क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो रोज सुबह अलार्म से लड़ते हैं और सोचते हैं कि काश कोई जादू की छड़ी मिल जाए और आप रातों रात अमीर बन जाएं। अगर आप अब तक खाली हाथ हैं तो मुबारक हो आप अपनी गरीबी के खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि आपने कभी वह सीक्रेट सीखा ही नहीं जो दी इंस्टेंट मिलियनेयर किताब में एक बूढ़ा करोड़पति सिखाता है।
अब अगर आप अपनी इस पुरानी घिसी पिटी लाइफ को छोड़कर सच में पैसा बनाना चाहते हैं तो चलिए समझते हैं इस किताब के वह ३ जबरदस्त सबक जो आपकी सोच और बैंक बैलेंस दोनों बदल देंगे।
Lesson : पावर ऑफ वर्ड्स और एफर्मेशन
अगर आप सुबह उठकर सबसे पहले यह सोचते हैं कि आज फिर वही घिसी पिटी ऑफिस की कुर्सी तोड़नी है और महीने के आखिर में वही चिल्लर सैलरी देखनी है तो मुबारक हो। आप अपनी गरीबी के सबसे बड़े आर्किटेक्ट हैं। मार्क फिशर की यह किताब दी इंस्टेंट मिलियनेयर हमें सबसे पहले यही सिखाती है कि हमारे शब्द और हमारे विचार ही हमारी हकीकत को शेप देते हैं। इसे थोड़ा गहराई से समझते हैं।
लेखक बताते हैं कि एक बूढ़ा मिलियनेयर एक नौजवान को मिलता है जो बिल्कुल आपकी तरह फ्रस्ट्रेटेड और परेशान है। वह बूढ़ा उसे एक सादा कागज देता है और कहता है कि अपनी लाइफ का गोल लिखो। अब असली मजे की बात यहाँ आती है। ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी यह कहने में बिता देते हैं कि मुझे बहुत सारा पैसा चाहिए। लेकिन भाई साहब बहुत सारा क्या होता है। एक भिखारी के लिए १००० रुपये बहुत सारा पैसा है और एक बिजनेसमैन के लिए १० करोड़ भी कम हैं।
किताब में यह साफ कहा गया है कि अगर आपके दिमाग में कोई स्पेसिफिक नंबर नहीं है तो कायनात को भी नहीं पता कि आपको देना क्या है। आप रेस्टोरेंट में जाकर वेटर से यह नहीं कहते कि कुछ अच्छा खिला दो। आप मेनू देखकर ऑर्डर देते हैं। वैसे ही लाइफ में भी आपको अपना ऑर्डर स्पेसिफिक रखना होगा।
यहाँ आता है पावर ऑफ वर्ड्स का असली खेल। क्या आपने कभी गौर किया है कि अमीर लोग अक्सर अपनी कामयाबी के बारे में बात करते हैं जबकि मिडिल क्लास लोग अपनी दिक्कतों और महंगाई का रोना रोते रहते हैं। आप जो बार बार दोहराते हैं आपका सबकॉन्शियस माइंड उसे ही सच मान लेता है। अगर आप दिन भर कहेंगे कि पैसा कमाना बहुत मुश्किल है तो आपका दिमाग ऐसे ही रास्ते खोजेगा जहाँ मेहनत ज्यादा और कमाई कम हो।
