अगर आपको लगता है कि सिर्फ गधों की तरह मेहनत करने से आप अगले बिल गेट्स बन जाएंगे, तो मुबारक हो, आप अपनी लाइफ बर्बाद करने की सही राह पर हैं। बिना मैनेजमेंट के काम करना ऐसा है जैसे बिना पेट्रोल की गाड़ी को धक्का मारना। अगर पीटर ड्रकर के ये सीक्रेट्स नहीं पता, तो बस स्ट्रगल ही करते रह जाओगे।
आज के इस ब्लॉग में हम पीटर ड्रकर की साठ सालों की रिसर्च का निचोड़ देखेंगे। हम उन तीन पावरफुल लेसन्स के बारे में बात करेंगे जो आपके करियर और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल कर रख देंगे।
Lesson : मैनेजिंग वनसेल्फ - खुद के बॉस खुद बनो
बॉस बनना सबको पसंद है, लेकिन जब बात खुद को मैनेज करने की आती है, तो हम सब फेल हो जाते हैं। पीटर ड्रकर कहते हैं कि इतिहास में पहली बार आज हमारे पास चॉइस है। पहले क्या होता था? मोची का बेटा मोची बनता था और किसान का बेटा किसान। किसी को दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं थी। पर आज आपकी तरक्की आपके हाथ में है। और यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम भी है। क्योंकि जब आपको खुद को मैनेज करना नहीं आता, तो आप लाइफ की रेस में पीछे छूट जाते हैं।
क्या आपको पता है कि आपकी असली ताकत क्या है? ज्यादातर लोग अपनी कमियों को सुधारने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं। अगर आपकी मैथ कमजोर है, तो आप पागलों की तरह ट्यूशन पढ़ेंगे। लेकिन ड्रकर कहते हैं कि यह बेवकूफी है। अपनी कमियों को ठीक करके आप सिर्फ औसत बन सकते हैं। लेकिन अगर आप अपनी स्ट्रेंथ पर काम करेंगे, तो आप स्टार बन जाएंगे। दुनिया में कोई भी इंसान अपनी कमजोरी के दम पर परफॉर्म नहीं कर सकता। सचिन तेंदुलकर अगर सिंगर बनने की कोशिश करते, तो शायद आज हम उन्हें जानते भी नहीं। उन्होंने अपनी स्ट्रेंथ यानी बैटिंग को पहचाना और इतिहास रच दिया।
खुद को मैनेज करने का दूसरा बड़ा हिस्सा है यह समझना कि आप काम कैसे करते हैं। क्या आप एक 'रीडर' हैं जो पढ़कर चीजों को समझते हैं? या आप एक 'लिसनर' हैं जो सुनकर बेहतर सीखते हैं? हमारे देश में कई ऐसे मैनेजर्स हैं जो मीटिंग में फाइल्स पढ़ते ही नहीं, बस सुनना चाहते हैं। अगर आप उन्हें लंबी रिपोर्ट देंगे, तो वो बोर हो जाएंगे। वहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें जब तक लिखित में कुछ न मिले, उन्हें समझ ही नहीं आता। अगर आप खुद को नहीं जानते, तो आप गलत तरीके से काम करेंगे और फ्रस्ट्रेट हो जाएंगे। यह वैसा ही है जैसे आप मछली को पेड़ पर चढ़ने के लिए मजबूर कर रहे हों। मछली का काम तैरना है, चढ़ना नहीं।
