The Winner Within (Hindi)


अगर आपकी 'सक्सेस' लिस्ट भी 'सोमवार से जिम जाऊँगा' वाली लिस्ट जैसी है, जो कभी पूरी नहीं होती, तो मुबारक हो! आप अपनी लाइफ का बेस्ट गेम मिस कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि जीत बस लक (luck) है और 'विनर' पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते? पैट रिले (Pat Riley) की किताब 'द विनर विदिन' कहती है: यह आपकी सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी (misunderstanding) है। असली चैम्पियन बनने का सीक्रेट सिर्फ़ आपके अंदर छिपा है। आइए, जानते हैं इस किताब के 3 गोल्डन लेसन, जो आपको परमानेंट विनर बना देंगे।


Lesson : जीत की क़ीमत – द डेली पेन

हम सबको एक 'मैजिकल मोमेंट' का इंतज़ार रहता है। एक दिन सुबह उठेंगे और अचानक सब बदल जाएगा। वज़न कम हो जाएगा। बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा। बॉस आपकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ेगा। हम इसी दिन को 'जीत' मानकर बैठे हैं। हम सोचते हैं कि सक्सेस एक 'डेस्टिनेशन वेडिंग' है, जो एक रात में शानदार ढंग से निपट जाती है।

पर पैट रिले (Pat Riley) आपको एक कड़वा सच बताते हैं। वे कहते हैं, "द प्राइस ऑफ़ विनिंग इज़ हायर दैन द प्राइस ऑफ़ लूज़िंग।" यानी, हारने की क़ीमत से ज़्यादा, जीतने की क़ीमत होती है। और यह क़ीमत कोई चेक नहीं है, जिसे एक बार भरा जाए। यह क़ीमत है आपका हर रोज़ का संघर्ष।

विनिंग (Winning) कोई इवेंट (event) नहीं है, यह एक हैबिट (habit) है। ज़रा सोचिए, आप एक बार जिम जाकर फोटो खिंचा लें, तो क्या 6-पैक एब्स बन जाएँगे? नहीं न। सबको रिजल्ट चाहिए, पर कोई प्रोसेस नहीं चाहता। हम चाहते हैं कि 'फ़ास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट' दबाएँ और करोड़पति बन जाएँ। पर रियलिटी क्या है? रियलिटी है आपका 5 बजे उठकर वर्कआउट करना, जब पूरा मोहल्ला खर्राटे मार रहा होता है। रियलिटी है वह रात जब आप अपनी प्रेज़ेंटेशन (presentation) को तीसरी बार चेक कर रहे होते हैं, जबकि आपके दोस्त पार्टी कर रहे हैं। यही 'द डेली पेन' है।

इसे 'सैक्रिफाइस' नहीं, बल्कि 'इनवेस्टमेंट' मानिए। हम एक शादी में 5 लाख खर्च करने के लिए तैयार हैं, पर रोज़ की 15 मिनट की रीडिंग (reading) पर दिमाग़ लगाने को तैयार नहीं हैं। यह कैसा गणित है? एक एवरेज (average) आदमी अपनी लाइफ में 80% एनर्जी उस 20% काम पर लगाता है जो दिखते हैं। यानी, स्टेज पर चमकना। पर एक विनर अपनी 80% एनर्जी उन 80% कामों पर लगाता है जो किसी को दिखते नहीं। सुबह की मीटिंग की तैयारी। क्लाइंट को चौथा फॉलो-अप। वह एक्स्ट्रा माइल (extra mile) जाना, जो आपकी जॉब डिस्क्रिप्शन में नहीं लिखा था।

इसे एक मज़ेदार उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, आप एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर (influencer) बनना चाहते हैं। आपका दोस्त एक दिन में एक वायरल रील (reel) बनाता है और कहता है कि 'मैं तो विनर हूँ।' पर आप रोज़ 5 घंटे रिसर्च करते हैं, स्क्रिप्ट लिखते हैं, और 3 रीलों के लिए फ़ुटेज शूट करते हैं। आपकी रीलों पर अभी 100 लाइक्स आ रहे हैं, उसके पर 10,000। पर उसका वायरल रील बस एक लक बाय चांस था। आपकी मेहनत में कंसिस्टेंसी (consistency) है। वह जीत आज नहीं तो कल एक परमानेंट स्ट्रक्चर (permanent structure) बनाएगी। क्योंकि आपने जीत की क़ीमत रोज़ चुकाई है।

