अगर आपको लगता है कि आपकी मेहनत ही आपकी तरक्की की गारंटी है तो मुबारक हो आप अब भी किसी पुरानी सदी में जी रहे हैं। बिना लीडरशिप और सही मैनेजमेंट के आप सिर्फ एक गधे की तरह काम कर रहे हैं जो कभी शेर नहीं बन पाएगा। ली आइकोका की ये बातें सुनकर शायद आपकी ईगो हर्ट हो जाए पर सच तो यही है कि आप अब तक फेल हो रहे थे।
चलिए अब बिना टाइम वेस्ट किए उन ३ पावरफुल लेसन्स पर नजर डालते हैं जिन्होंने डूबती हुई कंपनी और टूटते हुए करियर को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया।
Lesson : मैनेजमेंट का मतलब है लोगों को हिलाना, फाइलों को नहीं
ली आइकोका कहते हैं कि अगर आप सोचते हैं कि ऑफिस में बैठकर सिर्फ ईमेल भेजने या एक्सेल शीट भरने से आप एक महान मैनेजर बन जाएंगे, तो भाई आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। असल मैनेजमेंट कागजों पर नहीं, बल्कि इंसानों के दिलों और दिमागों पर राज करने का नाम है। आइकोका जब फोर्ड कंपनी में थे और बाद में जब उन्होंने क्रिस्लर की कमान संभाली, तो उन्होंने एक बात साफ कर दी थी कि अगर आप अपनी टीम को मोटिवेट नहीं कर सकते, तो आपकी डिग्री सिर्फ एक रद्दी का टुकड़ा है।
इसे एक सिंपल उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपकी एक छोटी सी टीम है जो एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। अब आप एक ऐसे बॉस हैं जो बस केबिन में बैठकर ऑर्डर झाड़ता है और गलती होने पर चिल्लाता है। आपकी टीम आपके डर से काम तो करेगी, लेकिन वो अपना बेस्ट कभी नहीं देगी। वहीं दूसरी तरफ, आइकोका जैसा लीडर अपनी टीम के बीच जाता है। वो जानता है कि कब किसको पीठ थपथपाकर शाबाशी देनी है और कब किसको प्यार से हकीकत का आईना दिखाना है।
अक्सर हमारे साथ भी ऐसा होता है। हम सोचते हैं कि काम तो काम है, इसमें इमोशन्स की क्या जरूरत? पर सच तो ये है कि मशीनें तेल से चलती हैं और इंसान मोटिवेशन से। आइकोका ने क्रिस्लर में आकर सबसे पहले यही किया। उन्होंने वहां के वर्कर्स से बात की, उन्हें यकीन दिलाया कि ये कंपनी उनकी अपनी है। उन्होंने खुद की सैलरी सिर्फ एक डॉलर कर ली ताकि उनकी टीम को दिखे कि उनका लीडर उनके साथ खड़ा है। इसे कहते हैं असली लीडरशिप का स्वैग।
अगर आप किसी से काम करवाना चाहते हैं, तो उसे ये महसूस कराइए कि वो काम उसके लिए भी उतना ही जरूरी है जितना आपके लिए। अगर आप सिर्फ अपना फायदा देखेंगे, तो लोग आपके लिए सिर्फ घड़ी देखकर काम करेंगे। पर अगर आप उन्हें विजन देंगे, तो वो आपके लिए संडे को भी खुशी-खुशी ऑफिस आएंगे। कटाक्ष की बात ये है कि आज के कलुआ मैनेजर अपनी टीम को मोटिवेट करने के नाम पर बस पिज्जा पार्टी दे देते हैं, जबकि जरूरत होती है उन्हें सम्मान और जिम्मेदारी देने की।
ली आइकोका का ये लेसन हमें सिखाता है कि एक अच्छा मैनेजर बनने के लिए आपको एक अच्छा साइकोलॉजिस्ट होना जरूरी है। आपको पता होना चाहिए कि कौन सा बटन दबाने पर कौन सा एम्प्लॉई रॉकेट की तरह उड़ेगा। अगर आप अपनी टीम की ताकत नहीं पहचान पा रहे, तो यकीन मानिए आप खुद अपनी तरक्की के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। मैनेजमेंट का असली जादू फाइलों के ढेर में नहीं, बल्कि लोगों के साथ आपके तालमेल में छिपा है।
