आपका ऑनलाइन बिज़नेस अगर सिर्फ़ एक डिजिटल दुकान बनकर रह गया है, तो मुबारक हो! आप अपनी 90% ग्रोथ को अनदेखा कर रहे हैं। आप सोच रहे हैं कि सिर्फ़ वेबसाइट बना देने से पैसा छप जाएगा, पर हक़ीकत में, आप इंटरनेट के असली गेम को मिस कर रहे हैं। 'Webonomics' बताती है कि क्यों आपके कॉम्पिटिटर चुपचाप अमीर हो रहे हैं और आप पीछे छूट रहे हैं। चलिए, जानते हैं वो 3 सीक्रेट लेसन्स।
Lesson : सिर्फ़ प्रोडक्ट मत बेचो, एक भीड़ बनाओ (नेटवर्क इफ़ेक्ट्स का जादू)
एक बात बताइए, आपने अपने पड़ोसी के घर के बाहर खड़ी, चमचमाती नई कार देखी। क्या उस कार की क़ीमत आपके लिए बढ़ गई? नहीं। वो अभी भी सिर्फ़ एक कार है। लेकिन, जब आप देखते हैं कि आपके मोहल्ले के हर दूसरे घर में 'UPI' (यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस) का QR कोड लगा है, तो क्या उसकी वैल्यू बढ़ गई? हाँ! क्यों? क्योंकि अब आप किसी भी रेहड़ी वाले को, किसी भी टैक्सी वाले को, किसी भी पाँव-भाजी स्टॉल को बिना कैश के पेमेंट कर सकते हैं। यही है असली नेटवर्क इफ़ेक्ट्स का जादू।
आप सोच रहे हैं, "यार, मैंने तो बहुत अच्छी वेबसाइट बनाई है। प्रोडक्ट भी शानदार है। फिर भी ग्रोथ धीमी क्यों है?" क्योंकि आप अभी भी पुरानी दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ 'मेरा सामान, मेरी दुकान' का रूल चलता था। वेबनॉमिक्स कहती है: नेटवर्क की वैल्यू, यूज़र्स की संख्या के स्क्वायर (Square) में बढ़ती है, सिंपल एडिशन में नहीं। यानी, अगर आपके 10 कस्टमर हैं, तो आपके बिज़नेस की वैल्यू 10 नहीं है, 100 है। और 100 कस्टमर हैं, तो वैल्यू 10,000 है। अब समझ आया?
आजकल के बिज़नेस ओनर बिल्कुल उस पंडित जी की तरह हैं जो अपने बेटे को सिर्फ़ इसलिए अंग्रेज़ी नहीं पढ़ाते, क्योंकि उन्हें ख़ुद नहीं आती। वो डरते हैं कि 'नेटवर्क' बनाने का मतलब है कंट्रोल खो देना। लेकिन इंटरनेट तो कंट्रोल छोड़ने का ही गेम है। अगर आपका बिज़नेस ऐसा है कि जब ज़्यादा लोग उसे यूज़ करते हैं, तो हर पुराने यूज़र का एक्सपीरियंस और बेहतर हो जाता है, तभी आप जीतेंगे। जैसे लिंक्डइन को देख लो। जब आप अकेले उस पर थे, तो वो सिर्फ़ एक ऑनलाइन रेज़्यूमे था। जब आपके 500 दोस्त, 200 बॉस, और 1000 HR वाले उस पर आ गए, तो वो आपकी नौकरी और बिज़नेस का सबसे बड़ा दरवाज़ा बन गया।
इसका सबसे बड़ा मज़ाक देखिए। आप एक ई-कॉमर्स वेबसाइट बनाते हैं और ख़ूब पैसा ख़र्च करके गूगल पर ऐड चलाते हैं, सिर्फ़ एक कस्टमर को लाने के लिए। जैसे आप अपने दोस्त को पार्टी में बुलाने के लिए टैक्सी का किराया भी ख़ुद ही दे रहे हैं। और दूसरी तरफ़ एक सोशल मीडिया ऐप है, जो अपने पहले यूज़र से कहता है, "जाओ, अपने 5 दोस्तों को लाओ, वरना तुम अकेले क्या करोगे?" और वो 5 दोस्त 25 और दोस्तों को ले आते हैं। पहला बिज़नेस पैसा ख़र्च कर रहा है; दूसरा बिज़नेस यूज़र को अपना सेल्समैन बना रहा है।
