What They Don't Teach You at Harvard Business School (Hindi)


कॉलेज की डिग्री मिल गई? बधाई हो! अब 90% बिज़नेस डील्स आपकी समझ से बाहर होंगी। क्योंकि, जिन करोड़पति लोगों के साथ आप डील करेंगे, उन्होंने Harvard में नहीं, सड़क पर सीखा है। अगर आपको लगता है कि सिर्फ़ 'किताबी ज्ञान' से आप बिज़नेस के शेर बन जाएँगे, तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। Mark McCormack की इस किताब में 3 ऐसे लेसन हैं जो आपको 'Street Smart' बनाएँगे।


Lesson : ऑब्ज़र्वेशन की पावर – जो आँखें देखती नहीं, वो जेब में आता नहीं

स्कूल में हमें सिखाया जाता है कि सवाल सुनो, जवाब दो। बिज़नेस में, यह बिलकुल उल्टा है। यहाँ आपको सुनना है, देखना है, और फिर समझना है कि जो बोला जा रहा है, उसका मतलब क्या है। McCormack कहते हैं, बिज़नेस में 80% कम्युनिकेशन (communication) बिना शब्दों के होता है।

अगर आप किसी क्लाइंट (client) से मीटिंग कर रहे हैं और वो बार-बार अपनी घड़ी देख रहा है। क्या वो सच में बिज़ी है? नहीं, वो आपको संकेत (signal) दे रहा है कि "यार, ख़त्म कर अब ये सब।" आप हड़बड़ी में डील करने की कोशिश करेंगे, और वो समझ जाएगा कि आप जल्दी में हैं। जैसे ही आप जल्दी में दिखे, आपकी नेगोशिएशन पावर (negotiation power) ख़त्म।

याद करो वो दोस्त जो कहता है, "यार, मैं तो बिलकुल ठीक हूँ," पर उसकी आँखें और कंधे झुके हुए हैं। आप जानते हैं कि वो झूठ बोल रहा है। बिज़नेस में भी यही चलता है, बस दाँव (stakes) बड़ा होता है।

असली खेल क्या है? आपको सामने वाले के 'कमज़ोर पॉइंट' (weak point) और 'अहमियत' (priority) को पहचानना है।

एक बार एक कंपनी को बड़ी डील क्रैक करनी थी। प्रेजेंटेशन (presentation) शानदार थी। लेकिन McCormack ने देखा कि क्लाइंट (client) का CEO प्रेजेंटेशन के बीच में, बार-बार अपने फ़ोन पर अपने बेटे की बेसबॉल टीम के स्कोर (score) देख रहा था। बाकी सबने इसे नज़रअंदाज़ किया। McCormack ने मीटिंग ख़त्म होते ही, प्रेजेंटेशन पर बात करने के बजाय, सीधा उस CEO से पूछा, "सर, आपके बेटे की टीम जीत गई क्या? सुना है वो बहुत बढ़िया खेलता है।"

बस, हो गया काम। CEO को लगा, "अरे वाह, इस बंदे ने मेरे बिज़नेस से ज़्यादा मेरे परिवार में दिलचस्पी दिखाई।" अगले दिन डील क्रैक हो गई। कमाल का बिज़नेस सीक्रेट? बिज़नेस नहीं, इंसान की बात करो।

Harvard में आपको डेटा (data) पढ़ना सिखाया जाएगा, पर ये किताब सिखाती है कि डेटा से पहले इंसान को पढ़ना ज़रूरी है। जब आप ऑब्ज़र्वेशन की पावर बढ़ाते हैं, तो आप सिर्फ़ जानकारी (information) नहीं जुटाते, आप सामने वाले के इमोशनल बटन (emotional button) ढूँढते हैं। और एक बार बटन मिल गया, तो अगला कदम आसान हो जाता है।

यही ऑब्ज़र्वेशन की कला हमें हमारे दूसरे लेसन की ओर ले जाती है: अगर आप किसी को पढ़ सकते हैं, तो आप उसे समझ सकते हैं। और जहाँ समझ है, वहाँ नेगोशिएशन है।


Lesson : नेगोशिएशन एक आर्ट है, साइंस नहीं – सही दाम नहीं, सही टाइम देखो

पहला लेसन था – 'लोगों को देखो।' दूसरा लेसन है – 'उनका इस्तेमाल करो (In a good way)।'

