क्या आप अभी भी उसी घिसे पिटे एम्प्लॉई माइंडसेट के साथ ऑफिस में गधे की तरह मेहनत कर रहे हैं? मुबारक हो, आप बहुत जल्द रिप्लेस होने वाले हैं। अगर आप खुद को एक ब्रांड नहीं बना सके, तो आपकी वैल्यू किसी रद्दी कागज से ज्यादा नहीं होगी। टॉम पीटर्स की यह किताब आपको उस बोरियत और गुमनामी की जिंदगी से बाहर निकाल कर एक चमकता हुआ ब्रांड बना देगी, जिसकी डिमांड मार्केट में सबसे ज्यादा होगी। चलिए जानते हैं अपनी ब्रांड वैल्यू बढ़ाने के वो ३ जबरदस्त सीक्रेट्स।
Lesson : आप खुद एक ब्रांड हैं - वेलकम टू 'मी इंक' (Me Inc.)
अगर आपको लगता है कि आप किसी कंपनी के सिर्फ एक एम्प्लॉई हैं जिसका काम सुबह ९ से शाम ५ बजे तक कीबोर्ड तोड़ना है, तो जाग जाइए। आप असल में एक चलते-फिरते बिजनेस हैं। टॉम पीटर्स कहते हैं कि आज के जमाने में नौकरी की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन आपके ब्रांड की गारंटी हमेशा रहेगी। अपने आप को एक कर्मचारी समझना बंद करें और खुद को 'मी इंक' (Me Inc.) का सीईओ समझना शुरू करें। सोचिए, अगर आपका नाम एक कंपनी होता, तो लोग उसके शेयर खरीदते या उसे कचरे के डिब्बे में डाल देते?
जरा अपने पड़ोस वाले शर्मा जी के लड़के को देखिए। वह पिछले दस साल से एक ही डेस्क पर बैठकर फाइलें इधर-उधर कर रहा है। उसे लगता है कि वफादारी उसे प्रमोशन दिलाएगी, लेकिन असल में वह कंपनी के लिए बस एक फर्नीचर का हिस्सा बन चुका है। अगर कल कंपनी उसे निकाल दे, तो उसे कोई नहीं पूछेगा क्योंकि उसका अपना कोई ब्रांड ही नहीं है। वहीं दूसरी तरफ वो लड़का है जो अपनी स्किल्स को सोशल मीडिया पर चमकाता है, नए प्रोजेक्ट्स हाथ में लेता है और ऑफिस में सबको पता है कि "यह काम तो सिर्फ वही कर सकता है"। वह एक ब्रांड है, और शर्मा जी का लड़का सिर्फ एक रिप्लेस होने वाला एम्प्लॉई।
एक ब्रांड बनने का मतलब यह नहीं कि आप सूट-बूट पहनकर फोटो खिंचवाएं। इसका मतलब है अपनी वैल्यू बढ़ाना। क्या आप अपनी कंपनी के लिए सिर्फ एक 'कॉस्ट' यानी खर्चा हैं या आप उनके लिए 'इन्वेस्टमेंट' हैं? जब आप एक ब्रांड की तरह सोचते हैं, तो आप अपनी ट्रेनिंग पर खुद पैसा खर्च करते हैं। आप कंपनी के भरोसे नहीं बैठते कि वो आपको कुछ नया सिखाएगी। आप खुद नए सॉफ्टवेयर सीखते हैं, अपनी कम्युनिकेशन सुधारते हैं और मार्केट की खबर रखते हैं।
सर्कस के हाथी और जंगल के शेर में यही फर्क है। हाथी को जो सिखाया जाता है वह वही करता है, लेकिन शेर अपना रास्ता खुद बनाता है। एम्प्लॉई माइंडसेट आपको पालतू बना देता है, जबकि ब्रांड माइंडसेट आपको एक लीडर बनाता है। याद रखिए, अगर आप भीड़ का हिस्सा बनेंगे तो सिर्फ शोर बनकर रह जाएंगे, लेकिन अगर आप एक ब्रांड बनेंगे तो लोग आपको सुनने के लिए रुकेंगे।
इस लेसन का सीधा मतलब यह है कि अपनी जिम्मेदारी खुद उठाएं। आपकी तरक्की आपके बॉस के हाथ में नहीं, बल्कि आपके 'मी इंक' के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स यानी आपके खुद के हाथ में है। अब जब आपने खुद को एक कंपनी मान लिया है, तो अगले कदम में हम यह सीखेंगे कि इस कंपनी को मार्केट में बेचना कैसे है। क्योंकि बिना सही काम के ब्रांड सिर्फ एक खाली डिब्बा है।
