Best Practices (Hindi)


अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो यह सोचते हैं कि बस प्रोडक्ट बना देने से कस्टमर लाइन लगा देगा तो भाई साहब आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। कस्टमर को ईगो और पुराने रूल्स से फर्क नहीं पड़ता और आप वही घिसे पिटे तरीके अपनाकर अपनी लुटिया डुबो रहे हैं।

आज के इस जबरदस्त आर्टिकल में हम रॉबर्ट हिबेलर की किताब बेस्ट प्रैक्टिसेस से ऐसे ३ धांसू लेसन सीखेंगे जो आपके बिजनेस को कस्टमर का फेवरेट बना देंगे। यकीन मानिए यह लेसन्स आपकी सोच और प्रॉफिट दोनों को पूरी तरह बदल कर रख देंगे।


Lesson : कस्टमर के जूतों में पैर डालना (एम्पैथी)

इंडिया में बिजनेस करने का मतलब अक्सर यह समझा जाता है कि दुकान खोलो, गल्ले पर बैठो और कस्टमर को सामान चेप दो। अगर कस्टमर ने गलती से कोई शिकायत कर दी, तो दुकानदार उसे ऐसे देखता है जैसे उसने उसकी किडनी मांग ली हो। रॉबर्ट हिबेलर अपनी किताब में साफ कहते हैं कि अगर आप कस्टमर की नजर से दुनिया नहीं देख रहे, तो आप बिजनेस नहीं कर रहे, बस टाइम पास कर रहे हैं। इसे कहते हैं एम्पैथी। अब आप कहेंगे कि यह एम्पैथी क्या बला है? सिंपल है, कस्टमर के जूतों में अपना पैर डालकर देखो कि उन्हें कांटा कहां चुभ रहा है।

सोचिए, आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और वेटर आपको ऐसे ट्रीट करता है जैसे आप उधार मांगने आए हों। आप कहते हैं कि भाई दाल में नमक ज्यादा है, और वो पलटकर जवाब देता है कि हमारे यहां तो ऐसे ही बनती है, सबको पसंद आती है। अब आप वहां दोबारा कभी नहीं जाएंगे। यही प्रॉब्लम है। हम अपना ईगो अपने कस्टमर से बड़ा बना लेते हैं। बेस्ट प्रैक्टिसेस हमें सिखाती हैं कि सफल कंपनियां कस्टमर की प्रॉब्लम को अपनी प्रॉब्लम मानती हैं। वे यह नहीं देखतीं कि प्रोडक्ट क्या बेचना है, वे यह देखती हैं कि कस्टमर की लाइफ आसान कैसे बनानी है।

मान लीजिए आपकी एक मोबाइल रिपेयर की दुकान है। एक आदमी आता है जिसका फोन टूट गया है और उसका पूरा बिजनेस उसी फोन पर टिका है। आप उसे कह सकते हैं कि भाई दो दिन लगेंगे, लाइन में लग जाओ। यह हुआ आम तरीका। लेकिन अगर आप एम्पैथी का इस्तेमाल करें, तो आप उसे एक स्पेयर फोन दे सकते हैं ताकि उसका काम न रुके। आपने सिर्फ फोन ठीक नहीं किया, आपने उसका दिल जीत लिया। यही वो छोटी चीजें हैं जो एक लोकल दुकानदार को ब्रांड बना देती हैं।

लोग अक्सर यह गलती करते हैं कि वे डेटा और नंबर्स के पीछे भागते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि हर नंबर के पीछे एक जीता जागता इंसान है जिसकी अपनी भावनाएं हैं। अगर आप कस्टमर की फीलिंग्स को नहीं समझेंगे, तो वो आपके पास सिर्फ एक बार आएगा। लेकिन अगर आपने उसे यह महसूस करा दिया कि आप उसकी परवाह करते हैं, तो वो खुद आपका सेल्समैन बन जाएगा। वह दस लोगों को जाकर बताएगा कि भाई काम कराना है तो वहीं से कराओ।