तो आज ही अपने बिज़नेस को देखिए। क्या आपका प्रोडक्ट ऐसा है कि जब कोई नया कस्टमर आता है, तो पुराने कस्टमर को फ़ायदा होता है? अगर नहीं, तो आप अभी भी 20वीं सदी में हैं, 21वीं सदी में नहीं। अपने प्रोडक्ट को एक ऐसा मोहल्ला बनाइए, जहाँ लोग रहना इसलिए चाहते हैं क्योंकि वहाँ उनके सारे दोस्त रहते हैं, न कि इसलिए कि सिर्फ़ आपकी बिल्डिंग का रंग अच्छा है।
यह नेटवर्क इफ़ेक्ट ही है जो हमें अगले लेसन की तरफ़ लेकर जाता है। जब आपकी भीड़ बड़ी होती है, जब आपका मोहल्ला बड़ा होता है, तो सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या हो जाता है? सिर्फ़ प्रोडक्ट बेचना नहीं, बल्कि हर कस्टमर को वीआईपी वाला फ़ील देना। भीड़ में भी अकेले कस्टमर को सबसे ज़्यादा तवज्जो देना। वरना क्या होगा? आपकी भीड़ किसी दूसरे मोहल्ले में चली जाएगी, जहाँ पार्किंग की सुविधा और सिक्योरिटी अच्छी होगी।
Lesson : कंट्रोल छोड़ो और कस्टमर को राजा बनाओ (कस्टमर एक्सपीरियंस ही किंग है)
मान लीजिए आप एक सरकारी बैंक में गए हैं। वहाँ चेयर पर बैठा क्लर्क आपको ऐसा फ़ील कराता है, जैसे आप अपनी सैलरी नहीं, उसकी पर्सनल प्रॉपर्टी माँगने आए हैं। दूसरी तरफ़, आप एक नए ज़माने के ऑनलाइन पेमेंट ऐप को देखिए। आपने रात के 2 बजे पेमेंट किया, वो तुरंत हो गया। अगर अटक गया, तो चैटबॉट 30 सेकंड में जवाब दे रहा है। दोनों में फ़र्क क्या है? फ़र्क है कंट्रोल का। सरकारी बैंक में कंट्रोल क्लर्क के पास है, और ऑनलाइन ऐप में कंट्रोल आपके पास है।
Webonomics का यह लेसन सबसे ज़्यादा ईगो को चोट पहुँचाता है। यह कहता है कि वेब की दुनिया में, कस्टमर को 'सर्विस' नहीं चाहिए, उसे 'कंट्रोल' चाहिए। उसे चेक-आउट के लिए 5 स्टेप्स नहीं चाहिए। उसे कस्टमर केयर का 20 मिनट वाला वेटिंग-म्यूज़िक नहीं सुनना। उसे ऑर्डर की ट्रैकिंग के लिए 4 ईमेल नहीं चाहिए। उसे सब कुछ अभी, यहीं, और मेरी मर्ज़ी से चाहिए।
आपका ऑनलाइन बिज़नेस अभी भी उस स्कूल के प्रिंसिपल की तरह है, जो बच्चों को ड्रेस कोड और टाइम टेबल से डराता है। Webonomics कहती है कि आप प्रिंसिपल नहीं हो, आप एक सर्वेंट हो। और ये बात जितनी जल्दी समझोगे, उतना बड़ा महल बनाओगे।
इसका सबसे बड़ा मज़ाक तब होता है जब कोई ऑनलाइन स्टोर 'नो रिटर्न' पॉलिसी लगाता है। यह ऐसा है जैसे आपने अपने घर के बाहर बोर्ड लगा दिया, "जो यहाँ से एक बार चला गया, वो वापस नहीं आ सकता।" अरे भाई, यह इंटरनेट है, कोई वन-वे स्ट्रीट नहीं! कस्टमर को पता है कि उसके पास हज़ारों ऑप्शन्स हैं। अगर आपने उसका रिटर्न या रिफ़ंड आसानी से प्रोसेस नहीं किया, तो वो तुरंत अपने नेटवर्क को बताएगा। याद है लेसन 01? आपका नेटवर्क कितना पावरफुल है? अब सोचिए, जब वो नेटवर्क आपके ख़िलाफ़ खड़ा होगा, तो कितना नुक़सान होगा।
