The Power of Now (Hindi)



आज हम एक ऐसी किताब की बात करेंगे जो आपको प्रेजेंट मोमेंट की पावर का एहसास कराएगी – एकहार्ट टॉले की “द पावर ऑफ़ नाउ”। ये सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि एक गाइड है एक ज़्यादा पीसफुल और फुलफिल्ड लाइफ जीने की। इस समरी में हम इस बुक के दस सबसे ज़रूरी लेसन्स को समझेंगे, एकदम सिंपल हिंदी में, ताकि आप भी ‘अभी’ की पावर को एक्सपीरियंस कर सकें। तो चलिए, शुरू करते हैं इस ट्रांसफॉर्मेटिव जर्नी को!


लेसन 1 : यू आर नॉट योर माइंड
दोस्तों, “द पावर ऑफ़ नाउ” का सबसे पहला और इम्पोर्टेन्ट लेसन है कि “यू आर नॉट योर माइंड,” यानी आप अपना मन नहीं हैं। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि ज़्यादातर लोग अपने मन के साथ आइडेंटिफ़ाई कर लेते हैं, यानी वो ये समझने लगते हैं कि जो उनके दिमाग में थॉट्स चल रहे हैं, वही वो हैं। लेकिन एक्चुअली, थॉट्स सिर्फ़ थॉट्स हैं, वो आप नहीं हैं। आपका मन एक टूल है, एक इंस्ट्रूमेंट है जिसे आप यूज़ कर सकते हैं, लेकिन आप वो इंस्ट्रूमेंट नहीं हैं। इसे एक रेडियो के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। रेडियो में अलग-अलग स्टेशन्स चलते रहते हैं, अलग-अलग आवाज़ें आती रहती हैं। लेकिन रेडियो ख़ुद वो आवाज़ें नहीं है, वो सिर्फ़ उन्हें रिसीव करता है। वैसे ही, हमारा मन भी थॉट्स को रिसीव करता है, लेकिन हम वो थॉट्स नहीं हैं। हम कॉन्शियसनेस हैं, अवेयरनेस हैं, जो इन थॉट्स को ऑब्ज़र्व करती है। जब आप ये रियलाइज़ करते हैं कि आप अपना मन नहीं हैं, तो आप एक डिस्टेंस क्रिएट कर लेते हैं अपने थॉट्स और अपने बीच में। आप उन्हें सिर्फ़ ऑब्ज़र्व कर पाते हैं, बिना उनमें उलझे। ये बहुत इम्पोर्टेन्ट है, क्योंकि ज़्यादातर लोग अपने थॉट्स में ही खोए रहते हैं, और इस वजह से वो प्रेजेंट मोमेंट को एक्सपीरियंस नहीं कर पाते। वो या तो पास्ट के बारे में सोचते रहते हैं, या फ्यूचर के बारे में वरी करते रहते हैं। लेकिन जब आप अपने मन से आइडेंटिफ़ाई करना छोड़ देते हैं, तो आप प्रेजेंट मोमेंट में आ जाते हैं, ‘अभी’ में आ जाते हैं। ये ‘अभी’ ही असली पावर है, यही असली लाइफ है। टॉले कहते हैं कि जब आप अपने मन से आइडेंटिफ़ाई करते हैं, तो आप एक ‘पेन-बॉडी’ क्रिएट कर लेते हैं, यानी एक इमोशनल बॉडी जो पास्ट के पेनफुल एक्सपीरियंसेस से बनी होती है। ये पेन-बॉडी आपको नेगेटिव थॉट्स और इमोशन्स में फंसाए रखती है। लेकिन जब आप प्रेजेंट मोमेंट में आते हैं, तो आप इस पेन-बॉडी से फ्री हो जाते हैं। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें अपने मन के साथ आइडेंटिफ़ाई नहीं करना चाहिए। हमें ये रियलाइज़ करना चाहिए कि हम कॉन्शियसनेस हैं, अवेयरनेस हैं, जो थॉट्स को ऑब्ज़र्व करती है। यही है ‘द पावर ऑफ़ नाउ’ का फर्स्ट और सबसे इम्पोर्टेन्ट लेसन।


लेसन 2 : द प्रेजेंट मोमेंट इज़ ऑल यू हैव
