The HP Way (Hindi)


आपकी कंपनी (या टीम) में 'बॉस' का डर क्यों है? जब बाकी कंपनियाँ कल्चर से करोड़ों कमा रही हैं, आप अभी भी 'अटेंडेंस' गिन रहे हैं। यह 'खामोशी' आपको डुबो देगी! The HP Way में डेविड पैकर्ड ने 3 ऐसे मैनेजमेंट सीक्रेट्स बताए हैं, जिन्हें अपनाकर आप एम्प्लॉयीज़ को 'रोबोट' नहीं, 'मालिक' बना देंगे। ये 3 लेसन्स आपकी लीडरशिप की गेम को हमेशा के लिए ट्रांसफॉर्म कर देंगे।


Lesson : अटेंडेंस नहीं, ओनरशिप गिनो – वैल्यू-आधारित कल्चर का सीक्रेट

आपकी कंपनी एक बिल्डिंग है, लेकिन उसका कल्चर उसकी नींव है। अगर नींव कच्ची होगी, तो बिल्डिंग एक हवा के झोंके से गिर जाएगी। आजकल के मैनेजर का सबसे बड़ा भ्रम क्या है? उन्हें लगता है कि 'सैलरी' ही एम्प्लॉयी को काम करने के लिए काफ़ी है। अगर किसी ने 8 घंटे कुर्सी गरम कर दी, तो मतलब उसने काम कर दिया।

यह सोच बिज़नेस को 'सरकारी दफ्तर' बना देती है। डेविड पैकर्ड और बिल हेवलेट ने HP में इस माइंडसेट को शुरू में ही निकाल फेंका था। उनका मानना था कि लोगों को 'कंट्रोल' करने की ज़रूरत नहीं है। आपको उन्हें 'वैल्यू' देनी है।

HP Way का पहला और सबसे पावरफुल सीक्रेट है: विश्वास, सम्मान और ज़िम्मेदारी।

उन्होंने एम्प्लॉयी को 'रूल बुक' थमाने की बजाय, उन्हें 'टारगेट' थमाए। उन्होंने कहा: "यह तुम्हारा काम है। इसे कैसे करना है, कब करना है, कहाँ से करना है—यह तुम जानो। बस, हमें रिज़ल्ट चाहिए।"

यह तो ऐसा हो गया जैसे किसी ने आपको अपनी सबसे महंगी कार की चाबी दे दी और कहा: "जाओ, रेस जीतो। मैं तुम्हें ब्रेक लगाने का तरीक़ा नहीं बताऊँगा।" जब आप पर इतना भरोसा दिखाया जाता है, तो आप 100% नहीं, 110% देते हैं। क्योंकि अब काम सिर्फ़ 'बॉस का आदेश' नहीं रहा, अब यह आपकी पर्सनल ज़िम्मेदारी बन गया है।

मिस्टर चड्ढा का 'टाइमिंग ही सब कुछ है' ड्रामा

आइए, एक फनी एग्ज़ाम्पल देखते हैं। मिलिए मिस्टर चड्ढा से। इनकी कंपनी में 'अटेंडेंस' सबसे बड़ा धर्म है। अगर कोई 9:01 पर आया, तो मतलब वह 'देशद्रोही' है।

एक बार एक एम्प्लॉयी को अर्जेंट काम से 2 घंटे जल्दी जाना पड़ा। बॉस चड्ढा ने कहा: "काम बाद में, अटेंडेंस पहले।" नतीजा? उस एम्प्लॉयी ने घर जाकर वो काम किया, पर अगले दिन से उसने दिल से काम करना छोड़ दिया। उसका मन काम में नहीं, सिर्फ़ '9 से 6 की ड्यूटी' में लग गया। यह है रोबोट बनाने वाला कल्चर।

एचपी (HP) कल्चर इसके बिल्कुल उलट था। अगर एम्प्लॉयी रात भर जागकर काम कर रहा है, तो सुबह 10 बजे आने पर कोई सवाल नहीं करेगा। क्यूंकि फ़ोकस आउटपुट पर है, इनपुट पर नहीं। जब आप 'टाइम' गिनना छोड़ देते हैं, तो एम्प्लॉयी 'आपकी कंपनी' को 'अपनी कंपनी' समझने लगता है।

हार्टबीट फ्लो: सम्मान दो, ओनरशिप लो

वैल्यू-आधारित कल्चर का मतलब है:
  • गलती करो, पर छुपाओ मत।
  • काम करने का तरीक़ा बदलो, पर इरादा सही रखो।
  • सीनियर को नहीं, आइडिया को सम्मान दो।

