क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस में गधों की तरह मेहनत तो करते हैं पर अप्रेजल के वक्त बॉस आपको पहचानता तक नहीं? मुबारक हो, आप एक एवरेज वर्कर बनने की रेस जीत रहे हैं। अगर आप अभी भी वही घिसी पिटी ९ से ५ वाली छोटी सोच लेकर बैठे हैं, तो यकीन मानिए आप अपनी ग्रोथ का गला खुद अपने हाथों से घोंट रहे हैं।
रॉबर्ट केली की किताब 'हाउ टू बी ए स्टार एट वर्क' हमें वह कड़वा सच दिखाती है जो आपके एचआर भी आपको कभी नहीं बताएंगे। आज हम उन ३ बड़े सीक्रेट्स को डिकोड करेंगे जो आपको ऑफिस के उस 'एवरेज भीड़' से निकालकर सीधा 'स्टार परफॉर्मर' की लीग में खड़ा कर देंगे।
Lesson : इनिशिएटिव - सिर्फ अपना काम करना काफी नहीं है
ज्यादातर लोग ऑफिस इस सोच के साथ जाते हैं कि भाई मुझे जो जेडी (जॉब डिस्क्रिप्शन) दिया गया है, बस उतना ही करना है। डेस्क पर बैठे, ईमेल चेक किए, लंच ब्रेक लिया और शाम को ६ बजते ही बैग उठाकर पतली गली से निकल लिए। अगर आप भी यही कर रहे हैं, तो बधाई हो, आप कंपनी के लिए सिर्फ एक 'कोस्ट सेंटर' हैं, 'वैल्यू क्रिएटर' नहीं। रॉबर्ट केली कहते हैं कि एक एवरेज वर्कर और एक स्टार परफॉर्मर के बीच सबसे बड़ा अंतर 'इनिशिएटिव' का होता है। एवरेज वर्कर हमेशा अपनी बाउंड्री में खेलता है, जबकि स्टार खिलाड़ी मैदान के बाहर जाकर बॉल पकड़कर लाता है।
सोचिए, आपके ऑफिस में एक मीटिंग चल रही है। बॉस ने एक ऐसी समस्या बताई जो किसी की भी जिम्मेदारी नहीं है। एक एवरेज वर्कर तुरंत अपने मन में लड्डू फोड़ेगा कि चलो अच्छा है, यह मेरा काम नहीं है। वह चुपचाप कोने में बैठकर समोसे का इंतज़ार करेगा। लेकिन वहीं एक स्टार वर्कर क्या करेगा? वह हाथ उठाएगा और कहेगा कि सर, मैं इस पर कुछ रिसर्च कर सकता हूँ। इसे कहते हैं इनिशिएटिव। यह वह एक्स्ट्रा माइल है जो आपको भीड़ से अलग करता है।
अब आप कहेंगे कि भाई, एक्स्ट्रा काम करने के पैसे तो मिलते नहीं, फिर अपनी जान क्यों जलाना? यहीं पर आप मात खा जाते हैं। इनिशिएटिव का मतलब सिर्फ 'फालतू का काम' करना नहीं है। इसका मतलब है ऐसी जिम्मेदारी लेना जो कंपनी को सच में फायदा पहुँचाए। अगर आप ऑफिस में सिर्फ ऑर्डर फॉलो करने वाले रोबोट बने रहेंगे, तो कंपनी आपको रिप्लेस करने में दो मिनट भी नहीं लगाएगी। आज के जमाने में एआई और ऑटोमेशन आपके जैसे 'सिर्फ काम पूरा करने वाले' लोगों की नौकरी खाने के लिए तैयार बैठे हैं।
