क्या आप अभी भी हर चीज के लिए उतना ही पैसा दे रहे हैं जितना दुकानदार मांगता है? मुबारक हो, आप दुनिया के सबसे बड़े दानवीर हैं जो अपनी मेहनत की कमाई दूसरों पर लुटा रहे हैं। बिना नेगोशिएशन के डील करना मतलब अपनी जेब में खुद छेद करना है।
गैविन केनेडी की किताब एवरीथिंग इस नेगोशिएबल हमें सिखाती है कि दुनिया में कुछ भी फिक्स नहीं है, बस आपको सही तरीके से मांगना आना चाहिए। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन्स जो आपकी जेब और इज्जत दोनों बचाएंगे।
Lesson : डोंट एक्सेप्ट द फर्स्ट ऑफर
क्या आपने कभी गौर किया है कि जब आप किसी दुकान पर जाते हैं और दुकानदार कहता है कि यह टीशर्ट हजार रुपये की है, तो आपके अंदर का मासूम बच्चा तुरंत वॉलेट निकाल लेता है? गैविन केनेडी कहते हैं कि अगर आप पहले ऑफर पर हां बोल देते हैं, तो आप न केवल अपना नुकसान कर रहे हैं, बल्कि सामने वाले दुकानदार को भी यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि उसने शायद दाम कम बता दिए। सोचिए, आपने हां बोला और दुकानदार के मन में आया, धत तेरी की, बारह सौ बोलने चाहिए थे, यह तो फौरन मान गया।
पहला लेसन बहुत सीधा और कड़वा है, पहली पेशकश को कभी स्वीकार न करें। हमारे इंडियन कल्चर में इसे मोलभाव कहते हैं, लेकिन असल में यह एक साइकोलॉजिकल गेम है। मान लीजिए आप अपनी सैलरी नेगोशिएट कर रहे हैं। एचआर ने कहा कि हम आपको साल के छह लाख देंगे। अगर आपने झट से हाथ मिला लिया, तो यकीन मानिए, उसी पल आपने अपनी वैल्यू कम कर दी। पहली ऑफर हमेशा एक टेस्टिंग होती है। सामने वाला यह देख रहा होता है कि आप अपनी वैल्यू कितनी समझते हैं।
केनेडी अपनी किताब में साफ कहते हैं कि जो इंसान पहली बार में मान जाता है, वह नेगोशिएटर नहीं, वह एक आसान शिकार है। आपको वहां थोड़ा शॉक दिखाना चाहिए। थोड़ा रुकिए, गहरी सांस लीजिए और ऐसा चेहरा बनाइए जैसे आपको बिजली का हल्का झटका लगा हो। इसे नेगोशिएशन की दुनिया में फ्लिंच करना कहते हैं। जब आप ऐसा करते हैं, तो सामने वाले को लगता है कि शायद उसने कुछ ज्यादा ही बड़ी मांग रख दी है।
मान लीजिए आप एक सेकंड हैंड कार खरीदने गए। मालिक ने कहा कि भाई साहब, साढ़े तीन लाख से एक रुपया कम नहीं होगा। अब अगर आप वहां सर हिलाकर चेक बुक निकाल लेंगे, तो आप अपनी मेहनत की कमाई उसे दान में दे रहे हैं। इसकी जगह अगर आप थोड़ा मुस्कुराएं और कहें कि साढ़े तीन लाख? इस गाड़ी के लिए? इसमें तो पिछले टायर भी घिसे हुए हैं। बस इतना कहते ही गेम आपके हाथ में आ जाता है।
याद रखिए, नेगोशिएशन कोई लड़ाई नहीं है, यह एक डांस है। और इस डांस की पहली स्टेप यही है कि आपको लीड लेनी है। अगर आप पहली ही बार में घुटने टेक देंगे, तो आगे की पूरी बातचीत में आप सिर्फ दबते चले जाएंगे। लोग अक्सर शर्म के मारे नहीं बोलते कि कहीं सामने वाला बुरा न मान जाए। भाई साहब, वह बिजनेस करने बैठा है, रिश्तेदारी निभाने नहीं। अगर आप अपनी जेब का ख्याल नहीं रखेंगे, तो कोई और क्यों रखेगा?