मान लीजिए आपका दोस्त चिंटू है जो हमेशा कहता है कि मेरी तो किस्मत ही खराब है। अब चिंटू को अगर सोने का अंडा देने वाली मुर्गी भी मिल जाए तो वह उसे पकाकर खा जाएगा क्योंकि उसका माइंडसेट ही अभाव वाला है। वहीं अगर आप खुद को यह यकीन दिला दें कि पैसा कमाना एक आर्ट है और आप उसके कलाकार हैं तो आपके डिसीजन बदलने लगेंगे।
इस किताब का यह लेसन हमें सिखाता है कि अमीर बनने की शुरुआत आपके बैंक अकाउंट से नहीं बल्कि आपके शब्दों से होती है। आपको खुद को बार बार वह याद दिलाना होगा जो आप बनना चाहते हैं। इसे हम एफर्मेशन कहते हैं। यह कोई जादू टोना नहीं है बल्कि अपने दिमाग को रिप्रोग्राम करने का तरीका है। अगर आप खुद को बार बार कहेंगे कि मैं एक मिलियनेयर बन रहा हूँ तो आपका कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ेगा और आप उन मौकों को पहचान पाएंगे जिन्हें आप पहले डर की वजह से छोड़ देते थे।
लेकिन याद रहे सिर्फ चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। आपके शब्दों में इमोशन और विश्वास होना चाहिए। अगर आप आईने के सामने खड़े होकर कह रहे हैं कि मैं अमीर हूँ और पीछे से आपका मन कह रहा है कि भाई जेब में तो बस दस रुपये बचे हैं तो यह काम नहीं करेगा। आपको उस फीलिंग को पकड़ना होगा। यह लेसन हमें उस मेंटल बैरियर को तोड़ने की हिम्मत देता है जो हमें सालों से घेरे हुए है।
तो क्या आप तैयार हैं अपने पुराने घिसे पिटे विचारों को डिलीट करने के लिए। क्योंकि अगर आप अपनी सोच नहीं बदल सकते तो यकीन मानिए आप अपना बैंक बैलेंस भी कभी नहीं बदल पाएंगे। यह तो बस शुरुआत है आगे के दो सबक तो और भी ज्यादा हिला देने वाले हैं जो आपको आपकी कंफर्ट जोन से बाहर खींच लाएंगे।
Lesson : स्पेसिफिक गोल और डेडलाइन
अगर मैं आपसे पूछूँ कि आपको अमीर बनना है, तो आप कहेंगे "हाँ भाई, बिल्कुल!" लेकिन अगर मैं पूछूँ "कितना पैसा चाहिए और कब तक?" तो शायद आप बगलें झांकने लगेंगे। दी इंस्टेंट मिलियनेयर में बूढ़ा अमीर आदमी उस नौजवान को यही सबसे बड़ा सबक सिखाता है कि बिना एक फिक्स नंबर और तारीख के, आपका अमीर बनने का सपना सिर्फ एक "हसीन सपना" ही रह जाएगा, हकीकत कभी नहीं बनेगा।
जरा सोचिए, आप रेलवे स्टेशन जाते हैं और टिकट काउंटर वाले से कहते हैं, "भाई साहब, मुझे कहीं की भी टिकट दे दो, बस गाड़ी अच्छी होनी चाहिए।" वह क्लर्क आपको पागल समझेगा या सीधा पुलिस के हवाले कर देगा। लाइफ में भी हम यही गलती करते हैं। हम कहते हैं "मुझे बहुत सारा पैसा कमाना है", "मुझे सक्सेसफुल होना है", लेकिन "बहुत सारा" कोई अमाउंट नहीं होता। ब्रह्मांड को कन्फ्यूजन पसंद नहीं है। जब तक आप अपने दिमाग को यह नहीं बताते कि आपको ठीक १० करोड़ रुपये चाहिए और वो भी अगले ५ साल के अंदर, तब तक आपका सबकॉन्शियस माइंड एक्टिवेट ही नहीं होगा।