मान लीजिए आप मार्केटिंग टीम में हैं। आपका काम है सिर्फ एड्स रन करना। लेकिन आप देखते हैं कि सेल्स टीम को लीड्स क्लोज करने में दिक्कत आ रही है। आप खुद जाकर सेल्स वालों से बात करते हैं, उनकी समस्या समझते हैं और अपनी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में थोड़ा बदलाव करते हैं जिससे सेल्स बढ़ जाती है। अब आपने क्या किया? आपने अपनी बाउंड्री तोड़ी। आपने वह काम किया जो आपसे किसी ने नहीं कहा था। साल के अंत में जब इंक्रीमेंट की बात आएगी, तो बॉस को वह 'एक्स्ट्रा सेल्स' याद रहेगी, न कि आपके वो ९ से ६ वाले लॉग-इन ऑर्स।
लेकिन सावधान! इनिशिएटिव लेने का मतलब यह नहीं है कि आप हर किसी के काम में अपनी नाक घुसाने लगें और खुद का काम अधूरा छोड़ दें। स्टार परफॉर्मर्स बहुत स्मार्ट होते हैं। वे पहले अपना बेसिक काम परफेक्ट करते हैं और फिर ऐसा इनिशिएटिव चुनते हैं जिसका इम्पैक्ट बड़ा हो। अगर आप ऑफिस की कैंटीन का मेन्यू बदलने के लिए इनिशिएटिव ले रहे हैं, तो आप स्टार नहीं, सिर्फ एक 'बिजी बॉडी' कहलाएंगे। सही जगह पर सही समय पर अपनी एनर्जी लगाना ही असली खेल है।
जब आप इनिशिएटिव लेते हैं, तो आप अपनी कंपनी को यह मैसेज देते हैं कि आप सिर्फ यहाँ सैलरी के लिए नहीं आए हैं, बल्कि आप इस बिजनेस को अपना समझते हैं। यह 'ओनरशिप माइंडसेट' ही आपको ऑफिस का वो सितारा बनाता है जिसकी चमक के आगे बाकी सब फीके पड़ जाते हैं। याद रखिये, दुनिया में काम करने वालों की कमी नहीं है, कमी उनकी है जो काम को 'ढूँढ' कर करते हैं।
Lesson : नेटवर्किंग - आपका नेटवर्क ही आपकी असली नेट वर्थ है
अगर आपको लगता है कि ऑफिस में सबके साथ 'हाय-हेलो' करना और लंच ब्रेक में बॉस की बुराई करना ही नेटवर्किंग है, तो भाई आप गलत रास्ते पर हैं। रॉबर्ट केली कहते हैं कि स्टार परफॉर्मर्स के पास एक 'इन्फॉर्मेशन नेटवर्क' होता है, न कि सिर्फ 'फ्रेंड्स सर्कल'। एक एवरेज वर्कर को जब कोई काम समझ नहीं आता, तो वह घंटों गूगल पर अपना सिर फोड़ता रहता है या फिर किसी के रिप्लाई का इंतज़ार करता है। लेकिन एक स्टार वर्कर के पास ऐसी फोन डायरेक्टरी होती है कि उसे पता होता है कि कौन सा आदमी किस प्रॉब्लम का एक्सपर्ट है।
सोचिए, आपको एक ऐसी रिपोर्ट बनानी है जिसके लिए डेटा दूसरे डिपार्टमेंट के पास है। अब एक एवरेज वर्कर क्या करेगा? वह सीधा ईमेल डालेगा, फिर तीन दिन तक फॉलो-अप करेगा और जब काम नहीं होगा, तो हाथ खड़े कर देगा कि 'भाई मैंने तो मेल कर दिया था'। वहीं एक स्टार वर्कर क्या करेगा? वह उस बंदे को पहले से जानता होगा। वह उसे कॉल करेगा या सीधा उसके डेस्क पर जाकर कहेगा कि 'यार, वह डेटा चाहिए था, कॉफी पिएंगे?' और मिनटों में काम खत्म। इसे कहते हैं नॉलेज नेटवर्किंग।
असल में स्टार्स अपनी 'पॉकेट' में ऐसे एक्सपर्ट्स रखते हैं जो मुश्किल वक्त में उनके काम आ सकें। वे सिर्फ उन लोगों से नहीं जुड़ते जो उनसे ऊपर हैं, बल्कि वे जूनियर लेवल से लेकर चपरासी तक से अच्छे ताल्लुक रखते हैं। क्यों? क्योंकि कभी-कभी ऑफिस का प्रिंटर खराब होने पर टेक टीम का बंदा आपके काम आएगा, न कि आपका बॉस। स्टार्स जानते हैं कि अकेले रेस नहीं जीती जा सकती, उन्हें एक ऐसी टीम चाहिए जो उनके लिए इंफॉर्मेशन के दरवाजे खोल दे।
