Swim with the Sharks Without Being Eaten Alive (Hindi)


आप क्यों हमेशा हर डील में सबसे पीछे रह जाते हैं? जब बाकि लोग 'शार्क' के साथ तैरकर डील जीत रहे हैं, आप अभी भी 'डूबने' से डर रहे हैं। यह 'डर का मैनेजमेंट' आपको डुबो देगा! Swim with the Sharks में 3 ऐसे सीक्रेट्स हैं, जिन्हें अपनाकर आप कॉम्पिटिशन को Outsell, Outmanage, Outnegotiate कर देंगे। ये 3 लेसन्स आपको बिज़नेस और लाइफ़ में अनस्टॉपेबल बना देंगे।


Lesson : तैयारी ही 90% जीत है – रिसर्च और 'इंटेलीजेंस' का पावर

ज़्यादातर सेल्सपर्सन और मैनेजर्स एक मीटिंग या नेगोशिएशन (Negotiation) में कैसे जाते हैं? वह अपनी प्रॉडक्ट नॉलेज (Product Knowledge) को पूरी तरह से पढ़कर जाते हैं। वह सोचते हैं: "मुझे अपने प्रॉडक्ट के बारे में सब पता है, अब मैं डील जीत जाऊँगा।" यह सिर्फ़ 10% तैयारी है। बाक़ी 90% तैयारी, आपके 'सामने वाले' पर रिसर्च करने में लगती है।

हार्वी मैक्कॉर्मैक कहते हैं: "सक्सेस 'इंटेलिजेंस' (Information) पर आधारित है, न कि सिर्फ़ मेहनत पर। हर डील या नेगोशिएशन से पहले कॉम्पिटिटर और क्लाइंट पर पूरी रिसर्च करना।"

सोचिए, आप एक नेगोशिएशन के लिए जा रहे हैं। अगर आपको पहले से पता हो कि आपका क्लाइंट पिछले 6 महीने से किस चीज़ से दुखी है, उसका बॉस क्या चाहता है, और आपका कॉम्पिटिटर उसे क्या 'ग़लत' दे रहा है, तो क्या आप डील नहीं जीतेंगे?

हार्वी मैक्कॉर्मैक के लिए, एक डील शुरू होने से पहले ही जीती या हारी जा चुकी होती है—यह सब आपकी तैयारी पर निर्भर करता है। आपको क्लाइंट के पर्सनल और प्रोफ़ेशनल दोनों पहलुओं की जानकारी होनी चाहिए।

आइए, इसे एक फनी एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। मिलिए मिस्टर बंसल से। मिस्टर बंसल को लगता है कि 'सेल्स स्किल' ही सब कुछ है। वह एक बड़े क्लाइंट के पास गए। उन्होंने अपने प्रॉडक्ट के फ़ीचर्स 30 मिनट तक बताए। क्लाइंट ने पूछा, "आपकी सर्विस हमारे कॉम्पिटिटर 'X' से कैसे बेहतर है?"

मिस्टर बंसल को कॉम्पिटिटर 'X' के बारे में सिर्फ़ इतना पता था कि "वह सस्ते हैं।" उन्होंने कहा, "सर, वह तो लोकल हैं, हम इंटरनेशनल हैं।" क्लाइंट हँसने लगा और डील किसी और को मिल गई।

क्यों? क्योंकि मिस्टर बंसल को पता नहीं था कि कॉम्पिटिटर 'X' की सर्विस मिस्टर बंसल से 10 गुना ज़्यादा तेज़ी से काम करती है। अगर मिस्टर बंसल ने 'होमवर्क' किया होता, तो वह कॉम्पिटिटर की 'कमज़ोरी' को पकड़ते और अपनी 'ताक़त' को साबित करते।

यह तो वही बात हो गई कि आप जंगल में 'शार्क' से लड़ने जा रहे हैं, और आपको पता ही नहीं कि शार्क के अटैक करने का तरीक़ा क्या है। आप अपनी 'ताक़त' दिखाएँगे, पर शार्क आपको 'खा' जाएगी।

