क्या आपको लगता है कि 30 के बाद चीज़ें भूलना या कॉन्सेंट्रेशन (concentration) कम होना नॉर्मल है? अगर हाँ, तो मुबारक हो, आप 'डंब क्लब' के परमानेंट (permanent) मेंबर हैं। जब बाक़ी लोग अपनी ब्रेन पावर (brain power) बूस्ट करके लाइफ़ के गोल्स (goals) पूरे कर रहे हैं, आप वही पुरानी बहानेबाज़ी दोहरा रहे हैं। इस किताब ने बताया कि आप रोज़ कितनी इंटेलिजेंस (intelligence) मिस कर रहे हैं। यहाँ हैं वो 3 सबक जो आपका दिमाग हमेशा के लिए बदल देंगे और आपको स्मार्ट (smart) बनने पर मजबूर कर देंगे।
Lesson : दिमाग़ की प्लास्टिसिटी – बूढ़े घोड़े अब भी दौड़ सकते हैं!
अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो 30 क्रॉस करते ही ये डायलॉग मारना शुरू कर देते हैं, "यार, अब तो मेरी याददाश्त कमज़ोर हो गई है," या "मेरी उम्र हो गई है, अब नई चीज़ें सीखना मेरे बस का नहीं," तो आप ख़ुद को जानबूझकर डंब (dumb) बना रहे हैं। ये एक भयानक बहाना है, और इस किताब ने इसे सीधे कचरे के डिब्बे में डाल दिया है।
ज़्यादातर लोग मानते हैं कि उनका दिमाग़ 25 की उम्र तक जैसा बन गया, सो बन गया। अब बस डिक्लाइन (decline) होना है। यानी, एक बार अगर आप दाल-चावल दिमाग़ वाले पैदा हुए, तो आप बिरयानी दिमाग़ वाले कभी नहीं बन सकते। ये सोचकर आप बस आराम से अपने फ़ोन को फ़्रिज में रखकर ढूंढते रहते हैं, और इल्ज़ाम उम्र पर लगाते हैं।
पर सुनिए, साइंस (Science) कहती है कि आपका दिमाग़ पत्थर नहीं, बल्कि लचीला आटा है। इसे कहते हैं न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity)। मतलब? आप किसी भी उम्र में अपने दिमाग़ के अंदर नए रास्ते, नई सड़कें (न्यूरल पाथवेज़) बना सकते हैं। हाँ, सही सुना आपने। आपका दिमाग़ सचमुच बदल सकता है। अगर आप कल तक एवरेज (average) थे, तो कल आप एक्स्ट्राऑर्डिनरी (extraordinary) बन सकते हैं। बस ज़रूरत है, उसे सही तरह से यूज़ (use) करने की।
सोचिए, हम जिम (gym) में जाकर अपनी बाइसेप्स (biceps) तो बना लेते हैं, पर जब दिमाग़ की कसरत की बात आती है, तो हम वही पुरानी फ़ेसबुक फ़ीड (Facebook feed) देखते रहते हैं।
"यार, मेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा।"
"क्यों नहीं कर रहा भाई? क्या इसे तुमने आख़िरी बार कब नई चीज़ सिखाई?"
"अरे, मैंने तो बचपन में पहाड़े सीखे थे।"
यही तो प्रॉब्लम है। अगर आप अपने बाएँ हाथ से ब्रश करना शुरू कर दें, या कोई नई भाषा सीखने लगें, तो आपका दिमाग़ तुरंत काम पर लग जाता है। वह कहता है, "ओह! नई रिक्वायरमेंट (requirement) आई है। चलो, इस काम के लिए एक नया सेक्शन (section) बनाते हैं।" और वह सचमुच नए कनेक्शन्स (connections) बना लेता है।
ये एक रियल लाइफ़ (real-life) एक्ज़ाम्पल है। मेरे एक अंकल थे। 55 की उम्र तक वो सिर्फ़ सरकारी फ़ाइलें (files) देखते थे। रिटायरमेंट (retirement) के बाद बोर हो गए। तो उन्होंने डिजिटल मार्केटिंग (digital marketing) सीखने की सोची। पहले हफ़्ते उनका हाल ऐसा था जैसे किसी ने उनके दिमाग़ में गूगल मैप्स की जगह सांप-सीढ़ी का बोर्ड चिपका दिया हो। वो हर चीज़ भूल जाते थे। उनकी पत्नी कहती थीं, "इस उम्र में क्यों ज़बरदस्ती दिमाग़ को तकलीफ़ दे रहे हो?"