आजकल के स्टार्टअप्स भी यही गलती कर रहे हैं। वे ऐप तो बना लेते हैं पर कस्टमर सपोर्ट के नाम पर एक बोट बिठा देते हैं जो रटे रटाए जवाब देता है। जब इंसान परेशान होता है तो उसे एक इंसान की जरूरत होती है, रोबोट की नहीं। दुनिया की टॉप कंपनियां जैसे एमेजॉन या डिज्नी इसलिए सफल नहीं हैं कि उनके पास बहुत पैसा है, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने कस्टमर के एक्सपीरियंस को सबसे ऊपर रखा है। वे जानते हैं कि अगर कस्टमर खुश है, तो पैसा तो अपने आप पीछे पीछे आएगा।

तो मोरल ऑफ द स्टोरी यह है कि अपने ऑफिस के एसी रूम से बाहर निकलिए और ग्राउंड पर जाकर देखिए कि आपका कस्टमर असल में किन दिक्कतों का सामना कर रहा है। उसके दुख को समझिए, उसके गुस्से को झेलिए और फिर उसे एक ऐसा सोल्यूशन दीजिए कि उसे लगे कि वाह, बंदा हो तो ऐसा। जब आप कस्टमर की आंखों से अपना बिजनेस देखना शुरू करेंगे, तब आपको वो कमियां दिखेंगी जो आपको आज तक नजर नहीं आ रही थीं। ईगो को साइड में रखिए और एम्पैथी को अपना हथियार बनाइए।


Lesson : प्रोसेस नहीं रिजल्ट्स पर फोकस करना

हमारे देश में एक बहुत पुरानी बीमारी है जिसे कहते हैं सरकारी दफ्तर वाली सोच। मतलब काम हो या न हो, फाइलें पूरी होनी चाहिए। बिजनेस में भी बहुत से लोग यही गलती करते हैं। वे अपने रूल्स, अपनी पॉलिसी और अपनी प्रोसेस के इतने दीवाने हो जाते हैं कि वे भूल जाते हैं कि कस्टमर उनके पास नियम पढ़ने नहीं, बल्कि अपना काम कराने आया है। रॉबर्ट हिबेलर कहते हैं कि बेस्ट प्रैक्टिसेस का मतलब ही यही है कि आप अपनी इंटरनल प्रोसेस को गोली मारें और इस बात पर ध्यान दें कि कस्टमर को एंड रिजल्ट क्या मिल रहा है।

सोचिए, आप एक बैंक में जाते हैं अपना कार्ड ब्लॉक कराने क्योंकि आपका पर्स चोरी हो गया है। आप घबराए हुए हैं। वहां का मैनेजर आपसे कहता है कि सर पहले फॉर्म नंबर ४२० भरिए, फिर काउंटर नंबर १० पर जाकर स्टैम्प लगवाइए और फिर दो दिन बाद आकर मिलिए क्योंकि आज हमारे सिस्टम का सर्वर डाउन है। अब आप मुझे बताइए, क्या आपको उस बैंक के रूल्स में इंटरेस्ट है? बिल्कुल नहीं। आपको बस अपना कार्ड ब्लॉक कराना है ताकि आपका बचा हुआ पैसा सेफ रहे। अगर वो बैंक प्रोसेस की जगह रिजल्ट पर फोकस करता, तो वो एक फोन कॉल या एक क्लिक पर आपका काम कर देता।

कई कंपनियां अपनी प्रोसेस को इतना कॉम्प्लिकेटेड बना देती हैं कि कस्टमर को लगता है कि प्रोडक्ट खरीदना आसान था पर उसे इस्तेमाल करना या ठीक कराना हिमालय चढ़ने जैसा है। मान लीजिए आपने एक नया लैपटॉप खरीदा और वो खराब निकला। अब कंपनी आपसे कह रही है कि पहले ओरिजिनल डब्बा लाओ, फिर बिल की दस फोटोकॉपी दो, फिर हमारे सर्विस सेंटर जाओ जो शहर से ५० किलोमीटर दूर है। भाई साहब, कस्टमर ने पैसे आपको खुश होने के लिए दिए थे, सिर दर्द पालने के लिए नहीं।