B-School आपको सिखाएगा कि 'Win-Win' सिचुएशन (situation) कैसे बनाते हैं। पर Street Smart बंदा जानता है कि हर डील में 'Win-Win' से पहले 'Win-I' (मेरी जीत) आती है। नेगोशिएशन, गणित नहीं है जहाँ 2+2 हमेशा 4 हो। यह एक आर्ट है, एक ड्रामा है, जहाँ सही समय पर सही चीज़ बोलकर आप पूरे सीन (scene) को पलट सकते हैं।

सबसे बड़ी ग़लती? लोग टेबल पर बैठते ही अपनी बात शुरू कर देते हैं।

McCormack कहते हैं कि नेगोशिएशन शुरू करने से पहले, आपको चार चीज़ें जाननी हैं: (1) उन्हें क्या चाहिए, (2) उन्हें इसकी कितनी ज़रूरत है, (3) उन्हें इसकी कब तक ज़रूरत है, और (4) उन्हें कौन-कौन और ऑफर दे रहा है।

मान लो कि आप एक मकान बेच रहे हो। Harvard आपको सिखाएगा कि बाज़ार मूल्य (market value) के हिसाब से कीमत लगाओ। Street Smart आपको सिखाएगा: पड़ोसियों को देखो। अगर सामने वाले पड़ोसी को तुरंत अपना घर बेचना है क्योंकि उन्हें शहर छोड़ना है, तो आपकी नेगोशिएशन पावर अचानक बढ़ गई। आपको पता है कि सामने वाले की 'ज़रूरत' और 'जल्दी' आपसे ज़्यादा है। और यह ज़रूरत आपको ऑब्ज़र्वेशन (लेसन 01) से पता चली थी।

एक मज़ेदार किस्सा है। एक बार एक क्लाइंट अपनी फीस (fees) को लेकर बहस कर रहा था। क्लाइंट बार-बार कह रहा था कि फीस बहुत ज़्यादा है। McCormack ने बहस नहीं की। उन्होंने अपनी घड़ी देखी, और मज़ाक में कहा, "लगता है आप सिर्फ़ पैसे पर ही ध्यान दे रहे हैं, जबकि मैं इस फीस के बदले आपको जो 'आराम की नींद' बेच रहा हूँ, उसकी कीमत आप लगा ही नहीं रहे।"

यहाँ 'आराम की नींद' क्या थी? ये थी नेगोशिएशन की आर्ट। उन्होंने बहस को पैसों से हटाकर 'वैल्यू' (Value) और 'मानसिक शांति' (Mental Peace) पर केंद्रित कर दिया। क्लाइंट को एहसास हुआ कि वह सस्ते में काम करवाने के चक्कर में एक भरोसेमंद पार्टनर (partner) को खो रहा था। डील हो गई।

नेगोशिएशन में सबसे बड़ी ट्रिक (trick) यह है कि आप अपनी वैल्यू (Value) को इतना बढ़ा दें कि सामने वाले को दाम (Price) छोटा लगने लगे। कभी भी सिर्फ़ पैसे की बात मत करो। हमेशा बताओ कि आप उनका कितना समय बचाओगे, कितना तनाव कम करोगे, या कितना बड़ा नुक़सान होने से रोकोगे।

जब आप इस आर्ट को समझ जाते हैं, तो आप किसी भी टेबल पर सिर्फ़ एक बेचने वाले (salesperson) नहीं होते, आप एक सॉल्यूशन प्रोवाइडर (solution provider) बन जाते हैं। और सॉल्यूशन बेचने वाला हमेशा सबसे ज़्यादा कमाता है। पर ये सब कब काम करता है? जब आप खुद को 'महँगा' बेच पाते हैं। और यही हमारा तीसरा लेसन है।


Lesson : खुद को बेचना सबसे ज़रूरी – तुम्हारी ब्रांडिंग ही तुम्हारी असली फीस है

अब बात आती है सबसे ज़रूरी चीज़ की: तुम कौन हो?

