क्या आप भी अपनी टीम को सिर्फ सैलरी लेने वाली मशीन समझते हैं। अगर हाँ तो मुबारक हो आप अपनी कंपनी को डूबते हुए देखने के लिए बिल्कुल तैयार हैं। लोग ऑफिस आते हैं और काम चोरी करके चले जाते हैं क्योंकि आपने कभी द वर्कफोर्स स्कोरकार्ड को समझा ही नहीं। आप वो सब खो रहे हैं जो एक सफल बिजनेस के लिए जरूरी है।
आज हम मार्क ह्युसलिड की इस मास्टरक्लास बुक से वो ३ बड़े लेसन्स सीखेंगे जो आपकी टीम को लेबर से लीडर बना देंगे। यह आर्टिकल आपकी आंखें खोल देगा कि असली ग्रोथ कागजों पर नहीं बल्कि लोगों के माइंडसेट में होती है।
लेसन १ : वर्कफोर्स माइंडसेट - क्या आपकी टीम सिर्फ अटेंडेंस लगा रही है
जरा सोचिए, आप एक बहुत बड़ी कंपनी के मालिक हैं और आपके ऑफिस में सैकड़ों लोग काम कर रहे हैं। सुबह ९ बजे सब अपनी अपनी कुर्सी पर चिपक जाते हैं और शाम को ६ बजते ही ऐसे भागते हैं जैसे ऑफिस में आग लग गई हो। आपको लगता है कि सब कुछ बढ़िया चल रहा है क्योंकि काम हो रहा है। लेकिन असलियत यह है कि आपकी टीम सिर्फ शरीर से वहां मौजूद है, दिमाग से नहीं। मार्क ह्युसलिड अपनी किताब द वर्कफोर्स स्कोरकार्ड में सबसे पहले इसी 'वर्कफोर्स माइंडसेट' पर चोट करते हैं। अगर आपकी टीम का माइंडसेट एक नौकर जैसा है, जो सिर्फ घड़ी देखकर काम करता है, तो आपकी स्ट्रेटेजी कभी सफल नहीं हो सकती।
आजकल के दौर में लोग सोचते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को हायर कर लो और काम हो जाएगा। यह वैसा ही है जैसे आप एक क्रिकेट टीम में ११ ऐसे खिलाड़ियों को रख लें जिन्हें बैट पकड़ना तो आता है लेकिन उन्हें मैच जीतने की कोई भूख नहीं है। वे बस इसलिए खेल रहे हैं क्योंकि उन्हें मैच की फीस मिल रही है। क्या ऐसी टीम वर्ल्ड कप जीत पाएगी। कभी नहीं। यही हाल आपके बिजनेस का भी है। अगर आपके एम्प्लोई यह नहीं समझते कि उनका काम कंपनी के बड़े विजन से कैसे जुड़ा है, तो वे सिर्फ एक लायबिलिटी हैं।
मान लीजिए राहुल नाम का एक लड़का एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता है। राहुल बहुत स्मार्ट है लेकिन उसका माइंडसेट यह है कि 'मुझे तो बस कोडिंग करनी है और महीने के अंत में सैलरी लेनी है'। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो सॉफ्टवेयर वह बना रहा है उससे कस्टमर को फायदा हो रहा है या नहीं। अब अगर कल को कंपनी पर कोई मुसीबत आती है या कोई बड़ा बदलाव करना पड़ता है, तो राहुल सबसे पहले हाथ खड़े कर देगा क्योंकि उसका विजन सिर्फ अपनी कुर्सी तक सीमित है। वहीं दूसरी तरफ अगर राहुल का माइंडसेट यह होता कि 'मैं एक ऐसा टूल बना रहा हूं जो लाखों लोगों की जिंदगी आसान करेगा', तो उसकी परफॉरमेंस का लेवल ही कुछ और होता।
