The Myth of Excellence (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो हर फील्ड में शक्तिमान बनने की कोशिश कर रहे हैं? बधाई हो, आप अपनी कंपनी और करियर को गड्ढे में धकेलने का पूरा इंतजाम कर चुके हैं। हर चीज में बेस्ट बनने का भूत आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा और कॉम्पिटिटर्स आपकी नाकामी पर तालियां बजाएंगे।

आज हम फ्रेड क्रॉफर्ड की बुक द मिथ ऑफ एक्सीलेंस से यह समझेंगे कि कैसे महान कंपनियां सब कुछ करने के बजाय सिर्फ सही चीजें करने पर फोकस करती हैं। चलिए जानते हैं वो ३ लेसन जो आपकी सोच बदल देंगे।


Lesson : हर मर्ज की दवा बनने की नाकाम कोशिश

आजकल के बिजनेस वर्ल्ड में एक बहुत ही अजीब बीमारी फैली है और उस बीमारी का नाम है सब कुछ में बेस्ट होना। हमारे आसपास के सो कॉल्ड गुरु हमें यही सिखाते हैं कि अगर आपको मार्केट में टिकना है तो आपको सस्ता भी होना पड़ेगा, क्वालिटी भी नंबर वन देनी होगी और सर्विस तो ऐसी हो कि कस्टमर आपके पैर धोकर पिए। फ्रेड क्रॉफर्ड कहते हैं कि भाई, यह बिल्कुल बकवास बात है। अगर आप हर चीज में एक्सीलेंट बनने की कोशिश करेंगे, तो आप किसी भी चीज में एक्सीलेंट नहीं रह पाएंगे। इसे ऐसे समझिए जैसे आप एक रेस्टोरेंट में गए और वहां मेन्यू कार्ड में चाइनीज, इटालियन, साउथ इंडियन और यहां तक कि सुशी भी मिल रही है। अब आप खुद सोचिए, क्या वो बंदा सुशी भी अच्छी बनाएगा और डोसा भी? कतई नहीं। वह सब कुछ एवरेज ही बनाएगा।

असली प्रॉब्लम यह है कि जब आप हर पिलर पर टॉप पर रहने की कोशिश करते हैं, तो आपके रिसोर्स और आपकी एनर्जी बुरी तरह बिखर जाती है। आप अपनी टीम को पागल कर देते हैं क्योंकि सुबह आप कहते हैं कि हमें कॉस्ट कम करनी है और शाम को आप कहते हैं कि हमें वर्ल्ड क्लास लग्जरी सर्विस देनी है। यह तो वही बात हो गई कि आप जिम भी जाना चाहते हैं ताकि बॉडी बने और आपको रात को पार्टी में छोले भटूरे भी दबाकर खाने हैं। दोनों चीजें साथ में नहीं चलती दोस्त। एक्सीलेंस का मतलब यह नहीं है कि आप हर दीवार को पेंट करें, बल्कि इसका मतलब यह है कि आप उस एक दीवार को चुनें जिसे देखकर पड़ोसी जल भुनकर राख हो जाए।

इंडियन मार्केट में भी हम यही गलती करते हैं। एक छोटी सी दुकान वाला सोचता है कि मैं रिलायंस को भी टक्कर दे दूँ और साथ ही साथ मोहल्ले के टेलर जैसी पर्सनल सर्विस भी दे दूँ। रिजल्ट क्या निकलता है? ना तो वह सस्ता दे पाता है और ना ही उसकी सर्विस में वो दम रहता है। बुक कहती है कि महान कंपनियां यह जानती हैं कि उन्हें किन दो या तीन चीजों में सिर्फ ठीकठाक रहना है ताकि वो उस एक मेन चीज में आग लगा सकें। अगर आप अपनी एनर्जी हर जगह वेस्ट करेंगे, तो आप सिर्फ एक थके हुए बिजनेस ओनर बनकर रह जाएंगे जो दिन भर भागता तो बहुत है पर पहुंचता कहीं नहीं है।