'रिसर्च और तैयारी' का मतलब है:
  • क्लाइंट का 'बैकग्राउंड' जानो। (उनकी कंपनी का विज़न, उनके चैलेंजेज़, उनकी पुरानी ख़रीदें)।
  • कॉम्पिटिटर का 'डेथ वारंट' लिखो। (उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरियाँ, उनकी प्राइसिंग, और उनका अगला मूव क्या हो सकता है)।
  • 'नॉलेज' को 'सवाल' में बदलो। (रिसर्च किए हुए फैक्ट्स को 'सवाल' के रूप में पूछो, जिससे क्लाइंट को लगे कि आप उनकी फ़िक्र करते हैं)।

जब आप पूरी रिसर्च करके जाते हैं, तो आप सिर्फ़ 'बेच' नहीं रहे होते, आप 'कंसल्ट' कर रहे होते हैं। क्लाइंट को यह महसूस होता है कि आप उनके बिज़नेस को समझते हैं। यही 'भरोसा' है जो नेगोशिएशन की नींव रखता है।

लेकिन, यह सारी 'इंटेलिजेंस' कहाँ से आती है? यह सिर्फ़ गूगल से नहीं आती। यह उन लोगों से आती है जिन्हें आप जानते हैं।

यही बात हमें दूसरे सबसे ज़रूरी लेसन की ओर ले जाती है, जहाँ हम सीखेंगे कि 'नेटवर्क' सिर्फ़ 'लिंक्डइन कनेक्ट' नहीं है, बल्कि 'इनविजिबल आर्मी' है जो आपको कॉम्पिटिशन के सीक्रेट्स बताती है।


Lesson : लिंक्डइन नहीं, 'लॉयल्टी नेटवर्क' बनाओ – इनविजिबल नेटवर्क का सीक्रेट

आजकल हर कोई 'नेटवर्क' बनाता है। लिंक्डइन पर 5,000 कनेक्शन्स हैं, हर बिज़नेस इवेंट में जाकर 100 विज़िटिंग कार्ड्स इकट्ठे कर लिए। लेकिन जब आपको कोई असली, मुश्किल इनफ़ॉर्मेशन चाहिए होती है—जैसे कॉम्पिटिटर की नई प्राइसिंग क्या है, या क्लाइंट का CEO अंदर ही अंदर किस बात से दुखी है—तो ये 'फ़ॉर्मल' कनेक्शन्स काम नहीं आते।

हार्वी मैक्कॉर्मैक कहते हैं: "सिर्फ़ काम के लोगों से नहीं, बल्कि एक 'नेटवर्क' बनाना जो आपको हर तरह की इनफ़ॉर्मेशन दे सके (यहाँ तक कि कॉम्पिटिटर के बारे में भी)।"

यह नेटवर्क आपकी 'इनविजिबल आर्मी' है। ये वो लोग हैं जो आपको 'कॉफ़ी पर' वो बात बता देंगे जो किसी भी 'वीकली रिपोर्ट' में नहीं मिलेगी। यह नेटवर्क इस भरोसे पर बनता है कि आप सिर्फ़ 'लेने' वाले नहीं, बल्कि 'देने' वाले भी हैं। जब आप किसी को वैल्यू देते हैं, या किसी मुश्किल में उनकी मदद करते हैं, तब आप एक 'अकाउंट' खोलते हैं। जब आपको ज़रूरत होती है, तो आप उस अकाउंट से 'इंटेलिजेंस' निकाल सकते हैं।

आइए, इसे एक फनी एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। मिलिए मिस्टर त्यागी से। मिस्टर त्यागी बिज़नेस इवेंट्स के 'किंग' हैं। वह हर इवेंट में सबसे ज़्यादा विज़िटिंग कार्ड्स कलेक्ट करते हैं। उनके पास एक एक्सेल शीट है जिसमें 5000 नाम हैं।

एक बार उन्हें एक बड़ी डील में कॉम्पिटिटर की 'वीकनेस' जाननी थी (लेसन 1 के लिए ज़रूरी)। उन्होंने अपने 5000 'कनेक्शन्स' को ईमेल किया। 99% लोगों ने जवाब नहीं दिया। 1% ने कहा: "सॉरी, मैं बिज़ी हूँ।"

क्यों? क्योंकि मिस्टर त्यागी ने इन 5000 लोगों को सिर्फ़ तभी याद किया जब उन्हें ज़रूरत थी। उन्होंने कभी किसी को बिना मतलब के 'वैल्यू' नहीं दी थी। उनका नेटवर्क 'वन-वे स्ट्रीट' था—वो सिर्फ़ अपनी डील के लिए भागते थे, दूसरों की नहीं सोचते थे।

