What Were They Thinking? (Hindi)


क्या आप भी अपनी अगली कंपनी को दिवालिया (bankrupt) करने के लिए तैयार हैं? बढ़िया! क्योंकि 90% प्रोडक्ट लॉन्च ऐसे ही होते हैं! अगर आप भी उन 'स्मार्ट' लोगों में शामिल हैं जिन्होंने सोचा कि पुराना आइडिया, नया नाम देकर चल जाएगा, तो यह आर्टिकल आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप उस 10% सक्सेस की रेस में भागना चाहते हैं, तो देखिए वो 3 बड़ी गलतियाँ जो सबसे बड़े प्लेयर्स ने की और जिनसे आपको आज ही सबक लेना चाहिए।


Lesson : "कंज्यूमर क्या चाहता है?" पहले यह जानो, फिर प्रोडक्ट बनाओ

आईडिया आपका है, प्रॉब्लम किसकी है? आप मुस्कुरा रहे हैं, क्योंकि आपको लगता है, आपने दुनिया की सबसे ज़रूरी चीज़ बना दी है। पर सच तो यह है मेरे दोस्त, ९०% नए प्रोडक्ट इसलिए फेल होते हैं क्योंकि वो उस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन ढूँढ़ रहे थे जो कभी थी ही नहीं!

सोचिए ज़रा, एक प्रोडक्ट जो आपकी ज़िंदगी आसान कर देगा—ऐसा आपको लगता है। पर बाज़ार को आपकी महानता नहीं, अपनी ज़रूरत प्यारी है। मार्केटिंग गुरु रॉबर्ट मैकमैथ ने यही देखा—हज़ारों, लाखों प्रोडक्ट जो बड़े शोर के साथ लॉन्च हुए और फिर वॉशरूम क्लीनर से भी जल्दी गायब हो गए। क्यों? क्योंकि क्रिएटर अपने आईडिया से इतना प्यार कर बैठा कि उसने कंज्यूमर की आवाज़ ही नहीं सुनी।

यह बिलकुल उस इंजीनियर दोस्त की कहानी की तरह है जिसने "सेल्फ़-हीटिंग चाय का मग" बनाया। हाँ, वही मग जो आपको ठंड में भी गर्मा-गर्म चाय देगा। लॉन्च से पहले उसने हमें दिखाया। हम बोले, "यार, फ़्लास्क किसलिए है?" वो नाराज़ हो गया। "फ़्लास्क? फ़्लास्क ओल्ड-फ़ैशन है! यह मग ब्लूटूथ से कनेक्ट होगा, तापमान बताएगा, और हाँ, चार्जिंग के लिए इसमें एक छोटा सोलर पैनल भी है!"

हमें तो हँसी आई, पर उसे लगा वो स्टीव जॉब्स से भी बड़ा जीनियस है।

उसने १,००० रुपए का मग बनाया और उसे ५,००० रुपए में बेचा। उसका आईडिया क्या था? "लोग अपनी सुबह की चाय को ठंडा नहीं होने देंगे।" कंज्यूमर ने क्या सोचा? "यार, मैं ५,००० का मग क्यों ख़रीदूँ जब थर्मस १०० रुपए में मेरा काम कर रहा है? और सुनो, इसे चार्ज भी करना पड़ेगा!"

देखिए, फ़ेलियर यहीं से शुरू होता है। जब आप आईडिया को ज़रूरत से ज़्यादा कॉम्प्लेक्स कर देते हैं। जब आप 'स्मार्ट' बनने की कोशिश में 'ज़रूरी' बनना भूल जाते हैं। आपको लगा कि चाय का ठंडा होना एक बड़ी प्रॉब्लम है जिसके लिए लोग अपनी सैलरी का हिस्सा दे देंगे। पर सच तो यह है कि लोगों को बस एक अच्छी चाय चाहिए। अगर वो ठंडी हो गई, तो ज़्यादातर लोग उसे दुबारा गर्म कर लेते हैं या फिर, नया कप बना लेते हैं। वो आपकी ओवर-इंजीनियर्ड फैंटेसी पर पैसे बर्बाद नहीं करना चाहते।

यह है कंज्यूमर ब्लाइंडनेस। आप एक समस्या का समाधान कर रहे हैं जो लोगों की टॉप-१० समस्याओं में भी नहीं है। आपका प्रोडक्ट महान है, पर उसे कोई ख़रीदने को तैयार नहीं। क्यूँकि, 'ज़रूरत' की जगह 'फैंसी' ने ले ली है।