पहली ऑफर को ठुकराने का मतलब यह नहीं कि आप बदतमीजी करें। आपको बस अपनी पोजीशन होल्ड करनी है। जब आप पहली बार मना करते हैं, तो आप सामने वाले को मौका देते हैं कि वह अपनी असली लिमिट पर आए। यह एक फिल्टर की तरह काम करता है। जो फालतू का मार्जिन उसने रखा था, वह धीरे-धीरे कम होने लगता है। तो अगली बार जब कोई आपसे कहे कि यही फाइनल प्राइस है, तो बस एक बार मुस्कुराकर पूछना, क्या सच में यह फाइनल है? और फिर देखिए जादू।
Lesson : द पावर ऑफ इफ
जब आप पहली ऑफर को हंसते-मुस्कुराते ठुकरा देते हैं, तो अब असली खेल शुरू होता है। गैविन केनेडी का दूसरा सबसे पावरफुल लेसन है: द पावर ऑफ इफ (If)। इसे हिंदी में हम 'अगर' की ताकत कह सकते हैं। नेगोशिएशन की दुनिया में 'मुफ्त' जैसा कुछ नहीं होता। अगर आप किसी को कुछ दे रहे हैं, तो बदले में कुछ लेना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। केनेडी कहते हैं कि अगर आप बिना किसी शर्त के झुक जाते हैं, तो आप नेगोशिएटर नहीं, बल्कि एक चैरिटी संस्था चला रहे हैं। और यकीन मानिए, बिजनेस की दुनिया में दान-पुण्य करने वालों का दिवाली के पटाखों जैसा हाल होता है—सब जलाकर चले जाते हैं।
मान लीजिए आप एक फ्रीलांसर हैं और क्लाइंट आपसे कहता है कि भाई साहब, बजट थोड़ा कम कर लो, अगली बार बड़ा प्रोजेक्ट देंगे। अब यहाँ पर हमारे भोले-भाले देसी भाई भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं, चलो ठीक है सर, आपके लिए दस परसेंट कम कर देता हूँ। बधाई हो! आपने अभी-अभी अपनी वैल्यू की खुद ही लंका लगा दी। केनेडी के मुताबिक, आपको यहाँ 'इफ' का इस्तेमाल करना चाहिए था। आपको कहना चाहिए था, अगर मैं दस परसेंट डिस्काउंट देता हूँ, तो क्या आप मुझे पूरा पेमेंट एडवांस में देंगे? या फिर अगर मैं दाम कम करता हूँ, तो क्या आप डेडलाइन दो हफ्ते आगे बढ़ा देंगे?
देखिए, नेगोशिएशन एक तराजू की तरह है। अगर एक तरफ से वजन कम हो रहा है, तो दूसरी तरफ कुछ जुड़ना ही चाहिए। जब आप 'अगर' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो आप सामने वाले को यह मैसेज देते हैं कि आपकी हर रियायत की एक कीमत है। इससे सामने वाला आपको सीरियसली लेने लगता है। उसे समझ आ जाता है कि यह बंदा कच्चा खिलाड़ी नहीं है। बिना 'अगर' के हां बोलना मतलब अपनी कमजोरी दिखाना है। और दुनिया में कमजोर का साथ कोई नहीं देता, सब बस फायदा उठाते हैं।
सोचिए आप अपनी शादी के लिए शेरवानी खरीदने गए हैं। दुकानदार कहता है कि यह साढ़े सात हजार की है। आप कहते हैं कि भाई पांच हजार में दे दो। दुकानदार मान जाता है। अब आप खुश हो रहे हैं कि आपने ढाई हजार बचा लिए? बिल्कुल नहीं! दुकानदार मन ही मन हंस रहा है क्योंकि उसने बिना किसी शर्त के दाम कम कर दिए, मतलब उसकी मार्जिन अभी भी बहुत ज्यादा थी। लेकिन अगर आप शातिर होते, तो आप कहते कि अगर मैं इसे पांच हजार में लेता हूँ, तो क्या आप इसके साथ मैचिंग साफा फ्री देंगे? अब दुकानदार फंसेगा। अब उसे सोचना पड़ेगा कि क्या यह डील उसके लिए फायदेमंद है।
सर्कस के शेर और जंगल के शेर में बस यही फर्क होता है कि सर्कस वाला बिना 'अगर' के चाबुक पर नाचता है। आपको जंगल का शेर बनना है। नेगोशिएशन में हर कदम पर एक शर्त जोड़िये। अगर बॉस कहता है कि इस संडे ऑफिस आ जाओ, तो मुस्कुराकर कहिए कि सर, अगर मैं संडे आता हूँ, तो क्या मुझे अगले फ्राइडे की छुट्टी मिलेगी? इसे कहते हैं बराबरी का सौदा। जब आप अपनी शर्तों पर बात करते हैं, तो लोग आपकी इज्जत करते हैं।
याद रखिये, 'इफ' सिर्फ एक शब्द नहीं है, यह आपका ढाल है। यह आपको बेवकूफ बनने से बचाता है। जो लोग बिना किसी शर्त के दूसरों की बात मान लेते हैं, वे बाद में कोने में बैठकर पछताते हैं। केनेडी हमें सिखाते हैं कि नेगोशिएशन का मतलब जीतना नहीं, बल्कि एक ऐसा तालमेल बिठाना है जहाँ आपकी वैल्यू बनी रहे। तो अगली बार जब कोई आपसे कुछ मांगे, तो फौरन अपनी जेब मत ढीली कीजिये। बस दो अक्षर याद रखिये—अगर।
