क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो एक सस्ता सा लोगो बनाकर खुद को ब्रैंड मैनेजर समझ लेते हैं? बधाई हो, आप अपनी कंपनी की कब्र खुद ही खोद रहे हैं। जब आपके कॉम्पिटिटर करोड़ों की ब्रैंड इक्विटी बना रहे हैं, तब आप सिर्फ डिस्काउंट के पीछे भागकर अपना सारा प्रॉफिट और इज्जत दोनों गंवा रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि आप कुछ बहुत बड़ा मिस कर रहे हैं?
डेविड आकेर की यह किताब आपको बताएगी कि असल में ब्रैंडिंग का खेल क्या है। आइए जानते हैं वो 3 बड़े लेसन्स जो आपके बिजनस की शक्ल बदल देंगे।
Lesson : ब्रैंड केवल एक लोगो नहीं है, यह एक वादा है
क्या आपको लगता है कि एक चमकता हुआ लाल रंग का लोगो बना लेने से आप कोका कोला बन जाएंगे। अगर हां, तो दोस्त, आपको किसी अच्छे डॉक्टर या कम से कम इस किताब की सख्त जरूरत है। डेविड आकेर कहते हैं कि ब्रैंडिंग का मतलब सिर्फ पेंट और पॉलिश नहीं है। यह उससे कहीं ज्यादा गहरा है। लोग अक्सर कन्फ्यूज हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि एक बढ़िया ग्राफिक डिजाइनर को पैसे दिए और बन गया ब्रैंड। सच तो यह है कि वह सिर्फ एक नकाब है। असली ब्रैंड तो वह वादा है जो आप अपने कस्टमर से करते हैं और जिसे आप हर हाल में निभाते हैं।
मान लीजिए आप एक ढाबा खोलते हैं। आप उसका नाम रखते हैं "शुद्ध देसी घी का तड़का"। अब अगर आपने वहां डालडा या रिफाइंड तेल इस्तेमाल किया, तो आपका वह चमकता हुआ बोर्ड किसी काम का नहीं। कस्टमर एक बार आएगा, धोखा खाएगा और फिर कभी वापस नहीं मुड़ेगा। यही तो खेल है। आपका ब्रैंड वह भरोसा है जो किसी के दिल में आपके नाम को सुनकर जगता है। अगर एप्पल कल को एक खराब फोन निकाल दे, तो क्या आप उसे सिर्फ उसके लोगो की वजह से खरीदेंगे। शायद एक बार, पर दूसरी बार आप भी कहेंगे कि "भाई, अब इसमें वो बात नहीं रही"।
डेविड आकेर हमें समझाते हैं कि ब्रैंडिंग दरअसल एक "रिलेशनशिप" की तरह है। जैसे आप किसी दोस्त से उम्मीद करते हैं कि वह मुश्किल वक्त में साथ देगा, वैसे ही कस्टमर आपके ब्रैंड से एक खास तरह के एक्सपीरियंस की उम्मीद करता है। अगर आप वह एक्सपीरियंस देने में फेल हो गए, तो समझ लीजिए कि आपकी ब्रैंड इक्विटी जीरो हो गई। आजकल के स्टार्टअप्स को देखिए। वे एड्स पर करोड़ों फूंक देते हैं पर सर्विस के नाम पर ठेंगा दिखाते हैं। यह ब्रैंड बिल्डिंग नहीं, बल्कि सुसाइड है।
असली ब्रैंड वह है जो कस्टमर की लाइफ में कोई वैल्यू ऐड करे। क्या आपका प्रोडक्ट किसी की प्रॉब्लम सॉल्व कर रहा है। क्या वह उसे इस्तेमाल करके खुद को बेहतर महसूस कर रहा है। अगर जवाब "ना" है, तो आप सिर्फ सामान बेच रहे हैं, ब्रैंड नहीं बना रहे। याद रखिए, सामान बेचा जाता है पर ब्रैंड से प्यार किया जाता है। और प्यार कभी भी सिर्फ बाहरी खूबसूरती यानी लोगो को देखकर नहीं होता, वह तो अंदर की क्वालिटी और कमिटमेंट से आता है। तो अगली बार जब आप अपने बिजनस के बारे में सोचें, तो खुद से पूछें कि आपका "प्रॉमिस" क्या है। क्या आप वह डिलीवर कर रहे हैं जो आपने बोला था। अगर नहीं, तो सुधार जाइए वरना मार्केट आपको बहुत जल्दी भूल जाएगा।
