क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सुबह नौ से पांच की नौकरी को जेल समझते हैं और अपना बॉस खुद बनने के सपने देखते हैं? मुबारक हो, क्योंकि बिना किसी प्लान के बिजनेस शुरू करके आप अपनी रातों की नींद और बैंक बैलेंस दोनों को चूना लगाने की तैयारी कर चुके हैं। अगर आपको लगता है कि सिर्फ मर्जी का मालिक होना ही काफी है, तो शायद आप अपनी बर्बादी का जश्न मनाने के लिए सबसे आगे खड़े हैं।
इस आर्टिकल में हम सारा एडवर्ड्स और पॉल एडवर्ड्स की किताब मेकिंग इट ऑन योर ओन से वो ३ कड़वे सच और लाइफ लेसन्स जानेंगे, जो आपको एक फेल सोलोप्रेन्योर बनने से बचा सकते हैं और आपको असली सक्सेस का रास्ता दिखाएंगे।
Lesson : अपनी भावनाओं के रोलरकोस्टर को कंट्रोल करना सीखें
अपना खुद का काम शुरू करना किसी बॉलीवुड फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा लगता है जहाँ आप हीरो हैं और सब कुछ आपके इशारे पर चलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि जब आप अपना बॉस खुद बनते हैं, तो आप सिर्फ कंपनी के मालिक नहीं, बल्कि उसके चपरासी, मैनेजर और अकाउंटेंट भी खुद ही होते हैं। सारा और पॉल एडवर्ड्स अपनी किताब में बहुत साफ़ कहते हैं कि सोलोप्रेन्योरशिप का रास्ता फूलों की सेज नहीं, बल्कि भावनाओं का एक खतरनाक झूला है। एक दिन आपको लगेगा कि आप दुनिया के अगले एलन मस्क हैं क्योंकि एक क्लाइंट ने आपकी ईमेल का जवाब दे दिया, और अगले ही पल जब पेमेंट रुक जाती है, तो आप चादर तान कर सोने का बहाना ढूंढने लगते हैं।
इस इमोशनल रोलरकोस्टर को मैनेज करना ही आपकी पहली जीत है। ज्यादातर लोग बिजनेस इसलिए बंद कर देते हैं क्योंकि वे अपने डर और अकेलेपन से हार जाते हैं। जब आप ऑफिस में होते हैं, तो आपके पास गॉसिप करने के लिए कलीग्स होते हैं और बॉस को गाली देने का मौका होता है। लेकिन घर से काम करते समय, जब प्रिंटर खराब होता है या इंटरनेट चला जाता है, तो चिल्लाने के लिए सिर्फ आप और आपकी दीवारें होती हैं। अगर आप अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख सकते, तो यकीन मानिए, आपका बिजनेस आपको काबू में कर लेगा।
मान लीजिए हमारे शर्मा जी ने जोश में आकर अपनी आईटी की नौकरी छोड़ी और एक फ्रीलांस एजेंसी खोली। पहले हफ्ते उन्होंने पांच नए सूट खरीदे और लिंक्डइन पर 'सीईओ' का टैग लगा दिया। दूसरे हफ्ते जब किसी ने काम नहीं दिया, तो शर्मा जी को लगा कि शायद उनका नाम ही खराब है। तीसरे हफ्ते तक वह डिप्रेशन में आकर दिन भर नेटफ्लिक्स देखने लगे। यहाँ गलती शर्मा जी के टैलेंट की नहीं, बल्कि उनके इमोशनल मैनेजमेंट की थी। उन्होंने उतार-चढ़ाव को पर्सनली ले लिया।
किताब हमें सिखाती है कि जब आप अपने दम पर कुछ करते हैं, तो 'रिजेक्शन' आपके ब्रेकफास्ट का हिस्सा होना चाहिए। सार्केज़्म तो यह है कि लोग आजादी चाहते हैं ताकि वे अपनी मर्जी से सो सकें, लेकिन सच यह है कि आजादी मिलने के बाद उनकी नींद उड़ जाती है क्योंकि अब हर गलती का बिल उन्हीं के नाम फटता है। आपको खुद को यह समझाना होगा कि बुरा दिन आने का मतलब यह नहीं है कि आपका आईडिया बुरा है। आपको अपने काम और अपनी पहचान के बीच एक दीवार खड़ी करनी होगी। अगर बिजनेस नीचे जा रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप एक इंसान के तौर पर फेल हो गए हैं।
इस लेसन का सबसे बड़ा टेकअवे यह है कि अकेलेपन को अपनी ताकत बनाइये। जब कोई आपको शाबाशी देने वाला नहीं होता, तो खुद को आईने में देखकर 'वेल डन' कहना सीखिए। अगर आप अपनी मानसिक शांति को बचाए रख सकते हैं, तभी आप मार्केट की भीड़ में टिक पाएंगे। वरना, खुद का बॉस बनने का शौक आपको बहुत जल्दी वापस उसी नौ से पांच वाली जेल की याद दिलाने लगेगा जहाँ कम से कम महीने के अंत में सैलरी तो पक्की थी।
