क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर ऑफिस की मीटिंग्स में ज्ञान बाँटते हैं पर काम के नाम पर ज़ीरो हैं। बधाई हो आप अपनी कंपनी को डुबाने की पूरी तैयारी में हैं। जबकि आपकी कॉम्पिटिशन असल में काम कर रही है और आप सिर्फ भारी भरकम शब्द फेंक रहे हैं।
चलिए अब गहराई से समझते हैं वो 3 बड़े लेसन्स जो आपकी इस बातूनी आदत को असली एक्शन में बदल देंगे और आपको एक असली लीडर बनायेंगे।
Lesson : बोलना काम करने का रिप्लेसमेंट नहीं है
दोस्तो, हम में से बहुत से लोग एक ऐसी बीमारी के शिकार हैं जिसे मैं मीटिंग मेनिया कहता हूँ। ऑफिस में एक समस्या आती है और हम क्या करते हैं। हम एक मीटिंग बुलाते हैं। फिर उस मीटिंग के बाद एक और फॉलो अप मीटिंग होती है। हम घंटों तक स्मार्ट दिखने वाले पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन्स देखते हैं। हम ऐसे भारी भरकम शब्द इस्तेमाल करते हैं जैसे सिनर्जी, रोडमैप और गेम चेंजर। हमें लगता है कि हमने बहुत काम कर लिया। लेकिन सच तो यह है कि दिन के अंत में काम का आउटपुट अभी भी जीरो है। जेफरी फेफर और रॉबर्ट सटन कहते हैं कि स्मार्ट कंपनियां अक्सर इसी जाल में फंस जाती हैं। उन्हें लगता है कि किसी समस्या के बारे में बात करना ही उस समस्या को सुलझाना है।
इसे एक रियल लाइफ एक्जाम्पल से समझते हैं। मान लीजिये आप जिम जाने का प्लान बना रहे हैं। आपने बेस्ट नाइकी के जूते खरीद लिए। आपने डाइट चार्ट दीवार पर चिपका दिया। आपने इंस्टाग्राम पर वर्कआउट मोटिवेशन वाली रील्स भी देख लीं। अब आप अपने दोस्तों को पार्टी में बता रहे हैं कि कैसे आप अगले तीन महीने में एब्स बनाने वाले हैं। यहाँ आपने इतना ज्ञान बाँट दिया कि आपके दिमाग को लगा कि आपने सच में वर्कआउट कर लिया। इसे ही नोइंग डूइंग गैप कहते हैं। आपने सब कुछ जान लिया, सब कुछ बोल दिया, लेकिन पसीना एक बूंद भी नहीं बहाया। ऑफिस में भी यही होता है। जब एक मैनेजर कहता है कि हमने स्ट्रेटेजी बना ली है, तो उसे लगता है कि आधी जंग जीत ली। भाई, जंग तो तब शुरू होगी जब उस पेपर को छोड़कर जमीन पर उतरोगे।
हमारे यहाँ इंडिया में तो यह और भी मजेदार है। यहाँ चाय की टपरी पर बैठकर लोग देश की इकोनॉमी सुधारने के प्लान बना लेते हैं। वो घंटों बहस करेंगे कि जीडीपी कैसे बढ़नी चाहिए। लेकिन जब खुद के स्टार्टअप का बिजनेस प्लान एक्जीक्यूट करने की बारी आती है, तो कहते हैं कि यार अभी मार्केट थोड़ा डाउन है। स्मार्ट कंपनियां वो होती हैं जो बोलने वाले को नहीं बल्कि करने वाले को रिवॉर्ड देती हैं। अगर आपकी कंपनी में सिर्फ वो लोग प्रमोट हो रहे हैं जो मीटिंग्स में अच्छी इंग्लिश बोलते हैं और बढ़िया ग्राफ दिखाते हैं, तो समझ जाइये कि आपकी कंपनी एक गहरी खाई की तरफ बढ़ रही है।
एक्शन और टॉक के बीच का यह फर्क समझना बहुत जरूरी है। बात करना आसान है क्योंकि उसमें रिस्क नहीं है। गलती होने का डर नहीं है। लेकिन जब आप असल में काम करते हैं, तो चीजें गलत भी होती हैं। और यहीं से शुरू होता है असली बदलाव। तो अगली बार जब आप किसी प्रोजेक्ट पर काम करें, तो खुद से पूछें कि क्या मैं सिर्फ अपनी आवाज सुनने के लिए बोल रहा हूँ या वाकई में कुछ कर रहा हूँ। याद रखिये, दुनिया को आपके ज्ञान की परवाह नहीं है, दुनिया को आपके रिजल्ट्स की परवाह है।
