आप दिन रात मेहनत करके बेस्ट प्रोडक्ट बना रहे हैं और फिर भी सेल जीरो है? मुबारक हो, आप मार्केटिंग के उन बुनियादी कानूनों को तोड़ रहे हैं जिनके बिना आपका ब्रांड कचरे के डिब्बे में जाएगा। क्या आपको लगता है कि सिर्फ क्वालिटी से काम चल जाएगा? यह आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है जो आपको डुबो देगी।
आज हम अल रीस और जैक ट्राउट की मशहूर किताब द 22 इम्यूटेबल लॉज ऑफ मार्केटिंग से वो 3 सबसे बड़े लेसन सीखेंगे जो आपके डूबते हुए बिजनेस को पार लगा सकते हैं।
Lesson : द लॉ ऑफ लीडरशिप - बेहतर होने से ज्यादा जरूरी है पहले आना
क्या आपको याद है कि चांद पर कदम रखने वाला पहला इंसान कौन था? नील आर्मस्ट्रांग। सबको पता है। अब जरा सोचिए और बताइए कि दूसरा कौन था? दिमाग पर जोर डालिए। नहीं याद आ रहा ना? यही तो जिंदगी और मार्केटिंग का सबसे कड़वा सच है। लोग हमेशा नंबर वन को याद रखते हैं और नंबर टू को भूल जाते हैं जैसे वह कभी था ही नहीं।
मार्केटिंग की दुनिया में अक्सर लोग यह गलती करते हैं कि वे सोचते हैं कि अगर उनका प्रोडक्ट बाकी सबसे बेहतर होगा तो वह जीत जाएंगे। भाई साहब, यह कोई स्कूल का एग्जाम नहीं है जहाँ ज्यादा नंबर लाने वाला टॉपर बनेगा। यह मार्केट की जंग है। यहाँ क्वालिटी से ज्यादा टाइमिंग मैटर करती है। अगर आप किसी कैटेगरी में पहले नहीं हैं तो आप चाहे कितनी भी अच्छी सर्विस दे दें, आप हमेशा नील आर्मस्ट्रांग के पीछे खड़े उस दूसरे अंतरिक्ष यात्री की तरह रहेंगे जिसका नाम किसी को याद नहीं।
जरा अपने आसपास के ब्रांड्स को देखिए। कोका कोला पहली कोला ड्रिंक थी इसलिए आज भी वह राज कर रही है। पेप्सी ने सालों तक चिल्ला चिल्ला कर कहा कि हमारा स्वाद ज्यादा अच्छा है लेकिन वह हमेशा कोका कोला के पीछे ही रही। क्यों? क्योंकि कोका कोला ने लोगों के दिमाग में पहले कब्जा कर लिया था।
आज जब आपको चोट लगती है या कट जाता है तो आप मेडिकल स्टोर पर जाकर क्या मांगते हैं? आप कहते हैं कि भाई एक बैंड एड दे दो। आपको पता भी है कि बैंड एड एक ब्रांड का नाम है? उस चिपकने वाली पट्टी को मेडिकल भाषा में कुछ और कहते हैं। लेकिन जॉनसन एंड जॉनसन ने वह प्रोडक्ट सबसे पहले निकाला था इसलिए आज वह नाम ही हमारी जुबान पर चढ़ गया है।
अगर आप अपना बिजनेस शुरू कर रहे हैं और आप सोच रहे हैं कि आप एमेजॉन या जोमेटो से बेहतर ऐप बना लेंगे तो रुक जाइए। बेहतर होना अच्छी बात है लेकिन सबसे पहले पहुंचना गेम चेंजर है। अगर आप पहले नहीं आ सकते तो आप सिर्फ दूसरों की नकल कर रहे हैं और नकल करने वालों को इतिहास कभी याद नहीं रखता।