अगर आपके दिमाग़ में कोई आईडिया है, तो रुकिए। अपना सारा पैसा रिसर्च पर मत लगाइए। बाहर निकलिए। अपने टार्गेट कंज्यूमर से पूछिए: "आपकी सबसे बड़ी 'चाय ठंडी होने' वाली प्रॉब्लम क्या है?" अगर उनका जवाब है, "कोई प्रॉब्लम नहीं," तो आपका आईडिया फ्लॉप है। आपको तुरंत यू-टर्न लेना होगा।

आपका प्रोडक्ट आपके ईगो (ego) को नहीं, कंज्यूमर की लाइफ को आसान बनाना चाहिए। नहीं तो, आप भी रॉबर्ट मैकमैथ की अगली किताब के हीरो बन जाएँगे—उस महापुरुष की तरह जिसने सोचा कि लोग नीले रंग की केचप खाएँगे क्योंकि 'वो नया है'।

अब अगला लेसन, जो इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है: मान लीजिए आपने लोगों की असली ज़रूरत पहचान ली। आपने मग नहीं, सच में एक बेहतरीन फ़्लास्क बना दिया। पर क्या प्रोडक्ट का अच्छा होना ही काफ़ी है? बिलकुल नहीं। क्यूँकि अगर आपने अपने प्रोडक्ट को बाज़ार में सही ढंग से पेश नहीं किया, तो उसका हाल भी उस बेहतरीन फ़िल्म जैसा होगा जिसकी रिलीज़ डेट किसी ने नहीं देखी।


Lesson : नाम बड़ा और दर्शन छोटे वाली गलती

पहले लेसन में हमने देखा कि अगर प्रॉब्लम ही नहीं है, तो सॉल्यूशन क्या करोगे? अब मान लीजिए, आपने सच में एक ज़रूरी चीज़ बना दी। लोगों को वह चाहिए। आपने वह फ़्लास्क बनाया जो सही मायने में सस्ता, टिकाऊ और बिना चार्जिंग वाला था।

पर यहाँ आती है दूसरी गलती—ओव्हर-प्रॉमिसिंग और अंडर-डिलिवरिंग। यानी, नाम बड़ा और दर्शन छोटे। यह बिलकुल उस दोस्त की तरह है जिसने शादी के कार्ड पर लिखा, "दुनिया की सबसे शानदार पार्टी", और फिर आपको प्लास्टिक की प्लेट में ठंडा समोसा थमा दिया। मज़ाक़ का पात्र कौन बना? जिसने वादा किया था।

मार्केटिंग की दुनिया में इसे कहते हैं द एडवरटाइजिंग ट्रैप (The Advertising Trap)। जब प्रोडक्ट में दम नहीं होता, तो कंपनियाँ एडवरटाइजिंग पर इतना पैसा बहाती हैं कि लगता है, बस अब तो यह चीज़ आसमान छू लेगी। लेकिन जैसे ही कंज्यूमर उसे इस्तेमाल करता है, सच्चाई सामने आ जाती है।

मैकमैथ की किताब ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है। सोचिए उस एनर्जी ड्रिंक के बारे में जिसका नाम रखा गया "सुपर-फ़्यूल फ़ॉर सुपर-ह्यूमन"। ऐड में दिखाया गया कि इसे पीकर आदमी पहाड़ चढ़ रहा है, आग पर चल रहा है, और शायद स्टॉक मार्केट के सीक्रेट भी बता रहा है।

अब एक आम आदमी, जो सुबह ७ बजे ऑफ़िस के लिए भाग रहा है, वह सोचता है, "वाह! मुझे भी सुपर-ह्यूमन बनना है।" वह ८० रुपए की वह बोतल ख़रीदता है, एक घूँट लेता है... और मुँह बनाता है। क्यूँकि उसका स्वाद बिलकुल रबर और कड़वे एलोवेरा जूस का मिक्सचर था।

उसने क्या सीखा?
  • ऐड: "यह आपको एनर्जी देगा।"
  • असली फ़ीलिंग: "यार, इसे पीने के बाद मुझे अपनी रेगुलर चाय की ज़्यादा ज़रूरत है।"