Lesson : नेवर गिव समथिंग फॉर नथिंग
अब तक हमने सीखा कि पहली ऑफर को मना कैसे करना है और 'अगर' की ढाल कैसे इस्तेमाल करनी है। लेकिन गैविन केनेडी का तीसरा और सबसे जरूरी लेसन है: बिना कुछ लिए कभी कुछ न दें (नेवर गिव समथिंग फॉर नथिंग)। यह नेगोशिएशन का गोल्डन रूल है। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि हम अच्छे बनने के चक्कर में अपनी मेहनत की कमाई या सहूलियतें प्लेट में सजाकर दूसरों को दे देते हैं। केनेडी कहते हैं कि अगर आप बिना कुछ मांगे किसी की बात मान लेते हैं, तो आप उसे सिखा रहे हैं कि आपसे और भी ज्यादा कैसे छीना जा सकता है।
सोचिए, आप एक बिजनेस डील कर रहे हैं। सामने वाला कहता है, "सर, थोड़ा सा डिस्काउंट दे दीजिए, हम सालों पुराने ग्राहक हैं।" अब हमारे अंदर का इमोशनल इंडियन जाग जाता है। हम कहते हैं, "अरे सर, आपके लिए तो जान हाजिर है, चलिए पांच परसेंट कम कर दिया।" बधाई हो! आपने अभी-अभी सामने वाले को यह न्योता दिया है कि अगली बार वह दस परसेंट मांगेगा। केनेडी के मुताबिक, यह नेगोशिएशन नहीं, आत्मसमर्पण है। जब भी आप किसी को कोई रियायत (concession) देते हैं, तो बदले में कुछ न कुछ मांगना अनिवार्य है। चाहे वह छोटी सी ही चीज क्यों न हो।
इसका एक बहुत ही मजेदार और देसी रियल लाइफ एग्जांपल लेते हैं। मान लीजिए आप एक मकान मालिक हैं और आपका किराएदार कहता है कि इस महीने किराया दो हजार कम ले लो, बड़ी तंगी है। अगर आप सीधे 'हां' कह देते हैं, तो अगले महीने वह तीन हजार कम करने की सोचेगा। लेकिन अगर आप शातिर नेगोशिएटर हैं, तो आप कहेंगे, "ठीक है, मैं किराया कम कर देता हूँ, लेकिन बदले में आपको छत की टंकी की सफाई खुद करवानी होगी।" अब देखिए, आपने कुछ दिया तो बदले में कुछ लिया भी। इससे किराएदार को यह एहसास रहेगा कि अगली बार कुछ मांगने से पहले उसे भी कुछ कुर्बान करना पड़ेगा।
नेगोशिएशन असल में एक लेन-देन का मार्केट है। जो लोग सिर्फ 'देना' जानते हैं, उनका दिवाला निकल जाता है। और जो सिर्फ 'लेना' जानते हैं, उनके पास कोई दोबारा नहीं आता। असली खिलाड़ी वह है जो 'देने' के बदले में 'लेने' की कला जानता है। केनेडी कहते हैं कि जब आप बदले में कुछ मांगते हैं, तो सामने वाला आपकी दी हुई चीज की ज्यादा इज्जत करता है। मुफ्त की चीज की कोई कदर नहीं होती। अगर आपने बिना मांगे डिस्काउंट दे दिया, तो सामने वाला सोचेगा कि आपने पहले से ही बहुत ज्यादा मुनाफा रखा होगा।
मान लीजिए आपके बॉस ने आपको एक नया प्रोजेक्ट दिया और कहा कि इसे कल सुबह तक खत्म करना है। अगर आपने चुपचाप सर झुकाकर 'जी सर' कह दिया, तो अगले हफ्ते से आप ऑफिस के 'यस मैन' बन जाएंगे। इसकी जगह आपको यह कहना चाहिए, "सर, मैं यह कल सुबह तक कर दूंगा, लेकिन इसके बदले मुझे अगले हफ्ते एक दिन की वर्क फ्रॉम होम की सुविधा चाहिए होगी।" अब यहाँ बॉस को पता चल गया कि आपका समय कीमती है और उसका एक दाम है।
केनेडी की यह किताब हमें सिखाती है कि दुनिया में कोई भी चीज मुफ्त नहीं है। अगर हवा मुफ्त है, तो प्रदूषण भी साथ आता है। इसलिए अपनी शर्तों को मजबूती से रखें। जब आप बदले में कुछ मांगते हैं, तो आप एक प्रोफेशनल की तरह व्यवहार करते हैं। इससे आपकी पर्सनालिटी में एक वजन आता है। नेगोशिएशन कोई भीख मांगना नहीं है, यह दो बराबर के लोगों के बीच का समझौता है।
बस इतना याद रखिये, आपकी हर 'हां' की एक कीमत होनी चाहिए। अगर आप अपनी वैल्यू खुद नहीं करेंगे, तो दुनिया आपको कूड़े के भाव खरीदेगी। गैविन केनेडी के ये तीन लेसन आपकी जिंदगी बदल सकते हैं। तो अगली बार जब कोई आपसे कहे "भाई, इतना तो कर ही सकते हो", तो मुस्कुराकर पूछना "बदले में मुझे क्या मिलेगा?"
खुद को कम मत आंकिए। अपनी आवाज बुलंद रखिये और याद रखिये—दुनिया में हर चीज नेगोशिएबल है, बस आपको सही बटन दबाना आना चाहिए। चलिए, अब वक्त है अपनी शर्तों पर जीने का और अपनी हर डील को जीतने का।
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