सफल कंपनियां जैसे नेटफ्लिक्स या जोमैटो को देखिए। उन्हें पता है कि आपको भूख लगी है या आपको मूवी देखनी है। उन्हें इस बात से मतलब नहीं है कि उनके पीछे का कोडिंग स्ट्रक्चर कितना मुश्किल है। वे आपको बस दो क्लिक में वो दे देते हैं जो आपको चाहिए। इसे कहते हैं फ्रिक्शनलेस एक्सपीरियंस। अगर आपके बिजनेस में कस्टमर को आपसे जुड़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ रही है, तो समझ लीजिए कि आपकी प्रोसेस आपके बिजनेस को खा रही है।

मान लीजिए आप एक जिम के ओनर हैं। आपकी प्रोसेस कहती है कि हर किसी को पहले दिन से ही भारी वजन उठाना है क्योंकि आपका चार्ट यही कहता है। लेकिन आपका कस्टमर एक ५० साल का आदमी है जिसे बस अपनी पीठ का दर्द ठीक करना है। अगर आप उसे अपनी प्रोसेस चिपकाएंगे, तो वो अगले दिन से गायब हो जाएगा। लेकिन अगर आप रिजल्ट पर फोकस करेंगे और उसे आसान एक्सरसाइज देंगे जिससे उसका दर्द कम हो, तो वो आपका लाइफटाइम मेंबर बन जाएगा।

अक्सर बॉस लोग मीटिंग्स में बैठकर घंटों इस बात पर चर्चा करते हैं कि रिपोर्ट का कलर क्या होगा या ईमेल का फॉर्मेट क्या होगा। अरे भाई, इन सब से कस्टमर का पेट नहीं भरता। कस्टमर को बस इस बात से मतलब है कि क्या उसकी प्रॉब्लम सॉल्व हुई? क्या उसे वैल्यू मिली? क्या उसका टाइम बचा? अगर इन तीनों का जवाब हां है, तो आपकी प्रोसेस बेस्ट है। और अगर नहीं, तो आपके सारे मैन्युअल्स और रूल्स रद्दी के भाव बेचने लायक हैं।

इसलिए, अपने बिजनेस के हर स्टेप को गौर से देखिए। हर उस रुकावट को हटा दीजिए जो कस्टमर और उसके सोल्यूशन के बीच में खड़ी है। नियम इंसान के लिए बने हैं, इंसान नियम के लिए नहीं। जब आप प्रोसेस के गुलाम बनना छोड़कर रिजल्ट्स के मास्टर बन जाते हैं, तब आपका बिजनेस रॉकेट की तरह ऊपर जाता है। याद रखिए, कस्टमर आपको आपकी मेहनत के पैसे नहीं देता, वो अपनी सहूलियत के पैसे देता है।


Lesson : डेटा और फीडबैक का सही इस्तेमाल

हम इंडियन्स को अपनी तारीफ सुनना बहुत पसंद है, पर जैसे ही कोई हमारी गलती निकाल दे, हमारा बीपी हाई हो जाता है। बिजनेस में भी यही होता है। जब कस्टमर कहता है कि भाई मजा नहीं आया, तो हम उसे ही जज करने लगते हैं कि इसे तो अकल ही नहीं है। लेकिन रॉबर्ट हिबेलर की किताब बेस्ट प्रैक्टिसेस कहती है कि जो बिजनेस कस्टमर के फीडबैक को कचरा समझता है, वो खुद बहुत जल्द कचरे के ढेर में मिलने वाला है। डेटा और फीडबैक ही वो असली खजाना है जो आपको बताता है कि आपको अगला कदम कहां रखना है।

सोचिए, आप एक बहुत बड़ा शोरूम खोलते हैं, लाखों रुपए इंटीरियर पर खर्च करते हैं, डिस्काउंट के बोर्ड लगाते हैं, पर फिर भी कस्टमर अंदर नहीं आ रहा। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला, किस्मत को दोष दीजिए और मंदिर में जाकर मन्नत मांगिए। दूसरा, उस डेटा को देखिए कि लोग आपकी दुकान के सामने से तो गुजर रहे हैं पर अंदर क्यों नहीं आ रहे? क्या आपका गार्ड डरावना दिखता है? क्या बाहर की लाइटिंग खराब है? जब आप डेटा और फीडबैक का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको वो सच दिखता है जो आपकी आंखें नहीं देख पा रही थीं।