इसके अलावा, आपको अपनी वैल्यूज का पता होना चाहिए। क्या आप ऐसे बिजनेस में काम कर सकते हैं जो सिर्फ पैसे के लिए लोगों को बेवकूफ बनाता हो? अगर आपकी वैल्यूज आपके काम से मैच नहीं करतीं, तो आप कभी भी दिल से काम नहीं कर पाएंगे। रोज सुबह उठकर ऑफिस जाना आपको सजा जैसा लगेगा। ड्रकर का सीधा सा फंडा है कि जहां आपकी परफॉरमेंस और आपकी वैल्यूज मिलती हैं, वही आपकी सही जगह है। खुद को मैनेज करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बस अपनी मिरर इमेज को पहचानना है।
जरा सोचिए, आप एक ऐसे स्टार्टअप में काम कर रहे हैं जहां रोज नए आइडियाज चाहिए, लेकिन आपको शांति में बैठकर डेटा एनालिसिस करना पसंद है। यहाँ आप कितना भी जोर लगा लें, आप हमेशा स्ट्रेस में ही रहेंगे। खुद को मैनेज करने का मतलब है यह जानना कि आप कहां फिट होते हैं। जब आप अपनी स्ट्रेंथ, काम करने का तरीका और अपनी वैल्यूज को समझ लेते हैं, तब आप एक ऑर्डिनरी वर्कर से एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी लीडर की तरफ बढ़ते हैं। और यकीन मानिए, जो खुद को मैनेज नहीं कर सकता, वो किसी कंपनी या टीम को क्या ही खाक मैनेज करेगा। इसलिए दूसरों को इंस्ट्रक्शन देना बंद कीजिए और पहले खुद के सबसे सख्त बॉस बनिए।
Lesson : फोकस ऑन कंट्रीब्यूशन - काम नहीं, रिजल्ट दिखाओ
ज्यादातर लोग ऑफिस में सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि वो शाम को घर आकर कह सकें कि भाई आज बहुत काम था। लेकिन ड्रकर साहब आपसे एक कड़वा सवाल पूछते हैं, क्या आपके उस काम से कंपनी को या दुनिया को कोई फायदा हुआ? हमारे देश में एक बहुत बड़ी बीमारी है, जिसे हम 'बिजी रहने का दिखावा' कहते हैं। लोग फाइलों के ढेर लगा लेंगे, ईमेल्स का जवाब देंगे, और मीटिंग्स में चाय पिएंगे, पर आखिर में नतीजा जीरो होता है। यह वैसा ही है जैसे आप जिम जाकर सिर्फ सेल्फी खिंचवाएं और उम्मीद करें कि सिक्स पैक बन जाएंगे। भाई, पसीना बहाना पड़ता है और सही एक्सरसाइज करनी पड़ती है।
कंट्रीब्यूशन का मतलब है यह पूछना कि मैं ऐसा क्या कर सकता हूं जिससे मेरी संस्था का आउटपुट बदल जाए? एक एवरेज एम्प्लॉई हमेशा सोचता है कि मुझे क्या काम दिया गया है। लेकिन एक इफेक्टिव मैनेजर सोचता है कि मुझसे क्या उम्मीद की जा रही है। अगर आप एक सेल्समेन हैं और आप दिन भर में पचास कॉल करते हैं, तो यह आपका काम है। लेकिन अगर आप उन कॉल्स से कंपनी का रेवेन्यू दस परसेंट बढ़ा देते हैं, तो यह आपका कंट्रीब्यूशन है। दुनिया को आपके हार्ड वर्क से कोई मतलब नहीं है, दुनिया को सिर्फ रिजल्ट्स से प्यार है। सुनने में बुरा लग सकता है, पर यही सच है।
ड्रकर एक बहुत मजेदार उदाहरण देते हैं। एक बार तीन लोग पत्थर तोड़ रहे थे। किसी ने पहले से पूछा कि तुम क्या कर रहे हो? उसने कहा, मैं अपनी रोजी रोटी कमा रहा हूं। दूसरे से पूछा, तो उसने कहा, मैं पत्थर तोड़ने का सबसे अच्छा काम कर रहा हूं। लेकिन जब तीसरे से पूछा, तो उसने चमकती आंखों से कहा, मैं एक विशाल मंदिर बना रहा हूं। यहाँ तीसरा आदमी असली कंट्रीब्यूटर है। उसे पता है कि उसके छोटे से काम का बड़ा मकसद क्या है। अगर आपको अपने काम का बड़ा विजन नहीं पता, तो आप बस एक कोल्हू के बैल बनकर रह जाएंगे जो गोल-गोल घूम रहा है पर कहीं पहुंच नहीं रहा।