पर अंकल डटे रहे। रोज़ सुबह 2 घंटे, रात को 1 घंटा। उन्होंने हार नहीं मानी। 6 महीने बाद, वो न केवल वेबसाइट्स (websites) बनाने लगे, बल्कि अपने बेटे के लिए क्लाइंट्स (clients) भी ढूँढने लगे। क्या हुआ था? क्या वो रात को कोई जादू की गोली खाते थे? नहीं। उन्होंने बस अपने दिमाग़ को मजबूर किया कि वो अपने कम्फ़र्ट ज़ोन (comfort zone) से बाहर निकले। और दिमाग़ ने, एक वफ़ादार नौकर की तरह, नए रास्ते बना दिए।
यही प्लास्टिसिटी की पावर (power) है। अगर आप अपने दिमाग़ को सिर्फ़ टीवी (TV) और पुरानी यादों के हवाले कर देंगे, तो वो बस सिकुड़ता चला जाएगा। पर अगर आप उसे चैलेंज (challenge) देंगे - कोई नया इंस्ट्रूमेंट (instrument) सीखो, कोई मुश्किल पज़ल (puzzle) सॉल्व (solve) करो, कोई नई स्किल (skill) सीखो - तो वो फैलेगा। वो और मज़बूत होगा।
याद रखो, यूज इट ऑर लूज इट (Use it or lose it) ये बात सिर्फ़ बॉडी (body) पर नहीं, बल्कि दिमाग़ पर भी 100% लागू होती है। अगर आप अपनी इंटेलिजेंस (intelligence) को बढ़ाना चाहते हैं, तो सबसे पहले ये बहाना बंद कीजिए कि आपकी उम्र अब आड़े आ रही है। आपकी उम्र नहीं, आपकी आलस आड़े आ रही है।
लेकिन, अब आप कहेंगे, "ठीक है, मैं तैयार हूँ। पर इस सुपर-ब्रेन (super-brain) मशीन को चलाने के लिए फ़्यूल (fuel) क्या लगेगा?" यह हमें दूसरे सबक तक ले जाता है... जो सिर्फ़ बादाम खाने या बाज़ार के महंगे सप्लीमेंट्स (supplements) लेने से कहीं ज़्यादा है। यह उस पावर (power) की बात है जो आपके हाथ में है, रोज़, बिना किसी एक्स्ट्रा ख़र्च के।
Lesson : ब्रेन फ़ूड और लाइफ़स्टाइल का जादू – बदाम से नहीं, बिस्तर से आता है फ़ोकस!