यह कल्चर लोगों को 'हाँ, बॉस' कहने वाला नहीं, बल्कि 'यह ग़लत है, हमें ऐसे करना चाहिए' कहने वाला बनाता है।

HP में जब कोई छोटी मशीन खराब हो जाती थी, तो इंजीनियर्स ख़ुद उसे रिपेयर करते थे, बिना किसी 'परमिशन स्लिप' के। यह है ज़िम्मेदारी। यह 'ओनरशिप' का फ़ील है जो पैसा नहीं खरीद सकता। डेविड पैकर्ड जानते थे कि अगर आप अपने एम्प्लॉयी को भरोसा देंगे, तो वो उस भरोसे को टूटने नहीं देंगे।

लेकिन सिर्फ़ भरोसा देना काफ़ी नहीं है। आपको अपने दफ्तर में घुसना पड़ेगा। आपको देखना पड़ेगा कि ये वैल्यू सच में ज़मीन पर उतर रही हैं या नहीं। आपको 'बॉस के केबिन' से निकलकर, 'एम्प्लॉयी के वर्कस्टेशन' पर जाना पड़ेगा।

और यही बात हमें दूसरे सबसे ज़रूरी लेसन की ओर ले जाती है, जहाँ हम सीखेंगे कि एक महान लीडर 'ईमेल' पर नहीं, बल्कि 'चलकर' मैनेजमेंट करता है।


Lesson : चल फिर कर Management करो – MBWA का वो सीक्रेट जो मीटिंग्स नहीं देगी

सोचिए, एक राजा है जो अपने महल के सबसे ऊँचे कमरे में बैठकर हुकुम चला रहा है। उसे क्या पता कि उसकी प्रजा को सड़क पर क्या दिक्कत आ रही है? आजकल के 90% कॉर्पोरेट लीडर्स यही राजा हैं। उनका मैनेजमेंट उनकी 'ईमेल इनबॉक्स' तक सीमित है। उन्हें लगता है कि 'ज़्यादा मीटिंग्स' का मतलब 'ज़्यादा मैनेजमेंट' है।

डेविड पैकर्ड ने HP में एक नियम बनाया: मैनेजमेंट बाय वांडरिंग अराउंड (MBWA)। यह कोई फ़ैन्सी तकनीक नहीं थी। यह एक सीधा-सादा फ़ंडा था: 'चलते रहो और बात करते रहो'।

पैकर्ड और हेवलेट दोनों रोज़ाना दफ्तर में घूमते थे। वे सीधे इंजीनियर्स के पास जाते थे, मशीन के पास खड़े होते थे, और पूछते थे: "क्या चल रहा है? कोई दिक्कत तो नहीं है?" वे यह काम इसलिए नहीं करते थे कि उन्हें 'जासूसी' करनी थी, बल्कि इसलिए करते थे ताकि 'डिस्टेंस' ख़त्म हो जाए।

यह MBWA का कॉन्सेप्ट, लीडर और टीम के बीच का 'ईगो वॉल' तोड़ देता है। जब एक एम्प्लॉयी देखता है कि बॉस ख़ुद चलकर आया है, तो वह 'फ़ॉर्मल' बातचीत नहीं करता, बल्कि असली प्रॉब्लम बताता है। यही वो चीज़ है जो किसी 2 घंटे की 'वीकली रिव्यू मीटिंग' से कभी नहीं निकल सकती।

मिलिए मिसेज़ कपूर से। मिसेज़ कपूर एक शानदार मैनेजर हैं, पर उनके केबिन का दरवाज़ा हमेशा बंद रहता है। उन्होंने अपनी टीम को एक रूल दिया है: "कोई भी प्रॉब्लम हो, पहले ईमेल करो।"

एक बार एक जूनियर एम्प्लॉयी के पास एक 'आइडिया' था, जिससे कंपनी के 5 लाख रुपये बच सकते थे। उसने मिसेज़ कपूर को 3 दिन तक ईमेल किया। मिसेज़ कपूर मीटिंग्स में बिज़ी थीं, उन्होंने जवाब नहीं दिया। चौथे दिन, वह आइडिया 'टाइम-बाउंड' था, जो वेस्ट हो गया।

जब मिसेज़ कपूर ने बाद में पूछा, "तुमने बताया क्यों नहीं?" तो एम्प्लॉयी ने कहा: "मैम, मैंने तो ईमेल किया था। आपने ही कहा था, नो डिस्टर्बेंस।"

यह तो वही बात हो गई कि आपके घर में आग लगी है और आप फायर ब्रिगेड को 'अपॉइंटमेंट' लेने के लिए कह रहे हैं। मैनेजमेंट 'आराम' से नहीं, एक्शन से होता है। बंद दरवाज़े सिर्फ़ अविश्वास और डर पैदा करते हैं।