Lesson : संकट में साहस और फैसले लेने का असली जिगरा
ली आइकोका कहते हैं कि जब सब कुछ सही चल रहा हो, तब तो कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा मैनेजर बन सकता है। असली टेस्ट तो तब होता है जब आपकी नैया डूब रही हो और चूहे जहाज छोड़कर भाग रहे हों। फोर्ड कंपनी से निकाले जाने के बाद जब वो क्रिस्लर पहुंचे, तो वहां का हाल किसी कबाड़खाने से कम नहीं था। कंपनी अरबों के घाटे में थी और लोग कह रहे थे कि आइकोका का करियर अब खत्म है। लेकिन भाई साहब, आइकोका ने वहां हार नहीं मानी, बल्कि उन्होंने दुनिया को दिखाया कि फैसला लेना किसे कहते हैं।
इसे एक रीयल लाइफ एग्जांपल से समझते हैं। मान लीजिए आपकी लाइफ में एक ऐसी सिचुएशन आती है जहाँ आपका ब्रेकअप हो गया, नौकरी चली गई और बैंक बैलेंस भी जीरो है। अब आपके पास दो रास्ते हैं। या तो देवदास बनकर कोने में बैठ जाओ और दुनिया को अपनी दुखभरी कहानी सुनाओ, या फिर आइकोका की तरह खड़े हो जाओ और कहो कि अब मैं दिखाऊंगा कि गेम कैसे खेला जाता है। आइकोका ने क्रिस्लर में यही किया। उन्होंने वो फैसले लिए जो कोई और लेने की हिम्मत नहीं कर सकता था। उन्होंने बेकार के खर्चों को काटा और सबसे बड़ी बात, सरकार से लोन मांगने की हिम्मत दिखाई।
आजकल के कई लोग तो एक छोटा सा रिस्क लेने से भी डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने कोई नया काम शुरू किया और वो फेल हो गया, तो पड़ोस वाली आंटी क्या कहेंगी। आइकोका के लिए तो पूरी दुनिया देख रही थी, पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। उन्होंने कहा कि सही समय पर गलत फैसला लेना, गलत समय पर सही फैसला लेने से बेहतर है। मतलब ये कि हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने से अच्छा है कि आप कुछ तो कदम उठाएं। अगर आप हिलेंगे ही नहीं, तो मंजिल तक कैसे पहुंचेंगे?
आज के दौर में लोग छोटी सी परेशानी आते ही मोटिवेशनल वीडियो ढूंढने लगते हैं, जबकि असली मोटिवेशन तो खुद के अंदर के गुस्से और कुछ कर गुजरने की आग में होता है। आइकोका ने दिखाया कि जब आपकी पीठ दीवार से लगी हो, तब आपको पीछे हटने का नहीं, बल्कि जोर से धक्का देने का सोचना चाहिए। उन्होंने क्रिस्लर को न सिर्फ बचाया, बल्कि उसे एक ऐसी कंपनी बना दिया जिसने पूरी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया।
ये लेसन हमें सिखाता है कि लाइफ में जब भी बुरा वक्त आए, तो उसे एक चैलेंज की तरह लें। अगर आप रिस्क लेने से डरेंगे, तो आप कभी बड़ा नहीं बन पाएंगे। फैसला लीजिए, चाहे वो आपको डराता ही क्यों न हो। क्योंकि जीत हमेशा उसी की होती है जो मैदान में उतरने का दम रखता है, न कि उसकी जो सिर्फ स्टेडियम में बैठकर तालियां बजाता है या गालियां देता है।
Lesson : कम्युनिकेशन और अनुशासन ही असली किंगमेकर हैं
ली आइकोका एक बहुत ही कड़वी बात कहते हैं कि आपके पास दुनिया का सबसे क्रांतिकारी आइडिया हो सकता है, लेकिन अगर आप उसे किसी को समझा नहीं सकते, तो वो आइडिया कचरे के डिब्बे के लायक है। आइकोका खुद एक मास्टर कम्युनिकेटर थे। उन्होंने सिर्फ गाड़ियां नहीं बेचीं, बल्कि उन्होंने भरोसा बेचा। उनका मानना था कि एक लीडर का काम सिर्फ हुक्म चलाना नहीं है, बल्कि अपनी विजन को अपनी टीम और कस्टमर्स के दिमाग में उतार देना है। और ये सब मुमकिन होता है अनुशासन यानी डिसिप्लिन से।
