क्या आपको सच में लगता है कि आप अपनी लाइफ के हीरो हैं? बुरा मत मानिए पर आप अपनी असली पावर्स का सिर्फ 10 परसेंट इस्तेमाल कर रहे हैं। बाकी का 90 परसेंट पोटेंशियल तो आपके अंदर धूल खा रहा है। क्या आप सच में अपनी पूरी जिंदगी इसी तरह एक एवरेज इंसान की तरह गुजार देना चाहते हैं?
आज हम रॉबर्ट कूपर की कमाल की बुक द अदर 90 परसेंट के बारे में बात करेंगे। यह बुक हमें सिखाती है कि कैसे हम अपने अंदर छिपे उस खजाने को अनलॉक कर सकते हैं जिसे दुनिया अब तक देख नहीं पाई है। चलिए इसके 3 सबसे पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं।
Lesson : ट्रस्ट और ऑथेंटिसिटी की ताकत
क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग कमरे में घुसते ही सबका ध्यान अपनी तरफ कैसे खींच लेते हैं? नहीं, यह उनका महंगा परफ्यूम या आईफोन नहीं होता। यह होता है उनका ट्रस्ट और ऑथेंटिसिटी। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि हम में से ज्यादातर लोग अपनी 90 परसेंट जिंदगी एक मुखौटा पहनकर बिता देते हैं। हम वह बनने की कोशिश करते हैं जो हम हैं ही नहीं। ऑफिस में हम वो कोलीग बनने का नाटक करते हैं जो बहुत कूल है, और घर पर वो इंसान जो सब कुछ कंट्रोल में रखता है। लेकिन सच तो यह है कि दुनिया को आपकी एक्टिंग नहीं, आपकी असलियत चाहिए।
मान लीजिए आपके पास एक ऐसा बॉस है जो मीटिंग में तो बड़ी बड़ी बातें करता है कि हम एक परिवार हैं, लेकिन जब सैलरी बढ़ाने की बात आती है तो उसे अचानक गजनी वाली बीमारी हो जाती है। क्या आप उस पर भरोसा करेंगे? बिल्कुल नहीं! आपका दिमाग तुरंत उस पर शटर गिरा देगा। वहीं दूसरी तरफ अगर कोई आपसे आकर सीधे कहे कि देखो भाई, अभी कंपनी की हालत पतली है, लेकिन हम साथ मिलकर इसे ठीक करेंगे, तो आप उसके लिए अपनी जान भी लगा देंगे। यही है ऑथेंटिसिटी का जादू।
जब आप फेक होते हैं, तो आपका दिमाग उस झूठ को बनाए रखने में अपनी 90 परसेंट एनर्जी खर्च कर देता है। आप हर वक्त डरे रहते हैं कि कहीं आपकी पोल न खुल जाए। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप एक पुरानी खटारा कार को नया पेंट करके फेरारी बताने की कोशिश कर रहे हों। अंदर से तो इंजन अभी भी वही आवाज कर रहा है। ऑथर कहते हैं कि अगर आप सच में एक लीडर बनना चाहते हैं, तो पहले खुद से सच बोलना शुरू करें। अपनी कमियों को स्वीकार करें। जब आप अपनी गलतियों को मान लेते हैं, तो लोग आप पर भरोसा करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि यह बंदा कम से कम झूठ तो नहीं बोल रहा।
आजकल के सोशल मीडिया के जमाने में जहां फिल्टर लगाकर लोग अपनी शक्ल और अक्ल दोनों छुपाते हैं, वहां एक असली इंसान होना अपने आप में एक सुपरपावर है। अगर आप वही कहते हैं जो आप करते हैं, तो आपका कॉन्फिडेंस लेवल रॉकेट की तरह ऊपर जाएगा। आपका वह सोया हुआ 90 परसेंट पोटेंशियल तब जागता है जब उसे पता चलता है कि अब उसे झूठ बोलने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