HP Way में, लीडरशिप एक 'सर्विस' थी, 'पावर' नहीं। जब आप घूमते हैं, तो आप एम्प्लॉयी को यह 'सिग्नल' देते हैं कि: "मैं तुम्हारी मदद के लिए यहाँ हूँ, तुम्हें कंट्रोल करने के लिए नहीं।"

MBWA सिर्फ़ घूमना नहीं है, यह है 'एक्टिव लिसनिंग' (Active Listening)।
  • सवाल पूछो, पर 'टेस्ट' मत लो।
  • ईमेल से पहले 'चेहरा' देखो।
  • प्रॉब्लम की जड़ तक पहुँचो, टॉप तक नहीं।

जब आप एक टीम मेंबर से पूछते हैं: "तुम्हें अपना काम मुश्किल क्यों लग रहा है?" और वह बताता है कि 'टूल ख़राब है', तो आप सिर्फ़ एक 'प्रॉब्लम' नहीं, एक 'सलूशन' ढूँढ रहे होते हैं।

यह मैनेजमेंट स्टाइल एम्प्लॉयी को महसूस कराता है कि उनकी 'बात' सुनी जा रही है। जब किसी की बात सुनी जाती है, तो वह कंपनी से ज़्यादा जुड़ जाता है। वह आपको वो इनफ़ॉर्मेशन देगा जो 'बॉस को नहीं बताई जाती'। यही इनफ़ॉर्मेशन आपके बिज़नेस को आगे बढ़ाती है।

अगर आपने लेसन 1 से विश्वास का कल्चर बनाया है, तो MBWA उस विश्वास को हर दिन मज़बूत करता है। यह एक 'शॉर्ट-टर्म मोटिवेशनल टॉक' नहीं है, यह है लॉन्ग-टर्म रिश्ते में निवेश करना।

लेकिन इस मैनेजमेंट से फ़ायदा तभी होगा, जब आपकी सोच 'शॉर्ट-टर्म' प्रॉफिट कमाने की नहीं, बल्कि 'लॉन्ग-टर्म' वैल्यू बनाने की होगी। सिर्फ़ घूमकर प्रॉब्लम सुनना काफ़ी नहीं, आपको उस प्रॉब्लम को हमेशा के लिए सॉल्व करने के लिए एक रोडमैप चाहिए। और यही है हमारा आख़िरी और सबसे पावरफुल लेसन।


Lesson : तिमाही की रिपोर्ट नहीं, 20 साल का Legacy देखो – लॉन्ग-टर्म सोच

आजकल का कॉर्पोरेट वर्ल्ड एक 'इंस्टाग्राम स्टोरी' बन गया है। सब कुछ 24 घंटे का है। मैनेजर सुबह उठकर पूछता है: "पिछली तिमाही में कितना प्रॉफिट हुआ? इस हफ़्ते क्या नया किया?" यह शॉर्ट-टर्म सोच एक दवा की तरह है—तुरंत आराम, पर जड़ से बीमारी नहीं मिटाती। डेविड पैकर्ड जानते थे कि अगर आप सिर्फ़ अगले 90 दिनों की सेल्स के बारे में सोचेंगे, तो आपके एम्प्लॉयी वो वैल्यू नहीं बना पाएंगे जो 20 साल तक चलेगा।

HP Way का तीसरा सीक्रेट है लॉन्ग-टर्म सोच—यानी "शॉर्ट-टर्म प्रॉफिट से ज़्यादा, ग्राहकों को वैल्यू देने और इनोवेशन (Innovation) पर लगातार फोकस करना।"

अगर आप सिर्फ़ एक तिमाही के प्रॉफिट को देखकर अपने इनोवेशन बजट में कटौती कर देते हैं, तो यह ऐसा है जैसे कोई किसान बीज बोने से इसलिए मना कर दे क्योंकि उसे आज ही अनाज चाहिए। यह भूख को मिटाने का नहीं, बल्कि आत्महत्या करने का तरीक़ा है।

HP ने हमेशा अपने ग्राहकों के लिए ऐसे प्रॉडक्ट बनाने पर ध्यान दिया जो मार्केट की दिशा बदल दें, न कि सिर्फ़ मार्केट को कॉपी करें। जब आपकी सोच लंबी होती है, तो आपकी टीम डरकर काम नहीं करती, बल्कि सोचकर काम करती है।

आइए, हमारे तीसरे कैरेक्टर मिस्टर भाटिया से मिलिए। मिस्टर भाटिया हर तीन महीने में अपनी टीम को 'नर्क' दिखा देते थे। "इस बार टारगेट मीट नहीं हुआ, तो बोनस कट जाएगा।" उनका पूरा ध्यान बस यही था कि किसी तरह इस तिमाही की रिपोर्ट अच्छी दिख जाए।

