अगर आपको लगता है कि कड़ी मेहनत से ही सक्सेस मिलती है तो बधाई हो आप अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। बिना इन ३ लॉज के आप बस एक कोल्हू के बैल की तरह गोल गोल घूम रहे हैं और आपका फ्यूचर आपके पास्ट की एक बोरिंग कॉपी के अलावा कुछ नहीं है।
क्या आप भी अपनी घिसी पिटी लाइफ और वर्क परफॉरमेंस से परेशान हैं। आज हम स्टीव जैफरन की इस किताब से वो ३ सीक्रेट लेसन सीखेंगे जो आपकी सोच और काम करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : आपकी परफॉरमेंस वैसी ही होगी जैसा आपको दुनिया दिखाई देती है
क्या आपने कभी सोचा है कि ऑफिस में आपका वो खडूस बॉस हमेशा चिड़चिड़ा क्यों रहता है। या फिर आपका वो दोस्त जो हर मुसीबत में भी मुस्कुराता रहता है आखिर वो कौन सी च्यवनप्राश खाता है। असल में सच यह है कि हम दुनिया को वैसा नहीं देखते जैसी वो है बल्कि हम दुनिया को वैसा देखते हैं जैसा हमारा दिमाग उसे पेंट करता है। स्टीव जैफरन कहते हैं कि आपकी परफॉरमेंस पूरी तरह से इस बात पर टिकी है कि आपको अपनी सिचुएशन कैसी दिखाई दे रही है।
मान लीजिए आप एक सेल्स मीटिंग में जा रहे हैं। अगर आपके दिमाग में यह चल रहा है कि क्लाइंट बहुत कंजूस है और वो कभी डील साइन नहीं करेगा तो यकीन मानिए आप वहां जाकर दुनिया की सबसे घटिया प्रेजेंटेशन देंगे। आपके शब्द लड़खड़ाएंगे और आपके चेहरे पर हार साफ दिखेगी। क्लाइंट को लगेगा कि शायद आप खुद अपने प्रोडक्ट पर भरोसा नहीं करते। और फिर जब डील कैंसिल होगी तो आप बड़े शान से कहेंगे कि देखा मुझे तो पहले ही पता था। इसे कहते हैं अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारकर खुद को ज्योतिष समझना।
हम अपनी लाइफ में एक चश्मा लगाकर घूमते हैं। अगर चश्मा धुंधला है तो पूरी दुनिया कचरा नजर आएगी। अगर आपको लगता है कि आपकी कंपनी डूबने वाली है तो आप काम चोरी करना शुरू कर देंगे। आप सोचेंगे कि जब जहाज डूबना ही है तो टाइटैनिक के बैंड की तरह म्यूजिक बजाने का क्या फायदा। लेकिन मजे की बात यह है कि जहाज आपकी इसी सोच की वजह से डूबता है क्योंकि आपने हाथ पैर मारना बंद कर दिया था।
इंडियन घरों में भी यही होता है। अगर मम्मी को लगता है कि आज कामवाली बाई छुट्टी मारेगी तो वो सुबह से ही गुस्से में बर्तन पटकना शुरू कर देती हैं। बेचारा पति और बच्चे बिना वजह लपेटे में आ जाते हैं। परफॉरमेंस का पहला लॉ यही कहता है कि जैसा आपको दिखेगा वैसा ही आप एक्ट करेंगे। अगर आप अपनी परफॉरमेंस बदलना चाहते हैं तो पहले उस नजरिए को बदलिए जिससे आप दुनिया को देख रहे हैं। यह कोई जादू नहीं है बल्कि सिंपल साइंस है। जब तक आप अपनी रीयलिटी को एक प्रॉब्लम की तरह देखेंगे तब तक आपका सोल्यूशन भी एक मजबूरी ही बना रहेगा।
इसलिए अगली बार जब आप किसी मुश्किल टास्क को देखें तो खुद से पूछें कि क्या यह सच में मुश्किल है या मेरा चश्मा ही गंदा है। क्या मैं अपनी लाइफ के ड्रामा में खुद ही विलेन बना बैठा हूँ। जब आप अपनी सिचुएशन को एक अपॉर्चुनिटी की तरह देखना शुरू करते हैं तो आपकी बॉडी लैंग्वेज और आपकी एनर्जी अपने आप बदल जाती है। फिर लोग आपसे पूछेंगे कि भाई कौन सा नशा कर रहे हो जो इतनी आग लगी है काम में।
लेसन २ : शब्द ही आपकी दुनिया बनाते हैं और उसे बदल भी सकते हैं