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने सीखा कि हम अपना मन नहीं हैं, बल्कि कॉन्शियसनेस हैं जो थॉट्स को ऑब्ज़र्व करती है। अब हम बात करेंगे प्रेजेंट मोमेंट की इम्पोर्टेंस की – द प्रेजेंट मोमेंट इज़ ऑल यू हैव, यानी वर्तमान क्षण ही सब कुछ है जो आपके पास है। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि पास्ट और फ्यूचर सिर्फ़ हमारे माइंड में एक्सिस्ट करते हैं, रियलिटी में सिर्फ़ ‘अभी’ है, ‘यहीं’ है। पास्ट सिर्फ़ मेमोरीज़ का कलेक्शन है, और फ्यूचर सिर्फ़ एक इमेजिनेशन है। असली लाइफ तो ‘अभी’ में ही हो रही है। इसे एक एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। मान लीजिए, आप किसी बीच पर बैठे हैं। आप या तो पास्ट के बारे में सोच सकते हैं कि पिछली बार जब आप बीच पर आए थे तो क्या हुआ था, या आप फ्यूचर के बारे में वरी कर सकते हैं कि कल क्या होगा। लेकिन अगर आप प्रेजेंट मोमेंट में फुल्ली प्रेजेंट हैं, तो आप बीच की आवाज़ों को सुनेंगे, हवा को अपनी स्किन पर फील करेंगे, सनसेट को देखेंगे। यही असली एक्सपीरियंस है, यही असली लाइफ है। टॉले कहते हैं कि जब हम पास्ट या फ्यूचर में खोए रहते हैं, तो हम अपनी लाइफ का एक बहुत बड़ा हिस्सा मिस कर देते हैं। हम उस ब्यूटी को, उस जॉय को, उस पीस को मिस कर देते हैं जो प्रेजेंट मोमेंट में अवेलेबल है। वो कहते हैं कि एंजायटी, वरी, स्ट्रेस, ये सब पास्ट या फ्यूचर में रहने की वजह से होते हैं। जब आप प्रेजेंट मोमेंट में होते हैं, तो ये सब डिसअपीयर हो जाते हैं। प्रेजेंट मोमेंट में कोई प्रॉब्लम नहीं होती। प्रॉब्लम्स सिर्फ़ हमारे माइंड में होती हैं, जब हम पास्ट या फ्यूचर के बारे में सोचते हैं। टॉले एक और इम्पोर्टेन्ट बात कहते हैं – कि प्रेजेंट मोमेंट को एक्सेप्ट करना बहुत ज़रूरी है। जो है, उसे वैसे ही एक्सेप्ट करना। जब आप प्रेजेंट मोमेंट को रेज़िस्ट करते हैं, तो आप पेन क्रिएट करते हैं। लेकिन जब आप उसे एक्सेप्ट करते हैं, तो आप पीस फाइंड करते हैं। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें प्रेजेंट मोमेंट में जीना चाहिए, ‘अभी’ में जीना चाहिए। पास्ट और फ्यूचर सिर्फ़ थॉट्स हैं, रियलिटी तो ‘अभी’ है। जैसे एक फ्लावर ‘अभी’ ही ब्लूम करता है, वैसे ही लाइफ भी ‘अभी’ ही होती है। इसलिए प्रेजेंट मोमेंट में फुल्ली प्रेजेंट रहना बहुत ज़रूरी है।


लेसन 3 : द बॉडी एज़ अ पोर्टल टू द नाउ
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने प्रेजेंट मोमेंट की इम्पोर्टेंस की बात की। अब हम बात करेंगे एक ऐसे टूल की जो हमें प्रेजेंट मोमेंट में एंकर कर सकता है – हमारा शरीर, द बॉडी एज़ अ पोर्टल टू द नाउ, यानी शरीर ‘अभी’ का प्रवेश द्वार। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि हमारा शरीर प्रेजेंट मोमेंट में ही एक्सिस्ट करता है। हमारे थॉट्स पास्ट या फ्यूचर में जा सकते हैं, लेकिन हमारा शरीर हमेशा ‘अभी’ में ही होता है। इसलिए, अपने शरीर पर ध्यान देकर हम प्रेजेंट मोमेंट में आ सकते हैं। इसे एक सिंपल एक्सरसाइज से समझते हैं। अभी, इसी मोमेंट, अपनी बॉडी पर ध्यान दीजिए। अपने पैरों को फील कीजिए, अपनी साँसों को फील कीजिए, अपने आस-पास की आवाज़ों को सुनिए। जब आप ऐसा करते हैं, तो आप ऑटोमेटिकली प्रेजेंट मोमेंट में आ जाते हैं। आपके थॉट्स स्लो डाउन हो जाते हैं, और आप एक