कंपनी ने नाम पर, पैकिंग पर, और ऐडवरटाइज़मेंट पर करोड़ों ख़र्च किए। पर प्रोडक्ट की मूल चीज़, उसका स्वाद, उसका परफ़ॉर्मेन्स... वह फ़ेल हो गया। और यही है दूसरा सबसे बड़ा लेसन: प्रोडक्ट ही आपकी सबसे बड़ी मार्केटिंग होनी चाहिए।

आप कितने भी बड़े सेलेब्रिटी को ले आइए, कितनी भी चमकदार पैकिंग बनवा लीजिए, अगर आपके प्रोडक्ट का स्वाद बेकार है, या वह काम नहीं करता जिसके लिए उसे ख़रीदा गया है, तो कंज्यूमर दुबारा आपके पास नहीं आएगा। वह एक बार मज़ाक़ में आपका प्रोडक्ट ख़रीद लेगा, पर दुबारा नहीं। और उससे भी ख़तरनाक, वह दस और लोगों को बताएगा कि आपका प्रोडक्ट कितना वाहियात है। यह वर्ड-ऑफ-माउथ (Word-of-Mouth) का नेगेटिव वर्जन है जो जंगल की आग से भी तेज़ फैलता है।

हम सबने यह गलती की है। जब हमें किसी चीज़ पर पूरा भरोसा नहीं होता, तो हम उसे कवर-अप (cover-up) करने के लिए बाहरी चमक का सहारा लेते हैं। हम अपने अंदर की कमियों को महंगे कपड़े या बड़ी बातों से छुपाते हैं। ठीक वैसे ही, कंपनियाँ भी अपने फ़्लॉप प्रोडक्ट को महँगी एडवरटाइजिंग के नीचे छुपाने की कोशिश करती हैं।

लेकिन बाज़ार का नियम सीधा है: अगर आपकी नींव कमज़ोर है, तो आप उस पर कितनी भी अच्छी बिल्डिंग बना लें, वह गिर जाएगी। अपना समय और पैसा प्रोडक्ट को सच में बेहतरीन बनाने पर लगाओ। उसे इतना अच्छा बनाओ कि लोग उसके बारे में ख़ुद बात करें।

और अब, इस पूरी कहानी का तीसरा और सबसे दर्दनाक हिस्सा... आपने सही ज़रूरत पहचान ली, आपने बेहतरीन प्रोडक्ट भी बना दिया। पर फिर भी, कई बार चीज़ें फ़ेल हो जाती हैं। क्यों? क्यूँकि आप उन लोगों की बात सुनने से डरते हैं जो आपको सच बताते हैं।


Lesson : टेस्टिंग और नेगेटिव फीडबैक को नज़रअंदाज़ करना एक सुसाइड है

हम तीसरे और आख़िरी लेसन पर आ गए हैं, जो सबसे छोटा लेकिन सबसे ज़रूरी है। आपने लोगों की ज़रूरत पहचान ली। आपने उस ज़रूरत को पूरा करने के लिए एक शानदार, सस्ता और टिकाऊ फ़्लास्क भी बना दिया। अब क्या? अब आता है वह डर, जिससे बड़े-बड़े ब्रैंड्स भी काँपते हैं—नेगेटिव फ़ीडबैक का डर।

मार्केटिंग की दुनिया में इसे प्री-लॉन्च ब्लाइंडनेस (Pre-Launch Blindness) कहते हैं। जब आपका आईडिया आपके दिमाग़ में होता है, तो वह 'आपका बच्चा' बन जाता है। आप उससे इतना प्यार करते हैं कि उसकी कोई भी बुराई सुनना नहीं चाहते।

सोचिए, आपने अपना फ़्लास्क तैयार किया। आपने १०० लोगों को दिया और कहा, "इसे इस्तेमाल करो और मुझे बताओ कैसा लगा।"
  • ९० लोग कहते हैं: "वाह! बहुत बढ़िया है।"
  • १० लोग कहते हैं: "यार, ढक्कन थोड़ा टाइट है। और रंग भी थोड़ा फीका है।"

एक सच्चा मार्केटर इन ९० लोगों की तारीफ़ को साइड में रखेगा और उन १० लोगों के पास भागेगा। क्योंकि उन १० लोगों की आवाज़ ही वह अलार्म है जो आपको लाखों के नुक़सान से बचा सकता है।

