Faster Company (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सोचते हैं कि बिलियन डॉलर कंपनी बनाना बस किस्मत का खेल है? सच तो यह है कि आपकी कछुआ चाल वाली पुरानी बिजनेस सोच ही आपको बर्बाद कर रही है। अगर आप फास्टर कंपनी के ये सीक्रेट्स नहीं जानते, तो आप बस दूसरों की सफलता को दूर से जलते हुए देखने के लिए ही बने हैं।

पैट्रिक केली की यह किताब हमें सिखाती है कि कैसे एक आम इंसान भी असाधारण साम्राज्य खड़ा कर सकता है। तो चलिए, बिना किसी देरी के जानते हैं इस किताब के वे तीन धाकड़ सबक जो आपकी सोच और आपका बैंक बैलेंस दोनों बदल देंगे।


Lesson : कस्टमर सर्विस ही असली भगवान है (Customer Service is the True God)

अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ एक चकाचक ऑफिस और बढ़िया प्रोडक्ट बना लेने से आपका स्टार्टअप रॉकेट की तरह उड़ेगा, तो शायद आप मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रहे हैं। पैट्रिक केली की यह किताब हमें सबसे पहला और सबसे कड़वा सच यह सिखाती है कि बिजनेस में कस्टमर सिर्फ किंग नहीं होता, वह साक्षात भगवान होता है। और भगवान को सिर्फ अगरबत्ती दिखाने से काम नहीं चलता, उनकी सेवा में खुद को झोंकना पड़ता है। फास्टर कंपनी का पूरा मॉडल इसी बात पर टिका था कि वे अपने कस्टमर को वह देते थे जिसकी उसने कभी सपने में भी उम्मीद नहीं की थी। आज के जमाने में जहाँ लोग फोन उठाने में दस नखरे करते हैं, वहाँ पैट्रिक ने सिखाया कि कस्टमर की समस्या को अपनी समस्या समझना ही असली धंधा है।

मान लीजिए आपने ऑनलाइन एक नया मोबाइल मंगवाया। अब फोन आया और पता चला कि उसका कैमरा ही चालू नहीं हो रहा। आप कस्टमर केयर को फोन करते हैं और वहां से जवाब मिलता है कि कृपया ३० मिनट इंतज़ार करें, हमारी लाइनें अभी व्यस्त हैं। फिर ३० मिनट बाद कोई रोबोट जैसी आवाज में कहता है कि सर, सात दिन में टेक्नीशियन आएगा। कैसा महसूस होगा? मन करेगा न कि फोन उठाकर दीवार पर दे मारें? यही वह जगह है जहाँ ९० परसेंट इंडियन बिजनेस मात खा जाते हैं। वे सोचते हैं कि सामान बिक गया तो जिम्मेदारी खत्म। लेकिन फास्टर कंपनी कहती है कि असली रिश्ता तो सामान बिकने के बाद शुरू होता है।

पैट्रिक केली ने अपनी कंपनी को इतना तेज बनाया कि अगर कस्टमर को कोई दिक्कत आती थी, तो वे उसे सुलझाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते थे। इसे कहते हैं टर्न ऑन ए डाइम यानी एक सिक्के पर मुड़ जाना। इतनी फुर्ती कि कस्टमर को सोचने का मौका ही न मिले। हमारे यहाँ की सरकारी कचहरी जैसी सुस्ती से अगर आप बिजनेस चलाएंगे, तो यकीनन आपके कस्टमर आपके कॉम्पिटिटर के पास ही जाएंगे। और फिर आप बैठकर रोएंगे कि मार्केट खराब है। भाई साहब, मार्केट खराब नहीं है, आपकी सर्विस में जंग लगा है।

कुछ लोग तो ऐसे होते हैं कि कस्टमर से पैसे लेते वक्त तो दांत चमकाते हैं, लेकिन जैसे ही वह कोई शिकायत लेकर आए, तो ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। अगर आप अपने बिजनेस को बिलियन डॉलर बनाना चाहते हैं, तो आपको कस्टमर के चेहरे पर वह हैरानी वाली मुस्कान लानी होगी। उसे लगना चाहिए कि यार, ये लोग तो मेरी फिक्र मेरे घर वालों से भी ज्यादा करते हैं। जब आप कस्टमर का भरोसा जीत लेते हैं, तो वह आपका सबसे बड़ा मार्केटिंग मैनेजर बन जाता है और वह भी बिना किसी सैलरी के। इसलिए, अपने ईगो को साइड में रखिये और कस्टमर की सेवा में लग जाइये, क्योंकि वही आपकी तरक्की का शॉर्टकट है।