मार्केटिंग का यह पहला कानून कहता है कि लड़ाई प्रोडक्ट की नहीं बल्कि परसेप्शन यानी नजरिए की है। अगर आप कस्टमर के दिमाग में पहले घुस गए तो आप आधी जंग जीत चुके हैं। लोग बेहतर नहीं चाहते लोग वो चाहते हैं जो उनके लिए नया और पहला हो। अपनी एनर्जी यह साबित करने में मत लगाइए कि आप बेस्ट हैं बल्कि यह रास्ता ढूंढिए कि आप पहले कैसे बन सकते हैं।
Lesson : द लॉ ऑफ कैटेगरी - अगर नंबर वन नहीं बन सकते तो अपनी कुर्सी खुद बनाओ
मान लीजिए आप एक रेस में भाग ले रहे हैं और वहां पहले से ही उसैन बोल्ट खड़ा है। अब आप चाहे जितना भी च्यवनप्राश खा लें या नए जूते पहन लें, आप उसे हरा नहीं पाएंगे। तो क्या आप हार मान लेंगे? बिल्कुल नहीं। अक्लमंदी इसमें है कि आप उस रेस से बाहर निकलें और एक ऐसी नई रेस शुरू करें जिसमें आप अकेले दौड़ रहे हों। जैसे कि उल्टे पैर दौड़ने की रेस। अब मुबारक हो, आप उल्टे पैर दौड़ने वाले दुनिया के पहले इंसान बन गए।
मार्केटिंग का यह कानून कहता है कि अगर आप अपनी कैटेगरी में पहले नहीं आ सकते तो मायूस मत होइए। बस एक ऐसी नई कैटेगरी ढूंढ लीजिए जिसमें आप पहले नंबर पर आ सकें। लोग अक्सर अपनी पूरी जिंदगी यह साबित करने में निकाल देते हैं कि उनका प्रोडक्ट मार्केट लीडर से बेहतर है। भाई साहब, अगर मार्केट में पहले से ही कोई शेर बैठा है तो आप उसके सामने जाकर यह मत कहिए कि मैं उससे बड़ा शेर हूँ। आप बनिए एक ऐसी चील जो आसमान में अकेली उड़ती है।
मान लीजिए आपने एक नया साबुन बनाया है। अगर आप कहेंगे कि मेरा साबुन लक्स से ज्यादा खुशबू देता है तो लोग आपको भाव नहीं देंगे। लेकिन अगर आप कहें कि यह दुनिया का पहला साबुन है जो सिर्फ रात को सोने से पहले इस्तेमाल करने के लिए बना है ताकि आपको अच्छी नींद आए तो आपने एक नई कैटेगरी बना दी। अब लक्स आपका कॉम्पिटिटर नहीं रहा क्योंकि वह तो दिन में नहाने का साबुन है।
इसी तरह जब फॉक्सवैगन ने अमेरिका में अपनी छोटी कार बीटल लॉन्च की थी तब वहां बड़ी कारों का बोलबाला था। उन्होंने यह नहीं कहा कि हमारी कार फोर्ड से बेहतर है। उन्होंने कहा थिंक स्मॉल। उन्होंने छोटी कारों की एक नई कैटेगरी ही बना दी और उसमें वह नंबर वन बन गए।
भारत में भी यही होता है। जब सारे मोबाइल ब्रांड्स फीचर और कैमरा की बात कर रहे थे तब लावा ने कहा कि हम अपना फोन भारत में ही बनाएंगे और उसे देसी टच दिया। उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई।
अक्सर स्टार्टअप्स यह गलती करते हैं कि वे एमेजॉन जैसा स्टोर या फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइट बनाना चाहते हैं। अरे भाई एमेजॉन तो बन चुका है अब आप क्या नया करेंगे? सवाल यह नहीं है कि आपका प्रोडक्ट दूसरों से कितना अच्छा है बल्कि सवाल यह है कि आपका प्रोडक्ट किस तरह से पहला है?
