क्या आपकी कंपनी आपको हर साल 'एम्प्लॉयी ऑफ़ द मंथ' का सर्टिफिकेट देकर बेवकूफ़ बना रही है? अगर हाँ, तो मुबारक हो, आप एक और साधारण इंसान हैं। क्योंकि जब दुनिया का सबसे बड़ा मीडिया बॉस, रूपर्ट मर्डोक, अपने साम्राज्य की नींव रख रहा था, तब उसने ऐसी तीन चीजें कीं जो आप कभी नहीं करेंगे। चलिए, आज हम उन्हीं 3 सीक्रेट लेसन की बात करते हैं जो आपको बस 'गुड' नहीं, 'बॉस' बनाते हैं।
Lesson : रिस्क का "R" इतना बड़ा लिखो कि डर खुद ही छिप जाए
अगर आपकी लाइफ की सबसे बड़ी रिस्क ये है कि संडे को ब्रेकफ़ास्ट में पूड़ी-सब्जी खाएँ या छोले-भटूरे, तो बॉस, आप बिज़नेसमैन नहीं, बस एक अच्छे कस्टमर हैं। रूपर्ट मर्डोक ने हमें सिखाया कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं: एक वो जो 'सेफ़' खेलते हैं, और दूसरे वो जो जानते हैं कि सेफ़टी ही सबसे बड़ी रिस्क है।
रुपर्ट मर्डोक को ऑस्ट्रेलिया में जो कुछ विरासत में मिला, वो था एक छोटा, डूबता हुआ अखबार। क्या वो आराम से बैठकर उसे चलाते? नहीं। उन्होंने उस फॅमिली-पेपर को उठाया, और जैसे जिम में कोई दुबला-पतला लड़का पहली बार 100 किलो का वेट उठाता है, मर्डोक ने वैसे ही कैलकुलेटेड रिस्क लेना शुरू कर दिया। यहाँ ‘कैलकुलेटेड’ शब्द पर ध्यान देना ज़रूरी है। कैलकुलेटेड रिस्क का मतलब ये नहीं होता कि आप अपनी सैलरी का पूरा पैसा स्टॉक मार्केट में लगा दो और बोलो, "चल भाई, या तो आर-पार!" ये तो जुआ है।
कैलकुलेटेड रिस्क क्या है? ये वो रिस्क है जहाँ आप जानते हैं कि 70% चांस है कि आप गिरेंगे, लेकिन गिरने के बाद आपके पास उठने के लिए बैकअप प्लान और रिसोर्सेज हैं। मर्डोक ने ऐसे अखबार खरीदे जो लगभग मरने वाले थे, यानी उनकी कीमत ज़मीन पर थी। लेकिन उन्होंने ये भी देखा कि उन अख़बारों में एक 'पोटेंशियल' था—एक नब्ज़ थी जिसे सही मसाले वाली ख़बरों से फिर से धड़काया जा सकता था।
सोचिए, एक नॉर्मल आदमी जब कोई नई फैक्ट्री लगाता है, तो वो पहले छोटे मार्केट में टेस्ट करता है। मर्डोक ने क्या किया? उन्होंने सीधे दुनिया के सबसे बड़े और सबसे कॉम्पिटिटिव मार्केट, लंदन और न्यूयॉर्क में छलांग लगा दी। ये ठीक वैसा है जैसे आप अपनी लोकल गली क्रिकेट टीम को लेकर सीधे लॉर्ड्स (Lord's) के मैदान में वर्ल्ड कप खेलने पहुँच जाओ। सब कहेंगे, "अरे ये पागल हो गया है!"