पैट रिले कहते हैं, अपनी लाइफ में एक 'विनर्स कोड' (Winner's Code) सेट करो। जैसे, 'मैं कभी भी आधा-अधूरा काम नहीं करूँगा।' 'मैं हर असाइनमेंट (assignment) को चेक करने के बाद एक बार फिर चेक करूँगा।' यह छोटे-छोटे अनुशासन (disciplines) ही 'हैबिट ऑफ़ विनिंग' बनाते हैं। यह छोटे स्टेप्स आपको बड़े 'फेलियर' से बचाते हैं। अगर आप रोज़ अपने काम में 1% 'बेस्ट' डालते हैं, तो साल के अंत तक आप 37 गुना बेहतर बन जाते हैं। इसे ही 'कम्पाउंडिंग (compounding) इफेक्ट ऑफ़ डिसिप्लिन' कहते हैं।

तो अगली बार जब आपको आलस आए और दिल कहे 'आज छोड़ यार, कल कर लेंगे', तो याद रखना। आप सिर्फ़ एक दिन मिस नहीं कर रहे हैं, आप उस 'विनिंग हैबिट' की नींव में एक क्रैक (crack) डाल रहे हैं। और यह क्रैक धीरे-धीरे पूरी बिल्डिंग को गिरा सकता है। खुद से पूछो, क्या मैं 'जीतने की क़ीमत' चुकाने को तैयार हूँ, या बस 'लक' के भरोसे बैठा हूँ?

यही 'रोज़ की जंग' जब आप जीतते हैं, तो आप पहले खुद के विनर बनते हैं। और जब आप खुद को डिसिप्लिन कर लेते हैं, तभी आप किसी और के साथ मिलकर एक बड़ी जीत हासिल कर सकते हैं। और यही हमें दूसरे लेसन की तरफ़ ले जाता है: एक टीम में काम करने की जादूई शक्ति।


Lesson : ग्रुप सोल का महत्त्व — तुम नहीं, हम की जीत

पिछले लेसन में हमने सीखा कि जीतने की क़ीमत है रोज़ का अनुशासन। वह आपका पर्सनल संघर्ष है। पर आप एक आईलैंड (island) नहीं हैं। आप एक टीम का हिस्सा हैं। चाहे वह आपकी फ़ैमिली हो, आपका ऑफ़िस हो, या आपके दोस्त। क्या आपने कभी सोचा है कि एक बहुत अच्छी टीम भी बड़े मैच क्यों हार जाती है? जवाब है: 'ग्रुप सोल' की कमी।

'ग्रुप सोल' क्या है? यह टीम के हर मेंबर की मिली-जुली आत्मा है। यह वो अदृश्य शक्ति है जो 1+1 को 2 नहीं, बल्कि 5 बना देती है। पैट रिले कहते हैं कि जब हर खिलाड़ी अपना ईगो (Ego) दरवाज़े पर छोड़कर आता है, तब यह सोल (आत्मा) पैदा होती है। हमारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? हमारा अपना 'मैं'।

सोचिए, एक टीम में 10 टैलेंटेड (talented) लोग हैं। सब खुद को विनर मानते हैं। पर जब एक को पास देना होता है, तो वह 'मैं' की आवाज़ सुनकर ख़ुद ही बॉल लेकर भागता है। और हार जाता है। क्यों? क्योंकि उसे लगा कि 'सक्सेस स्टोरी' में सिर्फ़ उसका नाम आना चाहिए। हमारी सोसाइटी में भी यही हाल है। हम सब 'किंग' बनना चाहते हैं, पर कोई 'वज़ीर' नहीं बनना चाहता। वज़ीर यानी वह जो किंग को सही सलाह देता है, जो पर्दे के पीछे का काम करता है, जो बिना क्रेडिट लिए सपोर्ट करता है।

हम 'हीरो वर्शिप' (Hero Worship) में इतने खोए हैं कि 'टीम वर्क' को भूल गए हैं। जैसे, एक फ़ैमिली में कोई एक व्यक्ति ही सब काम करता है और बाक़ी सब बस ऑर्डर देते हैं। वह व्यक्ति थक जाता है। टीम का सिस्टम टूट जाता है। रिले कहते हैं, असली लीडर वह नहीं है जो सबसे ज़्यादा स्कोर करे। असली लीडर वह है जो अपनी टीम के सबसे कमज़ोर मेंबर को भी बेस्ट बना दे।