अगर आपको लगता है कि शब्द सिर्फ हवा में उड़ती हुई बातें हैं तो आप बहुत बड़े धोखे में हैं। असल में हमारी पूरी लाइफ उन शब्दों के जाल में फंसी है जो हम खुद से या दूसरों से कहते हैं। स्टीव जैफरन का दूसरा लॉ कहता है कि लैंग्वेज ही वो टूल है जिससे हम अपनी रीयलिटी को नया रूप दे सकते हैं। अगर आपकी डिक्शनरी में सिर्फ 'कोशिश करूँगा' या 'देखते हैं' जैसे ढीले शब्द हैं तो आपकी लाइफ भी किसी पुरानी खटारा गाड़ी की तरह ही चलेगी जो कभी भी बीच रस्ते में दम तोड़ सकती है।
सोचिए आप अपने किसी ऐसे रिश्तेदार से मिलते हैं जो पिछले २० साल से एक ही दुखड़ा रो रहा है कि 'किस्मत ही खराब है'। उनके लिए शब्द सिर्फ एक जरिया नहीं हैं बल्कि उन्होंने अपनी किस्मत की जेल खुद ही अपने शब्दों से बना ली है। जब आप बार-बार कहते हैं कि 'मेरा ऑफिस बहुत टॉक्सिक है' तो आपका दिमाग सिर्फ उन बातों को ढूंढता है जो उस टॉक्सिक माहौल को सच साबित कर सकें। आप ऑफिस के फ्री समोसों का मजा भी नहीं ले पाते क्योंकि आपका दिमाग तो उस 'टॉक्सिक' शब्द की फाइलें खंगालने में बिजी है। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी ही शादी में पनीर की सब्जी में कमियां निकाल रहे हैं जबकि पूरी दुनिया डांस करने में मगन है।
लेखक समझाते हैं कि हम अक्सर 'डिफॉल्ट फ्यूचर' में जीते हैं। यह वो फ्यूचर है जो आपके पास्ट की कड़वाहट और पुरानी बातों से बना है। अगर पास्ट में आपका कोई स्टार्टअप फेल हुआ था तो आपका डिफॉल्ट फ्यूचर कहेगा कि 'मुझसे बिजनेस नहीं होगा'। आप बिना कोशिश किए ही खुद को रिटायर मान लेते हैं। लेकिन इस लॉ का असली जादू तब शुरू होता है जब आप अपनी लैंग्वेज को बदलते हैं। जब आप 'प्रॉब्लम' को 'प्रोजेक्ट' कहना शुरू करते हैं तो आपका दिमाग डरने के बजाय सोल्यूशन मोड में आ जाता है।
इंडिया में हम अक्सर कहते हैं कि 'सिस्टम ही ऐसा है भाई कुछ नहीं हो सकता'। यह जुमला बोलकर हम अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं और सोफे पर लेटकर नेटफ्लिक्स देखने लगते हैं। लेकिन जो लोग एक्स्ट्राऑर्डिनरी रिजल्ट्स लाते हैं वो सिस्टम को कोसने के बजाय उसे 'रीडिजाइन' करने की भाषा बोलते हैं। शब्द आपकी सोच की पटरी हैं। अगर पटरी टेढ़ी है तो ट्रेन कितनी भी लग्जरी हो वो गड्ढे में ही गिरेगी।
भाषा का सही इस्तेमाल करने का मतलब यह नहीं है कि आप शीशे के सामने खड़े होकर झूठी तारीफें करें। इसका मतलब है कि आप अपनी सिचुएशन को एक नया नाम दें। जब आप अपनी टीम से कहते हैं कि 'हमें यह डेडलाइन पूरी करनी है वरना सब बर्बाद हो जाएगा' तो आप डर पैदा कर रहे हैं। लेकिन जब आप कहते हैं कि 'यह प्रोजेक्ट हमारे लिए एक नया बेंचमार्क सेट करने का मौका है' तो आप एक नई रीयलिटी डिक्लेयर कर रहे हैं। याद रखिए आपकी जुबान आपके फ्यूचर का रिमोट कंट्रोल है। अगर आप वही पुरानी घिसी पिटी बातें रिपीट करते रहेंगे तो आपकी लाइफ का चैनल कभी नहीं बदलेगा।
लेसन ३ : फ्यूचर को डिक्लेअर करना ही असली लीडरशिप है