यहाँ पर लेखक एक बहुत ही मजेदार और थोड़ा डरावना टास्क देते हैं। वह उस नौजवान से कहते हैं कि एक चेक लिखो अपने नाम का, उस पर वह रकम लिखो जो तुम कमाना चाहते हो और एक साल बाद की तारीख डाल दो। अब आप कहेंगे, "अरे भाई, चेक लिखने से थोड़े ही पैसा आता है!" यहीं तो आप मात खा जाते हैं। यह चेक कोई जादू का टोना नहीं है, बल्कि आपके दिमाग के लिए एक "डेडलाइन" है। जब आप एक तारीख तय कर लेते हैं, तो आपका आलसी दिमाग अचानक से काम करना शुरू कर देता है। उसे पता चल जाता है कि अब टाइम पास करने का वक्त खत्म हो गया है।
मान लीजिए आपके ऑफिस में एक प्रोजेक्ट है जिसकी कोई डेडलाइन नहीं है। आप उसे महीनों तक टालते रहेंगे, चाय पिएंगे, गप्पें मारेंगे। लेकिन जैसे ही बॉस कहता है कि कल सुबह १० बजे तक रिपोर्ट चाहिए, तो आप रात भर जागकर, बिना खाए-पिए काम खत्म कर देते हैं। हमारी बॉडी और माइंड प्रेशर में ही बेस्ट परफॉर्म करते हैं। अमीर लोग खुद पर यह प्रेशर खुद ही डालते हैं, जबकि गरीब लोग बाहरी दबाव का इंतजार करते हैं।
मार्क फिशर यहाँ एक और गहरी बात कहते हैं। ज्यादातर लोग डरते हैं बड़ी रकम लिखने से। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने १ साल में १ करोड़ लिख दिया और नहीं हुआ तो? भाई साहब, वैसे भी तो आपके पास अभी नहीं हैं! तो बड़ा सोचने में टैक्स थोड़े ही लग रहा है। जब आप एक बड़ा और स्पेसिफिक गोल सेट करते हैं, तो आपकी पूरी पर्सनैलिटी बदलने लगती है। आप फालतू की वेब सीरीज छोड़कर उन स्किल्स पर ध्यान देने लगते हैं जो आपको उस गोल तक ले जाएँगी।
लेकिन सावधान! यहाँ भी एक ट्विस्ट है। सिर्फ नंबर लिखने से कुछ नहीं होगा। आपको उस नंबर पर अटूट विश्वास होना चाहिए। अगर आप १० करोड़ लिख रहे हैं और अंदर से आवाज आ रही है "बेटा, तेरी औकात तो १० हजार की भी नहीं है", तो वह गोल कभी पूरा नहीं होगा। आपको उस अमाउंट के साथ कंफर्टेबल होना पड़ेगा।
यह लेसन हमें सिखाता है कि क्लैरिटी ही पावर है। जिसके पास प्लान और डेट है, वही रेस जीतता है। बाकी सब तो बस भीड़ का हिस्सा बनकर धक्के खाते रहते हैं। तो आज ही अपनी डायरी निकालिए और वह नंबर लिखिए जो आपकी लाइफ बदल दे, और हाँ, साथ में एक्सपायरी डेट डालना मत भूलिएगा!
