&G में, एक नया 'ट्रेनी' भी जानता है कि किस सिचुएशन में 'क्या फै़सला' लेना है, क्योंकि 'प्रिंसिपल' साफ़ हैं। उन्हें किसी 'बॉस' के 'हाँ' का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।

यह तो वही बात हो गई कि आप एक 'क्रिकेट टीम' चला रहे हैं, और 'कप्तान' के मैदान से बाहर जाने पर कोई भी 'फै़सला' लेने को तैयार नहीं है, क्योंकि किसी को 'नियम' नहीं पता।

'सिस्टम ही सब कुछ है' का मतलब है:
  • फ़ैसला लेने के नियम साफ़ करो। (कौन सा फै़सला 'टीम' ले सकती है? कौन सा फै़सला 'मैनेजर' लेगा? यह साफ़ होना चाहिए)।
  • 'प्रोसेस' को 'इमोशन-फ़्री' बनाओ। (काम के तरीक़े को 'किसी की मर्ज़ी' पर नहीं, बल्कि 'डेटा' और 'रूल्स' पर आधारित करो)।
  • हर काम को 'डॉक्यूमेंट' करो। (अगर कोई काम 3 बार हो चुका है, तो उसका 'रूल' लिख लो, ताकि चौथी बार किसी को 'नया' सोचना न पड़े)।

जब आप 'सिस्टम' बनाते हैं, तो आपकी कंपनी एक 'मज़बूत मशीन' बन जाती है। यह मशीन 'लीडर्स' के आने-जाने से नहीं रुकती। यह 'ग्रोथ' पर फ़ोकस करती है।

लेकिन, यह सिस्टम किसके लिए काम करता है? यह काम करता है 'कस्टमर' के लिए। अगर आपका सिस्टम 'कस्टमर की ज़रूरत' पूरी नहीं करता, तो वह किसी काम का नहीं है।

यही बात हमें दूसरे सबसे ज़रूरी लेसन की ओर ले जाती है, जहाँ हम सीखेंगे कि P&G कस्टमर को अपना 'असली बॉस' क्यों मानती है।


Lesson : कस्टमर को 'भगवान' नहीं, 'बॉस' मानो – कस्टमर ही बॉस

ज़्यादातर कंपनियाँ 'कस्टमर' को 'ज़रूरी' मानती हैं। वह कहते हैं: "कस्टमर हमारा किंग है।" लेकिन जब 'कस्टमर' सच में कोई मुश्किल सवाल पूछता है या 'नया प्रॉडक्ट' माँगता है, तो वह कंपनी 'डर' जाती है।

P&G का नियम साफ़ है: "सिर्फ़ प्रोडक्ट बेचना नहीं, बल्कि कस्टमर की ज़रूरतों को समझना, उनके लिए 'वैल्यू' बनाना, और उन्हें हमेशा सेंटर में रखना।"

P&G कस्टमर को 'बॉस' मानता है। 'बॉस' क्या करता है? वह 'सैलरी' देता है, वह 'फ़ैसला' लेता है, और वह 'फ़ायर' (Fire) भी कर सकता है। अगर आप कस्टमर को 'बॉस' मानते हैं, तो आप हर दिन पूछेंगे: "मेरा बॉस (कस्टमर) आज मुझसे क्या चाहता है?"

यह 'बॉस माइंडसेट' आपको हमेशा 'ग्राउंड लेवल' पर रखता है। आप अपने प्रॉडक्ट को सिर्फ़ 'बेचते' नहीं हैं, आप उसे 'कस्टमर की ज़रूरत' के हिसाब से बदलते रहते हैं।

P&G की एक मशहूर प्रैक्टिस थी: 'गोइंग टू द स्टोर' (Going to the Store)। टॉप मैनेजर्स को हर हफ़्ते बाज़ार में जाकर ख़ुद देखना होता था कि कस्टमर उनके प्रॉडक्ट को कैसे ख़रीद रहा है, उसे क्या प्रॉब्लम आ रही है। वह सिर्फ़ 'मीटिंग रूम' में बैठकर 'डेटा' नहीं देखते थे।

आइए, इसे एक फनी एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। मिलिए मिसेज़ वर्मा से। मिसेज़ वर्मा एक ऑनलाइन स्टोर चलाती थीं। वह हर हफ़्ते 'सेल्स डेटा' देखती थीं: "कस्टमर ने क्या ख़रीदा? कितना ख़रीदा?"