कस्टमर एक्सपीरियंस को टाइट करने का मतलब है:
- 10-सेकंड रूल: आपकी वेबसाइट इतनी तेज़ी से लोड हो कि कस्टमर को लगे वो सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन में बैठा है।
- वन-क्लिक फ़्रीडम: चेकआउट इतना आसान हो कि पागलपन की हद तक आसान हो। जैसे, आँख बंद करके क्लिक किया और ऑर्डर हो गया।
- ग़लती सुधारने की स्पीड: अगर आपने कोई ग़लती कर दी, तो उसे इतनी जल्दी और प्यार से सुधारो कि कस्टमर कहे, "यार, मज़ा आ गया, ग़लती तो हर कोई करता है, पर ये लोग डील करना जानते हैं।"
कस्टमर को राजा बनाने का मतलब ये नहीं कि आप हर डिमांड पूरी करें। इसका मतलब है, आप उन्हें सहूलियत दें। आप उन्हें ये पावर दें कि वो जब चाहें आपके सिस्टम से एंट्री या एग्ज़िट ले सकें। जब कस्टमर को ये पावर मिलती है, तो वह जाता नहीं, वह टिकता है, और अपने पूरे नेटवर्क को आपके पास लेकर आता है।
अब एक सवाल है। अगर हम कस्टमर को इतना कंट्रोल दे रहे हैं, सब कुछ इतना फ़ास्ट और इज़ी कर रहे हैं, तो हम पैसा कैसे कमाएँगे? क्या हमें सब कुछ मुफ़्त में दे देना चाहिए? यह सवाल सीधा लेसन 03 की तरफ़ इशारा करता है। क्योंकि वेबनॉमिक्स का सबसे बड़ा सरप्राइज़ यही है: सबसे ज़्यादा पैसा कमाने के लिए, आपको कुछ चीज़ें मुफ़्त में देनी पड़ती हैं।
Lesson : दौलत 'फ़्री' में छुपाना सीखो (इन्फॉर्मेशन ही करेंसी है)
पिछला लेसन ख़त्म हुआ था एक बड़े सवाल पर: जब हम कस्टमर को इतना कंट्रोल दे रहे हैं, सब कुछ इतना इज़ी कर रहे हैं, तो पैसा कहाँ से आएगा? क्या हमें भिखारी बन जाना चाहिए और सब कुछ मुफ़्त में बाँट देना चाहिए? Webonomics कहती है: हाँ! आपको मुफ़्त में बाँटना चाहिए, लेकिन सही चीज़। यह स्ट्रीट फ़ूड वाला फ़ंडा है। आप चाट वाले के पास जाते हैं। वो आपको एक पापड़ी टेस्ट कराता है। वो पापड़ी फ़्री है, लेकिन वो इतनी चटपटी है कि आप 50 रुपये की चाट तुरंत ख़रीद लेते हैं।
इंटरनेट की दुनिया, जहाँ इन्फॉर्मेशन की कोई कमी नहीं है, वहाँ आपका सबसे बड़ा कॉम्पिटिटर आपके कस्टमर का ध्यान (Attention) है। आप पेड़ लगाकर फल का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन बाक़ी सब आम बेच रहे हैं। आप क्या करें? आपको अपनी सबसे बेस्ट इन्फॉर्मेशन, अपना सबसे कीमती नुस्ख़ा, या अपनी सबसे शानदार सर्विस का एक छोटा सा टुकड़ा फ़्री में दे देना चाहिए।
यह सुनने में पागलपन लगता है। आप सोचेंगे, "अगर मैं अपना बेस्ट फ़्री में दे दूँगा, तो लोग पैसा क्यों देंगे?"
