क्या आप भी रद्दी के ढेर पर राजा बनकर बैठे हैं। मुबारक हो, आपके घर के बिल और पुराने पेपर्स अब आपसे ज्यादा जगह घेर रहे हैं। इस कचरे में दबकर मरना है या फिर ऑर्गनाइज्ड इंसान बनना है। चॉइस आपकी है, वरना जरूरी डॉक्यूमेंट ढूंढते समय आपकी शक्ल देखने लायक होगी।
स्टेफनी कल्प की किताब कान्करिंग द पेपर पाइल अप हमें सिखाती है कि कैसे इस कागजी पहाड़ को जड़ से खत्म करना है। आइए देखते हैं वह 3 बड़े लेसन्स जो आपकी जिंदगी और ऑफिस की टेबल को फिर से सांस लेने के लायक बना देंगे।
Lesson : पेपर को देखते ही फैसला करो - टॉस या फाइल
क्या आपने कभी अपनी डाइनिंग टेबल को गौर से देखा है। बेचारा फर्नीचर कम और रद्दी का गोदाम ज्यादा लगता है। स्टेफनी कल्प कहती हैं कि हमारे घर और ऑफिस में जो कागजों का पहाड़ खड़ा होता है, उसकी सबसे बड़ी वजह हमारी टालमटोल वाली आदत है। हम क्या करते हैं। डाक आई, बिल आया, या किसी ने कोई पर्चा थमाया, हम उसे टेबल पर पटक देते हैं और खुद को तसल्ली देते हैं कि इसे बाद में देखेंगे। भाई साहब, वह बाद कभी नहीं आता। वह एक कागज अगले दस कागजों को दावत देता है और देखते ही देखते आपकी टेबल पर एक नया इकोसिस्टम तैयार हो जाता है।
किताब का सबसे पहला और कड़वा सबक यही है कि जैसे ही कोई कागज आपके हाथ में आए, उसे उसी पल एक अंजाम तक पहुंचाओ। आपके पास केवल दो ही रास्ते होने चाहिए, या तो उसे कचरे के डिब्बे में डालो (टॉस) या फिर उसे उसकी सही जगह पर टिका दो (फाइल)। बीच का कोई रास्ता नहीं है। वह जो हम सोचते हैं कि इसे अभी यहाँ रख देता हूँ, बाद में सोचूँगा, वही असल में बर्बादी की जड़ है।
एक रीयल लाइफ एक्जाम्पल लेते हैं। मान लीजिए आपके बिजली का बिल आया। अब आपके पास दो चॉइस हैं। या तो उसे तुरंत पे करके फाइल में लगा दो, या फिर उसे पिज्जा के खाली डिब्बे के ऊपर रख दो। ज्यादातर लोग दूसरा ऑप्शन चुनते हैं। फिर क्या होता है। हफ्ता भर बाद जब लाइट कटने वाली होती है, तब आप उस बिल को पागलों की तरह ढूंढते हैं। तब आपको समझ आता है कि आपने बिल नहीं, बल्कि अपनी शांति को रद्दी में दबा दिया था।
स्टेफनी का कहना है कि 80 परसेंट कागज जो हम संभाल कर रखते हैं, उनकी हमें लाइफ में कभी जरूरत नहीं पड़ती। तो फिर यह मोह कैसा। वह पुराना रेस्टोरेंट का मेन्यू कार्ड या वह एक्सपायर हो चुका गारंटी कार्ड संभाल कर आप कौन सा किला फतह करने वाले हैं। अगर वह काम का नहीं है, तो उसे फाड़कर फेंकने में वैसी ही खुशी महसूस करो जैसी संडे को ऑफिस की छुट्टी होने पर होती है।
याद रखिए, आपकी टेबल कोई डस्टबिन नहीं है। हर कागज को हाथ में लेते ही खुद से पूछो, क्या यह मेरी लाइफ में वैल्यू एड कर रहा है। अगर जवाब ना है, तो डस्टबिन का दरवाजा खुला है। यह आदत शुरू में थोड़ी तकलीफ देगी, जैसे जिम का पहला दिन देता है, लेकिन यकीन मानिए, एक बार जब आपकी टेबल साफ रहने लगेगी, तो आपको अहसास होगा कि आप वाकई में अपने स्पेस के मालिक हैं, न कि उन बेजान कागजों के गुलाम।
