क्या आप अभी भी वही घिसी पिटी मार्केटिंग करके अपना पैसा और कस्टमर दोनों नाली में बहा रहे हैं? अगर आपको लगता है कि सिर्फ डिस्काउंट देने से सेल्स बढ़ेगी तो मुबारक हो आप बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। कस्टमर के इमोशन्स को इग्नोर करना आपके बिजनेस की सबसे बड़ी नाकामी है।
लेकिन फिकर मत कीजिए क्योंकि आज हम बर्नड श्मिट की किताब से मार्केटिंग के वह तीन गहरे राज खोलेंगे जो आपके ब्रांड को एक इमोशन बना देंगे।
Lesson : सेंसरी मार्केटिंग — कस्टमर के सेंस से खेलो, दिमाग से नहीं
आजकल की मार्केटिंग का हाल वैसा ही है जैसे कोई बिन बुलाए मेहमान आपके घर आकर अपनी तारीफों के पुल बांधने लगे। आप बोर होते हैं और उसे भगा देते हैं। अगर आप भी अपने कस्टमर को सिर्फ बोरिंग फीचर्स और डिस्काउंट के नंबर दिखा रहे हैं, तो समझ लीजिए कि आप अपनी दुकान बढ़ाने नहीं बल्कि बंद करने की तैयारी कर रहे हैं। बर्नड श्मिट कहते हैं कि इंसान सिर्फ दिमाग से नहीं बल्कि अपनी पांचों इन्द्रियों यानी फाइव सेंस से फैसले लेता है। इसे कहते हैं सेंस मार्केटिंग।
सोचिए आप एक मॉल में घूम रहे हैं और अचानक ताजी कॉफी की खुशबू आती है। आपके कदम अपने आप उस कैफे की तरफ बढ़ जाते हैं। क्या आपने उस वक्त अपना बजट चेक किया? नहीं। क्या आपने कॉफी के फायदे गूगल किए? बिलकुल नहीं। बस उस खुशबू ने आपके दिमाग के एक कोने में बटन दबा दिया। यही तो जादू है। अगर आपका ब्रांड सिर्फ आंखों को भा रहा है लेकिन कानों को चुभ रहा है, या फिर दिखने में अच्छा है पर छूने में सस्ता लग रहा है, तो आप गेम हार चुके हैं।
मान लीजिए आप एक नई गाड़ी खरीदने गए। सेल्समैन आपको इंजन की सीसी और माइलेज के बोरिंग आंकड़े सुना रहा है। आप उबासी ले रहे हैं। लेकिन जैसे ही आप गाड़ी के अंदर बैठते हैं और वह नई लेदर सीट की खुशबू आपके नथुनों तक पहुंचती है, आपका मन कहता है कि भाई यही चाहिए। वह खुशबू आपको अमीर होने का अहसास दिलाती है। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह सोची समझी स्ट्रेटेजी है। बड़ी कंपनियां अपनी गाड़ियों में खास तरह के परफ्यूम छिड़कती हैं ताकि आपको वह प्रीमियम फील आए।
अगर आप एक छोटा बिजनेस चला रहे हैं, तो सोचिए कि आपका कस्टमर आपके ऑफिस या दुकान में कदम रखते ही क्या देखता है? क्या वहां वही पुरानी धूल जमी फाइलें हैं या कुछ ऐसा जो उसे सुकून दे? क्या वहां बजने वाला म्यूजिक उसे रिलैक्स करता है या सिरदर्द देता है? एप्पल के स्टोर्स को देखिए। वहां सब कुछ इतना साफ और मिनिमल होता है कि आपको लगता है कि आप भविष्य में आ गए हैं। वे आपको प्रोडक्ट बेचने से पहले एक विजुअल एक्सपीरियंस बेचते हैं।
याद रखिए, लोग वह भूल जाएंगे जो आपने उनसे कहा था, लेकिन वे कभी नहीं भूलेंगे कि आपने उन्हें कैसा महसूस कराया। अगर आप उनके सेंस को एक्टिवेट नहीं कर सकते, तो आपका ब्रांड उनके लिए सिर्फ एक और रद्दी विज्ञापन बनकर रह जाएगा। इसलिए अपने ब्रांड को एक चेहरा, एक आवाज और एक खुशबू दीजिए। वरना आप सिर्फ भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे और कस्टमर आपको इग्नोर मारकर आगे बढ़ जाएगा।