एक बार उन्हें डेटा में दिखा कि 'एक ख़ास प्रॉडक्ट' को कस्टमर बार-बार 'वापस' कर रहे हैं। मिसेज़ वर्मा ने सेल्स टीम से कहा: "इस प्रॉडक्ट को मत बेचो।"

अगर मिसेज़ वर्मा 'बॉस माइंडसेट' से सोचतीं, तो वह पूछतीं: "मेरा बॉस (कस्टमर) इस प्रॉडक्ट को क्यों वापस कर रहा है?"

उन्होंने 'वापसी' (Return) का कारण नहीं देखा। कारण यह था कि प्रॉडक्ट 'अच्छा' था, पर उसकी 'पैकेजिंग' इतनी ख़राब थी कि वह 'टूट' जाता था। अगर मिसेज़ वर्मा 'पैकेजिंग' में 5 रुपये ज़्यादा लगातीं, तो उनकी 'वापसी' ख़त्म हो जाती।

मिसेज़ वर्मा ने 'नंबर' को देखा, पर 'इंसान' को नहीं देखा। उन्होंने 'डेटा' को 'बॉस' माना, 'कस्टमर' को नहीं।

यह तो वही बात हो गई कि आप एक 'बड़ा जहाज़' चला रहे हैं, और आप 'समुद्र की लहरों' को देखने की बजाय, सिर्फ़ 'जहाज़ की स्पीड' देख रहे हैं।

'कस्टमर ही बॉस' का मतलब है:
  • फ़ोन उठाओ। (हर दिन कम से कम 10 मिनट 'कस्टमर सपोर्ट' कॉल सुनो—यही 'असली इनफ़ॉर्मेशन' है)।
  • 'प्रोसेस' को बदलो। (अगर कस्टमर को कोई प्रॉब्लम आती है, तो उसे 'एक बार की प्रॉब्लम' मत मानो। अपने पूरे 'सिस्टम' (लेसन 1) को बदलो, ताकि वह ग़लती दोबारा न हो)।
  • ज़रूरत को 'नया प्रॉडक्ट' बनाओ। (अगर कस्टमर 5 बार 'एक ही चीज़' माँगता है, तो समझ लो कि वह आपका 'अगला प्रॉडक्ट' है)।

जब आप कस्टमर को 'बॉस' मानते हैं, तो आपकी कंपनी 'बाहर' की नहीं, 'अंदर' की आवाज़ सुनती है। यह आपको हमेशा 'सही प्रॉडक्ट' बनाने के लिए प्रेरित करती है।

लेकिन, प्रॉडक्ट कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसकी 'क्वालिटी' 100% नहीं है, तो वह 'बॉस' (कस्टमर) को नाराज़ कर देगा।

यही बात हमें तीसरे सबसे ज़रूरी लेसन की ओर ले जाती है, जहाँ हम सीखेंगे कि 'छोटी चीज़ों' में भी 'एक्सीलेंस' को कैसे ढूँढें।


Lesson : 100% नहीं, 101% दो – ऑब्सेशन विद क्वालिटी

सोचिए, आप एक 'टूथपेस्ट' बेच रहे हैं। अगर वह टूथपेस्ट 'ठीक-ठाक' काम करता है, तो आप 50 कस्टमर बनाएँगे। लेकिन अगर वह टूथपेस्ट 'इतना अच्छा' है कि कस्टमर उसे 'दोबारा' ख़रीदता है, तो आप 'लॉयल्टी' कमाते हैं।

P&G की सक्सेस सिर्फ़ 'मार्केटिंग' पर नहीं टिकी। यह टिकी है 'क्वालिटी' पर। P&G का प्रिंसिपल साफ़ है: "हर छोटी चीज़ में 'एक्सीलेंस' को ढूँढना, और प्रोडक्ट की क्वालिटी और ब्रांड की इमेज को हमेशा टॉप पर रखना।"