Lesson : ब्रैंड आइडेंटिटी ही आपकी असली पर्सनैलिटी है
क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप किसी पार्टी में जाते हैं, तो कुछ लोग दूर से ही चमकते हैं और कुछ बेचारे कोने में खड़े समोसे खा रहे होते हैं। क्यों। क्योंकि पहले वाले की एक पर्सनैलिटी है, एक स्टाइल है। डेविड आकेर कहते हैं कि बिजनस के साथ भी बिलकुल ऐसा ही है। अगर आपके ब्रैंड की कोई खास पहचान या आइडेंटिटी नहीं है, तो आप उस कोने वाले समोसे खाने वाले लड़के की तरह हैं जिसे कोई नोटिस नहीं करता। ब्रैंड आइडेंटिटी का मतलब सिर्फ यह नहीं कि आपका विटिंग कार्ड कैसा दिखता है। इसका मतलब है कि लोग आपके बारे में क्या सोचते और महसूस करते हैं।
जरा सोचिए, अगर रॉयल एनफील्ड एक इंसान होती, तो वह कैसी होती। शायद एक दाढ़ी वाला, रफ एंड टफ बंदा जो एडवेंचर का शौकीन है। और अगर फेयर एंड लवली एक इंसान होती। शायद एक ऐसी लड़की जिसे लगता है कि गोरा होना ही दुनिया की सबसे बड़ी अचीवमेंट है। यही तो ब्रैंड पर्सनैलिटी का जादू है। आकेर साहब समझाते हैं कि अगर आप अपने ब्रैंड को एक इंसान की तरह नहीं देख पा रहे, तो आप कस्टमर से इमोशनल कनेक्शन कभी नहीं बना पाएंगे। आजकल के दौर में लोग सामान नहीं खरीदते, वो उस अहसास को खरीदते हैं जो उस सामान के साथ आता है।
मान लीजिए आपने एक जिम खोला। अब आप एड में दिखा रहे हैं कि "हमारे पास बहुत भारी डंबल हैं"। भाई, डंबल तो कबाड़ी वाले के पास भी भारी होते हैं। लोग आपके पास डंबल उठाने नहीं, बल्कि फिट और कॉन्फिडेंट दिखने के लिए आते हैं। अगर आपके जिम की आइडेंटिटी "बदलाव" या "ताकत" की है, तो लोग खिंचे चले आएंगे। लेकिन अगर आप खुद ही कंफ्यूज हैं कि आप सस्ते हैं या प्रीमियम, आप प्रोफेशनल हैं या देसी, तो कस्टमर भी कंफ्यूज होकर बगल वाले जिम में चला जाएगा।
डेविड आकेर का यह मॉडल हमें सिखाता है कि ब्रैंड आइडेंटिटी के चार हिस्से होते हैं: प्रोडक्ट, ऑर्गेनाइजेशन, पर्सन और सिंबल। जब ये चारों मिल जाते हैं, तब जाकर एक सॉलिड ब्रैंड बनता है। लेकिन हमारे यहाँ क्या होता है। कल एक नया ट्रेंड आया तो हमने अपनी मार्केटिंग बदल दी, परसों कुछ और आया तो लोगो बदल दिया। ऐसे तो आप सिर्फ गिरगिट बन सकते हैं, ब्रैंड नहीं। एक स्टैंड लीजिए। अपनी एक वैल्यू तय कीजिए। चाहे वो 'भरोसा' हो, 'स्पीड' हो या 'लग्जरी' हो। जब तक आप खुद नहीं जानेंगे कि आप कौन हैं, दुनिया आपको कभी नहीं पहचान पाएगी। तो अपनी आइडेंटिटी पर काम कीजिए, वरना भीड़ में खो जाना ही आपकी नियति बन जाएगी।
Lesson : ब्रैंड इक्विटी का निर्माण ही असली खजाना है