Lesson : फियर ऑफ फेलियर को छोड़ना
आपने गोल सेट कर लिया, चेक भी लिख लिया, और रोज सुबह खुद को मिलियनेयर बोलना भी शुरू कर दिया। लेकिन अगर आपके अंदर 'रिस्क' लेने का दम नहीं है, तो आपकी सारी प्लानिंग धरी की धरी रह जाएगी। दी इंस्टेंट मिलियनेयर का यह तीसरा सबक सबसे कड़वा मगर सबसे सच्चा है। बूढ़ा अमीर आदमी उस नौजवान को एक ऐसी सिचुएशन में डाल देता है जहाँ उसे लगता है कि उसकी जान जा सकती है। क्यों? क्योंकि जब तक आप अपनी जान प्यारी समझेंगे और अपनी छोटी सी कंफर्ट जोन को पकड़कर बैठेंगे, तब तक आप बड़ी दौलत के हकदार नहीं बनेंगे।
सच तो यह है कि हम में से ज्यादातर लोग गरीबी से नहीं डरते, हम "बदलाव" से डरते हैं। हमें डर लगता है कि अगर हमने अपनी नौ से पांच की नौकरी छोड़ दी या अपना छोटा सा बिजनेस दांव पर लगा दिया और फेल हो गए तो लोग क्या कहेंगे। भाई साहब, लोग तो तब भी कह रहे हैं जब आप खाली हाथ हैं! तो क्यों न कुछ बड़ा करके लोगों को बोलने का मौका दिया जाए। लेखक कहते हैं कि अमीर बनने का रास्ता फूलों की सेज नहीं है, बल्कि यह उन कांटों भरा रास्ता है जहाँ आपको अपने डर का सामना करना पड़ता है।
मान लीजिए चिंटू को तैरना सीखना है। वह किनारे पर बैठकर स्विमिंग की सारी किताबें पढ़ लेता है, यूट्यूब पर वीडियो देख लेता है और खुद को 'मास्टर स्विमर' बोलने लगता है। लेकिन जैसे ही उसे पानी में धक्का दिया जाता है, उसकी हवा निकल जाती है। क्यों? क्योंकि असली सीख पानी के अंदर है, किनारे पर नहीं। लाइफ में भी जब तक आप अपनी सेविंग्स को इन्वेस्ट नहीं करेंगे या किसी नए आइडिया पर काम शुरू नहीं करेंगे, तब तक आप सिर्फ किनारे पर बैठे दर्शक ही रहेंगे।
मार्क फिशर यहाँ एक बहुत ही गहरी बात समझाते हैं। वह कहते हैं कि जो इंसान हारने से डरता है, वह कभी जीत नहीं सकता। अमीर लोग रिस्क को 'खतरा' नहीं बल्कि 'अपॉर्चुनिटी' की तरह देखते हैं। वे जानते हैं कि अगर वे फेल भी हुए, तो वे वो सबक सीखेंगे जो किसी कॉलेज में नहीं पढ़ाया जाता। और यही कॉन्फिडेंस उन्हें अगली बार और बड़ा दांव खेलने की हिम्मत देता है। क्या आपने कभी किसी ऐसे करोड़पति को देखा है जिसने अपनी जिंदगी में कभी कोई बड़ा रिस्क न लिया हो? जवाब है 'नहीं'।
अब सवाल यह है कि क्या आप तैयार हैं? क्या आप अपनी उस पुरानी और डरी हुई पहचान को छोड़ने के लिए राजी हैं? याद रखिए, वह बूढ़ा मिलियनेयर उस नौजवान को सिर्फ पैसे नहीं दे रहा था, वह उसे एक नया 'इंसान' बना रहा था। एक ऐसा इंसान जो अपनी किस्मत खुद लिखता है, जो हालातों का रोना नहीं रोता और जो डर के आगे घुटने नहीं टेकता।
तो मेरे दोस्त, आज खुद से एक वादा कीजिए। क्या आप अपनी पूरी जिंदगी उसी मिडिल क्लास फियर में बिताना चाहते हैं या फिर आप उस चेक पर लिखी रकम को सच करना चाहते हैं? चुनाव आपका है। मौका अभी है, क्योंकि कल कभी नहीं आता। उठिए, अपना गोल फिक्स कीजिए और अपने डर को अपनी कामयाबी की सीढ़ी बना लीजिए। क्योंकि दुनिया में सिर्फ वही लोग इतिहास रचते हैं जो 'सेफ' खेलने के बजाय 'ग्रैंड' खेलना जानते हैं।
अगर इस आर्टिकल ने आपके अंदर की सोई हुई आग को थोड़ा भी सुलगाया है, तो कमेंट्स में अपना एक 'स्पेसिफिक गोल' और उसकी 'डेडलाइन' जरूर लिखें। देखते हैं कितने लोगों में सच में अमीर बनने का जिगरा है! इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा पैसों की तंगी का रोना रोता रहता है। शायद आज उसकी भी किस्मत बदल जाए।
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