ग्रुप सोल को बनाने के लिए पर्सनल सैक्रिफाइस (sacrifice) की ज़रूरत होती है। इसे एक मज़ेदार ऑफ़िस सिचुएशन से समझते हैं। आपका बॉस एक प्रोजेक्ट पर 4 लोगों की टीम बनाता है। आपके पास सबसे शानदार आईडिया है। पर आपकी टीम का एक साथी, जो नया है, घबरा रहा है। एक 'एगो-ड्रिवेन' (Ego-driven) व्यक्ति क्या कहेगा? "मेरे पास बेस्ट आईडिया है, तुम हट जाओ।" पर एक 'ग्रुप सोल' वाला विनर क्या करेगा? वह कहेगा, "यार, तुम्हारा आईडिया भी अच्छा है। चलो, इस छोटे से हिस्से पर तुम काम करो। मैं तुम्हें गाइड करूँगा। अगर तुम कामयाब होगे, तो जीत हमारी होगी।"

यही सैक्रिफाइस है। अपनी लाइमलाइट (limelight) को कम करके, दूसरे को मौक़ा देना। अपनी ताकत का इस्तेमाल सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे 'ग्रुप' को ऊपर उठाने के लिए करना। यह सोचिए, क्रिकेट में एक मैच विनर वह होता है जो 150 रन बनाए। पर एक असली टीम विनर वह है जो 15 रन बनाकर, 100 रन की पार्टनरशिप (partnership) बनाने में मदद करे, भले ही उसका नाम ज़्यादा न चमके। उसका काम अन-नोटिस्ड (un-noticed) हो सकता है, पर टीम की जीत के लिए वह ज़रूरी है।

जब आप अपने पर्सनल फ़ायदे से ऊपर उठकर 'ग्रुप सोल' के लिए काम करते हैं, तो एक जादू होता है। टीम के अंदर एक भरोसा पैदा होता है। सबको पता होता है कि अगर मैं गिरूँगा, तो कोई न कोई मुझे उठाने वाला है। यह भरोसा ही आपको 'डेली पेन' झेलने की ताकत देता है, जिसके बारे में हमने पहले लेसन में बात की थी।

पर यह ग्रुप सोल तब तक मज़बूत नहीं हो सकती, जब तक आप अपने अंदर की लड़ाई न जीत लें। जब तक आप अपने दिमाग़ पर कंट्रोल न कर लें। क्योंकि टीम का सबसे बड़ा दुश्मन बाहर नहीं, बल्कि आपके अंदर बैठा है। और यही हमें तीसरे और आख़िरी लेसन की ओर ले जाता है: सेल्फ़-मास्टरी और आपका अंदरूनी खेल।


Lesson : सेल्फ़-मास्टरी और अनुशासन — आपकी अंदरूनी आग

पहले लेसन में हमने 'डेली पेन' की बात की। दूसरे में, हमने 'ग्रुप सोल' को समझा। पर यह सब शुरू कहाँ से होता है? यह शुरू होता है आपसे। पैट रिले का कहना है कि असली विनर बनने के लिए आपको बाहर की दुनिया को नहीं, बल्कि अपने अंदर की दुनिया को जीतना होगा। इसे 'सेल्फ़-मास्टरी' कहते हैं।

हम सबका एक 'इनर क्रिटिक' (Inner Critic) होता है। एक आवाज़ जो कान में फुसफुसाती है, "तुम नहीं कर सकते," "यह बहुत मुश्किल है," "आज थोड़ा चीट कर लो।" यही आवाज़ हमें सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाती है। आप जब भी कोई बड़ा काम शुरू करने वाले होते हैं, तो यही आवाज़ आपको डराकर वापस कंबल में भेज देती है।

हम अक्सर सोचते हैं कि 'विनर' यानी जिसके पास मोटिवेशन (Motivation) की कोई जादुई चाबी है। पर सच यह है कि मोटिवेशन एक टेंपरेरी (temporary) गैस है। असली पॉवर (power) है अनुशासन (Discipline)। डिसिप्लिन यानी कि वह काम करना जो आपको करना चाहिए, भले ही आपका मन न करे।

