क्या आप भी उन बिजनेस ओनर्स में से हैं जो सुबह से रात तक गधे की तरह मेहनत करते हैं पर महीने के अंत में बैंक अकाउंट देखकर रोना आता है। अगर आप आज भी अपनी कंपनी में हर छोटा बड़ा काम खुद कर रहे हैं तो आप बिजनेस ओनर नहीं बल्कि अपनी ही कंपनी के सबसे सस्ते मजदूर हैं। आपके बिना आपकी दुकान एक दिन भी नहीं चल सकती और यही आपके बिजनेस की सबसे बड़ी नाकामी है।
लेकिन अब परेशान होना बंद कीजिए। आज हम क्रिस रोन्जियो की बेहतरीन किताब द बिजनेस प्लेबुक से तीन ऐसे कमाल के तरीके सीखेंगे जो आपके बिजनेस को ऑटोपायलट पर ले आएंगे और आपको असली आजादी दिलाएंगे।
लेसन १ : खुद को रिप्लेस करना सीखें
क्या आप जानते हैं कि एक असली बिजनेस ओनर और एक आम मजदूर में क्या अंतर है। मजदूर के बिना काम रुक जाता है पर ओनर के बिना काम और तेजी से भागता है। लेकिन हमारे देश में कहानी बिल्कुल उल्टी है। यहाँ छोटा बिजनेस चलाने वाले लोग सुबह दुकान का शटर खुद खोलते हैं और रात को ताला भी खुद मारते हैं। वह सोचते हैं कि उनके बिना तो कंपनी एक दिन भी नहीं चल पाएगी। अगर आप भी इसी भ्रम में जी रहे हैं तो मुबारक हो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि आपने खुद के लिए एक बहुत ही थका देने वाली नौकरी ढूंढ ली है। जहाँ आपका बॉस कोई और नहीं बल्कि आप खुद हैं और यह बॉस बहुत ही जालिम है।
क्रिस रोन्जियो अपनी किताब द बिजनेस प्लेबुक में सबसे पहला और सबसे जरूरी लेसन यही सिखाते हैं कि खुद को रिप्लेस करना सीखें। इसका सीधा सा मतलब है कि आपको अपनी कंपनी के हर छोटे बड़े काम से खुद को धीरे-धीरे बाहर निकालना होगा। जब तक आप खुद को रिप्लेस नहीं करेंगे तब तक आपका बिजनेस कभी बड़ा नहीं हो पाएगा। सोचिए अगर आप ही बिलिंग करेंगे आप ही कस्टमर से बात करेंगे और आप ही झाड़ू भी लगाएंगे तो बिजनेस को आगे बढ़ाने की स्ट्रेटेजी कब बनाएंगे।
मान लीजिए शर्मा जी की एक बहुत ही मशहूर चाट की दुकान है। शर्मा जी के हाथ के गोलगप्पों का स्वाद पूरे शहर में फेमस है। अब शर्मा जी सुबह खुद आलू उबालते हैं मसाले तैयार करते हैं और शाम को खुद ही लोगों को गोलगप्पे खिलाते हैं। उनकी दुकान पर हमेशा भीड़ लगी रहती है। शर्मा जी फूले नहीं समाते और सोचते हैं कि मैं तो बहुत बड़ा बिजनेसमैन बन गया हूँ। अब एक दिन शर्मा जी की पीठ में जोर का दर्द उठता है और डॉक्टर उन्हें दो हफ्ते के बेड रेस्ट की सलाह देता है। नतीजा क्या हुआ। दुकान बंद आमदनी बंद और कस्टमर गायब।
शर्मा जी को लगता था कि वह बिजनेस चला रहे हैं पर असल में वह सिर्फ एक कारीगर थे जो अपनी दुकान में खुद ही मजदूरी कर रहे थे। अगर शर्मा जी ने शुरुआत से ही अपने गोलगप्पे बनाने का सीक्रेट मसाला और खिलाने का तरीका किसी और को सिखा दिया होता तो वह बीमार होने पर भी पैसे कमा रहे होते। वह शहर में अपनी दस और नई ब्रांच खोल सकते थे। लेकिन उन्होंने खुद को रिप्लेस करने के बजाय सारा काम अपने सिर पर ले रखा था।
