The New Positioning (Hindi)


करोड़ों फूंकने के बाद भी आपका ब्रांड कचरे के डिब्बे में पड़ा है क्योंकि आपको लगता है कि कस्टमर बेवकूफ है। अपनी बोरिंग मार्केटिंग बंद करो वरना कॉम्पिटिशन आपको कच्चा चबा जाएगा। अगर आप अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं तो मुबारक हो आप फेल होने की तैयारी कर चुके हैं।

आइए जैक ट्राउट की इस मास्टरक्लास से समझते हैं वह ३ बड़े लेसन्स जो आपके बिजनेस की डूबती नैया पार लगा सकते हैं।


Lesson : कस्टमर के दिमाग में कब्जा करना (माइंड शेयर ही असली मार्केट शेयर है)

क्या आपने कभी सोचा है कि जब आपको प्यास लगती है और आप दुकान पर जाते हैं, तो आप पानी की बोतल नहीं बल्कि बिसलेरी मांगते हैं। जब आपको चोट लगती है, तो आप एंटीसेप्टिक नहीं बल्कि डेटोल ढूंढते हैं। क्या ये ब्रांड्स जादुई हैं? बिल्कुल नहीं। इन्होंने बस आपके दिमाग के उस छोटे से कोने पर कब्जा कर लिया है जिसे जैक ट्राउट पोजिशनिंग कहते हैं।

जैक ट्राउट कहते हैं कि पोजिशनिंग वह नहीं है जो आप अपने प्रोडक्ट के साथ करते हैं। पोजिशनिंग वह है जो आप अपने संभावित ग्राहक के दिमाग के साथ करते हैं। मान लीजिए आप एक नई चाय की दुकान खोलते हैं। आप चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि मेरी चाय सबसे अच्छी है। लेकिन भाई साहब, आपके बगल वाला भी यही कह रहा है और सामने वाला भी। कस्टमर कंफ्यूज है। वह सोच रहा है कि सब तो यही बोल रहे हैं, तो इसमें नया क्या है?

यहीं पर आप गलती करते हैं। आप प्रोडक्ट बेच रहे हैं, जबकि आपको एक धारणा यानी परसेप्शन बेचनी चाहिए थी। अगर आप अपनी दुकान को सबसे अच्छी चाय की जगह सिर्फ अदरक वाली कड़क चाय का अड्डा बना देते, तो आप उन लोगों के दिमाग में जगह बना लेते जिन्हें सिर्फ अदरक वाली चाय पसंद है। आपने एक कैटेगरी चुन ली। आपने उनके दिमाग के एक फोल्डर पर अपना नाम लिख दिया।

आज की दुनिया में जानकारी का बम फट रहा है। हर तरफ विज्ञापन हैं। फेसबुक खोलते ही दस लोग आपको अमीर बनाने का कोर्स बेच रहे होते हैं। यूट्यूब पर हर दूसरा बंदा आपको लाइफ कोच बन कर ज्ञान दे रहा है। ऐसे में इंसान का दिमाग एक फिल्टर की तरह काम करता है। वह फालतू की चीजों को कचरे में डाल देता है और सिर्फ उसे याद रखता है जो उसके लिए खास है।

मान लीजिए आप किसी पार्टी में गए हैं और वहां ५० लोग हैं। आप सबको अपना नाम बताते हैं, लेकिन अगले दिन किसी को याद नहीं रहता कि आप कौन थे। लेकिन अगर आप उस पार्टी में लाल रंग की शेरवानी पहन कर जाते और सबको बताते कि आप दुनिया के सबसे बड़े समोसा लवर हैं, तो लोग आपको समोसा वाले भाई साहब के नाम से याद रखते। यही पोजिशनिंग है। आपने भीड़ में अपनी एक अलग पहचान बना ली।

बिजनेस में भी यही होता है। अगर आप सबके लिए सब कुछ बनने की कोशिश करेंगे, तो आप किसी के लिए कुछ नहीं बन पाएंगे। आपको एक तलवार की तरह पैना होना पड़ेगा ताकि आप कस्टमर के दिमाग की दीवारों को चीर कर अंदर घुस सकें। एप्पल ने खुद को प्रीमियम और क्रिएटिव लोगों के लिए पोजिशन किया। उन्होंने कभी नहीं कहा कि हमारा फोन सस्ता है। उन्होंने कहा कि हम अलग हैं। और आज लोग किडनी बेचकर भी आईफोन लेने को तैयार हैं क्योंकि एप्पल ने उनके दिमाग में खुद को स्टेटस सिंबल की तरह सेट कर दिया है।