अपनी कंपनी को एक सुपरहीरो की तरह मत देखिए जो उड़ भी सकता है, पानी में भी तैर सकता है और गायब भी हो सकता है। उसे एक स्पेशलिस्ट की तरह देखिए। जैसे अगर आपको दिल की बीमारी है, तो आप उस डॉक्टर के पास जाएंगे जो सिर्फ दिल का इलाज करता है, ना कि उसके पास जो दांत भी निकालता है और जुकाम की दवाई भी देता है। इसलिए, यह जो हर चीज में बेस्ट बनने का मिथ है, इसे अपने दिमाग से निकाल दीजिए वरना मार्केट आपको निकाल देगा।


Lesson : कस्टमर को भगवान नहीं, इंसान समझिए

अक्सर बिजनेस वर्ल्ड में कहा जाता है कि कस्टमर भगवान है। लेकिन सच तो यह है कि कस्टमर भी एक इंसान है जिसकी अपनी जरूरतें और इमोशन्स होते हैं। फ्रेड क्रॉफर्ड हमें समझाते हैं कि कस्टमर हर बार आपसे चांद-तारे नहीं मांग रहा होता। उसे बस एक चीज चाहिए और वो है भरोसा। हम लोग अक्सर क्या करते हैं? हम कस्टमर को इम्प्रेस करने के चक्कर में इतने सारे वादे कर देते हैं कि बाद में उन्हें पूरा करना नामुमकिन हो जाता है। आप उसे कहते हैं कि सर, हम आपको सबसे कम दाम में सबसे बढ़िया क्वालिटी देंगे और डिलीवरी तो पलक झपकते ही हो जाएगी। अब भाई, आप कोई जादूगर तो हैं नहीं। जब आप इन तीनों मोर्चों पर फेल होते हैं, तो वही कस्टमर जो आपको दुआएं दे रहा था, सोशल मीडिया पर आपकी कंपनी की धज्जियां उड़ाने लगता है।

मान लीजिए आप एक ई-कॉमर्स साइट से मोबाइल मंगवाते हैं। अगर उन्होंने आपसे वादा किया है कि डिलीवरी दो दिन में होगी, तो आपको दो दिन में ही चाहिए। अब चाहे वो डिलीवरी बॉय आपको घर आकर फूल माला न पहनाए, आपको फर्क नहीं पड़ता। आपको बस अपना फोन सही सलामत और टाइम पर चाहिए। लेकिन अगर वही कंपनी आपको फोन तो सस्ता दे दे पर डिलीवरी में दस दिन लगा दे और कस्टमर केयर वाले आपका फोन न उठाएं, तो क्या आप दोबारा वहां जाएंगे? बिल्कुल नहीं। सार्केज्म तो देखिए, कंपनियां करोड़ों रुपये एडवरटाइजिंग पर खर्च करती हैं यह बताने के लिए कि वो कितनी महान हैं, लेकिन एक छोटे से रिफंड के लिए कस्टमर को दस बार चक्कर कटवाती हैं।

बुक के अनुसार, कस्टमर वैल्यू के पांच पिलर्स होते हैं: प्राइस, प्रोडक्ट, सर्विस, एक्सेस और एक्सपीरियंस। आपको इनमें से किसी एक में डोमिनेट करना है, यानी सबसे बेस्ट होना है। दूसरे पिलर में आपको डिफरेंशिएट करना है, मतलब कॉम्पिटिटर से थोड़ा बेहतर। और बाकी के तीन पिलर्स में? वहां आपको सिर्फ नॉर्मल या एवरेज रहना है। हां, आपने सही सुना। हर चीज में नंबर वन बनने की जरूरत नहीं है। अगर आप दुनिया के सबसे सस्ते दुकानदार हैं, तो लोग आपसे फाइव स्टार होटल जैसी सर्विस की उम्मीद नहीं करेंगे। लेकिन अगर आप सबसे महंगे हैं, तो फिर आपका प्रोडक्ट और सर्विस दोनों टॉप क्लास होने चाहिए। कंफ्यूजन तब पैदा होता है जब आप खुद नहीं जानते कि आप किस पिलर पर खड़े हैं। आप खिचड़ी बनाने की कोशिश करते हैं और अंत में कस्टमर को बदहजमी हो जाती है। इसलिए कस्टमर को बेवकूफ समझना बंद कीजिए और उसे वो एक चीज दीजिए जिसके लिए वो आपके पास आया है।