ज्यादातर मालिक अपनी टीम को डराकर काम करवाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि जितना ज्यादा प्रेशर होगा, उतना अच्छा काम होगा। लेकिन भाई साहब, प्रेशर से तो सिर्फ टायर फटते हैं, टैलेंट निखरकर बाहर नहीं आता। अगर आपकी टीम आपके विजन को अपना नहीं मानती, तो आप दुनिया के सबसे अमीर इंसान बनकर भी अंदर से खोखले ही रहेंगे। वर्कफोर्स माइंडसेट का मतलब है कि हर एक इंसान यह समझे कि वह कंपनी के मिशन का हिस्सा है, न कि सिर्फ एक छोटा सा पुर्जा।
जब तक आपकी टीम में वो जुनून नहीं होगा कि 'हमें कुछ बड़ा करना है', तब तक आप सिर्फ एक भीड़ चला रहे हैं, कंपनी नहीं। और यकीन मानिए, भीड़ के साथ आप सिर्फ मेले में जा सकते हैं, मार्केट में झंडा नहीं गाड़ सकते। इसलिए सबसे पहले अपनी टीम के साथ बैठिए और उन्हें बताइए कि वे क्यों खास हैं। उन्हें सिर्फ काम मत दीजिए, उन्हें एक मकसद दीजिए। क्योंकि जब इंसान के पास मकसद होता है, तो वह बिना कहे भी पहाड़ तोड़ सकता है।
लेसन २ : वर्कफोर्स कैपेबिलिटी - बंदर को मछली की रेस में मत दौड़ाइए
अब मान लीजिए आपकी टीम का माइंडसेट तो एकदम रॉकेट जैसा हो गया है। सब जोश में हैं और कंपनी के लिए जान देने को तैयार हैं। लेकिन क्या होगा अगर आप एक मछली को पेड़ पर चढ़ने का टारगेट दे दें और एक बंदर को समंदर में तैरने के लिए कह दें। जोश तो बहुत है, पर रिजल्ट जीरो आएगा। मार्क ह्युसलिड कहते हैं कि वर्कफोर्स कैपेबिलिटी का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आपकी टीम कितनी पढ़ी लिखी है, बल्कि यह है कि क्या उनके पास वो खास स्किल्स हैं जो आपकी स्ट्रेटेजी को जीत दिला सकें।
अक्सर कंपनियों में क्या होता है। बॉस को लगता है कि जो इंसान सेल्स में अच्छा है, उसे मार्केटिंग का हेड बना दो क्योंकि वह बातें अच्छी करता है। यह वैसा ही लॉजिक है जैसे किसी को लगता है कि अगर कोई अच्छा खाना खाता है, तो वह अच्छा रसोइया भी बन सकता है। भाई साहब, टैलेंट और सही जगह का मेल होना बहुत जरूरी है। अगर आपकी टीम के पास वो काबिलियत ही नहीं है जो आज के कॉम्पिटिटिव मार्केट में चाहिए, तो आपका सारा विजन सिर्फ कागजों पर ही अच्छा लगेगा।
एक मजेदार उदाहरण देखिए। रमेश की एक गारमेंट की दुकान है। रमेश ने सोचा कि अब वह ऑनलाइन कपड़े बेचेगा। उसने अपने पुराने मुनीम जी को बोला कि 'मुनीम जी, अब आप फेसबुक और इंस्टाग्राम संभालिए'। अब मुनीम जी जो पिछले २० साल से सिर्फ बहीखाता लिख रहे थे, उन्हें हैशटैग और रील्स का क्या पता। वह जोश में तो बहुत हैं, सुबह सबसे पहले दुकान खोलते हैं, लेकिन उन्हें डिजिटल मार्केटिंग की एबीसीडी भी नहीं आती। नतीजा क्या हुआ। रमेश का ऑनलाइन बिजनेस शुरू होने से पहले ही फुस्स हो गया। यहाँ मुनीम जी की नीयत में खोट नहीं था, बस उनके पास वो 'कैपेबिलिटी' नहीं थी जिसकी उस काम को जरूरत थी।