Lesson : फील और थिंक — कस्टमर के इमोशन्स और लॉजिक के साथ खेलें
अगर आपको लगता है कि आपका कस्टमर एक रोबोट है जो सिर्फ फीचर्स और स्पेसिफिकेशन देखकर सामान खरीदता है, तो दोस्त आप गलत दुनिया में जी रहे हैं। बर्नड श्मिट कहते हैं कि लोग चीजें अपनी जरूरतों के लिए नहीं बल्कि अपनी अधूरी हसरतों और जज्बात यानी इमोशन्स के लिए खरीदते हैं। इसे कहते हैं फील मार्केटिंग। अगर आपका ब्रांड किसी के चेहरे पर मुस्कान या आंखों में आंसू नहीं ला सकता, तो समझ लीजिए कि वह ब्रांड नहीं बल्कि बस एक सामान है जो धूल फांक रहा है।
सोचिए एक पुरानी एडवरटाइजमेंट की जिसमें एक बूढ़ा बाप अपने बेटे का इंतजार कर रहा है और बेटा घर आते ही उसे गले लगा लेता है। वहां किसी प्रोडक्ट की बात नहीं हो रही थी, वहां बात हो रही थी जुड़ाव की। आप उस एड को देखकर रो देते हैं और अनजाने में उस कंपनी के फैन बन जाते हैं। इसे कहते हैं दिल पर वार करना। लेकिन सिर्फ इमोशन से काम नहीं चलता। आपको कस्टमर को सोचने पर भी मजबूर करना होगा, जिसे थिंक मार्केटिंग कहते हैं। उसे लगना चाहिए कि आपका ब्रांड उसे कुछ नया सिखा रहा है या उसकी लाइफ की कोई बड़ी प्रॉब्लम सॉल्व कर रहा है।
मान लीजिए आप एक जिम के मालिक हैं। आप पोस्टर लगाते हैं कि हमारे पास सबसे बढ़िया डंबल और मशीनें हैं। कोई नहीं आएगा। अब इसकी जगह आप एक पोस्टर लगाइए जिसमें एक मोटा आदमी शीशे के सामने खड़ा है और नीचे लिखा है कि क्या आप अपनी पुरानी जींस में फिट होना चाहते हैं? यह हुआ फील मार्केटिंग। अब उसी के नीचे लिख दीजिए कि हमारी ट्रेनिंग से आप 30 दिन में 5 किलो वजन कम कर सकते हैं वरना पैसे वापस। यह हुआ थिंक मार्केटिंग। आपने उसके दिल को छुआ और दिमाग को लॉजिक दे दिया।
भारतीय शादियों को ही ले लीजिए। वहां कैटरिंग वाला सिर्फ खाना नहीं बेचता, वह इज्जत बेचता है। अगर पनीर की सब्जी कम पड़ गई तो मोहल्ले वाले क्या कहेंगे? यह डर और इज्जत ही है जो उसे सबसे महंगा पैकेज खरीदने पर मजबूर करती है। कंपनियां इसी डर और खुशी का फायदा उठाती हैं। अगर आप अपने कस्टमर को यह यकीन दिला दें कि आपके बिना उसकी लाइफ अधूरी है या वह पीछे छूट जाएगा, तो वह खुद चलकर आपके पास आएगा।
लेकिन याद रखिए, अगर आप सिर्फ इमोशनल ड्रामा करेंगे और प्रोडक्ट में दम नहीं होगा, तो कस्टमर आपको एक ही बार में पहचान लेगा। आपको उसे एक पहेली की तरह एंगेज करना होगा। उसे लगना चाहिए कि वह आपके ब्रांड के साथ जुड़कर खुद को बेहतर बना रहा है। उसे चैलेंज दीजिए, उसे कुछ हटकर सोचने के लिए उकसाइए। जब कोई इंसान आपके ब्रांड के बारे में सोचना शुरू कर देता है, तो वह आपका कस्टमर नहीं बल्कि आपका छोटा भाई या दोस्त बन जाता है। और दोस्त कभी साथ नहीं छोड़ते।