अक्सर लोग अपनी स्किल्स का दिखावा करने में लग जाते हैं। एक ग्राफिक डिजाइनर शायद एक ऐसा डिजाइन बनाए जो दिखने में तो कमाल हो, लेकिन कस्टमर को समझ ही न आए। यहाँ डिजाइनर ने अपनी स्किल तो दिखा दी, पर कंट्रीब्यूशन भूल गया। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या मेरा यह डिजाइन सेल्स बढ़ाने में मदद करेगा? क्या यह मेसेज क्लियर दे रहा है? अगर नहीं, तो वह डिजाइन कचरे के डिब्बे में डालने लायक है। आपको अपनी एक्सपर्ट नॉलेज को दूसरों के काम आने लायक बनाना होगा। अगर आप एक बहुत बड़े डॉक्टर हैं लेकिन अपनी टीम को यह नहीं समझा पाते कि पेशेंट की देखभाल कैसे करनी है, तो आपकी नॉलेज सिर्फ आपके अहंकार को संतुष्ट कर रही है, समाज का भला नहीं।
यही नहीं, कंट्रीब्यूशन का सीधा संबंध आपके रिश्तों से भी है। जब आप यह सोचते हैं कि आप दूसरों की मदद कैसे कर सकते हैं, तो कोलबोरेशन आसान हो जाता है। आप अपनी टीम से सिर्फ काम नहीं करवाते, बल्कि उन्हें सफल होने में मदद करते हैं। याद रखिए, आपकी सैलरी आपके 'एफर्ट' के लिए नहीं, बल्कि आपके द्वारा पैदा की गई 'वैल्यू' के लिए दी जाती है। तो अगली बार जब आप अपने डेस्क पर बैठें, तो खुद से पूछें कि क्या आप सिर्फ पत्थर तोड़ रहे हैं या मंदिर बना रहे हैं? अगर जवाब मंदिर है, तो मुबारक हो, आप ड्रकर के असली चेले बन चुके हैं।
Lesson : मेकिंग इफेक्टिव डिसीजन्स - सही फैसला, सही समय
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो रेस्टोरेंट में मेन्यू कार्ड देखकर आधा घंटा लगा देते हैं कि पनीर टिक्का मंगाए या कड़ाही पनीर? अगर हां, तो पीटर ड्रकर के हिसाब से आप मैनेजमेंट की दुनिया के सबसे बड़े विलेन बन सकते हैं। ड्रकर कहते हैं कि एक इफेक्टिव मैनेजर बहुत ज्यादा फैसले नहीं लेता। वह सिर्फ 'जरूरी' फैसले लेता है। वह हर छोटी बात पर अपनी नाक नहीं अड़ाता, बल्कि वह उन बड़े मसलों पर ध्यान देता है जो कंपनी का भविष्य बदल सकते हैं। यह वैसा ही है जैसे धोनी मैदान पर हर बॉल पर फील्डिंग सेट नहीं करते थे, वो सिर्फ उन खास मौकों पर फैसला लेते थे जहाँ से मैच पलट जाए।
इफेक्टिव डिसीजन मेकिंग का पहला नियम है, 'डिसेंट' यानी असहमति का होना। अगर आपकी मीटिंग में सब लोग गर्दन हिलाकर आपकी हर बात मान रहे हैं, तो समझ जाइए कि दाल में कुछ काला है। ड्रकर का मानना था कि जब तक किसी बात पर बहस न हो, तब तक सही फैसला नहीं लिया जा सकता। अगर कोई आपकी योजना में कमियां नहीं निकाल रहा, तो इसका मतलब है कि किसी ने होमवर्क ही नहीं किया। जापानी कंपनियों में यह कल्चर बहुत स्ट्रॉन्ग है, वहां तब तक फैसला नहीं होता जब तक हर कोई अपनी असहमति न जता दे। हमारे यहाँ तो बॉस ने कह दिया 'दिन है' तो सब कहते हैं 'हां सर, सूरज चमक रहा है', भले ही बाहर काली रात हो। यही चापलूसी बिजनेस को ले डूबती है।