पिछले सबक में हमने कहा था, दिमाग़ एक सुपर-मशीन है। इसे कोई भी बदल सकता है। पर इस मशीन को चलाने के लिए फ़्यूल भी तो चाहिए। ज़्यादातर लोग यहाँ गलती करते हैं। वो सोचते हैं कि बाज़ार के महंगे सप्लीमेंट्स (supplements), बादाम का ढेर, या कोई 'मैजिक टी' ही उनकी ब्रेन पावर (brain power) बढ़ा देगी। और फिर जब रिज़ल्ट (result) नहीं आता, तो कहते हैं, "यार, ये सब तो बकवास है।"
असलियत सुनिए। असली जादू बाज़ार में नहीं, बल्कि आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में है। राइटर (writer) माइकल चाफ़ेट्ज़ ने साफ़ कहा है: ब्रेन पावर का 90% खेल सिर्फ़ तीन चीज़ों का है— नींद (Sleep), डाइट (Diet) और मूवमेंट (Movement) या एक्सरसाइज़ (Exercise)।
पहला पिलर: नींद – आपका 'गार्बेज डिस्पोज़ल'
हम भारतीय लोग नींद को टाइम-वेस्ट (time waste) समझते हैं। "4 घंटे सोकर भी काम चल जाएगा।" क्यों? ताकि आप ज़्यादा देर तक काम करके अमीर बन जाएँ? पर अगर 4 घंटे की नींद के बाद आप 8 घंटे में वो काम कर रहे हैं जो 6 घंटे की अच्छी नींद के बाद 4 घंटे में हो सकता था, तो आप टाइम-वेस्ट ही कर रहे हैं।
नींद, आपके दिमाग़ का गार्बेज डिस्पोज़ल है। जब आप सोते हैं, तब दिमाग़ पिछले दिन की सारी टॉक्सिक (toxic) चीज़ों को साफ़ करता है। मेमोरी (memory) फ़ाइलों को सॉर्ट (sort) करता है। और अगर आप उसे सफ़ाई का टाइम ही नहीं देंगे, तो क्या होगा? दिमाग़ में कचरे का ढेर लगेगा। आपकी कॉन्सेंट्रेशन (concentration) कम होगी, आप चीज़ें भूलने लगेंगे।
कल्पना कीजिए: आप रात को 3 बजे तक नेटफ़्लिक्स (Netflix) पर सीरीज़ (series) देख रहे हैं। सुबह 9 बजे उठकर कह रहे हैं, "यार, फ़ोकस नहीं हो रहा।" अरे भाई, आपकी मेमोरी की फ़ाइलें तो अभी भी 'प्रोसेसिंग' (processing) में हैं। 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद जिस दिन ले ली, उस दिन दुनिया अलग लगेगी। आपका दिमाग़ कहेगा, "आह्ह्ह! आज तो मैं सुपरमैन हूँ।" नींद से समझौता, मतलब इंटेलिजेंस (intelligence) से समझौता।
दूसरा पिलर: डाइट – दिमाग़ को तेल नहीं, न्यूट्रिएंट्स (Nutrients) चाहिए
अगला पिलर: डाइट। आप अपने दिमाग़ को क्या खिला रहे हैं? आलू चिप्स, समोसे, कोल्ड ड्रिंक (cold drink)? ये सब शॉर्ट-कट एनर्जी है। ये आपको 10 मिनट के लिए 'हाई' (high) कर देगी, पर फिर धड़ाम से नीचे गिरा देगी।
दिमाग़ को ओमेगा-3 (Omega-3) फ़ैटी एसिड्स (fatty acids) चाहिए, न कि ऑयली ड्रामा। आप अपने सुपर-कंप्यूटर (super-computer) को पेट्रोल की जगह मिट्टी का तेल पिला रहे हैं, और फिर उम्मीद कर रहे हैं कि वो रॉकेट की स्पीड से चले। नहीं चलेगा! आपका दिमाग़ आपके पेट से ही चलता है। जो खाओगे, वही सोचोगे।
एक बार एक दोस्त ने मुझसे कहा, "मैं कितना भी पढ़ लूँ, 20 मिनट बाद दिमाग़ थक जाता है।" मैंने उससे पूछा, "खाने में क्या खाया था?" उसने हँसकर कहा, "दो प्लेट छोले-भटूरे और एक कोल्ड ड्रिंक।" मैंने कहा, "भाई, ये छोले-भटूरे नहीं, स्लो-भटूरे हैं। इन्होंने आपके दिमाग़ में ख़ून की सप्लाई (supply) की जगह, नींद की सप्लाई शुरू कर दी है।" हल्की डाइट, ढेर सारा पानी, और हरी सब्ज़ियाँ – यही आपके दिमाग़ का असली वीआईपी (VIP) फ़ूड है।