यह तो वही बात हो गई कि आपने एक बैंक में कभी पैसा जमा नहीं किया, और अब आप सोचते हैं कि आप जब चाहें, तब वहाँ से करोड़ों निकाल लेंगे। नेटवर्क सिर्फ़ 'संख्या' नहीं है, यह इमोशनल और वैल्यू-आधारित लॉयल्टी है।

'इनविजिबल नेटवर्क' बनाने का मतलब है:
  • वैल्यू पहले दो: हमेशा यह सोचो कि आप सामने वाले के लिए क्या कर सकते हैं, न कि वह आपके लिए क्या कर सकता है।
  • 'इंटरेस्टिंग' बनो: अगर आप किसी से मिलते हो, तो उसे सिर्फ़ अपने प्रॉडक्ट के बारे में मत बताओ, उसे 'मार्केट की कोई नई इनसाइट' दो।
  • 30 दिन का नियम: अपने टॉप 50 नेटवर्क कॉन्टैक्ट्स को हर 30 दिन में एक बार किसी न किसी बहाने से वैल्यू दो (जैसे कोई ज़रूरी आर्टिकल, या उनकी तारीफ)।

यह नेटवर्क ही आपको 'शार्क' के सीक्रेट्स बताता है। जब आपको पता होता है कि कॉम्पिटिटर की टीम में किस बात पर लड़ाई चल रही है, या क्लाइंट को 'किस कलर' से नफ़रत है, तो आप Outsell, Outmanage, Outnegotiate कर सकते हैं। यह जानकारी आपको 'एक्स्ट्रा माइल' जाने (लेसन 1 से कनेक्शन) की ताक़त देती है।

लेकिन, इस सारी इनफ़ॉर्मेशन का क्या फ़ायदा, अगर आप उसे सही समय पर, सही तरीक़े से इस्तेमाल न करें? आपको यह जानना होगा कि कब 'बोलना' है और कब 'चुप' रहना है।

यही बात हमें तीसरे सबसे ज़रूरी लेसन की ओर ले जाती है, जहाँ हम सीखेंगे कि नेगोशिएशन में 'कब चुप रहना' सबसे बड़ी ताक़त है।


Lesson : नेगोशिएशन में 'चुप रहना' ही क्यों सबसे बड़ी ताक़त है? – कम्यूनिकेशन और टाइमिंग

सोचिए, आप एक नेगोशिएशन की टेबल पर बैठे हैं। आपका क्लाइंट चुप है। आपको लगता है कि 'मैं बोलूँगा तो यह डील आगे बढ़ेगी'। आप बोलते हैं, और बोलते-बोलते आप अपनी 'सीक्रेट प्राइसिंग' या 'कमज़ोर पॉइंट' बता देते हैं। सामने वाला सिर्फ़ चुप रहा और उसने आपकी सारी जानकारी चुरा ली।

हार्वी मैक्कॉर्मैक कहते हैं: "नेगोशिएशन में 'बोलने' से ज़्यादा ज़रूरी है 'सुनना', और 'हाँ' कहने से ज़्यादा ताक़तवर है 'सही समय पर चुप हो जाना'। "

नेगोशिएशन एक 'चेस' गेम की तरह है। आपको अपनी चाल से पहले सामने वाले की चाल का इंतज़ार करना चाहिए। जब आप चुप रहते हैं, तो सामने वाले को असहजता (Uncomfortable) महसूस होती है। वह इस असहजता को दूर करने के लिए बोलना शुरू कर देता है—और इसी बोलने में वह आपको वो सीक्रेट इनफ़ॉर्मेशन दे देता है, जिसे आपने लेसन 1 (रिसर्च) और लेसन 2 (नेटवर्क) से ढूँढने की कोशिश की थी।

इसके अलावा, 'ना' कहने की ताक़त को समझो। अगर आप किसी डील में अपनी 'ना' को बचाकर रखते हैं, तो आपका 'हाँ' ज़्यादा वैल्यू रखता है। 'ना' का मतलब हमेशा 'हम नहीं करेंगे' नहीं होता, इसका मतलब होता है: "हम इस शर्त पर नहीं करेंगे।"

आइए, इसे एक फनी एग्ज़ाम्पल से समझते हैं। मिलिए मिस्टर पंडित से। मिस्टर पंडित एक शानदार सेल्समैन हैं, पर उन्हें 'जल्दी-जल्दी बोलने' की बीमारी है। एक बार वह एक डील क्लोज करने के लिए बैठे। क्लाइंट ने पूछा, "आपकी सर्विस का बेस्ट प्राइस क्या है?"