पर हम क्या करते हैं? हम उन १० लोगों को 'निगेटिव', 'जलनखोर' या 'जो हमेशा नुक़्स निकालते हैं' कहकर ख़ारिज कर देते हैं। हम अपने दोस्तों और परिवार से पूछते हैं, "तुम्हें कैसा लगा?" और वे हमें दुखी न करने के लिए झूठ बोल देते हैं। यह झूठ आपको कुछ समय की ख़ुशी देगा, पर बाज़ार में आपका प्रोडक्ट दफ़न कर देगा।

मैकमैथ की किताब में एक बहुत ही मज़ेदार उदाहरण है: एक कंपनी ने टूथपेस्ट लॉन्च किया जिसका स्वाद था पनीर और संतरे का मिक्स।

हाँ, सही पढ़ा आपने—पनीर और संतरे!

जब उन्होंने शुरुआती टेस्टिंग की, तो ५ में से ४ लोगों ने कहा, "ई... यह बहुत अजीब है।" लेकिन कंपनी के हेड ने कहा, "ये ५ लोग ही क्यों? क्या बाक़ी दुनिया को यह पसंद नहीं आएगा? यह 'नया' है! लोगों को नए टेस्ट में एडजस्ट होने में समय लगेगा।"

उनके दिमाग़ में क्या था? डिफरेंट, यानी बेटर।

बाज़ार में लॉन्च हुआ। नतीजा? लोग एक बार ख़रीदते थे क्यूँकि पैकेजिंग अच्छी थी, पर इस्तेमाल करने के बाद उसे सीधे कूड़ेदान में फेंक देते थे। किसे चाहिए सुबह-सुबह पनीर और संतरे का अजीब कॉम्बिनेशन? उनका आईडिया था कि टूथपेस्ट को ब्रेकफ़ास्ट जैसा फील दें, पर असलियत में वह 'मॉर्निंग सिकनेस' जैसा बन गया।

यह तीसरी गलती हमें सिखाती है कि आप 'जीनियस' हैं, पर कंज्यूमर 'जज' है। आप अगर 'ना' सुनने से डरते हैं, तो आप हारने के लिए तैयार हैं। आपको आलोचना (criticism) को एक सोने का अंडा समझना चाहिए। हर आलोचना आपके प्रोडक्ट को बेहतर बनाने का एक मुफ़्त कंसल्टेशन (free consultation) है।

अगर आपका ढक्कन टाइट है, तो उसे अभी ढीला करो। लॉन्च के बाद ढीला करने जाओगे, तो आपकी रेपुटेशन टाइट हो जाएगी।

तो देखा आपने, ये तीनों लेसन एक दूसरे से जुड़े हैं।

पहले लेसन (ज़रूरत) ने सिखाया कि आप ग़लत रेस में भाग रहे हैं। दूसरे लेसन (गुणवत्ता) ने सिखाया कि आपका घोड़ा कमज़ोर है। और तीसरे लेसन (फ़ीडबैक) ने सिखाया कि आप रेस से पहले ही घोड़े की बीमारी को नज़रअंदाज़ कर रहे थे।

हर प्रोडक्ट फेलियर एक चीख़ती हुई कहानी है, जो हमें बताती है कि बड़े से बड़े ब्रैंड्स ने भी इंसानी ग़लतियाँ की हैं—अहंकार (ego), लालच (greed), और अंधापन (blindness)।


आप अगर कुछ नया शुरू कर रहे हैं, या अपने मौजूदा बिज़नेस को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो एक काम कीजिए। अपने सबसे नज़दीकी, ईमानदार दोस्त या ग्राहक को फ़ोन लगाइए। उसे अपना 'बेस्ट' आईडिया बताइए। और जब वह आपको उसकी १०० कमियाँ गिनाए, तो उसे गले लगाइए। क्यूँकि वह आपको दिवालिया होने से बचा रहा है।

असफल होना बुरा नहीं है, पर उन गलितयों को दुहराना जो इतिहास में हज़ार बार हो चुकी हैं, वह बेवकूफ़ी है। अपनी आँखों से 'यह सबसे अलग है' वाला चश्मा उतारिए, ज़मीन पर आइए, और वो बनाइए जो लोग सच में ख़रीदेंगे।

अब यह आर्टिकल शेयर कीजिए और हमें बताइए कि आपकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा 'यह आईडिया किसने सोचा होगा?' वाला प्रोडक्ट कौन सा था।

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