मान लीजिए आप एक प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। अचानक क्लाइंट ने कोई ऐसी डिमांड कर दी जो आपकी कंपनी ने पहले कभी नहीं की। अब एवरेज वर्कर पैनिक बटन दबा देगा। वह इधर-उधर भागने लगेगा। लेकिन स्टार मैनेजर शांत रहेगा। क्यों? क्योंकि उसके नेटवर्क में एक ऐसा पुराना कलीग है जो अब दूसरी कंपनी में है और उसने ऐसा काम पहले किया हुआ है। वह एक कॉल घुमाएगा, सीक्रेट टिप्स लेगा और क्लाइंट के सामने ऐसे पेश होगा जैसे वह इस फील्ड का गुरु हो। यह जादू नेटवर्किंग का है, आपकी डिग्री का नहीं।
लेकिन यहाँ भी एक कड़वा सच है। नेटवर्किंग का मतलब चापलूसी या चमचागिरी बिल्कुल नहीं है। अगर आप सिर्फ मतलब के वक्त लोगों को याद करेंगे, तो लोग आपको 'सेल्फिश' लेबल कर देंगे। स्टार्स हमेशा 'गिव एंड टेक' यानी लेन-देन के उसूल पर चलते हैं। वे दूसरों की मदद तब करते हैं जब उन्हें उनकी जरूरत नहीं होती, ताकि जब उन्हें जरूरत पड़े, तो लोग खुशी-खुशी उनकी मदद करें। अगर आप सिर्फ लेने वाले हैं और देने वाले नहीं, तो आपका नेटवर्क कार्डबोर्ड के घर की तरह ढह जाएगा।
ऑफिस पॉलिटिक्स और हेल्दी नेटवर्किंग में बहुत बारीक धागा होता है। जो लोग सिर्फ गॉसिप करते हैं, वे पॉलिटिक्स का हिस्सा बन जाते हैं। लेकिन जो लोग काम की खबरें और रिसोर्सेज शेयर करते हैं, वे सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं। आप खुद सोचिए, क्या आप किसी ऐसे बंदे को प्रमोट करना चाहेंगे जो सबके साथ घुला-मिला है और जिसके पास हर मसले का हल है, या उसे जो कोने में बैठकर सिर्फ अपना कंप्यूटर घूरता रहता है? स्टार्स अपने चारों तरफ एक ऐसा सुरक्षा कवच बना लेते हैं कि मुसीबत आने पर पूरा ऑफिस उनके साथ खड़ा होता है।
Lesson : सेल्फ मैनेजमेंट - अपनी किस्मत का रिमोट खुद संभालो
ज्यादातर लोग ऑफिस में ऐसे घूमते हैं जैसे रिमोट कंट्रोल वाली कार हों, जिसका रिमोट उनके बॉस या क्लाइंट के हाथ में है। बॉस ने चिल्लाया तो दुखी हो गए, डेडलाइन आई तो पैनिक हो गए और अगर काम नहीं हुआ तो किस्मत को दोष दे दिया। लेकिन रॉबर्ट केली कहते हैं कि एक 'स्टार' वही है जो अपना रिमोट अपने पास रखता है। इसे कहते हैं सेल्फ मैनेजमेंट। यानी अपने समय, अपनी स्किल्स और अपने इमोशन्स का खुद मालिक बनना।