Lesson : डर परफॉरमेंस का सबसे बड़ा दुश्मन है
दोस्तो, क्या आपके ऑफिस में भी ऐसा माहौल है जहाँ बॉस के आते ही सब अपनी स्क्रीन की तरफ ऐसे देखते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस सॉल्व कर रहे हों। या फिर जब कोई नया आइडिया देने की बात आती है, तो सब एक दूसरे का मुँह ताकते हैं कि कहीं कुछ गलत बोल दिया तो बेइज्जती न हो जाए। जेफरी फेफर और रॉबर्ट सटन कहते हैं कि डर एक ऐसी चीज है जो नॉलेज को एक्शन में बदलने से रोक देती है। जब लोग डरते हैं, तो वो रिस्क नहीं लेते। और जब रिस्क नहीं लेते, तो कुछ नया नहीं होता। बस वही पुराना घिसा पिटा काम चलता रहता है।
इसे एक मजेदार मिसाल से समझते हैं। मान लीजिये आप एक ऐसी शादी में गए हैं जहाँ दुल्हन के पापा बहुत गुस्से वाले हैं। अब आप डांस फ्लोर पर जाकर नागिन डांस करना चाहते हैं, लेकिन आपको डर है कि अगर ताऊजी ने देख लिया तो वो वहीं बेइज्जत कर देंगे। तो आप क्या करते हैं। आप बस कोने में खड़े होकर कोल्ड ड्रिंक पीते हैं और दूसरों को देखते रहते हैं। ऑफिस में भी यही होता है। एक एम्प्लॉई के पास बहुत बढ़िया आईडिया होता है जिससे कंपनी का करोड़ों का फायदा हो सकता है। लेकिन उसे डर है कि अगर यह फेल हो गया तो उसकी रेटिंग खराब हो जाएगी या उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। तो वो क्या करता है। वो अपना मुँह बंद रखता है और वही करता है जो उसे बताया गया है।
इंडिया में तो वैसे भी हमें बचपन से सिखाया जाता है कि गलती मत करो। स्कूल में गलत जवाब दिया तो टीचर की डाँट, घर पर कम नंबर आए तो पापा की चप्पल। यही डर हमारे खून में बस जाता है। जब हम जॉब में आते हैं, तो हम बस सेफ खेलना चाहते हैं। स्मार्ट कंपनियां वो होती हैं जो फेलियर को गले लगाती हैं। वो जानती हैं कि अगर आप कुछ नया कर रहे हैं, तो गलती होना पक्का है। अगर आप गलती नहीं कर रहे, इसका मतलब आप कुछ नया कर ही नहीं रहे। आप बस एक रोबोट की तरह पुरानी फाइल्स इधर से उधर कर रहे हैं।
डरावने बॉस को लगता है कि चिल्लाने से काम जल्दी होगा। लेकिन सच तो यह है कि चिल्लाने से लोग सिर्फ काम करने का नाटक करते हैं। वो अपनी गलतियों को छुपाने लगते हैं। और जब गलतियां छुपती हैं, तो वो कैंसर की तरह पूरी कंपनी को अंदर से खा जाती हैं। अगर आपको नोइंग डूइंग गैप को खत्म करना है, तो पहले डर को खत्म करना होगा। एक ऐसा माहौल बनाइये जहाँ लोग अपनी बात खुलकर कह सकें, भले ही वो बात सुनने में बेवकूफी भरी क्यों न लगे। याद रखिये, जब डर खिड़की से बाहर जाता है, तभी असली इनोवेशन दरवाजे से अंदर आता है।
Lesson : फालतू की पेचीदगी काम को रोक देती है