Lesson : फोकस का जादू और सही चुनाव की ताकत

बिजनेस हो या लाइफ, सबसे मुश्किल काम 'हां' कहना नहीं, बल्कि 'ना' कहना होता है। फ्रेड क्रॉफर्ड का तीसरा सबसे बड़ा लेसन यही है कि आपको यह चुनना पड़ेगा कि आप किन चीजों में बेकार या साधारण दिखने के लिए तैयार हैं। सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि बचपन से हमें सिखाया गया है कि हर सब्जेक्ट में १०० में से १०० नंबर लाने हैं। लेकिन असल दुनिया में जो हर सब्जेक्ट में १०० लाता है, वो अक्सर किसी एक चीज का एक्सपर्ट नहीं बन पाता। महान कंपनियां अपनी बाउंड्री तय करती हैं। वो जानते हैं कि अगर वो अपनी सर्विस को वर्ल्ड क्लास बनाएंगे, तो शायद उनकी कीमत थोड़ी ज्यादा होगी और वो इस बात को गर्व से स्वीकार करते हैं।

आप स्टारबक्स जाते हैं तो वहां कॉफी महंगी होती है। क्या आप वहां जाकर मैनेजर से बहस करते हैं कि बगल वाली टपरी पर तो १० रुपये की चाय मिलती है? नहीं करते। क्योंकि स्टारबक्स ने चुन लिया है कि वो 'प्राइस' के मामले में सस्ते नहीं होंगे, वो 'एक्सपीरियंस' के मामले में बेस्ट होंगे। दूसरी तरफ एक डिस्काउंट स्टोर वाला जानता है कि उसके पास भीड़ इसलिए आती है क्योंकि वो सस्ता है, वहां आपको कोई सोफे पर बिठाकर पानी नहीं पिलाएगा। अगर वो स्टोर वाला अचानक से मखमली कालीन बिछाने लगे और दरबान खड़ा कर दे, तो उसकी कॉस्ट बढ़ जाएगी और वो अपना असली हथियार यानी 'कम दाम' खो देगा। सार्केज्म यह है कि ज्यादातर लोग बीच के रास्ते पर चलने की कोशिश करते हैं और बीच में चलने वालों को अक्सर ट्रैफिक कुचल देता है।

अपनी ताकत को पहचानना और उस पर दांव लगाना ही असली बुद्धिमानी है। अगर आपकी कंपनी का प्रोडक्ट लाजवाब है, तो पूरी जान लगा दीजिए उसे और बेहतर बनाने में। बाकी चीजों को सिर्फ इतना संभालिए कि काम न रुके। जब आप एक दिशा में पूरी ताकत लगाते हैं, तो मार्केट में आपकी एक अलग पहचान बनती है। लोग आपको उस एक खास खूबी के लिए याद रखते हैं। बिना फोकस के आप उस पतंग की तरह हैं जिसकी डोर कट चुकी है, हवा जिधर ले जाएगी आप उधर ही उड़ेंगे और अंत में किसी झाड़ी में फंसे हुए मिलेंगे। इसलिए आज ही तय कीजिए कि आपकी वो एक सुपरपावर क्या है। क्या आप सबसे तेज हैं? क्या आप सबसे सस्ते हैं? या क्या आप सबसे भरोसेमंद हैं? एक को चुनिए और बाकी दुनिया को शोर मचाने दीजिए।


दोस्तो, दुनिया आपको हर तरफ भागने के लिए मजबूर करेगी, लेकिन असली जीत रुककर सही रास्ता चुनने में है। आज ही अपने काम या अपने स्टार्टअप को करीब से देखिए। क्या आप भी हर चीज में बेस्ट बनने की नाकाम कोशिश में खुद को थका रहे हैं? कमेंट्स में बताइए कि आप किस एक पिलर पर राज करना चाहते हैं। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिए जो अपनी लाइफ में क्लैरिटी ढूंढ रहे हैं। याद रखिए, एक्सीलेंस सब कुछ करने में नहीं, सही चीज को सबसे बेहतर करने में है।

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