'ऑब्सेशन विद क्वालिटी' का मतलब है कि आप 'कमज़ोरी' को छुपाते नहीं हैं, आप उसे 'जड़ से' ख़त्म करते हैं। P&G की कई ब्रांड्स (जैसे Tide, Gillette) सालों से मार्केट लीडर क्यों हैं? क्योंकि वह अपनी 'कोर क्वालिटी' से कभी समझौता नहीं करते।

क्वालिटी सिर्फ़ 'प्रॉडक्ट' में नहीं होती। वह आपके 'कस्टमर सपोर्ट', आपके 'पैकेजिंग', और आपके 'विज्ञापन' में भी होती है। हर जगह 'एक्सीलेंस' की छाप होनी चाहिए।

आइए, हमारे तीसरे और आख़िरी कैरेक्टर मिस्टर सेठ से मिलिए। मिस्टर सेठ एक 'शॉर्ट-कट' वाले लीडर थे। जब उनके प्रॉडक्ट में एक छोटी-सी 'तकनीकी ख़राबी' आई, तो मिस्टर सेठ ने कहा: "इसे जल्दी से 'फिक्स' कर दो। अभी कस्टमर को पता नहीं चलेगा।"

यह एक 'क्विक-फ़िक्स' था, न कि 'परमानेंट सॉल्यूशन'। कुछ दिन बाद, वही 'छोटी ख़राबी' एक 'बड़ी प्रॉब्लम' बन गई। 100 कस्टमर ने सोशल मीडिया पर शिकायत की, और मिस्टर सेठ की 'ब्रांड इमेज' को भारी नुक़सान हुआ।

मिस्टर सेठ ने 'बचत' को चुना, 'क्वालिटी' को नहीं। उन्होंने 'आज' का प्रॉफिट देखा, 'कल' का नुक़सान नहीं देखा।

P&G में, 'छोटी प्रॉब्लम' भी 'बड़ी मीटिंग' का कारण बनती है। क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि 'छोटी सी' क्वालिटी की चूक, पूरे ब्रांड की वैल्यू (जो 'पैसों' से ज़्यादा है) को ख़त्म कर सकती है।

यह तो वही बात हो गई कि आप एक 'घर' बना रहे हैं, और आप 'नींव' में 'ख़राब ईंट' लगाते हैं, यह सोचकर कि 'किसी को पता नहीं चलेगा'।

'ऑब्सेशन विद क्वालिटी' का मतलब है:
  • ज़ीरो टॉलरेंस (Zero Tolerance): 'ठीक-ठाक' को 'अस्वीकार' करो। या तो '101%' दो, या बिल्कुल मत दो।
  • हर शिकायत को 'गिफ्ट' मानो। (कस्टमर की हर शिकायत (लेसन 2 से कनेक्शन) आपको 'क्वालिटी' सुधारने का 'मुफ़्त' में मौका देती है)।
  • ब्रांड को 'मंदिर' मानो। (अपने ब्रांड की इमेज को किसी भी छोटे से 'प्रॉफिट' के लिए ख़तरे में मत डालो)।

जब आप 'ऑब्सेशन विद क्वालिटी' अपनाते हैं, तो आपका 'सिस्टम' (लेसन 1) और 'कस्टमर' (लेसन 2) दोनों मज़बूत होते हैं। आपकी कंपनी 'ब्रांडेड' नहीं रहती, वह 'भरोसेमंद' बन जाती है।


कस्टमर 'ब्रांड' नहीं, 'भरोसा' ख़रीदता है।
  1. आज ही अपने सबसे 'सफल' प्रॉडक्ट को देखो और पूछो: "इस प्रॉडक्ट की कौन सी 'एक चीज़' है जिसे 101% बेहतर किया जा सकता है?"
  2. अपने कस्टमर की सबसे 'छोटी' शिकायत को देखो और उस पर 'पूरी कंपनी' को लगा दो—जब तक वह 'जड़ से' ख़त्म न हो जाए।
  3. अगर यह आर्टिकल पढ़कर आपको लगा कि यह आपकी कंपनी को 'शॉर्ट-कट' से बचा सकता है, तो इसे अपने उन सभी मैनेजर और लीडर दोस्तों के साथ शेयर करो जो अभी भी 'क्वालिटी' को 'ख़र्चा' मानते हैं, 'इन्वेस्टमेंट' नहीं!

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