Lesson : प्रोजेक्ट ही आपकी पहचान है - काम नहीं, कमाल करें
अगर आप ऑफिस में सिर्फ इसलिए बैठे हैं क्योंकि आपको "काम" दिया गया है, तो आप एक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। टॉम पीटर्स कहते हैं कि एक ब्रांड बनने के लिए आपको "टास्क" यानी छोटे-मोटे कामों से ऊपर उठकर "प्रोजेक्ट्स" पर ध्यान देना होगा। एम्प्लॉई वह होता है जिसे बताया जाता है कि क्या करना है, लेकिन एक ब्रांड वह होता है जो खुद ढूंढता है कि क्या बदला जा सकता है। आपकी वैल्यू इस बात से नहीं मापी जाएगी कि आपने कितनी ईमेल भेजीं, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि आपने कौन सा बड़ा इम्पैक्ट छोड़ा है।
जरा अपनी कंपनी के उस "मिस्टर आलसी" को याद करिए जो लंच ब्रेक के बाद डेस्क पर खराटे लेता है। उसे लगता है कि उसकी नौकरी पक्की है क्योंकि वह बरसों से वहीं काम कर रहा है। लेकिन असल में वह बस एक फाइल का बोझ बढ़ा रहा है। वहीं दूसरी तरफ वह बंदा है जिसने नोटिस किया कि ऑफिस की इन्वेंट्री में गड़बड़ है और उसने खुद आगे बढ़कर एक नया ट्रैकिंग सिस्टम बना दिया। अब हर कोई उसे "द इन्वेंट्री गाय" के नाम से जानता है। उसने सिर्फ काम नहीं किया, उसने एक प्रोजेक्ट खड़ा किया जिसने कंपनी का समय और पैसा बचाया। यही तो असली ब्रांडिंग है।
एक प्रोजेक्ट का मतलब है कुछ ऐसा करना जो दिखे, जो मापा जा सके और जिसके बारे में आप गर्व से बता सकें। अगर आप सिर्फ रूटीन काम कर रहे हैं, तो आप एक रिप्लेसेबल पार्ट हैं। लेकिन अगर आप एक "प्रोजेक्ट मैनेजर" की तरह सोचते हैं, तो आप एक एक्सपर्ट बन जाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आपके पास ऐसा कौन सा प्रोजेक्ट है जिसे आप अपने रिज्यूमे में सुनहरे अक्षरों में लिख सकते हैं? अगर जवाब "नहीं" है, तो समझ लीजिए कि आप सिर्फ टाइम पास कर रहे हैं।
लोग आपके एफर्ट्स के पैसे नहीं देते, वो रिजल्ट्स के पैसे देते हैं। जैसे एक फिल्म का पोस्टर देखकर लोग थिएटर जाते हैं, वैसे ही आपके प्रोजेक्ट्स का शोर आपके ब्रांड को ऊपर ले जाता है। क्या आपने कोई ऐसी प्रॉब्लम सॉल्व की है जो सालों से अटकी हुई थी? क्या आपने कोई ऐसा नया तरीका निकाला जिससे टीम की एफिशिएंसी बढ़ गई? अगर हां, तो मुबारक हो, आपने खुद को एक ब्रांड की तरह पेश किया है।
याद रखिए, बोरिंग काम करना एक चॉइस है। आप चाहें तो फाइलों के ढेर के नीचे दबकर गुमनाम हो सकते हैं, या फिर आप एक ऐसा प्रोजेक्ट चुन सकते हैं जो आपको स्टार बना दे। ऑफिस में सिर्फ अटेंडेंस लगाने मत जाइए, वहां अपना सिग्नेचर छोड़ने जाइए। जब लोग आपके काम को एक प्रोजेक्ट की तरह देखेंगे, तब आपकी ब्रांड वैल्यू रॉकेट की तरह ऊपर जाएगी।
अब जब आप समझ गए हैं कि प्रोजेक्ट ही आपकी ताकत है, तो अगले स्टेप में हम यह सीखेंगे कि इस ताकत का ढिंढोरा कैसे पीटना है। क्योंकि बिना मार्केटिंग के तो कोहिनूर भी कोयला ही लगता है।
Lesson : मार्केटिंग और नेटवर्किंग - कोहिनूर बनो, पर डिब्बे में मत रहो