जैसे, आपके पास एक बहुत ही शानदार बिज़नेस आईडिया है। आप 3 दिन तक मोटिवेटेड रहते हैं। फिर आता है चौथा दिन। सिर दर्द है। बाहर बारिश हो रही है। मन कर रहा है कि वेब सीरीज़ (web series) देख लें। अगर आप मोटिवेशन के भरोसे बैठे, तो आप हार जाएँगे। पर अगर आप डिसिप्लिन के घोड़े पर सवार हैं, तो आप कहेंगे, "मन नहीं है, पर काम ज़रूरी है।" और आप 15 मिनट ही सही, पर काम करेंगे।

यही है 'द इनर गेम' जीतना। हमारी लाइफ एक फ़ुटबॉल मैच की तरह है। बाहर से सब चीयर (cheer) कर रहे हैं, पर अंदर ही अंदर आपका दिमाग़ आपसे लड़ रहा है। 'यार, थक गया हूँ, रुक जाता हूँ।' और वहीं पर, आपको अपने 'मेंटल ब्रेकडाउन' (mental breakdown) को ओवरकम (overcome) करना है।

इसे एक फ़नी एग्ज़ाम्पल (funny example) से समझते हैं। आप डाइट पर हैं। सामने आपकी मम्मी का बनाया हुआ गर्मागर्म गुलाब जामुन रखा है। आपका पेट कह रहा है, "हाँ, खा ले।" आपका दिमाग़ कह रहा है, "हाँ, एक से क्या होगा।" पर आपका 'सेल्फ़-मास्टरी' वाला हिस्सा बोलता है, "नो बॉस। मेरी जीत सिर्फ़ गुलाब जामुन को मना करने में है।" यह छोटा सा 'नो' सिर्फ़ गुलाब जामुन को मना नहीं करता, यह आपके दिमाग़ को ट्रेन (train) करता है कि आप इंचार्ज (in-charge) हैं।

रिले इस अनुशासन को एक 'टेंपर्ड स्टील' (Tempered Steel) मानते हैं। स्टील को मज़बूत बनाने के लिए उसे आग और बर्फ़, दोनों से गुज़रना पड़ता है। आपकी लाइफ में भी यही है। आप तब तक मज़बूत नहीं बनेंगे जब तक आप 'डेली पेन' की आग से न गुज़रें, और 'ग्रुप सोल' के ठंडे समर्पण (surrender) को न अपनाएँ।

सेल्फ़-मास्टरी का मतलब है अपनी आदतों को मास्टर करना। अपने टाइम (time) को मास्टर करना। अपने इमोशन्स (emotions) को मास्टर करना। जब आप अपनी अंदरूनी दुनिया को जीत लेते हैं, तो बाहर की जीत सिर्फ़ एक बाई-प्रोडक्ट (by-product) बन जाती है। आप एक ऐसी मशीन बन जाते हैं जो सिर्फ़ जीतना जानती है। क्योंकि आपने खुद को इस तरह से प्रोग्राम (program) कर लिया है।

जब आप सेल्फ़-मास्टरी से खुद को अनुशासित करते हैं, तो आप रोज़ जीतने की क़ीमत चुकाने के लिए तैयार होते हैं। और जब आप रोज़ यह क़ीमत चुकाते हैं, तो आप बिना ईगो के अपनी ग्रुप सोल को मज़बूत करते हैं। यह तीनों बातें मिलकर ही आपको परमानेंट विनर बनाती हैं।


बस, बहुत हो गई मोटिवेशन वाली बातें। अब उठिए। अपने 'विनर्स कोड' को लिखिए। आपका 'डेली पेन' क्या है, उसे पहचानिए। आज आप किस छोटी सी चीज़ में 'एक्स्ट्रा माइल' जाएँगे? क्या आप अपने पार्टनर को बिना शर्त सपोर्ट करेंगे? क्या आप उस गुलाब जामुन को मना करेंगे? जीतना कोई बड़ा चमत्कार नहीं है। यह हर दिन की छोटी सी, पर ज़रूरी, लड़ाई है। कमेंट्स में बताइए, आज आप कौन सा 'विनर्स कोड' अपना रहे हैं। यह आर्टिकल शेयर कीजिए और अपनी टीम को याद दिलाइए: जीतना हमारा हक़ नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी है।

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