खुद को रिप्लेस करने का मतलब यह नहीं है कि आप कामचोर बन जाएं और दिन भर सोफे पर बैठकर टीवी देखें। इसका मतलब यह है कि आप अपनी एनर्जी को उन कामों में लगाएं जो आपकी कंपनी को दस गुना आगे ले जा सकती हैं। डेली रूटीन के काम जैसे ईमेल का जवाब देना बिल बनाना या इन्वेंट्री चेक करना दूसरों को सौंप दें। शुरुआत में आपको लगेगा कि कोई भी दूसरा इंसान आपके जितना अच्छा काम नहीं कर सकता। यह डर हर बिजनेस ओनर को सताता है। लेकिन आपको अपनी इस आदत को बदलना होगा। आपको अपनी टीम पर भरोसा करना पड़ेगा। जब आप खुद को काम से फ्री करेंगे तभी आप एक सच्चे लीडर बन पाएंगे।
जब तक शर्मा जी खुद गोलगप्पे छानते रहेंगे वह कभी भी हल्दीराम नहीं बन सकते। हल्दीराम इसलिए बड़ा बना क्योंकि उसके मालिक ने खुद को किचन से बाहर निकाला और सिस्टम बनाने पर ध्यान दिया। आपको भी अपने बिजनेस का हल्दीराम बनना है ना कि गली का साधारण चाट वाला। इसलिए आज ही से उन कामों की लिस्ट बनाइए जो आपके बिना भी हो सकते हैं और उन्हें दूसरों को सौंपने की तैयारी शुरू कीजिए। जब आप अपनी कंपनी के सबसे जरूरी काम से खुद को रिप्लेस कर लेते हैं तब जाकर आपका बिजनेस असल मायनों में ग्रो करना शुरू करता है।
लेसन २ : हर प्रोसेस का प्लेबुक बनाएं
पहले लेसन में हमने देखा कि शर्मा जी कैसे अपनी ही दुकान में मजदूर बने रहे और खुद को रिप्लेस नहीं कर पाए। लेकिन मान लीजिए शर्मा जी मेरी बात मान जाते हैं और खुद को रिप्लेस करने के लिए रमेश नाम के एक लड़के को नौकरी पर रख लेते हैं। अब क्या होगा। पहले ही दिन शर्मा जी रमेश को दुकान पर खड़ा कर देते हैं और खुद घर चले जाते हैं। शाम को जब शर्मा जी वापस आते हैं तो देखते हैं कि पूरी दुकान तहस नहस हो चुकी है। रमेश ने गोलगप्पे के पानी में नमक की जगह चीनी डाल दी है और तीखे मसाले की जगह हल्दी मिला दी है। सारे कस्टमर गुस्से में थूक कर जा चुके हैं। शर्मा जी अपना सिर पकड़ लेते हैं और चिल्लाते हैं कि देखा मैंने कहा था ना कि मेरे बिना यह दुकान नहीं चल सकती। कोई भी दूसरा इंसान मेरे जैसा काम नहीं कर सकता।
यही वह मोड़ है जहाँ नब्बे परसेंट भारतीय बिजनेस ओनर्स हार मान लेते हैं और वापस जिंदगी भर के लिए खुद मजदूर बन जाते हैं। क्रिस रोन्जियो अपनी किताब द बिजनेस प्लेबुक में इसी बड़ी समस्या का सबसे सटीक समाधान बताते हैं। वह कहते हैं कि हर प्रोसेस का प्लेबुक बनाएं। इसका मतलब यह है कि आपकी कंपनी का हर छोटा बड़ा काम कैसे किया जाता है उसका एक लिखित नियम या वीडियो गाइड होना चाहिए। जब तक आपके बिजनेस के नियम आपके दिमाग में बंद रहेंगे तब तक आपका बिजनेस कभी बड़ा नहीं हो सकता। आपको उन नियमों को दिमाग से निकालकर कागज पर या डिजिटल फाइल में लिखना होगा।