मान लीजिए आपने दुनिया की सबसे बेहतरीन कार बनाई है, लेकिन आपने उसे अपने गैराज के अंधेरे कोने में छिपा कर रखा है। क्या कोई उसे खरीदेगा? बिल्कुल नहीं। टॉम पीटर्स कहते हैं कि सिर्फ अच्छा काम करना काफी नहीं है, उस काम का ढिंढोरा पीटना भी उतना ही जरूरी है। अगर आप ऑफिस के कोने में बैठकर चुपचाप मेहनत कर रहे हैं और सोच रहे हैं कि एक दिन बॉस खुद आकर आपके गले में मेडल डालेगा, तो आप दुनिया के सबसे बड़े मुगालते में जी रहे हैं। असल जिंदगी में जो दिखता है, वही बिकता है।
जरा उस "मिस्टर साइलेंट" को देखिए जो रात के २ बजे तक ऑफिस में काम करता है, लेकिन मीटिंग में एक शब्द नहीं बोलता। सबको लगता है कि वह बस डेटा एंट्री कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ वह "मिस्टर स्मार्ट" है जिसने शायद आधा काम किया हो, लेकिन उसने अपने काम के ग्राफ्स बनाए, शानदार प्रेजेंटेशन दी और पूरी टीम को बताया कि उसने क्या अचीव किया है। साल के आखिर में प्रमोशन किसे मिलेगा? जाहिर है, उसे जो खुद को मार्केट करना जानता है। लोग इसे "चाटुकारिता" कह सकते हैं, लेकिन असल में यह "विजिबिलिटी" है।
नेटवर्किंग का मतलब यह नहीं कि आप सिर्फ बड़े साहबों को "गुड मॉर्निंग" के मैसेज भेजें। इसका मतलब है अपनी एक कम्युनिटी बनाना। क्या आपके पास ऐसे लोग हैं जो आपके काम की गवाही दे सकें? क्या आप अपनी इंडस्ट्री के इवेंट्स में जाते हैं या सिर्फ ऑफिस की कैंटीन में समोसे तोड़ते हैं? एक ब्रांड वही होता है जिसके नाम की चर्चा उसके कमरे में घुसने से पहले ही शुरू हो जाए। आपको अपना पीआर (PR) खुद बनना होगा।
सोशल मीडिया आज के दौर का सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप लिंक्डइन पर सिर्फ दूसरों की पोस्ट लाइक कर रहे हैं, तो आप कंज्यूमर हैं, क्रिएटर नहीं। अपनी लर्निंग्स शेयर करिए, अपने प्रोजेक्ट्स के बारे में लिखिए और दुनिया को बताइए कि आप किस चीज के एक्सपर्ट हैं। जब आप अपनी मार्केटिंग खुद करते हैं, तो आपको नौकरी ढूंढनी नहीं पड़ती, नौकरियां आपको ढूंढती हुई आती हैं।
अंत में, याद रखिए कि आपकी नेटवर्किंग ही आपकी नेटवर्थ है। अकेले दौड़कर आप रेस जीत सकते हैं, लेकिन बड़ा साम्राज्य बनाने के लिए आपको लोगों की जरूरत पड़ेगी। अपने काम को एक प्रोडक्ट की तरह बेचिए और खुद को एक सेलिब्रिटी प्रोफेशनल की तरह पेश करिए। अगर आप खुद अपनी कद्र नहीं करेंगे, तो यह मत उम्मीद करिए कि कोई कंपनी आपको सिर पर बिठाएगी।
तो अब वक्त आ गया है उस कर्मचारी वाले खोल को उतार फेंकने का। खुद को एक ब्रांड मानिए, बड़े प्रोजेक्ट्स हाथ में लीजिए और अपनी कामयाबी का शोर मचाइए। क्योंकि दुनिया उन्हीं को याद रखती है जो अपनी छाप छोड़ जाते हैं, उन्हें नहीं जो सिर्फ हाजिरी लगाकर चले जाते हैं।
तो क्या आप आज से अपनी 'मी इंक' कंपनी के सीईओ बनने के लिए तैयार हैं? नीचे कमेंट में 'BRAND' लिखिए अगर आप अपनी पहचान बदलने का संकल्प लेते हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जो ऑफिस की भीड़ में खो गया है। आपकी एक शेयरिंग किसी का करियर बदल सकती है।
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