अगर आप अपने ब्रांड को लेकर सीरियस हैं, तो सबसे पहले यह पूछना बंद करें कि मेरा प्रोडक्ट क्या करता है। इसके बजाय यह पूछें कि मेरा ब्रांड कस्टमर के दिमाग में किस शब्द के रूप में मौजूद है। क्या वह भरोसा है? क्या वह कम कीमत है? या क्या वह लग्जरी है? अगर आपके पास इसका जवाब एक शब्द में नहीं है, तो समझ लीजिए आप मार्केट की भीड़ में खो चुके हैं।

पोजिशनिंग का असली खेल साइकोलॉजी का है। लोग वह नहीं खरीदते जो सबसे अच्छा होता है, बल्कि वह खरीदते हैं जिसे उनका दिमाग सबसे पहले याद करता है। और दिमाग हमेशा उसे याद रखता है जो पहला होता है या सबसे अलग होता है। अगर आप पहले नहीं बन सकते, तो कुछ ऐसा ढूंढिए जिसमें आप इकलौते हों। जब आप दिमाग जीत लेते हैं, तो बटुआ अपने आप खुल जाता है।


Lesson : सादगी की शक्ति (कन्फ्यूजन यानी मौत, क्लैरिटी यानी पैसा)

क्या आपने कभी वह मेन्यू कार्ड देखा है जिसमें ५०० तरह के खाने लिखे होते हैं? पनीर टिक्का से लेकर चाइनीज भेल तक सब कुछ। आप १० मिनट तक उसे घूरते हैं और अंत में वही पुराना दाल मखनी ऑर्डर कर देते हैं। क्यों? क्योंकि आपका दिमाग इतना सारा डेटा देख कर थक चुका है। जैक ट्राउट कहते हैं कि आज की दुनिया में "ज्यादा" का मतलब "बेहतर" नहीं होता। आज की दुनिया में सादगी ही सबसे बड़ी लग्जरी है।

जैक ट्राउट अपनी किताब में समझाते हैं कि इंसानी दिमाग एक छननी की तरह है। अगर आप उस पर बाल्टी भर कर जानकारी डालेंगे, तो वह सब कुछ बाहर फेंक देगा। लेकिन अगर आप एक छोटा सा पत्थर यानी एक सिंपल मैसेज फेकेंगे, तो वह सीधे निशाने पर लगेगा। लोग अक्सर सोचते हैं कि अगर वह अपने प्रोडक्ट के ५० फायदे बताएंगे, तो कस्टमर इम्प्रेस हो जाएगा। असलियत यह है कि कस्टमर को आपके ५० फीचर्स से कोई लेना-देना नहीं है। वह बस यह जानना चाहता है कि आप उसकी कौन सी एक बड़ी समस्या हल कर रहे हैं।

मान लीजिए आप एक फिटनेस ट्रेनर ढूंढ रहे हैं। एक ट्रेनर कहता है, मैं आपको योगा, जिम, जुम्बा, डाइट, मेडिटेशन और मार्शल आर्ट्स सब सिखाऊंगा। दूसरा ट्रेनर कहता है, मैं सिर्फ ३० दिन में आपका पेट कम कर दूंगा। आप किसके पास जाएंगे? जाहिर है दूसरे वाले के पास। क्यों? क्योंकि उसका मैसेज साफ है। उसने फालतू का रायता नहीं फैलाया। उसने सीधे आपके दर्द वाली रग पर हाथ रखा है।

आजकल की मार्केटिंग में लोग जार्गन यानी भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके खुद को स्मार्ट दिखाने की कोशिश करते हैं। "हम एक ओमनी-चैनल पायनियरिंग सॉल्यूशन प्रोवाइडर हैं जो सिनर्जी क्रिएट करते हैं।" भाई साहब, कहना क्या चाहते हो? अगर आपकी दादी को समझ नहीं आ रहा कि आप क्या बेच रहे हैं, तो समझ लीजिए आपकी मार्केटिंग फेल है। सादगी का मतलब यह नहीं है कि आप कम बोलें, इसका मतलब है कि आप इतना साफ बोलें कि किसी को दोबारा पूछने की जरूरत न पड़े।