तो क्या आप तैयार हैं उस मुखौटे को उतारने के लिए? याद रखिए, लीडरशिप कोई पोजीशन नहीं, बल्कि एक भरोसा है। और भरोसा सिर्फ सच की बुनियाद पर टिकता है। जब आप खुद के प्रति सच्चे होते हैं, तभी आप दूसरों के लिए एक मिसाल बन पाते हैं।
Lesson : एनर्जी मैनेजमेंट न कि टाइम मैनेजमेंट
हम सभी के पास दिन में वही 24 घंटे होते हैं जो एलन मस्क या रतन टाटा के पास हैं। पर हमारी हालत क्या है? हम सुबह उठते ही ऐसे थके होते हैं जैसे रात भर बॉर्डर पर लड़ाई लड़कर आए हों। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि आपकी असल प्रॉब्लम टाइम की कमी नहीं है बल्कि आपकी एनर्जी का गलत इस्तेमाल है। आप अपनी 90 परसेंट एनर्जी उन फालतू चीजों में लगा देते हैं जिनका आपकी लाइफ से कोई लेना देना नहीं है।
सोचिए आप ऑफिस में काम करने बैठे हैं और अचानक आपके फोन पर नोटिफिकेशन आता है कि शर्मा जी के लड़के की शादी की फोटो अपलोड हुई है। अब आप अगले आधे घंटे तक उन फोटोज को ज़ूम करके देख रहे हैं और यह सोच रहे हैं कि पनीर की सब्जी अच्छी बनी होगी या नहीं। बधाई हो! आपने अपनी सबसे कीमती दिमागी उर्जा एक ऐसी चीज पर खर्च कर दी जो आपकी ईएमआई नहीं भरने वाली। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप एक बाल्टी में पानी भर रहे हों जिसमें नीचे बड़े बड़े छेद हों। पानी तो आ रहा है लेकिन रुक नहीं रहा।
ऑथर समझाते हैं कि एनर्जी चार तरह की होती है: शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक। अगर आप जिम जाकर डोले शोले बना रहे हैं पर दिमाग में हर वक्त चिड़चिड़ाहट भरी है तो आपकी बैटरी कभी फुल नहीं होगी। हम में से ज्यादातर लोग उस फोन की तरह हैं जो चार्जर से तो लगा है पर जिसकी केबल बीच में से कटी हुई है। हम काम तो कर रहे हैं पर आउटपुट जीरो है। सरकाज्म की बात करें तो, कुछ लोग तो इतने बिजी होने का नाटक करते हैं कि उन्हें देखकर लगता है पूरा देश वही चला रहे हैं, जबकि असल में वह बस अपनी डेस्क पर बैठकर यह डिसाइड कर रहे होते हैं कि लंच में क्या मंगाना है।
असली लीडर वह है जिसे पता है कि कब अपनी पूरी ताकत झोंकनी है और कब आराम करना है। अगर आप लगातार 8 घंटे काम कर रहे हैं और बीच में एक मिनट का भी ब्रेक नहीं ले रहे तो आप अपनी एफिशिएंसी को खुद ही मार रहे हैं। आपका दिमाग एक मशाल की तरह है, उसे जलने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। छोटे छोटे ब्रेक्स लीजिए, गहरी सांस लीजिए और अपनी एनर्जी को रीचार्ज कीजिए।
जब आप अपनी एनर्जी को मैनेज करना सीख जाते हैं तो समय अपने आप मैनेज हो जाता है। तब आपको 14 घंटे काम करने की जरूरत नहीं पड़ती, आप 4 घंटे में ही वह कमाल कर देते हैं जो दूसरे लोग पूरे हफ्ते में नहीं कर पाते। याद रखिए, आपकी एनर्जी आपका सबसे बड़ा एसेट है। इसे कौड़ियों के भाव सोशल मीडिया की फालतू बहस या दूसरों की बुराई करने में मत बेचिए।
Lesson : छोटे बदलावों से बड़ी जीत