उन्होंने प्रॉडक्ट की क्वालिटी से समझौता किया, कस्टमर सपोर्ट का बजट कम कर दिया, और कर्मचारियों के काम के घंटे बढ़ा दिए। उन्होंने 'लागत कम' की, पर वैल्यू ख़त्म कर दी। एक बार तो उन्होंने अपने बेस्ट क्लाइंट को भी इसलिए मना कर दिया, क्योंकि उसकी पेमेंट 45 दिन बाद आने वाली थी, जो इस तिमाही में नहीं गिनी जाएगी।

यह तो वही बात हो गई कि आप अपने घर में पेंट कर रहे हैं, लेकिन दीवारें अंदर से खोखली हैं। बाहर से सब अच्छा, पर कभी भी गिर सकता है। मिस्टर भाटिया ने 'नंबर' तो अच्छे दिखाए, पर कंपनी के भविष्य को दाँव पर लगा दिया।

HP की कहानी इसका उल्टा है। उन्होंने कई बार रिस्क लिए, ऐसे प्रॉडक्ट पर सालों तक इन्वेस्ट किया जो तुरंत प्रॉफिट नहीं दे रहे थे, पर उन्हें पता था कि यही प्रॉडक्ट लॉन्ग-टर्म वैल्यू बनाएँगे।

लॉन्ग-टर्म सोच आपको 'डिफ़ेंसिव' नहीं, 'ऑफ़ेन्सिव' बनाती है।
  • कस्टमर की प्रॉब्लम को अपनी प्रॉब्लम समझो।
  • क्वालिटी से कभी समझौता मत करो।
  • कम कमाओ, पर 'भरोसा' ज़्यादा कमाओ।

जब आप ये माइंडसेट अपनाते हैं, तो आप एक सिस्टम बनाते हैं।

लेसन 1 का भरोसा और लेसन 2 का खुलापन (Openness) इस लॉन्ग-टर्म सोच को सपोर्ट करते हैं। जब एम्प्लॉयी को पता होता है कि कंपनी का लीडर सिर्फ़ आज के मुनाफ़े के पीछे नहीं भाग रहा है, तो वो ख़ुद भी ईमानदारी से काम करते हैं। वे जानते हैं कि उनके द्वारा बनाए गए हर प्रॉडक्ट, हर कोड, और हर सर्विस का लॉन्ग-टर्म इम्पैक्ट होगा।

HP Way में, लीडरशिप सिर्फ़ 'बॉस' बनने के बारे में नहीं थी, यह एक मशाल जलाने के बारे में थी—एक ऐसी मशाल जो पीढ़ी दर पीढ़ी जलती रहे। यह एक ऐसा बिज़नेस मॉडल है जो आपको 'शार्क' की तरह नहीं, बल्कि व्हेल की तरह बनाता है—धीरे, पर मज़बूती से, जो मार्केट में अपनी जगह बना लेता है।

अब यह तय आपको करना है: क्या आपको मिस्टर भाटिया की तरह 'क्वार्टरली किलर' बनना है, या डेविड पैकर्ड की तरह एक ऐसा लीडर बनना है जो आज काम करे, पर जिसका नाम कल के इतिहास में लिखा जाए?


बंद करो ये 'शॉर्टकट' ढूँढना! अगर आपकी टीम सुबह उठकर काम पर आने से डरती है, तो सबसे पहले अपनी लीडरशिप को बदलो।
  1. आज ही अपने किसी एम्प्लॉयी के पास जाओ और 'बिना एजेंडा' के उससे बात करो।
  2. अपने काम के हर छोटे फ़ैसले में पूछो: "क्या यह फ़ैसला अगले 10 साल में मेरी कंपनी को बेहतर बनाएगा या बस आज का बिल भरेगा?"
  3. अगर यह आर्टिकल पढ़कर आपको लगा कि यह आपकी कंपनी को 'सरकारी दफ्तर' बनने से बचा सकता है, तो इसे अपने उन सभी मैनेजर और लीडर दोस्तों के साथ शेयर करो जो अभी भी 'अटेंडेंस रजिस्टर' को अपना बाइबिल मानते हैं!

-----

अगर आप इस बुक की पूरी गहराई में जाना चाहते हैं, तो इस बुक को यहाँ से खरीद सकते है - Buy Now

आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now




#LeadershipGoals #TheHPWay #CompanyCulture #ManagementTips #BusinessStrategy


_

Post a Comment

Previous Post Next Post