Lesson : रिलेट और एक्ट — कस्टमर को अपना बना लो और एक्शन लेने पर मजबूर कर दो
अगर आपने कस्टमर को खुश कर दिया और उसे सोचने पर मजबूर भी कर दिया, लेकिन वह आपके साथ जुड़ा नहीं, तो समझ लीजिए कि आपने एक तरफा प्यार किया है जिसका कोई अंजाम नहीं। बर्नड श्मिट कहते हैं कि असली मार्केटिंग वह है जहाँ कस्टमर खुद को आपके ब्रांड का हिस्सा समझे। इसे कहते हैं रिलेट मार्केटिंग। जब कोई इंसान कहता है कि मैं तो बस इसी कंपनी का फोन चलाता हूँ, तो वह सिर्फ एक गैजेट नहीं बल्कि अपनी पहचान दिखा रहा होता है। वह उस ब्रांड की कम्युनिटी से खुद को रिलेट कर रहा है।
सोचिए उस बाइक वाले ग्रुप की जो संडे को सुबह 5 बजे निकल पड़ते हैं। क्या वे सिर्फ पेट्रोल फूंकने जाते हैं? नहीं। वे एक पहचान, एक कल्चर और एक साथ होने के अहसास के लिए जाते हैं। अगर आपका ब्रांड किसी को यह महसूस नहीं करा सकता कि वह एक खास क्लब का मेंबर है, तो आप बस एक और दुकान चला रहे हैं। आपको अपने कस्टमर को एक लाइफस्टाइल देनी होगी। उसे लगना चाहिए कि आपके ब्रांड को इस्तेमाल करके वह कूल बन गया है या वह समाज के एक बड़े मकसद से जुड़ गया है।
अब बात करते हैं एक्ट मार्केटिंग की। यह वह जादू है जो कस्टमर से असलियत में कुछ करवाता है। चाहे वह सेल्फी खींचकर सोशल मीडिया पर डालना हो या आपके स्टोर पर आकर किसी एक्टिविटी में हिस्सा लेना। जैसे मान लीजिए एक जूतों की दुकान है। अगर वे सिर्फ जूते बेचें तो बोरिंग है। लेकिन अगर वे दुकान के बाहर एक छोटा सा ट्रैक बना दें और कहें कि यहाँ दौड़कर देखिए कि ये जूते आपको कितनी रफ्तार देते हैं, तो यह हुआ एक्ट मार्केटिंग। कस्टमर ने उसे फील किया और एक्शन लिया। अब वह जूता नहीं बल्कि एक एक्सपीरियंस खरीद रहा है।
आपने देखा होगा कि कुछ मसाले वाले एड्स में दिखाते हैं कि बहू ने वह मसाला डाला और सास खुश हो गई। यहाँ वे सिर्फ मसाला नहीं बेच रहे, वे फैमिली की शांति और इज्जत बेच रहे हैं। हर बहू खुद को उस सिचुएशन से रिलेट करती है और तुरंत वह पैकेट खरीद लेती है। यह है असली खेल। अगर आप अपने कस्टमर की डेली लाइफ की मुश्किलों या खुशियों से खुद को जोड़ नहीं पाए, तो आप उसके लिए सिर्फ एक अजनबी बने रहेंगे।
याद रखिए कि मार्केटिंग अब सिर्फ सामान बेचने का जरिया नहीं है। यह यादें बनाने और रिश्तों को निभाने का तरीका है। अगर आप अपने कस्टमर के सेंस को जगाएंगे, उसके दिल को छुएंगे, उसके दिमाग को चैलेंज करेंगे और उसे एक कम्युनिटी का हिस्सा बनाएंगे, तो वह कभी आपको छोड़कर नहीं जाएगा। वह आपकी पब्लिसिटी खुद करेगा और आपको एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। तो अब फैसला आपका है: क्या आप बस एक सेल्समैन बनकर रहना चाहते हैं या एक ऐसा ब्रांड बनना चाहते हैं जो लोगों की रूह में बस जाए?
उठिए और अपने ब्रांड को एक इमोशन बनाइए क्योंकि दुनिया अब सामान नहीं, एक्सपीरियंस मांग रही है।
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