दोस्तो, क्या कभी आपने सोचा है कि कुछ कंपनियों में एक छोटा सा फैसला लेने के लिए भी दस लोगों के साइन क्यों चाहिए होते हैं। इसे कहते हैं स्ट्रक्चरल कॉम्प्लेक्सिटी। जेफरी फेफर और रॉबर्ट सटन बताते हैं कि अक्सर कंपनियां खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेती हैं। वो इतने नियम और कायदे बना देती हैं कि एक आम एम्प्लॉई को समझ ही नहीं आता कि वो काम करे या सिर्फ फॉर्म भरता रहे। जब स्ट्रक्चर बहुत ज्यादा उलझा हुआ होता है, तो नॉलेज फाइलों में दबकर रह जाती है और एक्शन लेने वाला इंसान थक कर हार मान लेता है।
इसे एक देसी मिसाल से समझते हैं। मान लीजिये आपको अपने घर के पास वाली दुकान से दूध का पैकेट लाना है। अब आपकी मम्मी एक नियम बना दें कि पहले आपको अपने पापा से परमिशन लेनी होगी, फिर बड़े भाई से साइन करवाना होगा और फिर अपनी बहन से पूछना होगा कि दूध फुल क्रीम लाना है या टोंड। तब तक तो चाय का टाइम ही निकल जाएगा और शायद दूध की दुकान भी बंद हो जाए। ऑफिस में भी यही ड्रामा होता है। एक शानदार आईडिया आता है, लेकिन उसे पास कराने के चक्कर में इतनी कमेटियां बन जाती हैं कि जब तक आईडिया अप्रूव होता है, तब तक मार्केट बदल चुका होता है।
इंडिया में तो वैसे भी हमें लाल फीताशाही यानी रेड टेप का बहुत शौक है। हमें लगता है कि अगर प्रोसेस मुश्किल है, तो काम बहुत प्रोफेशनल हो रहा है। लेकिन असलियत में हम सिर्फ वक्त बर्बाद कर रहे होते हैं। स्मार्ट कंपनियां अपने सिस्टम को इतना सिंपल रखती हैं कि एक नया इंटर्न भी समझ सके कि उसे क्या करना है। वो फालतू के लेयर्स हटा देती हैं। वो चाहती हैं कि जानकारी ऊपर से नीचे तक बिजली की रफ़्तार से पहुंचे, न कि किसी कछुए की तरह फाइलों के ढेर में रेंगती रहे।
अगर आपकी कंपनी में काम से ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड सॉफ्टवेयर्स और ट्रैकिंग टूल्स पर ध्यान दिया जा रहा है, तो समझ जाइये कि आप नोइंग डूइंग गैप के शिकार हैं। असली काम तब होता है जब लोग एक दूसरे से बात करते हैं और तुरंत फैसला लेते हैं। जितनी कम रुकावटें होंगी, उतनी ही तेजी से ज्ञान एक्शन में बदलेगा। तो अपने सिस्टम को इतना हल्का रखिये कि वो आपकी उड़ान में मदद करे, न कि बोझ बनकर आपको नीचे खींचे।
दोस्तो, The Knowing Doing Gap हमें यही सिखाती है कि स्मार्ट होना अच्छी बात है, लेकिन स्मार्ट दिखना और स्मार्ट करना दो अलग चीजें हैं। अगर आप सिर्फ पढ़ रहे हैं और सुन रहे हैं, तो आप सिर्फ नॉलेज इकट्ठा कर रहे हैं। लेकिन अगर आप उस पर अमल नहीं कर रहे, तो वो नॉलेज रद्दी के भाव भी नहीं बिकेगी। आज ही अपने काम करने के तरीके को देखिये। क्या आप सिर्फ बोल रहे हैं। क्या आप डर रहे हैं। या क्या आपने खुद को फालतू के नियमों में बांध रखा है।
उठिये और आज कम से कम एक छोटा सा एक्शन लीजिये जो आपने कल तक सिर्फ सोचा था। क्योंकि अंत में वही जीतता है जो मैदान में उतरता है, वो नहीं जो सिर्फ गैलरी में बैठकर कमेंट्री करता है।
अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करता है पर काम कुछ नहीं करता। नीचे कमेंट्स में बताइये कि आप आज कौन सा एक नया काम शुरू करने वाले हैं।
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