क्लाइंट चुप हो गया—वह मिस्टर पंडित की तरफ़ देखने लगा।

मिस्टर पंडित को लगा कि क्लाइंट 'इंतज़ार' कर रहा है, तो उन्होंने तुरंत कहा: "सर, वैसे तो प्राइस ₹1 लाख है, पर अगर आप अभी ख़रीदते हैं, तो मैं आपको ₹80,000 में दे दूँगा... और अगर आप मेरे 'खास दोस्त' हैं, तो ₹75,000 फ़ाइनल है। और अगर आप सच में ख़रीदना चाहते हैं, तो मैं आपको 1 साल की फ़्री सर्विस भी दे दूँगा।"

क्लाइंट ने सिर्फ़ 'चुप' रहकर, मिस्टर पंडित से ₹25,000 और 1 साल की फ़्री सर्विस 'निकाल' ली। मिस्टर पंडित 'ज़्यादा' बोलकर अपनी सारी ताक़त गँवा चुके थे। वह ऐसे काम कर रहे थे जैसे उन्होंने अपने सभी पत्ते ज़मीन पर बिछा दिए हों, और सामने वाला सिर्फ़ 'देखकर' गेम जीत गया हो।

यह तो वही बात हो गई कि आप एक जासूस हैं, और आपने दुश्मन को पकड़ने से पहले ही उसे बता दिया कि आप कहाँ-कहाँ छिपकर बैठे हैं। नेगोशिएशन में जो कम बोलता है, वह ज़्यादा कंट्रोल रखता है।

सही कम्यूनिकेशन और टाइमिंग का मतलब है:
  • 5 सेकंड का नियम: जब क्लाइंट कुछ बोले, तो तुरंत जवाब मत दो। 5 सेकंड तक चुप रहो। उन्हें सोचने का मौक़ा दो—इससे सामने वाला ज़्यादा बोलता है।
  • 'ना' को हथियार बनाओ: 'ना' को अपने पास संभालकर रखो। जब डील आपके टर्म्स पर न हो, तभी 'ना' कहो। आपकी 'ना' आपकी वैल्यू बढ़ाती है।
  • सवाल पूछो, राय मत दो: अपनी बात मनवाने के लिए 'आर्गुमेंट' मत करो, 'सवाल' पूछो। सवाल हमेशा बातचीत को आपकी दिशा में मोड़ते हैं।

जब आप सही समय पर (टाइमिंग) सही चीज़ (कम्यूनिकेशन) बोलते हैं, तो आपकी रिसर्च और नेटवर्क से मिली सारी इंटेलिजेंस एक साथ काम करती है। आप बाज़ार में 'शार्क' के साथ तैरते हैं, पर आप उन्हें खाते हैं, उनके द्वारा खाए नहीं जाते। यही है हार्वी मैक्कॉर्मैक का 'सर्वाइवल' का नियम।


बस करो ये 'डर के मारे जल्दी बोलना'! हर नेगोशिएशन एक मौक़ा है, उसे अपनी 'ज़्यादा बोलने की आदत' से मत गँवाओ।
  1. आज ही अपनी अगली नेगोशिएशन में 'चुप' रहने की प्रैक्टिस करो—और देखो कि सामने वाला क्या-क्या 'ग़लतियाँ' करता है।
  2. अपने आप से पूछो: "अगर मैं यह डील कल करता, तो मैं कौन सी एक बात नहीं कहता?"
  3. अगर यह आर्टिकल पढ़कर आपको लगा कि यह आपको 'शार्क' के बीच भी ज़िंदा रहने की ताक़त दे सकता है, तो इसे अपने उन सभी सेल्स और बिज़नेस दोस्तों के साथ शेयर करो जो नेगोशिएशन में 'बोलकर' हार जाते हैं!

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