Lesson : कर्मचारियों को मालिक जैसा महसूस कराना (Making Employees Feel Like Owners)

अगर आप सोचते हैं कि आप एक अकेले खलीफा हैं जो पूरी सल्तनत खुद चला लेंगे, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। पैट्रिक केली की फास्टर कंपनी का दूसरा सबसे बड़ा मंत्र यही था कि अपनी टीम को सिर्फ नौकर मत समझो, उन्हें पार्टनर बनाओ। आज के कॉर्पोरेट कल्चर में क्या होता है? बॉस आता है, अपनी चकाचक गाड़ी से उतरता है और एम्प्लॉई बेचारा अपनी फटी पुरानी बाइक की चेन चढ़ा रहा होता है। ऐसे में एम्प्लॉई के मन में सिर्फ एक ही ख्याल आता है कि भाई, मैं इतनी मेहनत क्यों करूँ? प्रॉफिट तो सब ये मोटा सेठ ले जाएगा। बस, यहीं से कंपनी के डूबने की स्क्रिप्ट लिखी जाने लगती है।

पैट्रिक केली ने इस सोच को जड़ से उखाड़ फेंका। उन्होंने अपनी कंपनी में प्रॉफिट शेयरिंग और ओपन बुक मैनेजमेंट का ऐसा सिस्टम बनाया कि हर सफाई कर्मचारी से लेकर टॉप मैनेजर तक को पता होता था कि कंपनी कितना कमा रही है और कितना लुटा रही है। जब एम्प्लॉई को पता चलता है कि कंपनी के फायदे में उसका भी हिस्सा है, तो वह ऑफिस में आकर सिर्फ घड़ियाँ नहीं देखता। वह तब तक काम करता है जब तक काम खत्म न हो जाए, क्योंकि अब वह किसी और के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए मेहनत कर रहा है।

जरा सोचिए, एक ऐसी कंपनी जहाँ मंडे की सुबह एम्प्लॉई रोते हुए नहीं, बल्कि नाचते हुए ऑफिस आएं। अजीब लग रहा है न? क्योंकि हमारे यहाँ तो मंडे को ऑफिस जाना किसी काला पानी की सजा से कम नहीं लगता। लोग ऑफिस सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि महीने के आखिर में वह चंद सिक्के उनके अकाउंट में गिरें जिससे बिजली का बिल भरा जा सके। लेकिन फास्टर कंपनी में लोग इसलिए काम करते थे क्योंकि उन्हें कंपनी की ग्रोथ में अपना भविष्य दिखता था। पैट्रिक ने उन्हें सिर्फ सैलरी नहीं दी, उन्हें इज्जत और हिस्सेदारी दी।

कुछ बॉस तो ऐसे होते हैं कि अगर एम्प्लॉई पांच मिनट लेट हो जाए तो उसकी जान ले लेते हैं, लेकिन जब खुद की बारी आए तो मीटिंग के नाम पर तीन घंटे का लंच ब्रेक लेते हैं। ऐसे बॉस के नीचे काम करने वाले लोग सिर्फ रिज्यूमे अपडेट करने का बहाना ढूंढते रहते हैं। पैट्रिक केली ने सिखाया कि अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम आपके लिए गोलियां खाए, तो पहले आपको उनके लिए ढाल बनना होगा। जब आप अपनी टीम को मालिक जैसा सम्मान देते हैं, तो वे आपके बिजनेस को अपना बच्चा समझने लगते हैं और फिर उस बच्चे को पालने के लिए वे जी जान लगा देते हैं। याद रखिये, एक खुश एम्प्लॉई दस दुखी कस्टमर को खुश कर सकता है, लेकिन एक दुखी एम्प्लॉई आपके सौ खुश कस्टमर्स को भगा सकता है।