गूगल को देखिए। जब वह शुरू हुआ था, तो याहू और एमएसएन जैसे सर्च इंजन थे जो पूरी स्क्रीन को खबरों, विज्ञापनों और लिंक्स से भर देते थे। गूगल आया और उसने पूरी स्क्रीन सफेद रखी, बीच में बस एक सर्च बॉक्स। उसने कहा, "मुझे पता है तुम यहाँ सिर्फ कुछ ढूंढने आए हो, बस ढूंढो।" सादगी ने गूगल को दुनिया का राजा बना दिया।

जैक ट्राउट चेताते हैं कि अगर आप अपने ब्रांड को लेकर बहुत ज्यादा चालाक बनने की कोशिश करेंगे, तो आप खुद के जाल में फंस जाएंगे। लोग उन चीजों पर भरोसा करते हैं जो उन्हें आसानी से समझ आती हैं। अगर आपका लोगो पेचीदा है, आपकी टैगलाइन किसी कविता जैसी है और आपका सेल्स पिच किसी सरकारी फॉर्म जैसा है, तो लोग आपको छोड़कर आपके उस कॉम्पिटिटर के पास चले जाएंगे जो उनसे सीधे और सरल तरीके से बात करता है।

याद रखिए, सादगी का मतलब सस्ता होना नहीं है। सादगी का मतलब है फोकस। जब आप किसी एक चीज पर फोकस करते हैं, तो आपकी ताकत बढ़ जाती है। जैसे सूरज की किरणें अगर एक लेंस के जरिए एक कागज पर पड़ें, तो उसे जला देती हैं। वैसे ही आपका एक सिंपल मैसेज कस्टमर के दिमाग में आग लगा सकता है। लेकिन अगर आप अपनी किरणों को हर तरफ बिखेर देंगे, तो आप बस एक हल्की धूप बनकर रह जाएंगे जो किसी को महसूस तक नहीं होगी।

तो अगली बार जब आप अपनी वेबसाइट या एडवर्टाइजमेंट डिजाइन करें, तो खुद से पूछें, "क्या मैं इसे और भी छोटा और सिंपल बना सकता हूं?" अगर जवाब हां है, तो उसे तब तक काटते रहिए जब तक सिर्फ असली हीरा न बच जाए। सादगी ही वह चाबी है जो कस्टमर के दिल और दिमाग का दरवाजा एक बार में खोल देती है।


Lesson : री-पोजिशनिंग की कला (वक्त के साथ बदलो वरना इतिहास बन जाओगे)

क्या आपको नोकिया याद है? एक जमाना था जब हर दूसरे हाथ में नोकिया का फोन होता था। लोग कहते थे कि नोकिया का फोन गिर जाए तो फर्श टूट जाता है पर फोन नहीं। लेकिन आज नोकिया कहां है? वह एक म्यूजियम की चीज बन कर रह गया है। क्यों? क्योंकि उन्होंने खुद को वक्त के साथ री-पोजिशन नहीं किया। जैक ट्राउट कहते हैं कि मार्केट एक बहती हुई नदी की तरह है, अगर आप एक जगह खड़े रह गए तो आप पीछे छूट जाएंगे।

री-पोजिशनिंग का मतलब है अपनी पुरानी इमेज को उखाड़ फेंकना और नई जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालना। कभी-कभी यह इसलिए जरूरी होता है क्योंकि लोग आपसे बोर हो जाते हैं, और कभी-कभी इसलिए क्योंकि कोई नया खिलाड़ी आकर आपका खेल बिगाड़ देता है। जैक ट्राउट समझाते हैं कि जब आप अपनी पोजीशन खोने लगें, तो डरिए मत। बल्कि अपने कॉम्पिटिटर की ताकत को ही उसकी कमजोरी बना दीजिए।