Lesson : सेल्फ डिसिप्लिन और रूटीन - अपनी आजादी के खुद जेलर बनिए
जब आप अपना खुद का बॉस बनते हैं, तो सबसे बड़ी खुशी यह होती है कि अब कोई सुबह नौ बजे आपकी टेबल पर आकर फाइल नहीं पटकेगा। आप दोपहर के दो बजे तक पाजामे में घूम सकते हैं और लंच के बाद एक छोटी सी झपकी भी ले सकते हैं। लेकिन सारा और पॉल एडवर्ड्स अपनी किताब में चेतावनी देते हैं कि यही वह जगह है जहाँ ९० परसेंट सोलोप्रेन्योर फेल हो जाते हैं। बिना किसी बॉस के, आपका सबसे बड़ा दुश्मन आपका अपना आलस बन जाता है। आजादी का मतलब यह नहीं है कि आप जब चाहें तब काम करें, बल्कि इसका मतलब यह है कि आप खुद को काम करने के लिए मजबूर करें जब आपका मन बिलकुल न हो।
किताब हमें बताती है कि बिना एक सख्त रूटीन के, आपका घर ही आपका ऑफिस बन जाता है और आपका ऑफिस ही आपका बेडरूम। धीरे-धीरे आपको पता ही नहीं चलता कि आप कब काम कर रहे हैं और कब सिर्फ कंप्यूटर के सामने बैठकर टाइम पास कर रहे हैं। सार्केज़्म तो देखिए, लोग नौकरी छोड़ते हैं ताकि उन्हें ज्यादा समय मिले, लेकिन अपना काम शुरू करने के बाद वे चौबीसों घंटे काम के बारे में सोचते रहते हैं और फिर भी कुछ खास हासिल नहीं कर पाते। इसे 'बिजी होने का नाटक' कहते हैं जहाँ आप ईमेल चेक करने और फाइलें इधर-उधर करने में पूरा दिन निकाल देते हैं, लेकिन असली काम जो पैसा लाएगा, उसे कल पर टाल देते हैं।
हमारे एक मित्र हैं वर्मा जी, जिन्होंने अपनी डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी शुरू की। पहले दिन उन्होंने कसम खाई कि वह सुबह ७ बजे उठकर काम करेंगे। लेकिन हुआ क्या? ७ बजे अलार्म बजा, वर्मा जी ने सोचा 'अरे मैं तो अपना बॉस हूँ, ५ मिनट और सो लेता हूँ'। वह ५ मिनट कब १० बज गए पता ही नहीं चला। फिर ब्रेकफास्ट करते हुए उन्होंने यूट्यूब पर 'हाउ टू बी सक्सेसफुल' के तीन वीडियो देख डाले। दोपहर तक उन्होंने सिर्फ अपनी डेस्क साफ की और शाम को थक कर सो गए यह सोचकर कि आज बहुत मेहनत की है। हकीकत में, उन्होंने जीरो काम किया।
सेल्फ डिसिप्लिन का मतलब है अपने लिए एक 'ऑफिस टाइम' सेट करना। किताब सुझाव देती है कि आपको घर में एक ऐसी जगह ढूंढनी चाहिए जहाँ आप सिर्फ काम करें। अगर आप अपने सोफे पर बैठकर काम करेंगे जहाँ आप फिल्म देखते हैं, तो आपका दिमाग कभी काम के मोड में नहीं आएगा। आपको खुद को यह आदेश देना होगा कि सुबह ९ से शाम ५ तक आप किसी के लिए उपलब्ध नहीं हैं, न ही घर के कामों के लिए और न ही दोस्तों की गप्पों के लिए। बिना डिसिप्लिन के आप एक बिजनेसमैन नहीं, बल्कि एक ऐसे बेरोजगार इंसान हैं जिसके पास बस एक महंगा लैपटॉप है।
इस लेसन का सबसे जरूरी हिस्सा है अपनी बाउंड्री तय करना। जब आप घर से काम करते हैं, तो आपके घरवाले और रिश्तेदार अक्सर यह समझ लेते हैं कि आप खाली हैं। वे आपसे सब्जी लाने या बैंक का काम करने की उम्मीद करने लगते हैं। आपको बड़े ही प्यार से (और कभी-कभी थोड़े सार्केज़्म के साथ) उन्हें यह समझाना होगा कि भले ही आप सूट नहीं पहने हैं, लेकिन आप ड्यूटी पर हैं। अगर आप खुद के समय की इज्जत नहीं करेंगे, तो दुनिया में कोई और भी नहीं करेगा। असली बॉस वही है जो अपने आप को सबसे मुश्किल काम सबसे पहले करने के लिए राजी कर ले।
Lesson : नेटवर्किंग और सपोर्ट सिस्टम - अकेले चलने का मतलब अकेला होना नहीं है