ज्यादातर लीडर्स यहाँ बड़ी गलती करते हैं। वे ट्रेनिंग पर पैसा खर्च करने को फिजूलखर्ची समझते हैं। उन्हें लगता है कि इंसान को जो आता है बस उसी से काम चला लो। लेकिन सच तो यह है कि अगर आप अपनी टीम की स्किल्स को अपग्रेड नहीं कर रहे हैं, तो आप उन्हें धीरे धीरे कबाड़ बना रहे हैं। वर्कफोर्स कैपेबिलिटी का मतलब है कि आप अपनी टीम की स्ट्रेंथ को पहचानें। क्या आपके पास सही 'की प्लेयर्स' सही पोजीशन पर हैं। अगर आपका सबसे काबिल आदमी रूटीन के फालतू कामों में फंसा है, तो समझ लीजिए आप अपनी सबसे कीमती तलवार से सब्जियां काट रहे हैं।
स्ट्रेटेजी को लागू करने के लिए आपको यह देखना होगा कि आपकी टीम में कहाँ गैप है। क्या उन्हें नई टेक्नोलॉजी की जरूरत है। क्या उन्हें बातचीत करने के तरीके सीखने हैं। अगर आप अपनी टीम को बेहतर नहीं बनाएंगे, तो कल को कोई और कंपनी उन्हें अपनी टीम में शामिल कर लेगी और आपको पता भी नहीं चलेगा। याद रखिए, अच्छे लोग कंपनी छोड़कर नहीं जाते, वे अक्सर खराब मैनेजमेंट और खुद को ग्रो न कर पाने की वजह से जाते हैं।
अपनी टीम की काबिलियत को पहचानना एक कला है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस एक बड़ी मछली बने, तो उसे गहरे पानी में उतारिए, न कि उसे रेगिस्तान में दौड़ाने की कोशिश कीजिए। जब सही हुनर सही काम से मिलता है, तभी जादू होता है और आपकी बैलेंस शीट मुस्कुराने लगती है।
लेसन ३ : वर्कफोर्स कल्चर - ऑफिस का माहौल या कुरुक्षेत्र का मैदान
अब तक हमने माइंडसेट और काबिलियत की बात की। लेकिन सोचिए आपके पास दुनिया के सबसे टैलेंटेड लोग हैं और उनका माइंडसेट भी बढ़िया है। पर जैसे ही वे ऑफिस के गेट के अंदर कदम रखते हैं, उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे किसी जेल या कुरुक्षेत्र के मैदान में आ गए हों। जहाँ हर कोई एक दूसरे की टांग खींच रहा है, बॉस सिर्फ गलतियां ढूंढ रहा है और लंच ब्रेक में सब सिर्फ कंपनी की बुराई कर रहे हैं। क्या ऐसी जगह पर कोई बड़ा विजन सच हो सकता है। मार्क ह्युसलिड कहते हैं कि बिना सही 'वर्कफोर्स कल्चर' के आपकी बड़ी बड़ी स्ट्रेटेजी कूड़े के ढेर के समान है।
कल्चर का मतलब यह नहीं है कि आपने ऑफिस में एक टेबल टेनिस की टेबल रख दी या महीने में एक बार पिज्जा पार्टी कर ली। असली कल्चर वो है जो तब दिखता है जब बॉस कमरे में नहीं होता। क्या आपके लोग एक दूसरे की मदद करते हैं। क्या वे नए आइडियाज देने से डरते तो नहीं। अगर आपके ऑफिस का माहौल ऐसा है कि यहाँ सिर्फ 'जी हुज़ूरी' करने वालों की तरक्की होती है, तो समझ लीजिए कि आपने अपने बिजनेस की कब्र खोदनी शुरू कर दी है।