अमेरिका में एक कंपनी थी एविज (Avis), जो रेंटल कार बिजनेस में नंबर २ पर थी। नंबर १ पर हर्ट्ज (Hertz) का कब्जा था। एविज ने सालों तक कोशिश की कि वह नंबर १ बन जाए, पर नाकाम रही। फिर उन्होंने एक मास्टरस्ट्रोक खेला। उन्होंने अपनी टैगलाइन बदल दी और कहा, "हम नंबर २ हैं, इसलिए हम ज्यादा मेहनत करते हैं।"

वाह! क्या बात है। उन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपनी सबसे बड़ी खासियत बना दिया। लोगों को लगा कि हां यार, नंबर १ वाला तो घमंडी हो सकता है, लेकिन नंबर २ वाला हमें अच्छी सर्विस देगा क्योंकि उसे अपनी जगह बनानी है। देखते ही देखते एविज का बिजनेस रॉकेट की तरह ऊपर चला गया। इसे कहते हैं री-पोजिशनिंग का जादू। उन्होंने मार्केट की सोच ही बदल दी।

आज के दौर में अगर आप एक ही ढर्रे पर चलते रहेंगे, तो आप उस अंकल की तरह हो जाएंगे जो आज भी फेसबुक पर गुड मॉर्निंग वाले मैसेज भेजते हैं जबकि दुनिया इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर आगे निकल चुकी है। आपको यह समझना होगा कि आपके कस्टमर की पसंद बदल रही है। अगर आप कल तक सिर्फ "सस्ते" होने के लिए जाने जाते थे, तो आज आपको "क्वालिटी" या "एक्सपीरियंस" के लिए री-पोजिशन होना पड़ सकता है।

लेकिन ध्यान रहे, री-पोजिशनिंग का मतलब यह नहीं है कि आप कल कुछ और थे और आज अचानक कुछ और बन जाएं। यह एक सोची-समझी रणनीति है। अगर आप एक प्रीमियम ब्रांड हैं और अचानक डिस्काउंट देने लगें, तो आपकी वैल्यू गिर जाएगी। आपको अपनी जड़ों को पकड़े रखते हुए अपनी टहनी को नई दिशा में मोड़ना है।

इसे एक और मजेदार तरीके से देखिए। टाटा नैनो को याद कीजिए? उसे "दुनिया की सबसे सस्ती कार" कह कर पेश किया गया था। टाटा को लगा कि लोग खुशी-खुशी लेंगे। लेकिन भारत में कार सिर्फ एक सवारी नहीं, एक इज्जत का सवाल है। कोई भी यह नहीं दिखाना चाहता था कि वह सबसे सस्ती कार चला रहा है। अगर टाटा ने उसे "स्मार्ट सिटी कार" या "यंगस्टर्स की पहली पसंद" कह कर री-पोजिशन किया होता, तो आज शायद हर घर के बाहर नैनो खड़ी होती।

जैक ट्राउट हमें एक कड़वा सच बताते हैं। अगर आप अपने ब्रांड की इमेज खुद नहीं बनाएंगे, तो आपका कॉम्पिटिटर आपकी इमेज बिगाड़ देगा। इससे पहले कि कोई और आपको "पुराना" या "बेकार" कहे, आप खुद को "अनुभवी" और "भरोसेमंद" के रूप में री-पोजिशन कर लीजिए। मार्केट में टिके रहने का यही इकलौता तरीका है। या तो आप बदलेंगे, या आप खत्म हो जाएंगे। चॉइस आपकी है।


जैक ट्राउट की यह किताब हमें सिखाती है कि बिजनेस सिर्फ प्रोडक्ट का खेल नहीं है, बल्कि यह दिमागों की जंग है। अगर आप अपने ब्रांड को लेकर सीरियस हैं, तो आज ही बैठिए और सोचिए कि आपके कस्टमर के दिमाग में आपकी क्या इमेज है। क्या आप सादगी के साथ अपना मैसेज दे रहे हैं? क्या आप वक्त के साथ खुद को बदल रहे हैं?

अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप चाहते हैं कि आपका ब्रांड भी आसमान छुए, तो इस पोस्ट को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो स्टार्टअप शुरू करने का सपना देख रहे हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपके पसंदीदा ब्रांड की सबसे अच्छी बात क्या लगती है। आइए मिलकर इंडिया को एक ब्रांडिंग हब बनाते हैं।

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