इंसान एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन जब आप अपना बिजनेस घर के एक कोने से शुरू करते हैं, तो धीरे-धीरे आप एक 'आदिमानव' की तरह व्यवहार करने लगते हैं जो सिर्फ अपने गुफा (कमरे) में बंद रहता है। सारा और पॉल एडवर्ड्स अपनी किताब में एक बहुत ही कड़वा सच बताते हैं कि सोलोप्रेन्योरशिप की सबसे बड़ी चुनौती पैसा कमाना नहीं, बल्कि पागल होने से बचना है। जब आप पूरे दिन केवल अपने लैपटॉप की स्क्रीन और अपने पालतू कुत्ते से बात करते हैं, तो आपकी सोशल स्किल्स और क्रिएटिविटी दोनों में जंग लगने लगती है। आपको लगता है कि आप काम में डूबे हैं, पर असल में आप दुनिया से कट चुके हैं।
मजे की बात तो यह है कि लोग नेटवर्किंग इवेंट्स में इसलिए नहीं जाते क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां सिर्फ टाइम पास होगा। लेकिन सच तो यह है कि बिना नेटवर्किंग के आप एक ऐसे कुएं के मेंढक बन जाते हैं जिसे लगता है कि उसका आईडिया ही दुनिया का सबसे महान आईडिया है। किताब हमें सिखाती है कि अपना बॉस होने का मतलब यह नहीं है कि आप 'वन मैन आर्मी' बनकर सब कुछ अकेले ही झेलें। आपको एक ऐसा सपोर्ट सिस्टम चाहिए जो आपकी पीठ थपथपा सके जब आप अच्छा करें, और आपको आइना दिखा सके जब आप गलती करें।
एक रियल लाइफ उदाहरण लेते हैं हमारे चड्ढा जी का। चड्ढा जी ने ग्राफिक डिजाइनिंग का काम शुरू किया और खुद को कमरे में बंद कर लिया। छह महीने तक उन्होंने किसी दोस्त से बात नहीं की, किसी कम्युनिटी इवेंट में नहीं गए। नतीजा? उनके डिजाइन पुराने स्टाइल के होने लगे क्योंकि उन्हें मार्केट के नए ट्रेंड्स का पता ही नहीं चला। जब उन्हें लगा कि काम नहीं मिल रहा, तो वह किस्मत को कोसने लगे। अगर उन्होंने दूसरे डिजाइनर्स से बात की होती या किसी मास्टरमाइंड ग्रुप का हिस्सा होते, तो उन्हें पता चलता कि दुनिया बदल चुकी है। अकेले रहने के चक्कर में उन्होंने अपनी ग्रोथ का गला घोंट दिया।
नेटवर्किंग का मतलब सिर्फ कार्ड बांटना नहीं है, बल्कि 'गिव एंड टेक' का रिश्ता बनाना है। आपको ऐसे लोगों की जरूरत है जो आपकी इंडस्ट्री में हों, जो आपके संघर्ष को समझ सकें। कभी-कभी एक १० मिनट की फोन कॉल आपको वह आईडिया दे सकती है जो आप हफ्तों की रिसर्च से नहीं पा सकते। किताब कहती है कि आपको जानबूझकर अपने 'आइसोलेशन' को तोड़ना होगा। चाहे वो को-वर्किंग स्पेस में जाकर काम करना हो या महीने में एक बार अपने जैसे प्रोफेशनल्स के साथ कॉफी पीना हो, यह आपके बिजनेस की सेहत के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि आपका बैंक बैलेंस।
अंत में, यह समझ लीजिए कि बिजनेस केवल एक्सल शीट और ईमेल नहीं है, यह रिश्तों का खेल है। अगर आप अपने कमरे की चारदीवारी में बंद होकर महल बनाने के सपने देख रहे हैं, तो जाग जाइए। असली बिजनेस बाहर की दुनिया में होता है, लोगों के बीच होता है। जब आपके पास एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम होता है, तो बिजनेस के उतार-चढ़ाव आपको तोड़ते नहीं हैं, क्योंकि आपको पता होता है कि गिरने पर संभालने वाले हाथ मौजूद हैं। अपनी ईगो को साइड में रखिए और मदद मांगना सीखिए, क्योंकि सुपरमैन भी कभी-कभी टीम के साथ काम करता है।
अपना बॉस बनना एक साहसी कदम है, लेकिन यह कोई सजा नहीं होनी चाहिए। अगर आप इमोशन्स को मैनेज करना, खुद को डिसिप्लिन में रखना और सही लोगों से जुड़ना सीख जाते हैं, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। याद रखिए, आजादी जिम्मेदारी के साथ आती है। क्या आप आज से अपने काम करने के तरीके को बदलने के लिए तैयार हैं? कमेंट में बताएं कि आप इन ३ लेसन्स में से सबसे पहले किस पर काम करेंगे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो नौकरी छोड़ कर बिजनेस करने का सपना देख रहा है, शायद उसकी डूबती नैया बच जाए।
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