इसे एक मजे़दार रीयल लाइफ एग्जांपल से समझते हैं। आपने वो दोस्त तो देखा होगा जो जिम जाने का प्लान तो ऐसे बनाता है जैसे कल ही मिस्टर इंडिया बन जाएगा, लेकिन मंडे आते ही उसे नींद प्यारी लगने लगती है। आइकोका ऐसे लोगों को अपनी कंपनी के गेट से भी अंदर न घुसने दें। अनुशासन का मतलब ये नहीं कि आप बस टाइम पर ऑफिस आएं, बल्कि इसका मतलब है कि जो काम आपने हाथ में लिया है, उसे खत्म करने की जिद पालें। आइकोका जब क्रिस्लर में थे, तो उन्होंने हर ऑफिसर के लिए एक सिस्टम बनाया था कि उन्हें हर तीन महीने में अपने गोल्स लिखने होंगे। बिना लिखित गोल के आप बस एक बिना एड्रेस वाली चिट्ठी हैं जो कहीं नहीं पहुंचेगी।
आजकल के 'कूल' बनने वाले लड़कों को लगता है कि रील बनाकर या टेढ़े-मेढ़े कैप्शन लिखकर वो बहुत बड़े इन्फ्लुएंसर बन गए हैं। पर सच तो ये है कि जब तक आपकी बात में दम नहीं होगा और आपके काम में कंसिस्टेंसी नहीं होगी, कोई आपको सीरियसली नहीं लेगा। आइकोका ने सिखाया कि कम्युनिकेशन का मतलब सिर्फ बोलना नहीं, बल्कि सुनना भी है। वो अपने वर्कर्स की बात सुनते थे, उनके दुख-दर्द समझते थे और फिर उन्हें एक बेहतर भविष्य का सपना दिखाते थे।
लोग आजकल घंटों नेटफ्लिक्स पर बिंज वॉचिंग कर सकते हैं, पर अपनी स्किल्स पर काम करने के लिए उनके पास दस मिनट भी नहीं होते। आइकोका कहते थे कि अगर आप खुद को मैनेज नहीं कर सकते, तो आप दूसरों को क्या खाक मैनेज करेंगे? अनुशासन कड़वा होता है पर इसका फल बहुत मीठा होता है। उन्होंने क्रिस्लर को अनुशासन की वजह से ही उस दलदल से निकाला जहाँ से निकलना नामुमकिन लग रहा था।
तो भाई, अगर लाइफ में कुछ बड़ा उखाड़ना है, तो अपनी जुबान और अपनी आदतों पर काम करना शुरू कर दो। साफ़ बोलो, सीधा बोलो और जो बोलो उसे पूरा करने का दम रखो। आइकोका की लाइफ हमें यही सिखाती है कि एक साधारण इंसान भी अगर अनुशासन और सही बातचीत का तरीका सीख जाए, तो वो बड़ी से बड़ी जंग जीत सकता है।
दोस्तों, ली आइकोका की ये कहानी सिर्फ एक बिजनेस टायकून की कहानी नहीं है, ये एक ऐसे इंसान की दास्तान है जिसने हार को अपनी ताकत बना लिया। चाहे आपको अपनी जॉब में तरक्की चाहिए या खुद का स्टार्टअप खड़ा करना हो, ये ३ लेसन्स आपकी किस्मत बदल सकते हैं। याद रखिए, दुनिया आपको तब तक नहीं हरा सकती जब तक आप खुद घुटने न टेक दें।
आज ही अपने आप से एक सवाल पूछिए कि क्या आप सिर्फ अपनी लाइफ की फिल्म के एक साइड एक्टर बने रहना चाहते हैं या फिर आप भी ली आइकोका की तरह अपनी कहानी के खुद डायरेक्टर बनना चाहते हैं? कमेंट्स में हमें जरूर बताएं कि इन ३ लेसन्स में से कौन सी बात आपके दिल को छू गई और आप इसे अपनी लाइफ में कैसे लागू करेंगे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो लाइफ में थोड़ा सा कन्फ्यूज्ड है। क्या पता आपकी एक शेयरिंग किसी की जिंदगी बदल दे।
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