तीसरा पिलर: मूवमेंट (Movement) – शरीर का इंजन स्टार्ट करो
और तीसरा है एक्सरसाइज़। जब आप चलते हैं, दौड़ते हैं, या बस हिलते हैं, तो क्या होता है? आपके दिमाग़ में ख़ून की सप्लाई तेज़ होती है। ख़ून क्या ले जाता है? ऑक्सीजन (Oxygen) और न्यूट्रिएंट्स (Nutrients)। दिमाग़ को ये दोनों चीज़ें पार्टी के लिए चाहिए। अगर आप सारा दिन एक ही जगह बैठे हैं, तो दिमाग़ को लगता है कि "कोई इमरजेंसी (emergency) नहीं है, आराम करो।" और वो आलसी हो जाता है।
एक 15 मिनट की ब्रिस्क वॉक (brisk walk) आपके दिमाग़ के मूड (mood) को तुरंत बदल सकती है। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे आप सोये हुए घोड़े को एक ज़ोरदार चाबुक मारो। दिमाग़ तुरंत एक्टिव (active) हो जाता है।
ये तीनों पिलर्स (नींद, डाइट, एक्सरसाइज़) आपके दिमाग़ को फ़्यूल देते हैं। पर सिर्फ़ फ़्यूल से गाड़ी नहीं चलती। गाड़ी को सही ड्राइविंग भी चाहिए। यही हमें तीसरे और सबसे ज़रूरी सबक तक ले जाता है... कि आप एक साथ 10 काम करके ख़ुद को जीनियस समझते हैं, पर असल में आप ख़ुद का ही बेवकूफ़ बना रहे हैं। मल्टीटास्किंग (multitasking) एक घातक धोखा है।
Lesson : मल्टीटास्किंग एक घातक धोखा है – एक काम, एक टाइम, असली पावर!
पिछले लेसन में हमने आपके दिमाग़ को फ़्यूल दिया: अच्छी नींद, बढ़िया डाइट, और रोज़ की कसरत। अब आपके पास एक सुपर-चार्ज्ड (super-charged) इंजन है। पर क्या होगा अगर आप इस इंजन को एक साथ 10 रास्तों पर चलाने की कोशिश करें? ब्रेकडाउन (Breakdown)। यही है इस किताब का तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण सबक: मल्टीटास्किंग (Multitasking) एक धोखा है।
ज़्यादातर लोग इसे बैज ऑफ़ ऑनर (Badge of Honor) समझते हैं। "मैं एक साथ फ़ोन पर बात कर रहा हूँ, ईमेल (email) चेक कर रहा हूँ, और प्रेजेंटेशन (presentation) भी बना रहा हूँ।" वाह-वाह? ख़ुद को शाबाशी देने से पहले सुनिए। आप एक साथ 3 काम नहीं कर रहे हैं। आप 3 काम को 3 सेकंड के इंटरवल (interval) पर बदल रहे हैं। आपका दिमाग़ एक जॉग्लर (juggler) बन गया है जो 10 गेंदे उछाल रहा है, और हर बार ज़मीन पर एक गेंद गिराता है।
साइंस इसे कॉन्टैक्स्ट स्विचिंग (Context Switching) कहती है। जब आप एक काम से दूसरे काम पर जाते हैं, तो आपके दिमाग़ को गियर (gear) बदलने में टाइम लगता है। यह टाइम-वेस्ट नहीं, इंटेलिजेंस-वेस्ट है। हर बार जब आप स्विच करते हैं, आप अपनी कॉन्सेंट्रेशन (concentration) का एक टुकड़ा खो देते हैं।
सोचिए, आप एक बहुत ज़रूरी रिपोर्ट (report) लिख रहे हैं।
डिंग! (एक मैसेज आया)। आप चैट (chat) चेक करते हैं।
2 मिनट बाद...
आप वापस रिपोर्ट पर आते हैं। आपको याद ही नहीं है कि आप कहाँ थे।
फिर डिंग! (ईमेल आया)। आप उसे चेक करते हैं।
5 मिनट बाद...