हम सबको लगता है कि लाइफ बदलने के लिए कोई बहुत बड़ा धमाका करना पड़ेगा। हमें लगता है कि जिस दिन लॉटरी लगेगी या जिस दिन कोई चमत्कार होगा, उस दिन हमारी किस्मत चमकेगी। लेकिन रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि आपका वो सोया हुआ 90 परसेंट पोटेंशियल किसी बड़े धमाके का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि वो आपके छोटे छोटे डेली एक्शन में छिपा है। इसे ऑथर 1 परसेंट फॉर्मूला कहते हैं। अगर आप रोज खुद को सिर्फ 1 परसेंट भी बेहतर बनाते हैं, तो साल के अंत तक आप वो इंसान नहीं रहेंगे जो आज हैं।
मान लीजिए आपने नए साल पर कसम खाई कि आप कल से रोज 5 किलोमीटर दौड़ेंगे। आप जोश में नए जूते खरीद लाए, ट्रैक सूट पहन लिया और पहले ही दिन पागलों की तरह दौड़ पड़े। अगले दिन क्या हुआ? आपके पैरों में इतना दर्द था कि आप टॉयलेट तक रेंगकर जा रहे थे। तीसरे दिन आपने वो जूते अलमारी के उस कोने में फेंक दिए जहाँ मकड़ियां जाले बना रही हैं। यह है 100 परसेंट बदलाव की कोशिश का फेलियर। वहीं अगर आप सिर्फ 5 मिनट चलने से शुरू करते, तो आपका दिमाग बगावत नहीं करता।
हम इंडियन्स की एक बड़ी बीमारी है कि हमें सब कुछ तुरंत चाहिए। हमें इंस्टेंट नूडल्स चाहिए, इंस्टेंट सक्सेस चाहिए और रातों रात करोड़पति भी बनना है। लेकिन भाई साहब, कुतुब मीनार एक दिन में नहीं बना था। अगर आप अपनी बुरी आदतों को एक झटके में छोड़ने की कोशिश करेंगे, तो आपका दिमाग आपको पुरानी गलियों में वापस खींच ले जाएगा। असली खेल कंसिस्टेंसी का है। क्या आप बोरियत को झेल सकते हैं? क्या आप तब भी काम कर सकते हैं जब आपका मन न हो?
जब आप छोटे छोटे बदलाव करते हैं, जैसे कि सुबह 10 मिनट जल्दी उठना या हर घंटे एक गिलास पानी पीना, तो आपके दिमाग को जीत की आदत हो जाती है। उसे लगने लगता है कि यह बंदा जो बोलता है, वो करता है। यहीं से आपका कॉन्फिडेंस बिल्ड होता है। वो 90 परसेंट ताकत जो अब तक सोई थी, धीरे धीरे जागने लगती है क्योंकि उसे अब आप पर भरोसा होने लगा है।
अक्सर लोग पूछते हैं कि शुरुआत कहाँ से करें? जवाब बहुत सिंपल है। वहां से शुरू करें जहाँ आप अभी खड़े हैं। अपनी टेबल साफ करें, अपनी ईमेल का जवाब दें, या बस एक पन्ना पढ़ना शुरू करें। जब आप छोटे कदम उठाते हैं, तो रास्ता अपने आप दिखने लगता है। बड़ी मंजिल पाने का एक ही तरीका है, बस चलते रहना। रुकना मना है।
आपकी लाइफ की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अब तक आपने जो कुछ भी हासिल किया है, वो सिर्फ आपकी काबिलियत का ट्रेलर था। असली फिल्म तो उस 90 परसेंट हिस्से में है जिसे आपने अभी तक छुआ भी नहीं है। क्या आप वाकई अपनी पूरी जिंदगी उस ट्रेलर के भरोसे काट देना चाहते हैं? या फिर आप तैयार हैं उस असीमित शक्ति को जगाने के लिए जो आपके अंदर दबी पड़ी है?
उठिए, आज ही फैसला कीजिए। इनमें से कौन सा लेसन आप सबसे पहले अपनी लाइफ में लागू करेंगे? कमेंट्स में जरूर बताइए क्योंकि आपका एक छोटा सा प्रॉमिस आपकी बड़ी जीत की शुरुआत हो सकता है। इस आर्टिकल को उनके साथ शेयर करें जो अपनी लाइफ में अटके हुए महसूस कर रहे हैं। याद रखिए, दुनिया को आपके असली अवतार का इंतजार है।
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