सेंस ऑफ़ पीस एक्सपीरियंस करते हैं। टॉले कहते हैं कि ज़्यादातर लोग अपने शरीर से डिस्कनेक्टेड रहते हैं। वो अपने थॉट्स में इतने खोए रहते हैं कि उन्हें अपनी बॉडी का एहसास ही नहीं होता। लेकिन जब आप अपनी बॉडी से कनेक्ट करते हैं, तो आप एक डीपर लेवल ऑफ़ अवेयरनेस एक्सपीरियंस करते हैं। आप अपनी सेंसेशन्स को, अपनी फीलिंग्स को, अपनी एनर्जी को फील करते हैं। ये एक बहुत ही पावरफुल एक्सपीरियंस हो सकता है। टॉले एक और इम्पोर्टेन्ट बात कहते हैं – कि पेन-बॉडी, जिसके बारे में हमने पहले बात की थी, वो भी बॉडी में ही स्टोर होती है। जब आप अपनी बॉडी पर ध्यान देते हैं, तो आप इस पेन-बॉडी को भी एक्सपीरियंस कर सकते हैं। लेकिन जब आप उसे सिर्फ़ ऑब्ज़र्व करते हैं, बिना उसमें उलझे, तो वो धीरे-धीरे डिसअपीयर होने लगती है। वो कहते हैं कि बॉडी सिर्फ़ फिजिकल सेंसेशन्स का कलेक्शन नहीं है, बल्कि ये एक लिविंग, इंटेलिजेंट एंटिटी है। ये हमें हर मोमेंट में प्रेजेंट मोमेंट में एंकर कर सकती है। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें अपनी बॉडी पर ध्यान देना चाहिए। हमें अपनी सेंसेशन्स को फील करना चाहिए, अपनी साँसों को ऑब्ज़र्व करना चाहिए, और अपनी बॉडी के साथ कनेक्ट करना चाहिए। यही है ‘अभी’ में आने का, प्रेजेंट मोमेंट में एंकर होने का, एक बहुत ही इफेक्टिव तरीका। जैसे एक ट्री अपनी रूट्स से ग्राउंडेड रहता है, वैसे ही हमारी बॉडी हमें प्रेजेंट मोमेंट में ग्राउंडेड रखती है। इसलिए अपनी बॉडी के साथ कनेक्ट करना बहुत ज़रूरी है।


लेसन 4 : ऑब्ज़र्विंग द थिंकर
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने देखा कि कैसे हमारा शरीर हमें प्रेजेंट मोमेंट में एंकर कर सकता है। अब हम एक और इम्पोर्टेन्ट प्रैक्टिस की बात करेंगे जो हमें प्रेजेंट मोमेंट में रहने में हेल्प करती है – ऑब्ज़र्विंग द थिंकर, यानी विचारक का अवलोकन। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि हमारे माइंड में लगातार थॉट्स चलते रहते हैं, एक कंटीन्यूअस स्ट्रीम ऑफ़ थॉट्स। लेकिन ज़्यादातर लोग इन थॉट्स में खोए रहते हैं, वो ये नहीं समझ पाते कि वो थॉट्स को ऑब्ज़र्व भी कर सकते हैं। जब आप अपने थॉट्स को ऑब्ज़र्व करते हैं, तो आप एक डिस्टेंस क्रिएट कर लेते हैं अपने थॉट्स और अपने बीच में। आप ये रियलाइज़ करते हैं कि आप वो थॉट्स नहीं हैं, बल्कि आप वो अवेयरनेस हैं जो उन थॉट्स को ऑब्ज़र्व कर रही है। इसे एक मूवी देखने के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। जब आप एक मूवी देखते हैं, तो आप स्क्रीन पर हो रही एक्टिविटी को ऑब्ज़र्व करते हैं। आप उस मूवी में खो नहीं जाते, बल्कि आप उसे एक ऑब्ज़र्वर के रूप में देखते हैं। वैसे ही, जब आप अपने थॉट्स को ऑब्ज़र्व करते हैं, तो आप एक मेंटल ऑब्ज़र्वर बन जाते हैं। आप अपने थॉट्स में खो नहीं जाते, बल्कि आप उन्हें एक डिस्टेंस से देखते हैं। टॉले कहते हैं कि जब आप अपने थॉट्स को ऑब्ज़र्व करते हैं, तो आप एक गैप क्रिएट करते हैं थॉट्स के बीच में। ये गैप साइलेंस का, पीस का, प्रेज़ेंस का स्पेस है। जब आप इस गैप में एंटर करते हैं, तो आप एक डीपर लेवल ऑफ़ बीइंग एक्सपीरियंस करते हैं। आप ‘अभी’ में आ जाते हैं, प्रेजेंट मोमेंट में आ जाते हैं। वो कहते हैं कि ये प्रैक्टिस शुरू में थोड़ी चैलेंजिंग हो सकती है, क्योंकि हमारा माइंड लगातार थॉट्स जनरेट करता रहता है। लेकिन प्रैक्टिस से, आप इस स्किल में मास्टर बन सकते हैं। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें अपने थॉट्स को ऑब्ज़र्व करना चाहिए, बिना उनमें उलझे। हमें ये रियलाइज़ करना चाहिए कि हम वो थॉट्स नहीं हैं, बल्कि हम वो अवेयरनेस हैं जो उन थॉट्स को ऑब्ज़र्व कर रही है। यही है ‘ऑब्ज़र्विंग द थिंकर’ की पावर, जो हमें प्रेजेंट मोमेंट में रहने में हेल्प करती है। जैसे एक बर्ड स्काई में फ्लाई करते हुए सब कुछ ऑब्ज़र्व करता है, वैसे ही हमें भी अपने थॉट्स को ऑब्ज़र्व करना चाहिए, बिना उनमें खोए।


लेसन 5 : द पेन-बॉडी
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने थॉट्स को ऑब्ज़र्व करने की प्रैक्टिस की बात की। अब हम एक और इम्पोर्टेन्ट कॉन्सेप्ट पर बात करेंगे जो हमारे इमोशनल पेन से रिलेटेड है – द पेन-बॉडी, यानी पीड़ा-शरीर। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि ज़्यादातर लोगों के अंदर एक इमोशनल बॉडी होती है जो पास्ट के पेनफुल एक्सपीरियंसेस से बनी होती है। ये पेन-बॉडी एक तरह का एनर्जी फ़ील्ड है जो नेगेटिव इमोशन्स जैसे एंगर, सैडनेस, फ़ियर, और गिल्ट से बना होता है। ये कोई फिजिकल बॉडी नहीं है, बल्कि एक इमोशनल और एनर्जी बॉडी है जो हमारी बॉडी में स्टोर होती है। टॉले कहते हैं कि जब भी कोई सिचुएशन हमें पास्ट के पेनफुल एक्सपीरियंस की याद दिलाती है, तो ये पेन-बॉडी एक्टिवेट हो जाती है, और हम फिर से वही नेगेटिव इमोशन्स एक्सपीरियंस करने लगते हैं। ये एक साइकल बन जाता है, जहाँ हम बार-बार पास्ट के पेन में जीते रहते हैं। इसे एक स्प्रिंग के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। जब आप एक स्प्रिंग को दबाते हैं, तो उसमें एनर्जी स्टोर हो जाती है। जैसे ही आप उसे छोड़ते हैं, वो एनर्जी रिलीज़ हो जाती है। वैसे ही, जब हम पास्ट के पेनफुल एक्सपीरियंसेस को सप्रेस करते हैं, तो वो एनर्जी हमारी पेन-बॉडी में स्टोर हो जाती है। और जब कोई ट्रिगर आता है, तो वो एनर्जी फिर से रिलीज़ हो जाती है। टॉले कहते हैं कि पेन-बॉडी को डिसॉल्व करने का एक ही तरीका है – प्रेज़ेंस। जब आप प्रेजेंट मोमेंट में फुल्ली प्रेजेंट होते हैं, तो आप पेन-बॉडी को ऑब्ज़र्व कर पाते हैं, बिना उसमें उलझे। जब आप उसे सिर्फ़ ऑब्ज़र्व करते हैं, तो वो अपनी पावर खोने लगती है, और धीरे-धीरे डिसअपीयर हो जाती है। वो कहते हैं कि पेन-बॉडी को फीड करने वाली चीज़ है थॉट। जब हम पास्ट के बारे में नेगेटिव थॉट्स सोचते हैं, तो हम पेन-बॉडी को और स्ट्रॉन्ग बनाते हैं। लेकिन जब हम प्रेजेंट मोमेंट में होते हैं, तो हम थॉट से फ्री होते हैं, और इस वजह से पेन-बॉडी को कोई फ़ूड नहीं मिलता। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें अपनी पेन-बॉडी को पहचानना चाहिए, और उसे प्रेजेंट मोमेंट की अवेयरनेस से हील करना चाहिए। पास्ट में अटके रहने से कोई फ़ायदा नहीं है, असली हीलिंग ‘अभी’ में ही होती है। जैसे एक घाव हवा लगने से जल्दी भरता है, वैसे ही पेन-बॉडी भी प्रेज़ेंस में जल्दी हील होती है।