जवाब यह है: आप प्रोडक्ट नहीं बेच रहे, आप भरोसा बेच रहे हैं। जब आप फ़्री में कुछ इतना क़ीमती देते हैं कि कस्टमर हैरान हो जाता है, तो वो सोचने लगता है, "यार, जब इन्होंने मुफ़्त में इतना दे दिया, तो पैसा देने पर क्या देंगे?" यह भरोसा ही है जो ट्रैफ़िक को ट्रेड (यानी सेल) में बदलता है।
आप उन ऑनलाइन कोच और गुरुओं को देखिए। वो आपको ईमेल पर फ़्री वर्कशीट देते हैं। यूट्यूब पर 30 मिनट का फ़्री मास्टरक्लास देते हैं। वो फ़्री में आपको राज़ी करते हैं। यह फ़्री की चीज़ें उनके लिए नेटवर्क बनाने का गेटवे है (लेसन 01 याद है?)। वो फ़्री चटनी से अपनी दाल-रोटी नहीं चलाते, वो उस चटनी से आपका ईमेल एड्रेस खरीदते हैं।
यह स्ट्रेटेजी उन आलसी बिज़नेस वालों पर तमाचा है जो अपनी पुरानी, जंग लगी ई-बुक्स को फ़्री में देकर सोचते हैं कि उन्होंने Webonomics का लेसन सीख लिया। नहीं! आपकी फ़्री चीज़ भी प्रीमियम होनी चाहिए। वह इतनी अच्छी होनी चाहिए कि लोग उसे पैसों में ख़रीदने को तैयार हों, लेकिन आप उसे मुफ़्त में दे रहे हैं।
अब तीनों लेसन्स को एक साथ जोड़कर देखिए:
- आप अपनी बेस्ट इन्फॉर्मेशन 'फ़्री' में देते हैं (लेसन 03)।
- इस हाई-क्वालिटी 'फ़्री' प्रोडक्ट से कस्टमर को कंट्रोल और सुविधा मिलती है, जिससे उसका भरोसा बढ़ता है (लेसन 02)।
- जब भरोसा बढ़ता है, तो वह आपके नेटवर्क में जुड़ता है और दूसरों को भी लाता है (लेसन 01)।
कस्टमर आपका फ़्री प्रोडक्ट लेकर राजा बन जाता है, और यही राजा अपने पूरे परिवार (नेटवर्क) को आपके पास लेकर आता है, जिसके बाद आप उन्हें अपना असली, प्रीमियम प्रोडक्ट बेचते हैं।
बस, यही Webonomics है। ये 9 प्रिंसिपल्स आपके बिज़नेस को इंजन नहीं, रॉकेट बना सकते हैं। अब बहाने बनाना बंद कीजिए। अपनी सबसे कीमती चीज़ को संभाल कर मत रखिए। उसे बाँटिए, उसे फ़्री में दीजिए, और फिर देखिए कि दौलत कैसे ख़ुद चलकर आपके पास आती है।
तो सोचिए: आपके बिज़नेस में ऐसी कौन सी चटपटी पापड़ी है, जिसे आप हँसते-हँसते मुफ़्त में दे सकते हैं? उस पापड़ी को डिजिटलाइज़ कीजिए, और बस फिर शुरू हो जाइए।
अगर आप अभी भी सोफ़े पर बैठे ये सोच रहे हैं कि "यार, ये तो मैंने पहले भी सुना है," तो रुकिए। सुनने से कुछ नहीं होता, करने से होता है। आज रात सोने से पहले, अपने बिज़नेस में एक ऐसी चीज़ पहचानिए जिसे आप कल पूरी तरह से फ़्री कर देंगे, लेकिन जिसकी वैल्यू बहुत ज़्यादा होगी। उसे ईमेल के ज़रिए, वीडियो के ज़रिए, या पीडीएफ़ के ज़रिए नेटवर्क में फैला दीजिए। इस कमेंट में मुझे बताइए कि वो एक चीज़ क्या है। और हाँ, अपने उन दोस्तों को ज़रूर टैग करें जो पुरानी सोच से चिपके हुए हैं और इंटरनेट पर फेल हो रहे हैं!
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