क्या आप भी पुराने घिसे पिटे तरीकों से सामान बेचने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। अगर हां तो मुबारक हो आप अपने ई कस्टमर्स को खुद अपने हाथों से कॉम्पिटिटर के पास भेज रहे हैं। बिना मॉडर्न कंज्यूमर साइकोलॉजी समझे बिजनेस करना मतलब अंधेरे में तीर मारना है।
आज के इस आर्टिकल में हम द सोल ऑफ द न्यू कंज्यूमर किताब के उन ३ बड़े लेसन्स की गहराई में उतरेंगे जो आपके ऑनलाइन बिजनेस का नजरिया पूरी तरह बदल देंगे।
Lesson : भरोसे की नई करेंसी और ई कस्टमर का दिल
आजकल के दौर में अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ अच्छा डिस्काउंट देकर आप कस्टमर को अपना बना लेंगे तो सर आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। लोरी विंडहम और केन ऑर्टन अपनी किताब में साफ कहते हैं कि डिजिटल दुनिया में भरोसा यानी ट्रस्ट ही असली पैसा है। पुराने जमाने में दुकानदार मीठी बातें करके खराब माल चिपका देता था और आप अगली बार दुकान बदल लेते थे। लेकिन आज का ई कस्टमर? भाई साहब वो तो आपसे सामान खरीदने से पहले आपकी कुंडली निकाल लेता है।
इसे एक रियल लाइफ उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपको एक नया स्मार्टफोन खरीदना है। आप एक ऐसी वेबसाइट पर जाते हैं जहां फोन तो सस्ता है पर साइट का डिजाइन २००५ के जमाने का लग रहा है और पेमेंट पेज पर ताला भी नहीं बना है। क्या आप वहां अपना कार्ड नंबर डालेंगे? कभी नहीं। आप तुरंत वहां से ऐसे भागेंगे जैसे किसी ने पीछे कुत्ता छोड़ दिया हो। यही है न्यू कंज्यूमर की साइकोलॉजी। वह सस्ता सामान ढूंढने से पहले एक सुरक्षित अहसास ढूंढता है। उसे यह गारंटी चाहिए कि अगर सामान खराब निकला तो उसे वापस करने के लिए उसे कस्टमर केयर के सामने गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा।
आज का कस्टमर बहुत शातिर है। वह आपकी मार्केटिंग से ज्यादा उन अजनबियों के रिव्यूज पर भरोसा करता है जिन्होंने आपका प्रोडक्ट इस्तेमाल किया है। अगर आपने एक भी कस्टमर का भरोसा तोड़ा तो वह सोशल मीडिया पर आपकी ऐसी बैंड बजाएगा कि आपका ब्रांड रातों रात विलेन बन जाएगा। भरोसा बनाना सालों का काम है और उसे तोड़ना बस एक गलत डिलीवरी की बात है। इसलिए अगर आप इस डिजिटल रेस में टिकना चाहते हैं तो सेल से ज्यादा रिलेशनशिप पर ध्यान दें। जब तक कस्टमर को यह यकीन नहीं होगा कि आप उसके फायदे के लिए बैठे हैं न कि उसकी जेब काटने के लिए तब तक वह आपका वफादार नहीं बनेगा। याद रखिये नया कंज्यूमर सिर्फ सामान नहीं खरीदता वह एक ऐसा वादा खरीदता है जिसे आपको हर हाल में पूरा करना है।
Lesson : लगाम अब आपके हाथ में नहीं, कस्टमर के पास है
पुराने जमाने में मार्केटिंग का मतलब होता था कि आपने टीवी पर एक चमकता हुआ विज्ञापन दिखाया और भोले भाले लोगों ने उसे सच मान लिया। लेकिन लोरी विंडहम और केन ऑर्टन कहते हैं कि भाई साहब अब वो दिन लद गए। आज का नया ई कस्टमर किसी जासूस से कम नहीं है। वह अब आपके ब्रांड का गुलाम नहीं है बल्कि वह खुद को इस पूरे खेल का असली राजा समझता है। और सच तो यह है कि वह राजा है भी।
एक मजेदार उदाहरण देखिए। मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और वहां का खाना आपको पसंद नहीं आता। पुराने टाइम में आप क्या करते थे? वेटर को दो बातें सुनाते और बिल भरके घर चले जाते। लेकिन आज का डिजिटल कंज्यूमर? वह वहीं बैठे बैठे अपने फोन से उस डिश की फोटो खींचता है और सीधा गूगल मैप्स या सोशल मीडिया पर डाल देता है। अगले पांच मिनट में आपके बिजनेस की रेटिंग गिरकर पाताल में पहुंच जाती है। आज का कस्टमर सिर्फ सामान नहीं खरीद रहा बल्कि वह आपके ब्रांड की साख बनाने या बिगाड़ने की ताकत रखता है।
असल में इंटरनेट ने हर कस्टमर को एक माइक दे दिया है। पहले कंपनियों के पास बड़ी बड़ी मार्केटिंग टीमें होती थी जो तय करती थी कि लोगों को क्या सुनना चाहिए। अब कस्टमर खुद तय करता है कि उसे क्या चाहिए और किससे चाहिए। वह दस अलग अलग वेबसाइट्स पर जाकर कीमत चेक करता है और ग्यारहवीं जगह जाकर रिव्यूज पढ़ता है। अगर आपने उसे अपनी बातों में फंसाने की कोशिश की तो वह पलक झपकते ही आपके कॉम्पिटिटर के पास चला जाएगा। उसे अब आपकी बड़ी बड़ी बातों से ज्यादा इस बात में दिलचस्पी है कि आपका प्रोडक्ट उसकी लाइफ में क्या वैल्यू जोड़ रहा है।