लेसन 6: ब्रेकिंग फ्री फ्रॉम द पेन-बॉडी
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने पेन-बॉडी के कॉन्सेप्ट को समझा। अब हम बात करेंगे उस प्रोसेस की जिससे हम इस पेन-बॉडी से फ्री हो सकते हैं – ब्रेकिंग फ्री फ्रॉम द पेन-बॉडी, यानी पीड़ा-शरीर से मुक्ति। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि पेन-बॉडी से फ्री होने का एक ही तरीका है – प्रेज़ेंस, यानी वर्तमान में पूरी तरह से उपस्थित होना। जब आप प्रेजेंट मोमेंट में होते हैं, तो आप अपने थॉट्स और इमोशन्स को ऑब्ज़र्व कर पाते हैं, बिना उनमें उलझे। ये ऑब्ज़र्वेशन ही वो की है जो पेन-बॉडी को डिसॉल्व करती है। टॉले कहते हैं कि पेन-बॉडी एक तरह का एनर्जी फ़ील्ड है जो नेगेटिव इमोशन्स से बना होता है। जब आप प्रेजेंट मोमेंट में होते हैं, तो आप इस एनर्जी को फील कर सकते हैं, लेकिन आप इससे आइडेंटिफ़ाई नहीं करते। आप इसे सिर्फ़ ऑब्ज़र्व करते हैं, जैसे आप एक क्लाउड को स्काई में मूव करते हुए देखते हैं। जब आप ऐसा करते हैं, तो पेन-बॉडी अपनी पावर खोने लगती है, और धीरे-धीरे डिसअपीयर हो जाती है। इसे एक बल्ब के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। जब एक बल्ब जल रहा होता है, तो वो लाइट एमिट करता है। लेकिन जब आप उसे स्विच ऑफ़ कर देते हैं, तो लाइट डिसअपीयर हो जाती है। वैसे ही, जब आप प्रेजेंट मोमेंट में होते हैं, तो आप पेन-बॉडी को ‘स्विच ऑफ़’ कर देते हैं, यानी आप उससे आइडेंटिफ़ाई करना बंद कर देते हैं। टॉले एक और इम्पोर्टेन्ट बात कहते हैं – कि पेन-बॉडी को फीड करने वाली चीज़ है रेसिस्टेंस, यानी प्रतिरोध। जब आप किसी नेगेटिव इमोशन को रेज़िस्ट करते हैं, तो आप उसे और स्ट्रॉन्ग बनाते हैं। लेकिन जब आप उसे एक्सेप्ट करते हैं, बिना उसमें उलझे, तो वो अपनी पावर खो देता है। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि पेन-बॉडी से फ्री होने के लिए हमें प्रेजेंट मोमेंट में रहना चाहिए, अपने इमोशन्स को ऑब्ज़र्व करना चाहिए, और उन्हें एक्सेप्ट करना चाहिए, बिना उनमें उलझे। यही है पेन-बॉडी से मुक्ति का रास्ता, जो हमें ज़्यादा पीसफुल और फुलफिल्ड लाइफ की ओर ले जाता है। जैसे एक बटरफ्लाई ककून से फ्री होता है, वैसे ही हम भी प्रेज़ेंस की पावर से पेन-बॉडी से फ्री हो सकते हैं।


लेसन 7 : सरेंडर टू द प्रेजेंट मोमेंट
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने पेन-बॉडी से फ्री होने के तरीके की बात की। अब हम एक और क्रूशियल प्रैक्टिस पर बात करेंगे जो हमें प्रेजेंट मोमेंट में रहने में हेल्प करती है – सरेंडर टू द प्रेजेंट मोमेंट, यानी वर्तमान क्षण में समर्पण। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि सरेंडर का मतलब ये नहीं है कि हार मान लेना या गिव अप कर देना, बल्कि इसका मतलब है जो है, उसे वैसे ही एक्सेप्ट करना, बिना रेज़िस्टेंस के। जब आप प्रेजेंट मोमेंट को रेज़िस्ट करते हैं, तो आप इंटरनल कॉन्फ्लिक्ट क्रिएट करते हैं, जिससे पेन और सफरिंग होती है। लेकिन जब आप प्रेजेंट मोमेंट को सरेंडर करते हैं, तो आप पीस और एक्सेप्टेंस एक्सपीरियंस करते हैं। इसे एक रिवर के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। जब एक रिवर बह रही होती है, तो वो हर ऑब्स्टेकल को सरेंडर कर देती है, यानी वो उसके अराउंड फ्लो करती है, उसे रेज़िस्ट नहीं करती। वैसे ही, जब हम लाइफ के फ्लो को सरेंडर करते हैं, तो हम ज़्यादा ईज़ और पीस एक्सपीरियंस करते हैं। टॉले कहते हैं कि सरेंडर का मतलब ये नहीं है कि आप एक्शन लेना छोड़ दें, बल्कि इसका मतलब है कि आप एक्शन लें, लेकिन बिना रेज़िस्टेंस के, बिना अटैचमेंट के। आप अपना बेस्ट एफर्ट दें, लेकिन रिजल्ट को लेकर वरी न करें। जब आप रिजल्ट को लेकर अटैच्ड होते हैं, तो आप एंजायटी और डिसअपॉइंटमेंट एक्सपीरियंस करते हैं। लेकिन जब आप सरेंडर करते हैं, तो आप फ्री हो जाते हैं, आप प्रेजेंट मोमेंट में फुल्ली प्रेजेंट हो जाते हैं। वो कहते हैं कि सरेंडर एक डीप इनर एक्सेप्टेंस है ऑफ़ व्हाट इज़। ये एक रियलाइजेशन है कि जो हो रहा है, वो होना ही था, और उसे रेज़िस्ट करने से कोई फ़ायदा नहीं है। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें प्रेजेंट मोमेंट को सरेंडर करना चाहिए, यानी जो है, उसे वैसे ही एक्सेप्ट करना चाहिए। यही है पीस और फ्रीडम का रास्ता, जो हमें ज़्यादा फुलफिल्ड लाइफ की ओर ले जाता है। जैसे एक ट्री हवा में झुक जाता है, वैसे ही हमें भी लाइफ के फ्लो को सरेंडर करना चाहिए।


लेसन 8 : द इनर बॉडी
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने प्रेजेंट मोमेंट में सरेंडर करने की बात की। अब हम एक और इम्पोर्टेन्ट एस्पेक्ट पर बात करेंगे जो हमें प्रेज़ेंस में एंकर करता है – द इनर बॉडी, यानी आंतरिक शरीर। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि हमारा शरीर सिर्फ़ फिजिकल फॉर्म नहीं है, बल्कि एक एनर्जी फ़ील्ड भी है, एक लिविंग प्रेज़ेंस भी है जिसे हम ‘इनर बॉडी’ कहते हैं। ये वो सेंसेशन्स हैं जो हम अपनी बॉडी में फील करते हैं, जैसे साँसों का चलना, हार्टबीट, या बॉडी में होने वाली दूसरी सूक्ष्म सेंसेशन्स। टॉले कहते हैं कि ज़्यादातर लोग इस इनर बॉडी से डिस्कनेक्टेड रहते हैं, वो सिर्फ़ अपने थॉट्स में खोए रहते हैं। लेकिन जब हम अपनी अवेयरनेस को अपनी इनर बॉडी की तरफ़ डायरेक्ट करते हैं, तो हम एक डीपर लेवल ऑफ़ प्रेज़ेंस एक्सपीरियंस करते हैं। हम ‘अभी’ में आ जाते हैं, प्रेजेंट मोमेंट में एंकर हो जाते हैं। इसे एक सिंपल प्रैक्टिस से समझते हैं। अपनी आँखें बंद करें और अपनी बॉडी पर ध्यान दें। अपनी साँसों को फील करें, अपनी बॉडी में होने वाली सेंसेशन्स को ऑब्ज़र्व करें। जब आप ऐसा करते हैं, तो आप एक कामनेस, एक पीस एक्सपीरियंस करेंगे। टॉले कहते हैं कि इनर बॉडी कोई पास्ट या फ्यूचर नहीं जानती, ये सिर्फ़ ‘अभी’ में एक्सिस्ट करती है। इसलिए, जब हम अपनी इनर बॉडी से कनेक्ट करते हैं, तो हम ऑटोमेटिकली प्रेजेंट मोमेंट में आ जाते हैं। वो कहते हैं कि पेन-बॉडी भी इनर बॉडी का ही एक पार्ट है, लेकिन जब हम अपनी अवेयरनेस को पूरे इनर बॉडी पर फोकस करते हैं, तो पेन-बॉडी अपनी पावर खोने लगती है। टॉले एक और इम्पोर्टेन्ट बात कहते हैं – कि इनर बॉडी एक सोर्स ऑफ़ जॉय और वेल-बीइंग भी है। जब हम इससे कनेक्ट करते हैं, तो हम एक डीप सेंस ऑफ़ पीस और फुलफिलमेंट एक्सपीरियंस करते हैं। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें अपनी इनर बॉडी पर ध्यान देना चाहिए, उससे कनेक्ट करना चाहिए। ये हमें प्रेजेंट मोमेंट में एंकर करने का, पीस और जॉय एक्सपीरियंस करने का, एक बहुत ही पावरफुल तरीका है। जैसे एक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट की साउंड उसकी बॉडी से रेज़ोनेट करती है, वैसे ही हमारी अवेयरनेस हमारी इनर बॉडी से रेज़ोनेट करती है, और हमें प्रेजेंट मोमेंट में एंकर करती है।


लेसन 9 : द अनमैनिफेस्टेड एंड द मैनिफेस्टेड
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने इनर बॉडी की बात की जो हमें प्रेजेंट मोमेंट में एंकर करती है। अब हम एक और डीप कॉन्सेप्ट पर बात करेंगे – द अनमैनिफेस्टेड एंड द मैनिफेस्टेड, यानी अव्यक्त और व्यक्त। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि इस यूनिवर्स में दो रियलिटीज़ हैं: एक है मैनिफेस्टेड, यानी व्यक्त, जो वो है जो हम अपनी सेंसेस से परसीव करते हैं – फिजिकल वर्ल्ड, थॉट्स, इमोशन्स। और दूसरी है अनमैनिफेस्टेड, यानी अव्यक्त, जो वो है जो हमारी सेंसेस से परे है – बीइंग, प्रेज़ेंस, द सोर्स ऑफ़ ऑल क्रिएशन। टॉले कहते हैं कि ये अनमैनिफेस्टेड ही असली रियलिटी है, और मैनिफेस्टेड सिर्फ़ उसका एक एक्सप्रेशन है। इसे एक ओशन के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। ओशन की सरफेस पर वेव्स उठती हैं, गिरती हैं, चेंज होती रहती हैं। ये मैनिफेस्टेड है। लेकिन ओशन की डेप्थ, जो काम और स्टिल है, वो अनमैनिफेस्टेड है। वेव्स आती-जाती रहेंगी, लेकिन ओशन हमेशा वही रहता है। वैसे ही, हमारी लाइफ में भी थॉट्स, इमोशन्स, और एक्सटर्नल सरकमस्टान्सेस चेंज होते रहते हैं, ये मैनिफेस्टेड है। लेकिन हमारे अंदर एक डीपर लेवल ऑफ़ बीइंग है, एक प्रेज़ेंस है जो हमेशा स्टिल और अनचेंज्ड रहती है, ये अनमैनिफेस्टेड है। टॉले कहते हैं कि जब हम अपनी अवेयरनेस को इस अनमैनिफेस्टेड की तरफ़ शिफ्ट करते हैं, तो हम एक डीप सेंस ऑफ़ पीस और कनेक्शन एक्सपीरियंस करते हैं। हम ये रियलाइज़ करते हैं कि हम सिर्फ़ हमारी बॉडी या माइंड नहीं हैं, बल्कि हम इस अनमैनिफेस्टेड का ही एक पार्ट हैं, एक यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस का पार्ट हैं। वो कहते हैं कि ये अनमैनिफेस्टेड ही सोर्स ऑफ़ ऑल क्रिएशन है, यहीं से सब कुछ ओरिजिनेट होता है। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें सिर्फ़ मैनिफेस्टेड वर्ल्ड पर ही फोकस नहीं करना चाहिए, बल्कि हमें अपनी अवेयरनेस को अनमैनिफेस्टेड की तरफ़ भी डायरेक्ट करना चाहिए। यही है असली पीस और फुलफिलमेंट का सोर्स। जैसे एक आइसबर्ग का सिर्फ़ एक छोटा सा पार्ट ही पानी के ऊपर दिखता है, वैसे ही मैनिफेस्टेड वर्ल्ड भी अनमैनिफेस्टेड का एक छोटा सा पार्ट है। इसलिए अनमैनिफेस्टेड से कनेक्ट करना बहुत ज़रूरी है।


