The Experience Economy (Hindi)


क्या आप अभी भी वही पुराना घिसा पिटा सामान बेचकर अमीर बनने का सपना देख रहे हैं? सच तो यह है कि दुनिया बदल चुकी है और आप अभी भी पत्थर के जमाने की मार्केटिंग में फंसे हैं। अगर आप कस्टमर को सिर्फ प्रोडक्ट दे रहे हैं, तो यकीन मानिए आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं। आज की भागदौड़ वाली लाइफ में लोग सामान नहीं, बल्कि एक यादगार अहसास ढूंढ रहे हैं। अगर आपने द एक्सपीरियंस इकोनॉमी के इन ३ सीक्रेट्स को नहीं समझा, तो आपका बिजनेस बहुत जल्द इतिहास की किताबों में दफन हो जाएगा। चलिए जानते हैं कैसे आप अपने बोरिंग बिजनेस को एक सुपरहिट फिल्म बना सकते हैं।


Lesson : सामान मत बेचिए, अहसास का जादू चलाइए (The Shift from Product to Experience)

अगर आपको लगता है कि आप एक बढ़िया क्वालिटी का मोबाइल फोन या एक कड़क चाय बेचकर करोड़पति बन जाएंगे, तो माफ कीजियेगा, आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। आज के दौर में कस्टमर सामान खरीदने नहीं आता, वह एक 'फीलिंग' खरीदने आता है। जोसेफ पाइन और जेम्स गिल्मोर अपनी किताब द एक्सपीरियंस इकोनॉमी में साफ कहते हैं कि दुनिया अब सामान (Commodity) और सर्विस से बहुत आगे निकल चुकी है। अब जमाना है 'एक्सपीरियंस' का।

मान लीजिए आप रेलवे स्टेशन के बाहर एक टपरी पर चाय पीते हैं। वह आपको १० रुपये में चाय देता है, आप पीते हैं और निकल जाते हैं। यहाँ चाय एक कमोडिटी है। अब आप उसी चाय को एक अच्छे रेस्टोरेंट में जाकर पीते हैं, जहाँ वेटर आकर आपको ग्रीट करता है, कप साफ होता है और पंखा चल रहा होता है। यहाँ आप ५० रुपये देते हैं क्योंकि यहाँ आपको सर्विस मिल रही है। लेकिन अब कल्पना कीजिये कि आप एक ऐसी जगह जाते हैं जहाँ पुरानी यादों वाला डेकोरेशन है, बैकग्राउंड में किशोर कुमार के गाने चल रहे हैं, कुल्हड़ की खुशबू आ रही है और वेटर आपको 'महाराजा' कहकर बुलाता है। यहाँ आप उसी चाय के २०० रुपये भी ख़ुशी-ख़ुशी दे देंगे। क्यों? क्योंकि अब आप चाय नहीं, बल्कि वह एक्सपीरियंस खरीद रहे हैं।

यही वह सीक्रेट है जो एप्पल या स्टारबक्स जैसे बड़े ब्रांड्स इस्तेमाल करते हैं। वे जानते हैं कि लोग कॉफी के लिए नहीं, बल्कि उस सुकून वाले सोफे और वहां के माहौल के लिए पैसे देते हैं। अगर आप अभी भी सिर्फ अपने प्रोडक्ट के फीचर्स गिना रहे हैं, तो आप एक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। आप अपने कस्टमर को एक ऐसा लम्हा क्यों नहीं देते जो उसके दिमाग में चिपक जाए?

सच्चाई तो यह है कि आज का कस्टमर बहुत आलसी और डिमांडिंग हो गया है। उसे सब कुछ स्पेशल चाहिए। अगर आप उसे वही घिसी पिटी सर्विस देंगे जो पड़ोस वाली दुकान वाला दे रहा है, तो वह आपके पास दोबारा क्यों आएगा? आपको अपने बिजनेस को एक शो की तरह पेश करना होगा। याद रखिये, जब आप किसी को एक यादगार अनुभव देते हैं, तो वह कीमत नहीं पूछता, वह बस आपका होकर रह जाता है। क्या आपका बिजनेस कस्टमर के चेहरे पर वह मुस्कान ला पा रहा है? या आप बस भीड़ का हिस्सा बनकर रह गए हैं? अगर आप अपनी दुकान या ऑफिस को सिर्फ एक ट्रांजेक्शन की जगह समझते हैं, तो आप बहुत पीछे छूट जाएंगे। असली खेल भावनाओं का है, सामान का नहीं।