एक और मजेदार उदाहरण लेते हैं। सुमित की एक एड एजेंसी है। सुमित खुद को बहुत कूल बॉस समझता है, लेकिन उसका कल्चर बड़ा अजीब है। अगर कोई एम्प्लोई कोई नया और अलग आइडिया लेकर आता है, तो सुमित सबका मजाक उड़ाते हुए कहता है 'ज्यादा स्मार्ट मत बनो, जितना बोला है उतना करो'। अब धीरे धीरे उसकी टीम ने दिमाग चलाना बंद कर दिया। अब वे सिर्फ वही करते हैं जो सुमित बोलता है। नतीजा यह हुआ कि एजेंसी की क्रिएटिविटी खत्म हो गई और पुराने क्लाइंट्स छोड़कर जाने लगे। सुमित को लगता है कि मार्केट खराब है, पर असल में उसके ऑफिस का जहरीला कल्चर ही असली विलेन है।
ज्यादातर कंपनियों में लोग सिर्फ इसलिए काम करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी ईएमआई भरनी है। उन्हें कंपनी की ग्रोथ से कोई लेना देना नहीं होता क्योंकि कंपनी उन्हें सिर्फ एक 'रिसोर्स' समझती है, इंसान नहीं। वर्कफोर्स कल्चर वो खाद है जो आपकी टीम की कैपेबिलिटी को फलने फूलने का मौका देती है। अगर कल्चर सपोर्टिव है, तो एक औसत दर्जे का इंसान भी एक्स्ट्राऑर्डिनरी काम कर सकता है। लेकिन अगर कल्चर खराब है, तो गोल्ड मेडलिस्ट भी सिर्फ टाइम पास करेगा।
आपको एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ परफॉरमेंस की पूजा हो, न कि चापलूसी की। जहाँ गलतियां करने पर सजा न मिले बल्कि उनसे सीखने का मौका मिले। जब लोग सुरक्षित महसूस करते हैं, तभी वे अपना बेस्ट देते हैं। अगर आपकी टीम हर वक्त इस डर में रहेगी कि पता नहीं कब पिंक स्लिप मिल जाए, तो वे कभी भी रिस्क नहीं लेंगे। और बिना रिस्क के बिजनेस में रिवॉर्ड नहीं मिलता।
आपकी स्ट्रेटेजी क्या है, यह आपके कॉम्पिटिटर को पता चल सकता है। वो आपकी टेक्नोलॉजी भी कॉपी कर सकते हैं। लेकिन वो कभी आपका कल्चर कॉपी नहीं कर सकते। यही आपकी सबसे बड़ी ताकत है। अपनी टीम को एक ऐसी जगह दीजिए जहाँ वे सिर्फ काम न करें, बल्कि गर्व के साथ कहें कि 'यह मेरी कंपनी है'। जब काम करने का मजा आने लगता है, तो सफलता अपने आप पीछे भागती हुई आती है।
तो दोस्तों, द वर्कफोर्स स्कोरकार्ड हमें यही सिखाता है कि बिजनेस सिर्फ नंबरों का खेल नहीं है, बल्कि यह इंसानों के मैनेजमेंट की कला है। अगर आप आज भी पुराने तरीके से अपनी टीम को चला रहे हैं, तो रुकिए और सोचिए। क्या आप उन्हें वो सम्मान और मौका दे रहे हैं जिसके वे हकदार हैं।
आज ही अपनी टीम के साथ एक छोटी सी मीटिंग कीजिए। उनसे काम की नहीं, उनके विजन की बात कीजिए। देखिए कि कहाँ कमी रह गई है। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी टीम को बदलना चाहते हैं, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो बिजनेस चला रहे हैं या मैनेजर हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपकी टीम की सबसे बड़ी ताकत क्या है। चलिए मिलकर एक ऐसा वर्क कल्चर बनाते हैं जहाँ हर कोई विनर हो।
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