लेकिन, मर्डोक की स्ट्रेटेजी थी लगातार एक्सपेंशन। उनका मानना था कि आप तब तक सुरक्षित नहीं हैं जब तक आप अपने कॉम्पिटिटर से दस कदम आगे न हों। अगर आप एक छोटा सा न्यूज़ चैनल चला रहे हैं और आप संतुष्ट हैं, तो याद रखना—कोई और आदमी अपनी गैरेज में बैठकर आपसे बड़ा और सस्ता चैनल बनाने का प्लान बना रहा है।
मर्डोक ने जब एक कंपनी को खरीदा, तो वो तुरंत दूसरी कंपनी को देखने लगते थे। ये एटीट्यूड ठीक वैसा है जैसे आपने अभी-अभी पहली रोटी खाई हो, और आप पहले से ही दूसरी रोटी को प्लेट में लाने का इंतज़ार कर रहे हों। भूख कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।
उनके एक बड़े एक्विजिशन (acquisition) की कहानी बड़ी मज़ेदार है। उन्होंने न्यूयॉर्क पोस्ट (New York Post) को खरीदा। ये अखबार उस समय घाटे में था, एकदम ठंडा पड़ा हुआ। मर्डोक ने वहाँ जाते ही क्या किया? उन्होंने उसे बोरिंग पॉलिटिकल न्यूज़ से हटाकर सनसनीखेज ख़बरों, गॉसिप और क्राइम स्टोरीज से भर दिया—एकदम 'मसाला-डाल-के' स्टाइल। बाक़ी के सो कॉल्ड "जर्नलिस्ट" नाक-भौं सिकोड़ने लगे कि "ये क्या कर दिया, हमारी पत्रकारिता की गरिमा कहाँ गई?" और मर्डोक हँसते रहे। क्यों? क्योंकि उनकी सेल्स आसमान छू गईं।
यहाँ सबक ये नहीं है कि आप अच्छी चीज़ों को बुरा बना दो। सबक ये है कि: अगर आपका प्रोडक्ट बिक नहीं रहा, तो आपकी गरिमा किसी काम की नहीं। मर्डोक ने रिस्क लिया, लोगों की नब्ज़ को समझा, और वो दिया जो लोग चुपके से पढ़ना चाहते थे। अगर आप सिर्फ़ इसलिए कुछ नहीं कर रहे क्योंकि "लोग क्या कहेंगे," तो फिर आप अपनी मर्ज़ी से अपनी ग्रोथ को रोक रहे हैं। ग्रोथ तब होती है जब आप इतना बड़ा रिस्क लेते हैं कि आपकी पुरानी आइडेंटिटी ही टूटकर बिखर जाए।
और यही रिस्क, यही अग्रेसिव भूख, मर्डोक को दूसरे सबक की ओर ले गई। जब आप इतनी सारी मीडिया कंपनियों के मालिक बन जाते हैं, तब आप सिर्फ़ बिज़नेसमैन नहीं रह जाते। आप बन जाते हैं... ताकत का केंद्र (Centre of Power)।
अगले सबक में हम जानेंगे कि रूपर्ट मर्डोक ने कैसे सिर्फ़ पैसा नहीं कमाया, बल्कि दुनिया को बदलने वाली सबसे बड़ी चीज़—ताकत (Power)—को अपने कंट्रोल में लिया।
Lesson : इन्फ्लुएंस का खेल—जब आपकी आवाज़ ही दुनिया की हेडलाइन बन जाए
अगर आप सोचते हैं कि इन्फ्लुएंस का मतलब बस इतना है कि आपके ऑफिस में आपकी बात मान ली जाए, या इंस्टाग्राम पर आपके 10 हज़ार फॉलोअर्स हों, तो आप एक छोटे तालाब के मेंढक हैं। रूपर्ट मर्डोक ने हमें सिखाया कि असली पावर तब आती है, जब आप सिर्फ़ ख़बरें नहीं छापते, बल्कि आप वो आदमी बन जाते हैं जो ख़बरों को बनाता है। यह सबक, पहले सबक—अग्रेसिव एक्सपेंशन—का सीधा नतीजा है। जब आपके पास इतना बड़ा मीडिया एम्पायर होता है, तो आप दुनिया को क्या सोचना है, ये तय करने की ताकत रखते हैं।
जरा सोचिए। एक आम आदमी अपनी बात मनवाने के लिए क्या करता है? वह मीटिंग में लंबी-चौड़ी स्पीच देता है, अपने बॉस की चापलूसी करता है, या फिर WhatsApp ग्रुप पर ज्ञान बाँटता है। ये सब 'इन्फ्लुएंस' के छोटे-मोटे झटके हैं। लेकिन मर्डोक ने क्या किया? उन्होंने उस माइक को ही खरीद लिया, जिससे पूरी दुनिया बात करती है।
मर्डोक ने बहुत जल्दी समझ लिया कि पॉलिटिकल पॉवर और मीडिया पॉवर एक-दूसरे के जिगरी दोस्त हैं। ये दो ऐसे पक्के यार हैं जो हमेशा एक-दूसरे का बैकअप लेते हैं। अगर आप बिज़नेस में कोई बड़ा फ़ैसला ले रहे हैं, तो आपको पॉलिटिकल प्रोटेक्शन चाहिए। और अगर कोई पॉलिटिशियन चुनाव जीतना चाहता है, तो उसे आपके मीडिया सपोर्ट की ज़रूरत है। यह लेन-देन इतना सिंपल और इतना क्रूर था कि बाक़ी के लोग इसे देख कर सिर्फ़ हाथ मलते रह गए।