अगर शर्मा जी ने रमेश को रखने से पहले एक सिंपल प्लेबुक बनाई होती तो क्या होता। उस प्लेबुक में साफ-साफ लिखा होता कि एक लीटर पानी में कितना ग्राम नमक डालना है और कितना ग्राम मसाला मिलाना है। गोलगप्पे का साइज क्या होगा और कस्टमर से नमस्ते कैसे करना है। जब यह सब कुछ पहले से लिखा होगा तो रमेश कभी कोई गलती नहीं करेगा। शर्मा जी को बार-बार रमेश के सिर पर खड़े होकर चिल्लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रमेश उस गाइड को पढ़ेगा और बिल्कुल शर्मा जी जैसा परफेक्ट स्वाद वाला गोलगप्पा तैयार कर देगा।
आपने मैकडॉनल्ड्स का नाम तो सुना ही होगा। दुनिया के हर कोने में उसका बर्गर मिलता है। आप दिल्ली के मैकडॉनल्ड्स में जाएं या मुंबई के या फिर अमेरिका के किसी शहर में चले जाएं। आपको हर जगह फ्रेंच फ्राइज का स्वाद बिल्कुल एक जैसा मिलेगा। ऐसा क्यों होता है। क्या उनका मालिक हर जगह खुद फ्राइज तलने जाता है। बिल्कुल नहीं। उनके पास एक बहुत ही कड़क प्लेबुक है। उसमें लिखा है कि आलू को कितने मिलीमीटर साइज में काटना है। तेल का तापमान कितना होना चाहिए और फ्राइज को कितने सेकंड तक फ्राई करना है। वहाँ काम करने वाला लड़का चाहे नया हो या पुराना वह सिर्फ उस प्लेबुक को फॉलो करता है और हर बार परफेक्ट रिजल्ट आता है।
बिजनेस का प्लेबुक बनाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। इसके लिए आपको कोई बहुत बड़ी इंग्लिश या भारी भरकम सॉफ्टवेयर नहीं चाहिए। आप आज ही से शुरुआत कर सकते हैं। जब भी आप कोई काम करें जैसे कस्टमर का फोन उठाना या बिल बनाना तो उसका एक छोटा सा वीडियो रिकॉर्ड कर लें या उसे स्टेप बाई स्टेप लिख लें। अपनी टीम को वह वीडियो दिखाएं और कहें कि अगली बार से काम बिल्कुल इसी तरीके से होना चाहिए।
जब आपके पास हर काम की एक तय गाइडलाइन होगी तो नए एम्प्लॉई को ट्रेनिंग देने का आपका समय बचेगा। आपकी गैरमौजूदगी में भी कंपनी के काम की क्वालिटी कभी खराब नहीं होगी। लेकिन याद रखिए केवल काम को लिखना ही काफी नहीं है। असली जादू तब होता है जब आप उस काम की पूरी जिम्मेदारी सही इंसान को सौंप देते हैं। और यही हमारा अगला सबसे जरूरी कदम है।
लेसन ३ : जिम्मेदारी सौंपें ना कि सिर्फ काम
पहले दो लेसन में हमने देखा कि कैसे शर्मा जी ने अपनी दुकान का एक परफेक्ट प्लेबुक बनाया और रमेश को काम पर रखा। अब रमेश गाइड को पढ़कर बिल्कुल शर्मा जी जैसा टेस्टी गोलगप्पा बना रहा है। दुकान पर ग्राहकों की भारी भीड़ है। शर्मा जी दूर बैठकर मुस्कुरा रहे हैं। लेकिन कहानी में अभी एक और बड़ा ट्विस्ट बाकी है। कुछ ही दिनों में शर्मा जी देखते हैं कि रमेश सिर्फ वही काम करता है जो उस किताब में लिखा है। अगर काउंटर पर पानी गिर जाए तो रमेश उसे साफ नहीं करता क्योंकि प्लेबुक में टेबल साफ करने की जिम्मेदारी उसकी नहीं लिखी थी। अगर कोई ग्राहक एक्स्ट्रा सूखी पूड़ी मांगता है तो रमेश मना कर देता है क्योंकि शर्मा जी ने प्लेबुक में इसकी मात्रा तय कर रखी थी। ग्राहक नाराज होकर जाने लगते हैं। शर्मा जी फिर परेशान हो जाते हैं कि अब क्या करें।