अगर आप कोई नया रेस्टोरेंट खोल रहे हैं और शहर में पहले से ही बहुत सारे बिरयानी वाले हैं तो आप यह मत कहिए कि मेरी बिरयानी बेस्ट है। आप कहिए कि मेरा रेस्टोरेंट शहर का पहला ऐसा कोना है जहां सिर्फ मिट्टी के बर्तनों में बनी ऑर्गेनिक बिरयानी मिलती है। बस! जैसे ही आपने अपनी कैटेगरी बदली आप उस कैटेगरी के नील आर्मस्ट्रांग बन गए।
याद रखिए कस्टमर हमेशा नया ढूंढता है। उसे बेहतर की तलाश नहीं है उसे कुछ अलग और अपनी तरह का पहला चाहिए। अगर आप अपनी खुद की कैटेगरी बना लेंगे तो आपको किसी से मुकाबला करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। आप खुद ही राजा होंगे और खुद ही प्रजा।
Lesson : द लॉ ऑफ माइंड - मार्केट से ज्यादा जरूरी है दिमाग में जीतना
अगर आपको लगता है कि मार्केट में सबसे पहले दुकान खोलना या सबसे पहले ऐप लॉन्च करना ही काफी है, तो जरा रुकिए। असली लड़ाई बाजार की गलियों में नहीं, बल्कि लोगों के दिमाग की नसों में लड़ी जाती है। मार्केटिंग का यह कानून कहता है कि मार्केट में पहले आने से लाख गुना ज्यादा जरूरी है कस्टमर के दिमाग में पहले पहुंचना। परसेप्शन यानी नजरिया ही हकीकत है। अगर लोगों ने मान लिया कि आप बेस्ट हैं, तो आप बेस्ट हैं, चाहे आपका प्रोडक्ट असलियत में औसत ही क्यों न हो।
जरा सोचिए, जब हम ऑनलाइन कुछ सर्च करने की बात करते हैं, तो हम यह नहीं कहते कि इंटरनेट पर जानकारी ढूंढो। हम कहते हैं गूगल कर लो। क्या गूगल दुनिया का पहला सर्च इंजन था? बिल्कुल नहीं। उससे पहले याहू और अल्टाविस्टा जैसे दिग्गज मौजूद थे। लेकिन गूगल ने लोगों के दिमाग में ऐसी जगह बनाई कि आज वह एक शब्द बन चुका है। उन्होंने सीधा लोगों के माइंडसेट पर हमला किया और वहां अपनी कुर्सी जमा ली।
अब एक देसी और मजेदार मिसाल लेते हैं। जब भी आप किसी ढाबे पर रुकते हैं और आपको प्यास लगती है, तो आप पानी की बोतल मांगते वक्त क्या कहते हैं? भाई साहब, एक बिसलेरी देना। दुकानदार आपको किसी भी ब्रांड की बोतल पकड़ा दे, आप उसे बिसलेरी ही मान लेते हैं। बिसलेरी ने पानी बेचने से ज्यादा भरोसा और एक नाम बेचा है। उनके लिए मार्केट में जगह बनाना आसान था क्योंकि उन्होंने लोगों के दिमाग में यह बात बैठा दी कि शुद्ध पानी मतलब बिसलेरी।
अक्सर लोग यह गलती करते हैं कि वे अपना सारा पैसा और समय प्रोडक्ट को बेहतर बनाने में लगा देते हैं, लेकिन उसे लोगों के दिमाग तक पहुंचाने में कंजूसी कर जाते हैं। भाई साहब, अगर आपने दुनिया की सबसे अच्छी मिठाई बनाई है लेकिन किसी को उसके बारे में पता ही नहीं, तो वह मिठाई आपके किचन में ही पड़ी रह जाएगी। मार्केटिंग का मतलब है लोगों के दिमाग में एक इमेज बनाना।
अगर आप एक बार किसी के दिमाग में गलत इमेज बना लेते हैं, तो उसे बदलना लगभग नामुमकिन है। इसीलिए बड़े ब्रांड्स कभी अपनी इमेज से समझौता नहीं करते। अगर एप्पल कल को सस्ता और घटिया फोन बेचना शुरू कर दे, तो लोग उसे नहीं खरीदेंगे क्योंकि उनके दिमाग में एप्पल का मतलब है प्रीमियम और स्टेटस।
तो सीख यह है कि सिर्फ पहले मत बनिए, बल्कि लोगों के दिमाग में पहले घर बनाइए। आपका मैसेज इतना साफ और सीधा होना चाहिए कि एक छोटा बच्चा भी समझ जाए कि आप क्या बेच रहे हैं और क्यों। अगर आप कस्टमर के दिमाग में नंबर वन पोजीशन पा लेते हैं, तो फिर दुनिया की कोई भी ताकत आपको उस सिंहासन से नहीं हटा सकती।
मार्केटिंग कोई रॉकेट साइंस नहीं है, यह बस इंसानी दिमाग को समझने का एक खेल है। चाहे आप लीडर बनें, नई कैटेगरी बनाएं या लोगों के दिमाग पर राज करें, याद रखिए कि आपका ब्रांड आपकी पहचान है। इन कानूनों को तोड़ना मतलब अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है। तो क्या आप तैयार हैं अपने बिजनेस को एक नई पहचान देने के लिए? उठिए, इन रूल्स को अपनी स्ट्रेटेजी में शामिल कीजिए और देखिए कैसे दुनिया आपके पीछे भागती है।
याद रखिए, आप सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं बेच रहे, आप एक कहानी और एक भरोसा बेच रहे हैं।
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