मान लीजिए, आप एक फ्रीलांसर (freelancer) हैं। आपने Harvard से डिग्री ली है, आपकी प्रोफाइल (profile) ज़बरदस्त है। लेकिन जब आप किसी क्लाइंट से बात करते हैं, तो आपकी आवाज़ में कॉन्फिडेंस (confidence) नहीं है। आप अपनी फीस बताने में झिझकते हैं।

क्या क्लाइंट आपको बड़ी फीस देगा? नहीं।

McCormack कहते हैं कि आप चाहे कुछ भी बेच रहे हों – टूथपेस्ट, सॉफ्टवेयर या अपनी कंसल्टेंसी (consultancy) – सबसे पहले आप 'खुद को' बेचते हैं। आपकी रेप्यूटेशन (reputation) और आपका कॉन्फिडेंस आपकी सबसे बड़ी पूँजी है।

असली Street Smart बंदा जानता है: बिज़नेस में आपकी वैल्यू उतनी ही है, जितनी आप खुद मानते हैं। अगर आप सोचते हैं कि आप सस्ते हैं, तो दुनिया आपको सस्ता ख़रीद लेगी।

ये कैसे होता है? हर चीज़ की एक 'इमेज' बनाओ।

McCormack ने सिखाया कि अपने क्लाइंट्स की, अपने प्रोजेक्ट्स की, यहाँ तक कि अपने काम करने के तरीके की एक 'पॉवरफुल इमेज' (powerful image) बनाओ। अगर कोई आपसे पूछे कि 'यह काम कितने में करोगे?', तो सीधा दाम मत बताओ। पहले बताओ कि आप ये काम क्यों सबसे अच्छा कर सकते हो।

जैसे, एक बार एक स्पोर्ट्स कंपनी को एक छोटे शहर के एथलीट (athlete) को एंडोर्स (endorse) करना था। बाकी एजेंट्स ने एथलीट के पिछले रिकॉर्ड (records) दिखाए। McCormack ने क्या किया? उन्होंने कंपनी को बताया कि यह एथलीट सिर्फ़ एक खिलाड़ी नहीं है, यह उस छोटे शहर की 'उम्मीद' है। उन्होंने एथलीट के खेल को नहीं, बल्कि उसकी 'कहानी' और 'इमोशनल वैल्यू' (emotional value) को बेचा।

कंपनी ने डील की, क्योंकि उन्हें एक 'सिर्फ़ एथलीट' नहीं, बल्कि एक 'पावरफुल कहानी' मिली, जो उनके ब्रांड (brand) को जोड़ती थी।

यानी, आपको अपनी 'पर्सनल ब्रांडिंग' (personal branding) पर काम करना होगा।
  • आप मीटिंग में कैसे दिखते हैं?
  • आप कितनी तैयारी करके जाते हैं?
  • क्या आप अपनी बात पर अड़े रहते हैं, या आसानी से झुक जाते हैं?

ये सब मिलकर आपकी 'इमेज' बनाते हैं। अगर आपकी इमेज एक ऐसे इंसान की है जो हार नहीं मानता, जो हर समस्या का हल निकाल लेता है, तो लोग आपकी फीस पर सवाल नहीं उठाएँगे। वे चुपचाप आपको वह देंगे जो आप माँगेंगे। क्योंकि, उन्होंने सिर्फ़ एक सर्विस नहीं ख़रीदी है, उन्होंने आपके कॉन्फिडेंस और ट्रस्ट को ख़रीदा है।

पहला लेसन था: लोगों को पढ़कर उनकी ज़रूरतों को जानो। दूसरा लेसन था: उनकी ज़रूरत को अपनी आर्ट से पूरा करो। और तीसरा लेसन है: खुद को इतना मज़बूत बेचो कि वो आपको 'ना' कह ही न पाएँ।

यही है 'स्ट्रीट स्मार्ट' बिज़नेस का खेल। ये सब Harvard की किताबों में नहीं मिलेगा। ये सब आपको अपनी आँखें, अपने कान और अपने दिमाग़ को खुला रखकर सीखना होगा।

तो, अब अगला कदम क्या है?


अब बस, एक काम करो। कल जब आप अपनी पहली मीटिंग या अपनी पहली डील के लिए बैठें, तो नोट्स बनाना भूल जाओ। सिर्फ़ देखो। देखो कि सामने वाला अपनी कॉफ़ी (coffee) का मग कैसे पकड़ता है। देखो कि जब आप फीस बताते हैं, तो वो कहाँ देखता है। और कमेंट में आकर बताओ कि आपको कौन-सा 'Street Smart' सीक्रेट मिला। किताबी ज्ञान से बाहर निकलो, और आज से ही ऑब्ज़र्वेशन शुरू करो। शेयर करो यह आर्टिकल उन लोगों के साथ जो सोचते हैं कि डिग्री से दुनिया चलती है।

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