अगर आपको लगता है कि आपकी कंपनी या टीम पुराने ढर्रे पर चलकर भी दुनिया जीत लेगी तो बधाई हो आप गहरी नींद में हैं। जब तक आप बदलाव की आग नहीं जलाएंगे तब तक आपकी तरक्की का इंजन बस धुआं ही छोड़ेगा। जॉन कोटर की यह किताब आपको बताएगी कि कैसे आप अपनी सुस्ती छोड़कर असली लीडर बन सकते हैं। चलिए समझते हैं इस किताब के ३ सबसे पावरफुल लेसन्स।
Lesson : अर्जेंसी की आग जलाना
अगर आप सोच रहे हैं कि आपकी टीम या बिजनेस में सब कुछ चकाचक चल रहा है और कुछ बदलने की जरूरत नहीं है तो यकीन मानिए आप उस मेंढक की तरह हैं जो धीरे धीरे गर्म हो रहे पानी में मजे से तैर रहा है। आपको पता भी नहीं चलेगा और कब आपका सूप बन जाएगा। जॉन कोटर अपनी किताब लीडिंग चेंज में सबसे पहली बात यही कहते हैं कि भाई अगर बदलाव लाना है तो सबसे पहले लोगों के पीछे आग लगानी पड़ेगी। इसे वो कहते हैं क्रिएट अर्जेंसी।
असली दिक्कत यह है कि हम इंडियन्स को स्टेटस क्वो यानी जैसा चल रहा है वैसा चलने दो वाली बीमारी बहुत पसंद है। हम सोचते हैं कि जब तक काम चल रहा है तब तक माथापच्ची क्यों करना। लेकिन कोटर साहब कहते हैं कि अगर ७५ परसेंट मैनेजमेंट को यह नहीं लगता कि अब बदलना मौत और जिंदगी का सवाल है तो समझो आपका चेंज प्लान शुरू होने से पहले ही फेल हो गया।
मान लीजिए आपकी एक पुरानी किराने की दुकान है जहाँ आप अभी भी बहीखाते में हिसाब लिखते हैं। आपके बगल में एक नया सुपरमार्ट खुल गया है जो होम डिलीवरी भी देता है और डिजिटल पेमेंट भी लेता है। अब आप अपनी टीम से कह रहे हैं कि चलो हम भी ऐप बनवाते हैं। आपकी टीम कहेगी अरे लाला जी क्या जरूरत है। बीस साल से दुकान चल रही है। सब फालतू के खर्चे हैं। यहाँ कमी विजन की नहीं है बल्कि अर्जेंसी की है। जब तक आप उन्हें यह नहीं दिखाएंगे कि अगले ६ महीने में आपकी दुकान के शटर गिर सकते हैं तब तक कोई भी अपनी कुर्सी से नहीं हिलेगा।
लोग अक्सर कंफर्ट जोन में सो जाते हैं। उन्हें लगता है कि पिछला साल अच्छा था तो अगला भी होगा। लेकिन कोटर कहते हैं कि लीडर का काम है उस कंफर्ट जोन को लात मारकर बाहर निकालना। आपको वो डेटा दिखाना पड़ेगा जो डराने वाला हो। आपको वो कस्टमर फीडबैक सुनाना पड़ेगा जो कड़वा हो। आपको मार्केट की वो हकीकत दिखानी पड़ेगी जो आपकी नींद उड़ा दे।
सर्कस के शेर और जंगल के शेर में यही फर्क है। सर्कस के शेर को पता है कि कोड़ा पड़ेगा तो खाना मिलेगा। वो रूटीन का गुलाम है। लेकिन जंगल का शेर हमेशा अलर्ट रहता है क्योंकि उसे पता है कि अगर आज उसने अपनी रणनीति नहीं बदली तो कल वो भूखा मर सकता है। बिजनेस और करियर में भी यही लॉजिक काम करता है। अगर आप खुद को और अपनी टीम को यह महसूस नहीं करा सकते कि अभी नहीं तो कभी नहीं तो आप बदलाव की रेस में सबसे पीछे खड़े मिलेंगे।
अगला कदम यह है कि इस आग को बुझने न दिया जाए। एक बार जब लोगों को समझ आ जाए कि नाव डूब रही है तब वो आपकी बात सुनने को तैयार होंगे। लेकिन सिर्फ डर दिखाना काफी नहीं है। डर के साथ साथ एक ऐसा रास्ता भी दिखाना है जो उन्हें सुरक्षित किनारे तक ले जाए। यह रास्ता तब तक नहीं खुलेगा जब तक आपके पास एक ऐसी टीम न हो जो इस मुश्किल वक्त में आपका हाथ थामे रहे।
Lesson : एक मजबूत और असरदार टीम बनाना