कुछ लोग फीडबैक फॉर्म तो भरवाते हैं पर उन्हें पढ़ता कोई नहीं। रेस्टोरेंट में खाना खाने के बाद वो छोटा सा पर्चा मिलता है न, जिसमें हम लिखते हैं कि पनीर कच्चा था। वेटर उसे लेकर जाता है और सीधा डस्टबिन में डाल देता है। यह फीडबैक का अपमान नहीं, अपने बिजनेस की बर्बादी का न्योता है। दुनिया की बेहतरीन कंपनियां जैसे एप्पल या टोयोटा इसलिए नंबर वन हैं क्योंकि वे अपनी गलतियों को ढूंढने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती हैं। वे चाहती हैं कि कस्टमर उन्हें बताए कि कमी कहां है ताकि वे उसे सुधार सकें।

मान लीजिए आप एक ऑनलाइन कपड़े का स्टोर चलाते हैं। आपको दिख रहा है कि लोग शर्ट कार्ट में तो डाल रहे हैं पर पेमेंट नहीं कर रहे। अगर आप डेटा चेक करेंगे, तो आपको पता चलेगा कि भाई साहब आपका शिपिंग चार्ज शर्ट की कीमत से भी ज्यादा है। अब यह बात आपको सपने में तो नहीं आएगी, इसके लिए आपको डेटा की जरूरत है। जैसे ही आप शिपिंग चार्ज कम करेंगे, आपकी सेल बढ़ जाएगी। इसे कहते हैं डेटा ड्रिवन डिसीजन मेकिंग। बिना डेटा के बिजनेस करना ऐसा है जैसे पट्टी बांधकर हाइवे पर गाड़ी चलाना।

लोग अक्सर फीडबैक से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह उनकी बुराई है। अरे भाई, फीडबैक बुराई नहीं, बल्कि फ्री की सलाह है जो आपका बिजनेस बचा सकती है। अगर दस कस्टमर कह रहे हैं कि आपकी सर्विस स्लो है, तो मान लीजिए कि स्लो है। अपना ईगो पालने से अच्छा है कि अपनी टीम बढ़ा लीजिए। जो कंपनी अपने कस्टमर की आवाज सुनती है, कस्टमर उसे कभी डूबने नहीं देता। वह आपके ब्रांड का रक्षक बन जाता है।

आज के दौर में आपके पास सोशल मीडिया जैसा पावरफुल हथियार है। लोग ट्विटर और इंस्टाग्राम पर अपनी राय रखते हैं। अगर आप वहां सो रहे हैं, तो आप बहुत बड़ा मौका गंवा रहे हैं। डेटा का मतलब सिर्फ नंबर्स नहीं, बल्कि वो भावनाएं हैं जो आपके ब्रांड के बारे में लोग महसूस कर रहे हैं। जिस दिन आपने डेटा को पढ़ना और फीडबैक को गले लगाना सीख लिया, उस दिन से आपकी ग्रोथ को दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक पाएगी। याद रखिए, सच कड़वा जरूर होता है पर इलाज उसी से होता है।


तो दोस्तों, रॉबर्ट हिबेलर की यह किताब हमें सिर्फ बिजनेस करना नहीं, बल्कि लोगों का दिल जीतना सिखाती है। चाहे वो एम्पैथी हो, रिजल्ट पर फोकस करना हो या फीडबैक से सीखना, सब कुछ एक ही तरफ इशारा करता है कि कस्टमर ही आपका असली बॉस है। अब समय आ गया है कि आप अपने बिजनेस को पुराने और घिसे पिटे तरीकों से बाहर निकालें और इन मॉडर्न बेस्ट प्रैक्टिसेस को अपनाएं।

आज ही बैठकर सोचिए कि आपके बिजनेस में वो कौन सा एक कांटा है जो आपके कस्टमर को चुभ रहा है। उसे निकाल फेंकिए और देखिए कि कैसे आपकी सफलता की कहानी लिखी जाती है। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी लाइफ और बिजनेस में बदलाव लाना चाहते हैं, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना स्टार्टअप शुरू करने का सपना देख रहे हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि इन ३ लेसन्स में से आपको सबसे ज्यादा कौन सा पसंद आया? चलिए साथ मिलकर ग्रो करते हैं।

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