क्या आपने कभी सोचा है कि एक सादा सफ़ेद टी शर्ट बाजार में दो सौ रुपये का मिलता है, लेकिन उसी पर अगर एक छोटा सा 'नाइकी' का निशान लग जाए, तो उसकी कीमत दो हजार पार कर जाती है। क्या कपड़ा बदल गया। क्या उसे पहनने से आप सुपरमैन बन गए। बिलकुल नहीं। वो जो अठारह सौ रुपये का फर्क है, वही है 'ब्रैंड इक्विटी'। डेविड आकेर कहते हैं कि बिजनस का असली मकसद सिर्फ आज का सामान बेचना नहीं, बल्कि एक ऐसी वैल्यू खड़ी करना है जिसके लिए लोग खुशी खुशी एक्स्ट्रा पैसे दें। अगर आप सिर्फ डिस्काउंट और सेल के भरोसे जी रहे हैं, तो दोस्त, आप बिजनस नहीं, बल्कि एक चैरिटी चला रहे हैं जिसमें आपका ही नुकसान हो रहा है।
ब्रैंड इक्विटी चार पिलर्स पर टिकी होती है: ब्रैंड अवेयरनेस, परसीव्ड क्वालिटी, ब्रैंड एसोसिएशन और सबसे जरूरी, ब्रैंड लॉयल्टी। मान लीजिए आपने एक नई कोल्ड ड्रिंक लॉन्च की। पहले तो लोगों को पता होना चाहिए कि आप मार्केट में हैं (अवेयरनेस)। फिर उन्हें लगना चाहिए कि आपका टेस्ट और क्वालिटी नंबर वन है (क्वालिटी)। उसके बाद, आपका नाम सुनते ही उनके दिमाग में कोई अच्छी याद या अहसास आना चाहिए (एसोसिएशन)। और अंत में, जब वो दुकान पर जाएं और आपकी ड्रिंक न मिले, तो वो किसी और को खरीदने के बजाय दूसरी दुकान पर जाएं (लॉयल्टी)। अगर आपने यह हासिल कर लिया, तो समझो आपने कुबेर का खजाना पा लिया।
आजकल के 'देसी' स्टार्टअप्स की सबसे बड़ी गलती यही है कि वो सोचते हैं कि फेसबुक पर एड्स चलाकर और 'बाय वन गेट वन फ्री' का ऑफर देकर वो ब्रैंड बन जाएंगे। सरकाज्म की बात तो यह है कि जब आप डिस्काउंट देते हैं, तो आप कस्टमर को लालची बना रहे हैं, वफादार नहीं। जिस दिन डिस्काउंट खत्म, उस दिन आपका कस्टमर भी खत्म। असली ब्रैंड इक्विटी तो तब बनती है जब आप कस्टमर के दिमाग में एक ऐसी जगह बना लेते हैं जिसे कोई और छीन न सके। याद रखिए, मार्केट में कॉम्पिटिटर आपके प्रोडक्ट की नकल कर सकता है, आपकी प्राइस कम कर सकता है, लेकिन आपकी ब्रैंड इक्विटी और लोगों के भरोसे को कभी कॉपी नहीं कर सकता।
डेविड आकेर का यह लेसन हमें सिखाता है कि ब्रैंडिंग एक मैराथन है, कोई सौ मीटर की रेस नहीं। इसमें समय लगता है, पसीना बहता है और बहुत सारा सब्र चाहिए होता है। अगर आप आज बीज बोएंगे, तभी कल उसकी छांव में बैठ पाएंगे। तो बस अब बहुत हुआ 'छोटा सोचने' का खेल। उठिए, अपने बिजनस को एक पहचान दीजिए, एक वादा कीजिए और उसे पूरी ईमानदारी से निभाइए। जब आप ऐसा करेंगे, तो दुनिया आपको सिर्फ एक दुकानदार की तरह नहीं, बल्कि एक 'लीडर' की तरह देखेगी।
तो दोस्तों, 'बिल्डिंग स्ट्रॉन्ग ब्रैंड्स' सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि आपके बिजनस की किस्मत बदलने वाला मैप है। चाहे आप एक छोटा स्टार्टअप चला रहे हों या एक बड़ी कंपनी, ब्रैंडिंग के ये नियम सबके लिए एक समान हैं। अब फैसला आपके हाथ में है: क्या आप भी भीड़ का हिस्सा बनकर खो जाना चाहते हैं, या अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहते हैं।
नीचे कमेंट्स में मुझे जरूर बताएं कि आपके पसंदीदा ब्रैंड का वो कौन सा 'वादा' है जिसकी वजह से आप उसे बार बार खरीदते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना नया बिजनस शुरू करने की सोच रहे हैं। याद रखिए, एक सही फैसला आपकी पूरी जिंदगी बदल सकता है।
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