इस डिजिटल दौर में अगर आप अभी भी वही पुराना घिसा पिटा एटीट्यूड रखेंगे कि ग्राहक तो भगवान है पर उसे हम जो देंगे वही लेना पड़ेगा तो सर आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। आज का ई कस्टमर डिमांडिंग है और उसे पता है कि विकल्प बहुत सारे हैं। अगर आप उसे वो कंट्रोल नहीं देंगे जिसकी उसे तलाश है तो वह आपको अपनी हिस्ट्री से ऐसे डिलीट करेगा जैसे कोई स्पैम ईमेल। इसलिए उसे कंट्रोल करने की कोशिश छोड़िए और उसे यह अहसास दिलाइए कि वह इस ट्रांजैक्शन का सबसे जरूरी हिस्सा है। जब आप उसे पावर देते हैं तब जाकर वह आपके ब्रांड से जुड़ता है।
Lesson : हर कस्टमर को चाहिए वीआईपी वाली फीलिंग
पुराने जमाने में मार्केटिंग का मतलब होता था कि एक ही लाठी से सबको हांकना। मतलब एक बड़ा सा होर्डिंग लगा दिया और जो भी वहां से गुजरा उसने देख लिया। लेकिन लोरी विंडहम और केन ऑर्टन कहते हैं कि भाई साहब नया ई कस्टमर भीड़ का हिस्सा बनकर नहीं रहना चाहता। उसे चाहिए कि ब्रांड उसे उसके नाम से पहचाने और उसकी पसंद का ख्याल रखे। अगर आप उसे वो घिसा पिटा मैसेज भेजेंगे जो आपने लाखों लोगों को भेजा है तो वह उसे पढ़ने से पहले ही डिलीट कर देगा।
इसे एक मजेदार और कड़वे सच वाले उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आप अपनी गर्लफ्रेंड या वाइफ के लिए कोई गिफ्ट ढूंढ रहे हैं और अचानक आपको एक ईमेल आता है जिसमें ट्रैक्टर के टायरों पर भारी डिस्काउंट मिल रहा है। आपका रिएक्शन क्या होगा? जाहिर है आप सोचेंगे कि ये कंपनी वाले पागल हो गए हैं या फिर इन्हें पता ही नहीं कि मैं कौन हूँ और मुझे क्या चाहिए। यही फर्क है मास मार्केटिंग और पर्सनलाइजेशन में। नया कंज्यूमर चाहता है कि जब वह आपकी वेबसाइट पर आए तो उसे वही चीजें दिखें जो उसकी लाइफस्टाइल से मेल खाती हों। वह चाहता है कि आप उसे एक नंबर की तरह नहीं बल्कि एक इंसान की तरह ट्रीट करें जिसकी अपनी अलग पसंद और नापसंद है।
आजकल का डिजिटल कस्टमर इतना आलसी भी हो गया है और स्मार्ट भी कि वह चाहता है कि आप उसकी अगली जरूरत का अंदाजा खुद लगा लें। जैसे अगर उसने पिछले महीने कॉफी पाउडर खरीदा था तो इस महीने खत्म होने से पहले ही उसे याद दिला दीजिए। इसे कहते हैं दिमाग से खेलना और दिल जीतना। अगर आप उसे यह अहसास करा देते हैं कि आप उसके बिहेवियर को समझते हैं और उसकी लाइफ आसान बना रहे हैं तो वह आपकी उंगलियों के इशारों पर नाचेगा।
लेकिन सावधान! पर्सनलाइजेशन का मतलब यह नहीं कि आप उसके पीछे पड़ जाएं या उसकी प्राइवेसी में घुस जाएं। अगर आपने उसे ऐसा महसूस कराया कि आप उसकी जासूसी कर रहे हैं तो वह डरकर भाग जाएगा। सही बैलेंस बनाना ही असली आर्ट है। उसे वो चीजें सुझाइये जो उसके काम की हों और उसे ऐसा लगना चाहिए कि यह फैसला उसका अपना है न कि आपने उस पर थोपा है। जब आप हर कस्टमर को यह वीआईपी वाली फीलिंग देते हैं तब जाकर वह आपके ब्रांड का परमानेंट फैन बनता है। वरना तो भाई साहब इंटरनेट पर दुकानों की कमी नहीं है।
तो दोस्तों द सोल ऑफ द न्यू कंज्यूमर से हमें यह समझ आता है कि आज का ई कस्टमर सिर्फ सामान नहीं बल्कि एक अहसास और एक रिश्ता खरीद रहा है। अगर आप भरोसे की कीमत समझते हैं उसे कंट्रोल देते हैं और उसे खास महसूस कराते हैं तो आपका बिजनेस आसमान की ऊंचाइयां छुएगा। वर्ना आप भी उन्हीं गुमनाम ब्रांड्स की लिस्ट में शामिल हो जाएंगे जिन्हें लोग एक क्लिक में भूल जाते हैं।
आज ही अपने बिजनेस मॉडल को चेक कीजिये। क्या आप अपने कस्टमर को सच में जानते हैं या बस उसे सामान बेचने की मशीन समझ रहे हैं? नीचे कमेंट में हमें बताइये कि आपको इन तीनों में से कौन सा लेसन सबसे ज्यादा काम का लगा। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो ऑनलाइन धंधा शुरू करने का सपना देख रहे हैं। जाग जाइये क्योंकि नया कंज्यूमर अब पहले जैसा नहीं रहा।
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