क्रिस रोन्जियो अपनी किताब द बिजनेस प्लेबुक में इस समस्या का सबसे बड़ा सीक्रेट बताते हैं। वह कहते हैं कि जिम्मेदारी सौंपें ना कि सिर्फ काम। जब आप किसी को अपनी कंपनी में रखते हैं तो उसे सिर्फ रोबोट की तरह काम मत सिखाइए। उसे उस काम का मालिक बनाइए। जब तक आप अपनी टीम को खुद फैसले लेने की आजादी नहीं देंगे तब तक आपका बिजनेस कभी आपके बिना नहीं चल पाएगा। आपको अपनी टीम को केवल यह नहीं बताना है कि क्या करना है बल्कि यह भी समझाना है कि वह काम कंपनी के लिए क्यों जरूरी है।
चलिए शर्मा जी की दुकान पर वापस चलते हैं। शर्मा जी अपनी गलती सुधारते हैं। वह रमेश को पास बुलाते हैं और कहते हैं कि रमेश आज से इस काउंटर के असली मालिक तुम हो। हमारा असली मकसद ग्राहकों के चेहरे पर मुस्कान लाना है। अगर कोई ग्राहक खुश होकर एक्स्ट्रा सूखी पूड़ी मांगता है तो उसे बिना पूछे दे दिया करो। अगर काउंटर गंदा दिखे तो उसे तुरंत साफ कर दिया करो। मैं हर छोटी बात के लिए तुम्हारे सिर पर नहीं खड़ा रहूँगा। दुकान का यह हिस्सा अब तुम्हारी जिम्मेदारी है।
इस एक बदलाव से रमेश के अंदर का मजदूर मर जाता है और एक लीडर का जन्म होता है। अब रमेश सिर्फ दुकान की नौकरी नहीं कर रहा बल्कि उसे लगता है कि यह उसका अपना बिजनेस है। वह ग्राहकों का ज्यादा ध्यान रखने लगता है। जब शर्मा जी दुकान पर नहीं होते तब भी रमेश पूरी ईमानदारी से काम करता है क्योंकि अब वह केवल काम नहीं निपटा रहा बल्कि अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है।
यही अंतर होता है एक साधारण कंपनी और एक बहुत बड़े ब्रांड में। जब आप अपनी टीम को जिम्मेदारी सौंपते हैं तो वह आपके बिजनेस को अपना समझने लगते हैं। वह संकट के समय खुद सही फैसले लेते हैं। आपको हर छोटी बात के लिए फोन नहीं घुमाना पड़ता। जब आपकी टीम इस लेवल पर काम करने लगती है तब जाकर आपको एक बिजनेस ओनर के रूप में असली आजादी मिलती है। तब आप चैन से सो सकते हैं और आपका बिजनेस रात दिन तरक्की करता रहता है।
तो दोस्तों आज ही अपनी कंपनी के तौर तरीकों को बदलिए। खुद को काम से बाहर निकालिए। हर प्रोसेस का एक लिखित प्लेबुक तैयार कीजिए। और सबसे जरूरी बात अपनी टीम पर भरोसा करके उन्हें जिम्मेदारी सौंपना शुरू कीजिए। जब आप यह तीन काम कर लेंगे तो आपका बिजनेस आपके बिना भी तेजी से बढ़ने लगेगा। यही एक सच्चे और कामयाब बिजनेसमैन की असली पहचान है। आज ही से अपने बिजनेस को ऑटोपायलट पर ले जाने की शुरुआत कीजिए।
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