Lesson : तेजी और लचीलापन (Speed and Agility)

आज के जमाने में मार्केट की हालत उस लोकल बस जैसी है जो किसी का इंतज़ार नहीं करती। अगर आप बस के पीछे भागते रह गए, तो बस धूल उड़ाकर निकल जाएगी। पैट्रिक केली की फास्टर कंपनी का तीसरा और सबसे घातक सबक यही है कि बड़ा होना अच्छी बात है, लेकिन तेज होना उससे भी बड़ी बात है। इसे कहते हैं टर्न ऑन ए डाइम यानी एक सिक्के पर अपनी पूरी कंपनी का रुख बदल देना। पुराने जमाने की कंपनियों में क्या होता था? एक छोटा सा फैसला लेने के लिए फाइल दस टेबल पर घूमती थी, फिर कोई बड़ा बाबू उस पर चाय का कप रखकर साइन करता था। तब तक तो मार्केट का ट्रेंड ही बदल जाता था।

जरा सोचिए, आप एक ऐसी दुकान चलाते हैं जहाँ लोग आजकल नीली कमीज मांग रहे हैं। अब आप अपने हेड ऑफिस को मेल भेजते हैं, वहाँ मीटिंग होती है, फिर रिसर्च होती है, और छह महीने बाद जब आप गुलाबी कमीज का स्टॉक लाते हैं, तब तक दुनिया टी-शर्ट पर शिफ्ट हो चुकी होती है। कैसा लगेगा? यही वह सुस्ती है जो अच्छे-खासे बिजनेस को कब्रिस्तान पहुंचा देती है। पैट्रिक केली ने सिखाया कि फैसले लेने में देरी करना मतलब अपने कॉम्पिटिटर को दावत देना है। फास्टर कंपनी में फैसले लेने की रफ़्तार इतनी तेज थी कि बड़े-बड़े कॉर्पोरेट दिग्गज भी अपना सिर खुजलाते रह जाते थे।

हमारे यहाँ कुछ लोग तो ऐसे हैं कि उन्हें नया आइडिया दो तो वे पहले यह देखते हैं कि उनके दादाजी ने ऐसा कभी किया था या नहीं। अगर दादाजी ने नहीं किया, तो वे भी नहीं करेंगे, चाहे दुनिया मंगल ग्रह पर घर बना ले। पैट्रिक केली का कहना था कि अपनी कंपनी को इतना लचीला बनाओ कि अगर कल सुबह मार्केट की हवा बदले, तो आपकी कंपनी का पाल भी उसी तरफ घूम जाए। आपको किसी भी आइडिया या पुराने तरीके से इतना प्यार नहीं करना चाहिए कि वह आपके गले की फांसी बन जाए। जो कंपनी वक्त के साथ खुद को नहीं बदलती, वह इतिहास बन जाती है।

तो दोस्तों, अगर आप भी एक होम ग्रोन बिलियन डॉलर साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं, तो अपनी रफ़्तार बढ़ाइये। डर को साइड में रखिये और रिस्क लेने की हिम्मत जुटाइए। क्योंकि इस तेज दौड़ती दुनिया में सिर्फ वही टिकता है जो न केवल तेज चलता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपनी दिशा तुरंत बदल लेता है। पैट्रिक केली की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि कामयाबी किसी खास डिग्री या खानदान की जागीर नहीं है, यह तो बस उन लोगों को मिलती है जो कस्टमर की इज्जत करते हैं, अपनी टीम को साथ लेकर चलते हैं और बिजली की रफ़्तार से फैसले लेते हैं।


तो क्या आप भी अपने काम में वही कछुआ चाल चल रहे हैं या अब चीते की रफ़्तार पकड़ने के लिए तैयार हैं? नीचे कमेंट में बताइए कि फास्टर कंपनी का कौन सा सबक आपकी लाइफ या बिजनेस को बदल सकता है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जो हमेशा कहता है कि कल से काम शुरू करूँगा। याद रखिये, कल कभी नहीं आता, जो है बस आज और अभी है। चलिए, मिलकर कुछ बड़ा और तेज करते हैं।

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