सोचिए, एक एवरेज वर्कर का दिन कैसे शुरू होता है? वह ऑफिस पहुँचता है, अपनी ईमेल खोलता है और जो सबसे पहले आया, उसे करने लगता है। वह पूरा दिन दूसरों की आग बुझाने में बिता देता है और शाम को पता चलता है कि उसका अपना मुख्य प्रोजेक्ट तो छुआ ही नहीं गया। अब वहीं एक स्टार परफॉर्मर क्या करेगा? वह 'रिएक्टिव' नहीं 'प्रोएक्टिव' होगा। वह जानता है कि उसके दिन के सबसे कीमती २ घंटे कौन से हैं। वह उस वक्त अपना फोन साइलेंट करेगा, मीटिंग्स मना करेगा और सिर्फ उस काम पर फोकस करेगा जो उसे स्टार बनाता है।
सेल्फ मैनेजमेंट का मतलब सिर्फ टाइम टेबल बनाना नहीं है, बल्कि अपनी वैल्यू को मैनेज करना है। स्टार्स जानते हैं कि उन्हें कब 'ना' कहना है। अगर आप हर फालतू मीटिंग में हाँ कह रहे हैं और हर कलीग की फाइल चेक कर रहे हैं, तो आप हेल्पफुल नहीं, आप 'ईजी टारगेट' बन रहे हैं। स्टार्स अपनी एनर्जी को तिजोरी में रखे सोने की तरह समझते हैं, उसे हर किसी पर लुटाते नहीं फिरते। वे जानते हैं कि अगर वे खुद को मैनेज नहीं कर पाएंगे, तो कंपनी उन्हें क्या खाक मैनेज करेगी।
मान लीजिए आपके पास दो एम्प्लॉई हैं। पहला बंदा हमेशा थका हुआ रहता है, हर काम के लिए रोता है और हर १५ मिनट में चाय ब्रेक लेता है क्योंकि उसे 'स्ट्रेस' हो रहा है। दूसरा बंदा शांत है, अपना काम वक्त से पहले करता है और शाम को जिम भी जाता है। आप किसे प्रमोट करेंगे? जाहिर है दूसरे वाले को। क्यों? क्योंकि उसने अपनी लाइफ और काम के बीच एक बैलेंस बनाया है। उसने अपने दिमाग को ट्रेन किया है कि प्रेशर में कैसे परफॉर्म करना है।
स्टार परफॉर्मर्स अपनी लर्निंग की जिम्मेदारी भी खुद लेते हैं। वे इस इंतज़ार में नहीं बैठे रहते कि कंपनी उन्हें कोई ट्रेनिंग देगी या बॉस उन्हें कुछ नया सिखाएगा। वे खुद अपनी कमियां ढूँढते हैं और उन्हें सुधारते हैं। आज के इस भागदौड़ वाले दौर में अगर आप अपनी स्किल्स को अपडेट नहीं कर रहे हैं, तो आप एक ऐसी पुरानी मशीन हैं जो बस कबाड़ में जाने वाली है। सेल्फ मैनेजमेंट का मतलब है हर दिन खुद का एक बेहतर वर्जन तैयार करना।
तो क्या आप तैयार हैं उस भीड़ से बाहर निकलने के लिए? 'हाउ टू बी ए स्टार एट वर्क' सिर्फ एक किताब नहीं है, यह एक माइंडसेट शिफ्ट है। यह हमें सिखाती है कि सक्सेस कोई तुक्का नहीं है, बल्कि इनिशिएटिव, नेटवर्किंग और सेल्फ मैनेजमेंट का एक सही कॉम्बिनेशन है। आप आज ही तय कीजिये कि क्या आप सिर्फ एक नंबर बनकर रहना चाहते हैं या ऑफिस की उस गैलेक्सी का चमकता हुआ सितारा बनना चाहते हैं जिसे हर कोई देखना चाहता है।
अब फैसला आपके हाथ में है। कल जब आप ऑफिस जाएं, तो एक एवरेज वर्कर की तरह नहीं, बल्कि एक स्टार की तरह कदम रखें। अपनी काबिलियत को साबित करने का वक्त आ गया है। उठिए, पहल कीजिये और दुनिया को दिखा दीजिये कि आप स्टार बनने के लिए ही पैदा हुए हैं।
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