इसे एक मज़ेदार तरीके से समझते हैं। मान लीजिए कि आपको अपनी कॉलोनी में एक नया बिज़नेस खोलना है, लेकिन आपका कॉम्पिटिटर कॉलोनी के प्रेजिडेंट का रिश्तेदार है। आप क्या करेंगे? शायद आप चुपचाप बैठ जाएँगे या फिर लीगल फाइट लड़ेंगे। मर्डोक ऐसा नहीं करते। मर्डोक पहले ही पता लगा लेते थे कि अगला प्रेजिडेंट कौन बनने वाला है, और फिर वो अपने सारे बड़े-बड़े अखबारों को उस आदमी के समर्थन में लगा देते थे। वह ख़बरें इस तरह से चलाते थे कि उस नेता की इमेज एकदम सुपरहीरो वाली बन जाए।
अब जब वो नेता चुनाव जीत जाता, तो क्या होता? मर्डोक के लिए रेड कार्पेट बिछ जाता। उनका काम बिना किसी रुकावट के चलता रहता। मर्डोक ने सरकारों को बनाया और गिराया। यह इतना ओपन सीक्रेट था कि हर बड़ा नेता उनसे मिलने का टाइम माँगता था।
यहां सबक यह नहीं है कि आपको चापलूसी करनी है। सबक यह है कि: अपने बिज़नेस को सिर्फ़ प्रोडक्ट और सर्विस तक सीमित मत रखो। अगर आपकी इंडस्ट्री में सरकारी नियम-कानून बड़ा रोल अदा करते हैं, तो आपको उन नियम-कानूनों को बनाने वाले लोगों के साथ एक 'सभ्य रिश्ता' बनाना पड़ेगा।
मर्डोक की पॉलिटिक्स हमेशा एक जैसी नहीं रहती थी। वो हमेशा उस आदमी को सपोर्ट करते थे, जो उनके बिज़नेस के लिए उस वक़्त सही था। यह ऐसा था जैसे वो एक क्रिकेट टीम के मालिक हों और हर मैच में उस खिलाड़ी को खिलाएँ जो उस पिच पर सबसे अच्छा खेल सकता है, भले ही वह उनका फेवरेट न हो। उनका कमिटमेंट किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि अपने एम्पायर की ग्रोथ से था। यह एक बॉस एटीट्यूड है: कोई सेंटीमेंट नहीं, सिर्फ़ स्ट्रेटेजी।
इन्हीं सब दांव-पेचों के बीच, एक और बड़ी चीज़ थी जिसने उन्हें दुनिया से अलग कर दिया। मर्डोक का मीडिया एम्पायर एक दिन का राजा नहीं था। यह हर बदलते दौर में टिका रहा। जब कोई नया मीडियम आता था—केबल टीवी, सैटेलाइट, या फिर इंटरनेट—तो बाक़ी के लोग सोचते रहते थे कि क्या करें, लेकिन मर्डोक उसे तुरंत खरीद लेते थे।
और यही चीज़ हमें अगले और सबसे ज़रूरी सबक की ओर ले जाती है: अगर आप समय के साथ नहीं बदले, तो आपकी ताकत बस एक पुरानी कहानी बनकर रह जाएगी।
अगले सबक में हम जानेंगे कि कैसे मर्डोक ने अपने इतने विशाल एम्पायर को समय के हर थपेड़े से बचाए रखा, और कैसे एक बिज़नेसमैन के तौर पर 'एक चीज़' पर अटकना सबसे बड़ी गलती है।
Lesson : समय के साथ बदलने की कला—अपनी पहचान को कभी पत्थर की लकीर न बनने दो
अगर आप आज भी उसी टेक्निक से बिज़नेस कर रहे हैं जो आपने 2005 में सीखी थी, तो बॉस, आप बिज़नेसमैन नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में एक केस स्टडी बनने की राह पर हैं। रूपर्ट मर्डोक ने हमें सिखाया कि सक्सेस का मतलब एक जगह टिकना नहीं, बल्कि हमेशा चलते रहना है। यह सबक, उनके शुरुआती रिस्क और बाद के इन्फ्लुएंस को एक लंबी रेस का घोड़ा बनाता है।
सोचिए: मर्डोक का करियर तब शुरू हुआ जब न्यूज़ का मतलब था प्रिंट—यानी, अखबार। अगर वो अपनी पहचान को सिर्फ़ 'प्रिंट मीडिया टाइकून' तक सीमित रखते, तो केबल टीवी के आने पर और फिर इंटरनेट के आने पर उनका एम्पायर ढह जाता, जैसे रेत का महल। लेकिन मर्डोक ने ये गलती नहीं की।