आप वापस रिपोर्ट पर आते हैं, और अब आप सोचते हैं, "यार, मैं तो थक गया।"
आप थके नहीं हैं। आपने अपने दिमाग़ को 10 अलग-अलग जगह भेजकर थका दिया है। आपने एक काम को 10 बार शुरू किया, पर ख़त्म एक बार भी नहीं किया।
माइकल चाफ़ेट्ज़ साफ़ कहते हैं: डीप फ़ोकस (Deep Focus) ही असली पावर है। जब आप एक काम में पूरी तरह डूब जाते हैं, जब दुनिया की आवाज़ें बंद हो जाती हैं, तब आपका दिमाग़ मेमोरी (Memory) और लर्निंग (Learning) के लिए सबसे अच्छे कनेक्शन्स बनाता है। यह वही जगह है जहाँ असली जीनियस काम करते हैं।
आप क्या कर सकते हैं?
- सिंगल-टास्किंग (Single-Tasking) की आदत डालो: अगर 30 मिनट का काम है, तो फ़ोन को फ़्लाइट मोड (Flight Mode) पर डाल दो। दुनिया को जलने दो। पहले 30 मिनट में काम ख़त्म करो। यह आपको एक सुपरपावर (superpower) देगा।
- छोटे ब्लॉक्स (Small Blocks) में काम करो: 25 मिनट काम करो, 5 मिनट ब्रेक (break)। इसे पोमोडोरो टेक्नीक (Pomodoro Technique) कहते हैं। यह दिमाग़ को छोटे टारगेट (target) देता है, जिसे वह आसानी से हिट (hit) कर सकता है।
- 'नो' बोलना सीखो: जब आप किसी प्रोजेक्ट (project) पर काम कर रहे हों, और कोई दूसरा काम आ जाए, तो कहो, "अभी नहीं।" अपने दिमाग़ को प्रोटेक्ट (protect) करना सीखो।
ये तीन सबक, एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
पहले सबक ने आपको बताया कि आप बदल सकते हैं (प्लास्टिसिटी)।
दूसरे सबक ने आपको बदलने के लिए एनर्जी दी (नींद, डाइट, एक्सरसाइज़)।
और यह तीसरा सबक आपको बताता है कि उस एनर्जी को सही जगह कैसे लगाना है (सिंगल फ़ोकस)।
अगर आप सिर्फ़ एक चीज़ आज से बदल दें... मल्टीटास्किंग का ड्रामा बंद कर दें... और एक टाइम पर एक काम पर 100% फ़ोकस करें... तो आपकी प्रोडक्टिविटी (productivity) और इंटेलिजेंस (intelligence) रॉकेट की तरह उड़ने लगेगी।
तो अब क्या? क्या आप आज भी... अपने दिमाग़ को कचरे का डिब्बा बनाए रखना चाहते हैं? या उसे एक सुपर-स्मार्ट (super-smart) मशीन बनाना चाहते हैं?
आपके पास आज एक चॉइस (choice) है। आप अभी इस आर्टिकल को बंद करके वापस अपने फ़ोन की नोटिफ़िकेशन्स (notifications) में डूब सकते हैं, या फिर आज रात से 8 घंटे की नींद लेना शुरू कर सकते हैं। आप अगले 30 दिन तक रोज़ 15 मिनट चल सकते हैं। आप अगले 7 दिन तक, जब भी कोई ज़रूरी काम करें, तो अपने फ़ोन को फ़्लाइट मोड पर डाल सकते हैं। सिर्फ़ पढ़ना काफ़ी नहीं है। ज्ञान सिर्फ़ तब तक पावर है, जब तक आप उसे इस्तेमाल नहीं करते। नीचे कमेंट (comment) करके बताओ: वो कौन-सी एक चीज़ है जो आप आज से 'स्मार्ट फ़ॉर लाइफ़' बनने के लिए बदल रहे हैं?
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