अगर आप अब तक यह सोच रहे थे कि फ्यूचर अपने आप आता है तो आप गलत ट्रेन में बैठे हैं। स्टीव जैफरन का तीसरा लॉ कहता है कि फ्यूचर वो नहीं है जो कल होगा बल्कि फ्यूचर वो है जो आप आज डिक्लेअर करते हैं। लोग अक्सर पूछते हैं कि भाई डिक्लेरेशन क्या है। क्या यह कोई मंदिर की मन्नत है। नहीं डिक्लेरेशन का मतलब है एक ऐसा वादा करना जिसके पूरा होने का अभी कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। यह वैसा ही है जैसे आप अपने ससुर जी से वादा कर दें कि अगले साल तक आप अपनी खुद की बीएमडब्लू में उन्हें घुमाएंगे जबकि अभी आपकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं है।
जब आप कुछ डिक्लेअर करते हैं तो आप अपने पास्ट के सारे बहाने जला देते हैं। इंडिया में हम अक्सर 'देखते हैं' या 'कोशिश करेंगे' बोलकर पतली गली से निकल लेते हैं। लेकिन लीडर वो होता है जो बीच मैदान में खड़ा होकर कहता है कि 'हम यह प्रोजेक्ट जीतेंगे'। जैसे ही आप यह कहते हैं आपका पूरा शरीर और दिमाग उस रीयलिटी को सच करने में लग जाता है। आप उस फ्यूचर को अपनी आंखों के सामने घटता हुआ देखते हैं। यह वैसा ही है जैसे १९८३ के वर्ल्ड कप में कपिल देव ने डिक्लेअर किया था कि हम जीत सकते हैं जबकि उस वक्त वेस्ट इंडीज की टीम किसी खूंखार विलेन से कम नहीं थी।
बिना डिक्लेरेशन के आप बस अपनी लाइफ की गाड़ी न्यूट्रल गियर में छोड़कर ढलान पर लुढ़क रहे हैं। आप वही काम कर रहे हैं जो आपके पेरेंट्स ने किया था या जो आपका पड़ोसी कर रहा है। लेकिन जब आप एक नया फ्यूचर डिक्लेअर करते हैं तो आप पास्ट की जंजीरों को तोड़ देते हैं। आप यह नहीं कहते कि 'मेरी कंपनी में पॉलिटिक्स है इसलिए मैं ग्रो नहीं कर पा रहा'। आप कहते हैं कि 'मैं अपनी टीम में ऐसी कल्चर लाऊंगा जहां पॉलिटिक्स की जगह सिर्फ परफॉरमेंस होगी'। यह बोलना ही आपको दूसरों से अलग खड़ा कर देता है।
लोग शायद आपका मजाक उड़ाएंगे। वो कहेंगे कि 'लो भाई एक और मुंगेरी लाल आ गया हसीन सपने देखने'। लेकिन मजेदार बात यह है कि दुनिया उन्हीं के पीछे चलती है जो सपने देखने की हिम्मत रखते हैं और उसे डिक्लेअर करते हैं। अगर आप वही पुरानी लाइफ जीना चाहते हैं तो चुपचाप कोने में बैठे रहिए। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि आपके नाम का डंका बजे तो आपको वो फ्यूचर आज ही बोलना पड़ेगा जो आप जीना चाहते हैं। डिक्लेरेशन में वो ताकत है जो मरे हुए प्रोजेक्ट में भी जान फूंक देती है।
तो अब चॉइस आपकी है। क्या आप वही पुराने लेसन के साथ अपनी जिंदगी का कीमती समय बर्बाद करना चाहते हैं या फिर आज ही एक नया और शानदार फ्यूचर डिक्लेअर करके अपनी परफॉरमेंस को रॉकेट की तरह उड़ाना चाहते हैं। अपनी जुबान का सही इस्तेमाल कीजिए और देखिए कैसे दुनिया आपके कदम चूमती है।
दोस्तों, 'द थ्री लॉज ऑफ परफॉरमेंस' सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि यह आपकी लाइफ को रीसेट करने का बटन है। अब समय आ गया है कि आप अपने उस पुराने चश्मे को उतार फेंकें जिसने आपकी ग्रोथ को रोक रखा है। आज ही कमेंट सेक्शन में अपना एक 'डिक्लेरेशन' लिखें। वो एक चीज क्या है जो आप अपनी लाइफ में हासिल करना चाहते हैं भले ही आज वो नामुमकिन लग रही हो। हिम्मत कीजिए और अपना फ्यूचर खुद लिखिए। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा अपनी किस्मत को कोसता रहता है। चलिए साथ मिलकर एक नया इतिहास रचते हैं।
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