अब मान लीजिए आपने अपनी टीम के पीछे अर्जेंसी की आग तो लगा दी। सब भाग रहे हैं। लेकिन अगर सब अलग अलग दिशा में भागेंगे तो क्या होगा। सिवाय अफरातफरी के कुछ हाथ नहीं लगेगा। जॉन कोटर कहते हैं कि अकेले चने से भाड़ नहीं फूटता। अगर आपको दुनिया बदलनी है या कम से कम अपनी कंपनी का वर्क कल्चर बदलना है तो आपको एक ऐसी गाइडिंग कोएलिशन यानी एक मजबूत टीम चाहिए जो आपके विजन को हकीकत में बदल सके।
अक्सर बिजनेस में क्या होता है। बॉस को लगता है कि उसने आर्डर दे दिया तो बस काम हो गया। लेकिन भाई साहब यह इंडियन शादी नहीं है जहाँ फूफा जी नाराज होकर बैठ जाएंगे और काम चल जाएगा। यहाँ आपको ऐसे लोग चाहिए जो सिर्फ पोजीशन से बड़े न हों बल्कि उनका प्रभाव भी जबरदस्त हो। आपको अपनी टीम में वो खिलाड़ी चाहिए जिनके पास पावर हो एक्सपर्टाइज हो और सबसे बड़ी बात उनकी साख यानी क्रेडिबिलिटी हो।
इसको एक मजेदार तरीके से समझते हैं। सोचिए आप अपनी कॉलोनी में कचरा साफ करने का अभियान शुरू करना चाहते हैं। अगर आप अकेले झाड़ू लेकर निकलेंगे तो लोग आपको पागल समझेंगे। लेकिन अगर आप अपने साथ कॉलोनी के प्रेसिडेंट वहां के सबसे मशहूर डॉक्टर और उस लड़के को ले लें जिसे सब पसंद करते हैं तो नजारा बदल जाएगा। अब जब आप झाड़ू उठाएंगे तो पूरी कॉलोनी आपके पीछे होगी। यही है गाइडिंग कोएलिशन का असली जादू।
कोटर साहब साफ कहते हैं कि इस टीम में सिर्फ मैनेजर नहीं होने चाहिए। आपको लीडर्स की जरूरत है। मैनेजर तो बस चीजों को मेंटेन करता है लेकिन लीडर वो है जो नई राह बनाता है। अगर आपकी टीम में ऐसे लोग हैं जो सिर्फ यस सर बोलना जानते हैं तो समझ लीजिए कि आपका बदलाव वाला जहाज बीच समंदर में ही डूबने वाला है। आपको ऐसे लोग चाहिए जो आपसे सवाल कर सकें जो मुश्किल वक्त में आपके साथ खड़े हो सकें और जो बाकी लोगों को मोटिवेट कर सकें।
अक्सर लोग क्या गलती करते हैं। वो सिर्फ डिपार्टमेंट हेड को टीम में ले लेते हैं। लेकिन कोटर कहते हैं कि पद से ज्यादा प्रभाव मायने रखता है। हो सकता है कि आपकी कंपनी का सबसे जूनियर सेल्समैन बाकी पूरी टीम पर ज्यादा असर डालता हो। उसे अपनी टीम में शामिल कीजिए। जब लोग देखेंगे कि उनके जैसा ही कोई इस बदलाव का हिस्सा है तो वो भी हाथ बढ़ाने को तैयार हो जाएंगे।
इस टीम का एक और बड़ा काम होता है और वो है ट्रस्ट यानी भरोसा बनाना। अगर आपकी गाइडिंग कोएलिशन के बीच में ही आपस में लड़ाई चल रही है तो बाहर वाले आप पर कभी यकीन नहीं करेंगे। यह टीम एक ऐसी चट्टान की तरह होनी चाहिए जिस पर पूरा ऑर्गेनाइजेशन भरोसा कर सके। जब लहरें तेज होंगी तब यही टीम सबको डूबने से बचाएगी।
लेकिन याद रहे यह टीम बनाना सिर्फ शुरुआत है। असली खेल तो तब शुरू होता है जब यह टीम मैदान में उतरती है। अब इस टीम को यह दिखाना होगा कि छोटे कदम उठाकर भी बड़ी जीत हासिल की जा सकती है। क्योंकि अगर लोगों को जल्दी कोई रिजल्ट नहीं दिखेगा तो वो फिर से पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगे।
Lesson : शॉर्ट टर्म जीत का जश्न मनाना