Lesson : आपका ऑफिस एक स्टेज है और आप एक एक्टर (Business is Theatre)

कभी आपने गौर किया है कि जब आप किसी महंगे शोरूम में घुसते हैं, तो वहां की खुशबू, लाइट और सेल्समैन की वह बनावटी लेकिन मीठी मुस्कान आपको क्यों अपनी तरफ खींचती है? जोसेफ पाइन और जेम्स गिल्मोर कहते हैं कि 'वर्क इस थिएटर'। इसका मतलब है कि आप जो भी काम कर रहे हैं, वह असल में एक नाटक है जो आप अपने कस्टमर के लिए स्टेज पर कर रहे हैं। अगर आपको लगता है कि आप सिर्फ लैपटॉप पर डेटा एंट्री कर रहे हैं या काउंटर पर बैठकर बिल काट रहे हैं, तो आप अपनी फिल्म के सबसे फ्लॉप एक्टर हैं।

सोचिए, आप एक ऐसी दुकान पर जाते हैं जहाँ दुकानदार बनियान पहनकर बैठा है, पसीने से लथपथ है और फोन पर अपनी बीवी से लड़ रहा है। क्या आप वहां से सामान खरीदना चाहेंगे? बिल्कुल नहीं। भले ही उसका सामान दुनिया में सबसे बढ़िया हो, लेकिन उसकी 'परफॉरमेंस' जीरो है। दूसरी तरफ, एक ऐसा स्टोर है जहाँ घुसते ही ठंडी हवा आती है, लाइटें आपको किसी फिल्म स्टार जैसा महसूस कराती हैं और वहां का स्टाफ आपको ऐसे ट्रीट करता है जैसे आप देश के प्रधानमंत्री हों। यहाँ पर 'स्टेज' सज चुका है और 'एक्टर्स' अपना रोल बखूबी निभा रहे हैं।

आजकल के कस्टमर को बोरियत से नफरत है। उन्हें हर चीज में एंटरटेनमेंट चाहिए। अगर आप एक बैंक मैनेजर हैं, तो आपका केबिन आपका स्टेज है। अगर आप एक डॉक्टर हैं, तो आपका क्लिनिक आपका थिएटर है। यहाँ तक कि अगर आप घर से फ्रीलांसिंग कर रहे हैं, तो आपकी ईमेल लिखने का तरीका आपकी एक्टिंग है। क्या आपकी एक्टिंग दमदार है? या आप बस स्क्रिप्ट पढ़कर छुट्टी पाना चाहते हैं?

जरा याद कीजिये उस आखिरी बार को जब आपने किसी रेस्टोरेंट में खाना खाया और वेटर ने टेबल पर ही लाइव कुकिंग करके दिखाई। उसने नमक को हवा में उछाला, आग के साथ खेल दिखाया और अंत में एक शानदार डिश पेश की। क्या आप वहां सिर्फ पेट भरने गए थे? नहीं, आप उस तमाशे को देखने गए थे। आपने खाने से ज्यादा उस 'शो' के पैसे दिए हैं। यही है थिएटर का असली जादू।

अगर आप अपने बिजनेस में ड्रामे और भावनाओं का तड़का नहीं लगा रहे, तो आप बस एक मशीन हैं। और मशीनों से कोई प्यार नहीं करता। आपको अपनी हर सर्विस को एक सीन की तरह डिजाइन करना होगा। कस्टमर के आने से लेकर उसके जाने तक, हर सेकंड एक परफेक्ट शॉट होना चाहिए। अगर एक भी एक्टर यानी आपका कर्मचारी अपना रोल भूल गया, तो समझिये आपकी फिल्म फ्लॉप और कस्टमर का पैसा डूब गया। क्या आप तैयार हैं अपने बिजनेस को ऑस्कर विनिंग परफॉरमेंस बनाने के लिए? या आप बस साइड रोल प्ले करके खुश हैं?