लेसन 10 : द डिस्कवरी ऑफ़ बीइंग
दोस्तों, पिछले लेसन में हमने अनमैनिफेस्टेड और मैनिफेस्टेड रियलिटीज़ की बात की। अब हम ‘द पावर ऑफ़ नाउ’ के सबसे इम्पोर्टेन्ट एस्पेक्ट पर बात करेंगे – द डिस्कवरी ऑफ़ बीइंग, यानी होने की खोज। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि ज़्यादातर लोग ‘बीइंग’ को नहीं जानते, वो सिर्फ़ ‘डूइंग’ में बिज़ी रहते हैं, यानी लगातार कुछ न कुछ करते रहते हैं। वो अपनी आइडेंटिटी अपने रोल, अपने जॉब, अपनी पोज़िशन्स से डिफ़ाइन करते हैं। लेकिन टॉले कहते हैं कि असली आइडेंटिटी ‘बीइंग’ में है, यानी उस प्रेज़ेंस में जो हमारे अंदर हमेशा एक्सिस्ट करती है, चाहे हम कुछ भी कर रहे हों या न कर रहे हों। ये ‘बीइंग’ वो स्पेस है जहाँ कोई थॉट नहीं होता, कोई इमोशन नहीं होता, सिर्फ़ प्योर अवेयरनेस होती है। इसे एक रूम के एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। एक रूम में अलग-अलग फ़र्नीचर हो सकता है, अलग-अलग डेकोरेशन हो सकती है। ये ‘डूइंग’ है, यानी रूम में जो कुछ है वो। लेकिन रूम ख़ुद, जो स्पेस है, वो ‘बीइंग’ है। फ़र्नीचर चेंज हो सकता है, डेकोरेशन चेंज हो सकती है, लेकिन रूम हमेशा वही रहता है। वैसे ही, हमारी लाइफ में भी एक्सटर्नल सरकमस्टान्सेस चेंज होते रहते हैं, थॉट्स और इमोशन्स आते-जाते रहते हैं, ये ‘डूइंग’ है। लेकिन हमारे अंदर एक स्पेस है, एक प्रेज़ेंस है जो हमेशा स्टिल और अनचेंज्ड रहती है, ये ‘बीइंग’ है। टॉले कहते हैं कि जब हम इस ‘बीइंग’ को डिस्कवर करते हैं, तो हम एक डीप सेंस ऑफ़ पीस, जॉय और फुलफिलमेंट एक्सपीरियंस करते हैं। हम ये रियलाइज़ करते हैं कि हम सिर्फ़ हमारी बॉडी या माइंड नहीं हैं, बल्कि हम कुछ ज़्यादा हैं, एक यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस का पार्ट हैं। वो कहते हैं कि ये ‘बीइंग’ ही असली होम है, जहाँ हमें हमेशा पीस मिलती है। तो दोस्तों, इस लेसन से हम सीखते हैं कि हमें सिर्फ़ ‘डूइंग’ पर ही फोकस नहीं करना चाहिए, बल्कि हमें ‘बीइंग’ को भी डिस्कवर करना चाहिए। यही है असली स्पिरिचुअल अवेकनिंग, यही है ‘द पावर ऑफ़ नाउ’ का अल्टीमेट मेसेज। जैसे एक क्लाउड स्काई में मूव करता है, वैसे ही हमारी लाइफ के एक्सपीरियंसेस आते-जाते रहते हैं, लेकिन स्काई हमेशा वही रहता है। वैसे ही, ‘बीइंग’ हमेशा हमारे अंदर एक्सिस्ट करता है, हमें सिर्फ़ उसे डिस्कवर करना है।


तो दोस्तों, ये थे एकहार्ट टॉले की “द पावर ऑफ़ नाउ” के दस पावरफुल लेसन्स। हमने सीखा कि कैसे प्रेजेंट मोमेंट में जीना, अपने मन से आइडेंटिफ़ाई न करना, और अपनी इनर बॉडी से कनेक्ट करना हमें ज़्यादा पीसफुल और फुलफिल्ड लाइफ की ओर ले जा सकता है। ये सिर्फ़ एक किताब की समरी नहीं है, बल्कि एक गाइड है एक ज़्यादा कॉन्शियस और अवेयर लाइफ जीने की। उम्मीद है कि आपको ये समरी पसंद आयी होगी और आपको कुछ नया सीखने को मिला होगा। अगर आपको ये समरी अच्छी लगी तो इसे लाइक और शेयर करें। मिलते हैं अगले समरी में, तब तक के लिए, ‘अभी’ में जिएं!

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