अब आपने आग लगा दी और एक दमदार टीम भी बना ली। लेकिन भाई साहब बड़ा बदलाव लाना कोई मैगी बनाना नहीं है जो दो मिनट में तैयार हो जाए। बड़े बदलाव में महीनों और सालों लगते हैं। और यही वह मोड़ है जहाँ आधे से ज्यादा लोग दम तोड़ देते हैं। जॉन कोटर कहते हैं कि अगर आप अपनी टीम को सिर्फ २ साल बाद होने वाले बड़े मुनाफे के सपने दिखाएंगे तो वो बीच रास्ते में ही सो जाएंगे। आपको उन्हें बीच बीच में छोटी छोटी जीत का स्वाद चखाना पड़ेगा। इसे कोटर साहब कहते हैं सिस्टेमैटिकली प्लानिंग फॉर शॉर्ट टर्म विन्स।
सोचिए आप अपना वजन २० किलो कम करना चाहते हैं। अगर आप सिर्फ उस दिन का इंतजार करेंगे जब आप स्लिम दिखेंगे तो शायद आप १० दिन में ही जिम छोड़कर समोसे खाने लगेंगे। लेकिन अगर आप खुद को हर हफ्ते २ किलो वजन कम करने पर शाबाशी देंगे या एक नई टीशर्ट गिफ्ट करेंगे तो आपका जोश बना रहेगा। बिजनेस में भी यही लॉजिक फिट बैठता है। बदलाव के लंबे सफर में छोटे छोटे पड़ाव तय करना बहुत जरूरी है।
अक्सर लोग क्या गलती करते हैं। वो सोचते हैं कि जब तक पूरा प्रोजेक्ट खत्म नहीं होगा तब तक जश्न कैसा। लेकिन कोटर कहते हैं कि यह बहुत बड़ी बेवकूफी है। आपको ऐसे टारगेट सेट करने चाहिए जो ६ से १२ महीने के अंदर पूरे हो सकें। जब आपकी टीम देखेगी कि उनकी मेहनत से खर्च ५ परसेंट कम हो गया है या कस्टमर की शिकायतें कम हो गई हैं तो उनका भरोसा बढ़ेगा। वो सोचेंगे कि हाँ भाई साहब जो हम कर रहे हैं उसका कुछ तो फायदा हो रहा है।
मान लीजिए आपने अपनी कंपनी में नया सॉफ्टवेयर लागू किया है। अब पूरी टीम परेशान है क्योंकि उन्हें पुरानी आदतें छोड़नी पड़ रही हैं। ऐसे में अगर आप उस पहले डिपार्टमेंट को रिवॉर्ड दें जिसने सॉफ्टवेयर का १०० परसेंट सही इस्तेमाल शुरू किया है तो बाकी डिपार्टमेंट के पेट में भी चूहे दौड़ेंगे। वो भी चाहेंगे कि उन्हें भी वाहवाही मिले। यही है इंसानी फितरत।
शॉर्ट टर्म जीत के तीन बड़े फायदे होते हैं। पहला यह कि इससे उन लोगों का मुंह बंद हो जाता है जो हर बात में कमी निकालते हैं। दूसरा यह कि इससे आपकी गाइडिंग कोएलिशन यानी आपकी टीम को यह सबूत मिल जाता है कि उनकी मेहनत रंग ला रही है। और तीसरा यह कि इससे बदलाव की गाड़ी को वो धक्का मिलता है जो उसे मंजिल तक पहुँचाने के लिए जरूरी है।
लेकिन एक बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। कोटर चेतावनी देते हैं कि छोटी जीत को बड़ी जीत समझकर बैठ मत जाना। अक्सर लोग एक छोटी सफलता मिलते ही ढीले पड़ जाते हैं और सोचते हैं कि बस अब तो हो गया। यह सबसे खतरनाक मोड़ है। आपको उस छोटी जीत को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना है ताकि आप अगली और बड़ी जीत तक पहुँच सकें। बदलाव की प्रक्रिया तब तक खत्म नहीं होती जब तक वह आपकी कंपनी के कल्चर का हिस्सा न बन जाए।
जॉन कोटर की लीडिंग चेंज हमें सिखाती है कि बदलाव कोई इत्तफाक नहीं है बल्कि एक सोची समझी रणनीति है। अगर आप आज नहीं बदलेंगे तो कल आप इतिहास बन जाएंगे। अपनी टीम में अर्जेंसी लाइए एक मजबूत लीडरशिप ग्रुप बनाइए और हर छोटी जीत का जश्न मनाइए। याद रखिए दुनिया में सिर्फ एक ही चीज परमानेंट है और वो है बदलाव। तो क्या आप अपनी अगली बड़ी जीत के लिए तैयार हैं या अभी भी पुराने ढर्रे पर बैठकर डूबती नाव का मजा ले रहे हैं। फैसला आपका है।
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