Lesson : पर्सनल टच का जादू और कस्टमाइजेशन (Customization is the New King)

कभी आपने सोचा है कि जब आप किसी कैफे में जाते हैं और वेटर आपके कप पर आपका नाम लिख देता है, तो आपको इतनी ख़ुशी क्यों होती है? भले ही आपकी स्पेलिंग गलत लिखी हो, फिर भी आप उस कप की फोटो खींचकर इंस्टाग्राम पर जरूर डालते हैं। क्यों? क्योंकि वहां आप सिर्फ एक और 'कस्टमर नंबर १०१' नहीं थे, वहां आपकी एक पहचान थी। जोसेफ पाइन और जेम्स गिल्मोर अपनी किताब में समझाते हैं कि आज के दौर में 'पर्सनलाइजेशन' ही वह सीक्रेट मसाला है जो किसी साधारण सर्विस को एक यादगार एक्सपीरियंस बना देता है।

कल्पना कीजिये, आप एक दर्जी के पास जाते हैं और वह आपको रेडीमेड शर्ट दिखा देता है। आप उसे पहनते हैं, पैसे देते हैं और आ जाते हैं। यह एक सिंपल ट्रांजेक्शन है। लेकिन अब सोचिये, आप एक ऐसे बुटीक में जाते हैं जहाँ मास्टर जी आपका नाप लेते हैं, आपसे पूछते हैं कि आपको बटन कैसे चाहिए, कॉलर की डिजाइन कैसी हो और आपकी जेब पर आपके नाम का पहला अक्षर 'एम्ब्रॉयडरी' करके देते हैं। यहाँ आप शर्ट नहीं खरीद रहे, आप खुद को 'डिजाइन' कर रहे हैं। यहाँ आप वीआईपी महसूस करते हैं।

आज का कस्टमर चाहता है कि उसे समझा जाए। वह चाहता है कि बिजनेस उसे एक भीड़ का हिस्सा न समझे। अगर आप अपने हर कस्टमर को वही घीसा-पिटा 'थैंक यू फॉर शॉपिंग' वाला मैसेज भेज रहे हैं, तो आप अपना नुकसान कर रहे हैं। क्या आपने कभी अपने रेगुलर कस्टमर को उसके जन्मदिन पर बिना किसी मतलब के फोन करके बधाई दी है? या कभी किसी क्लाइंट को उसकी पसंद की कोई छोटी सी चीज सरप्राइज में दी है?

सच्चाई तो यह है कि कस्टमाइजेशन का मतलब सिर्फ नाम लिखना नहीं है, इसका मतलब है कस्टमर की जरूरतों को उनसे बेहतर समझना। अगर आप एक जिम ओनर हैं और आप अपने क्लाइंट को सिर्फ मशीनें दे रहे हैं, तो आप फेल हैं। लेकिन अगर आप उसे उसकी बॉडी टाइप, उसकी डाइट और उसकी पसंद के गानों के साथ एक वर्कआउट प्लान देते हैं, तो आपने उसे बांध लिया है। अब वह कहीं और नहीं जाएगा क्योंकि उसे पता है कि 'सक्सेस' की चाबी आपके पास है।

तो क्या आप अपने बिजनेस में वह पर्सनल टच ला रहे हैं? या आप अभी भी 'वन साइज फिट्स ऑल' वाली पुरानी सोच में अटके हैं? याद रखिये, जब आप किसी को खास महसूस कराते हैं, तो वह आपका ब्रांड एंबेसडर बन जाता है। वह चार लोगों को जाकर बताएगा कि "भाई, वहां जाना, वो बंदा दिल जीत लेता है।" और यही माउथ पब्लिसिटी आपके बिजनेस को रॉकेट बना देगी।


तो दोस्तो, द एक्सपीरियंस इकोनॉमी का सार यही है कि अब सिर्फ सामान बेचना काफी नहीं है। आपको एक डायरेक्टर बनना होगा, अपने बिजनेस को एक स्टेज बनाना होगा और अपने कस्टमर को उस फिल्म का हीरो बनाना होगा। अगर आप आज नहीं बदले, तो कल कोई और आपके कस्टमर को एक बेहतर एक्सपीरियंस देकर आपसे छीन ले जाएगा।

आज ही बैठकर सोचिये कि आप अपने बिजनेस में ऐसा क्या छोटा सा बदलाव कर सकते हैं जिससे आपके कस्टमर को 'वाओ' वाला अहसास हो। क्या वह एक मुस्कान है? क्या वह एक पर्सनल नोट है? या क्या वह आपकी दुकान का माहौल है? कमेंट में मुझे जरूर बताएं कि आप अपने काम को एक 'एक्सपीरियंस' में कैसे बदलने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो अपना नया बिजनेस शुरू करने जा रहा है, शायद उसकी लाइफ बदल जाए।

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