जब दुनिया में केबल टीवी का बूम आया, तो बाक़ी के अखबार वाले यही कहते रहे, "टीवी एक फ़ैड है, लोग हमेशा छपी हुई चीज़ों पर भरोसा करेंगे।" और मर्डोक क्या कर रहे थे? वो उस फ़ैड को हक़ीकत में बदल रहे थे। उन्होंने सैटेलाइट और केबल नेटवर्क में भारी निवेश किया। उन्होंने समझा कि लोग अब अपनी न्यूज़ और एंटरटेनमेंट के लिए कागज से दूर, स्क्रीन की तरफ़ जा रहे हैं।
ये बिल्कुल वैसा है जैसे आपने सालों तक अपनी लोकल दुकान चलाई हो, और फिर आपको पता चले कि अब सब ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं। एक साधारण दुकानदार क्या करेगा? वो शिकायत करेगा। एक मर्डोक क्या करेगा? वो सबसे पहले एक ई-कॉमर्स वेबसाइट बनाएगा और अपने सारे कॉम्पिटिटर्स को पीछे छोड़ देगा। शिकायत करने वाला नहीं, बल्कि समाधान खोजने वाला लीडर बनता है।
सबसे बड़ा उदाहरण है फॉक्स न्यूज़ (Fox News)। जब यूएसए में बाक़ी के न्यूज़ चैनल्स एक ख़ास तरह का नैरेटिव चला रहे थे, मर्डोक ने एक ऐसा चैनल शुरू किया जिसने एक बिल्कुल अलग और अनदेखी ऑडियंस को टारगेट किया—वो लोग जो बाकी चैनल्स से नाराज़ थे। ये एक खाली जगह थी, और मर्डोक ने वहाँ न केवल अपना झंडा गाड़ा, बल्कि एक पूरा किला बना दिया। उन्होंने ये साबित किया कि अगर मार्केट में कोई गैप है, तो उसे भर दो, भले ही दुनिया तुम्हें 'कंट्रोवर्शियल' कहे।
यहाँ सबक यह नहीं है कि आप हमेशा सही नैरेटिव चुनें। सबक यह है कि: सबसे बड़ी ग्रोथ अक्सर 'आउटसाइड द बॉक्स' में होती है।
लेकिन कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती। जब इंटरनेट आया, तो मर्डोक की कंपनी ने फिर से तेज़ी से छलांग लगाई। जब सब प्रिंट से टीवी पर गए, मर्डोक पहले ही वहाँ थे। और जब सब टीवी से डिजिटल पर जाने लगे, मर्डोक ने वहाँ भी बड़े दांव लगाए। उन्होंने MySpace जैसे सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म को भी खरीदा (भले ही वो दांव बाद में काम न आया, लेकिन उनका एटीट्यूड मायने रखता है)।
यह एटीट्यूड हमें सिखाता है कि कभी भी अपने आप को 'एक चीज़' का मास्टर मत समझो। अगर आप अपने आपको सिर्फ़ 'प्रिंट एक्सपर्ट' मानते हैं, तो डिजिटल की दुनिया आपको खा जाएगी। अगर आप सिर्फ़ 'फ़िज़िकल स्टोर ओनर' मानते हैं, तो ऑनलाइन बिज़नेस आपको बंद करवा देगा। आप एक 'एम्पायर बिल्डर' हैं, और एम्पायर हर ज़मीन पर खड़ा किया जाता है, चाहे वह प्रिंट हो, टीवी हो, या डिजिटल।
मर्डोक ने हमें एक बात साफ़ सिखाई: डर का मतलब है रुक जाना। और बिज़नेसमैन के लिए रुक जाना मौत है। आपको हर नए बदलाव को एक मौक़े के रूप में देखना है—एक मौक़ा अपने कॉम्पिटिटर्स पर लीड बनाने का, एक मौक़ा अपनी पॉवर को बढ़ाने का।
अब जब आपने ये तीन सबक सीख लिए हैं:
- रिस्क से डरो मत, उसे कैलकुलेट करो।
- सिर्फ़ बिज़नेस नहीं, पावर का गेम खेलो।
- बदलते वक़्त के साथ अपनी स्किन को बदलो।
तो आज रात जब आप सोएँ, तो अपने आप से एक सवाल पूछना: आप अपनी लाइफ में 'सेफ़' खेलकर कितना बड़ा मौक़ा गँवा रहे हैं? क्या आप बस वही कर रहे हैं जो सब करते हैं, या आप मर्डोक की तरह अपने कॉम्पिटिटर्स को देखकर मुस्कुरा रहे हैं? इस आर्टिकल को सिर्फ़ पढ़कर भूल मत जाना। आज ही एक बड़ा, कैलकुलेटेड रिस्क लो। अपनी टीम को बताओ कि अगला क़दम कहाँ होगा, और हाँ, नीचे कमेंट सेक्शन में बताओ कि आज आपकी सबसे बड़ी 'फ़ूडी रिस्क' क्या थी—छोले-भटूरे या पूड़ी-सब्जी?
शेयर करो ये आर्टिकल उन लोगों के साथ जो सोचते हैं कि बिज़नेस में 'प्यार' चलता है, 'पावर' नहीं।
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