फैसला लेने का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आपने कह दिया 'ऐसा होगा'। असली काम तो उसके बाद शुरू होता है। जब तक उस फैसले के लिए किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती, वह सिर्फ एक नेक इरादा है, फैसला नहीं। अगर आपने तय किया कि कंपनी की सेल्स बढ़ानी है, तो यह पूछना जरूरी है कि 'कौन बढ़ाएगा?', 'कैसे बढ़ाएगा?' और 'कब तक बढ़ाएगा?'। बिना डेडलाइन और बिना नाम के लिया गया फैसला वैसा ही है जैसे नए साल पर लिया गया जिम जाने का रेजोल्यूशन, जो दो दिन बाद दम तोड़ देता है। ड्रकर कहते हैं कि फैसला तब तक पूरा नहीं होता जब तक वह 'एक्शन' में न बदल जाए।
एक और बहुत बड़ी गलती जो हम करते हैं, वह है 'सॉल्विंग द रॉन्ग प्रॉब्लम'। हम अक्सर बुखार की दवा लेते रहते हैं जबकि शरीर में इन्फेक्शन कहीं और होता है। ड्रकर के अनुसार, एक अच्छा मैनेजर पहले यह देखता है कि समस्या 'जेनेरिक' है या 'एक्सेप्शनल'। अगर आपकी फैक्ट्री में रोज एक ही मशीन खराब हो रही है, तो मिस्त्री बुलाना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि उस मशीन को ही बदल दिया जाए या अपना मेंटेनेंस सिस्टम सुधारा जाए। हम अक्सर आग बुझाने में इतने बिजी हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि माचिस कौन जला रहा है। ड्रकर सिखाते हैं कि प्रॉब्लम की जड़ तक जाओ, पत्तों को पानी देने से पेड़ नहीं फलता।
सबसे जरूरी बात है 'प्रायोरिटी सेट करना'। आप सब कुछ एक साथ नहीं कर सकते। अगर आप दस खरगोशों का पीछा करेंगे, तो हाथ एक भी नहीं आएगा। ड्रकर का सीधा मंत्र है: सबसे पहले सबसे जरूरी काम। और एक समय पर सिर्फ एक ही काम। पुराने काम को छोड़ना भी एक बहुत बड़ा फैसला है। अगर कोई प्रोजेक्ट अब प्रॉफिट नहीं दे रहा, तो उसे बंद करना ही बुद्धिमानी है। लेकिन हम अपनी ईगो के कारण उसे ढोते रहते हैं। ड्रकर कहते हैं कि एक लीडर वह है जो भविष्य के लिए आज के संसाधनों को सही जगह लगाता है।
तो दोस्तों, पीटर ड्रकर की ये साठ सालों की सीख हमें यही बताती है कि सफलता कोई तुक्का नहीं है। यह खुद को पहचानने, सही योगदान देने और हिम्मत के साथ सही फैसले लेने का नतीजा है। अगर आप आज भी वही कर रहे हैं जो कल कर रहे थे, तो उम्मीद मत रखिएगा कि आपका आने वाला कल अलग होगा। अब समय है अपनी स्ट्रेंथ को पहचानने का, पत्थर नहीं बल्कि मंदिर बनाने का और फालतू की मीटिंग्स छोड़कर बड़े फैसले लेने का। क्या आप तैयार हैं अपनी लाइफ को मैनेज करने के लिए? या फिर वही पुराने बहाने बनाने का इरादा है? चुनाव आपका है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#TheEssentialDrucker #ManagementTips #PeterDrucker #CareerGrowth #BusinessStrategy
_