जब आप इस टॉस या फाइल वाली कला में माहिर हो जाते हैं, तब बारी आती है उस सिस्टम की जहाँ आप इन कागजों को रखेंगे। क्योंकि कचरा फेंकना तो आसान है, लेकिन जो बचा है उसे संभालना असली खेल है।
Lesson : फाइलिंग सिस्टम को इतना आसान बनाओ कि बच्चा भी कर ले
अब मान लीजिए आपने कचरा तो फेंक दिया, लेकिन जो जरूरी कागज बचे हैं, उनका क्या। स्टेफनी कल्प कहती हैं कि हम इंडियन्स की एक बहुत बुरी आदत है। हम जब कुछ ऑर्गनाइज करने बैठते हैं, तो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा साइंटिस्ट समझने लगते हैं। हम ऐसे फाइलिंग सिस्टम बनाते हैं जो नासा के रॉकेट लॉन्च से भी ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड होते हैं। हम बीस अलग अलग रंग की फाइल्स लाएंगे, उन पर चमकते हुए स्टिकर्स लगाएंगे और ऐसी ऐसी कैटेगरीज बनाएंगे कि दो दिन बाद खुद ही भूल जाएंगे कि म्युनिसिपैलिटी का टैक्स वाला कागज किस फोल्डर में घुसाया था।
लेखिका का बहुत ही सीधा और सिंपल फंडा है, अपनी फाइलिंग को बच्चों वाला खेल बनाओ। अगर आपका सिस्टम बहुत ज्यादा मुश्किल है, तो यकीन मानिए आप उसे फॉलो कभी नहीं करेंगे। आप बस एक दिन जोश में आकर सब ठीक करेंगे और अगले हफ्ते तक आपकी अलमारी फिर से कबाड़खाना बन चुकी होगी। सादगी ही सफलता की चाबी है। आपको अपनी फाइल्स को ऐसे नाम देने चाहिए जो आपके दिमाग में सबसे पहले आएं। अगर कार का इंश्योरेंस है, तो फाइल का नाम कार रखो, न कि व्हीकल प्रोटेक्शन एंड लायबिलिटी डॉक्यूमेंट्स। इतना भारी शब्द पढ़कर तो वैसे ही आलस आ जाएगा।
मान लीजिए हमारे शर्मा जी हैं। शर्मा जी ने बहुत मेहनत से एक फाइल बनाई जिसका नाम रखा मिसलेनियस यानी फुटकर। अब हुआ क्या। अगले छह महीने में शर्मा जी ने घर का हर कागज, चाहे वह वाशिंग मशीन की रसीद हो या पुराने दोस्त की शादी का कार्ड, सब उसी मिसलेनियस फाइल में ठूंस दिया। नतीजा क्या निकला। जब उन्हें अपनी लाइफ इंश्योरेंस की पॉलिसी ढूंढनी पड़ी, तो वह पूरी फाइल को पलटकर बैठ गए जैसे कि किसी खजाने की खोज कर रहे हों।
स्टेफनी कहती हैं कि आपको अपने कागजों को अल्फाबेटिकल यानी ए से जेड के हिसाब से रखना चाहिए। इससे क्या होता है। आपका दिमाग ज्यादा मेहनत नहीं करता। बिजली का बिल ई यानी इलेक्ट्रिसिटी में जाएगा और हेल्थ इंश्योरेंस एच में। कितना आसान है ना। लेकिन हम तो ठहरे जुगाड़ू लोग, हम सोचते हैं कि सब एक ही बड़े थैले में रख देते हैं, जब जरूरत होगी तब देख लेंगे। यही वह सोच है जो आपको एक ऑर्गनाइज्ड लाइफ जीने से रोकती है।
आपका फाइलिंग सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि अगर आप घर पर न हों और किसी को कोई जरूरी पेपर चाहिए, तो वह सिर्फ अलमारी खोलकर उसे पांच सेकंड में ढूंढ ले। अगर आपको किसी को फोन पर समझाना पड़ रहा है कि वह नीली वाली फाइल के पीछे जो लाल वाला लिफाफा है उसके अंदर तीसरा पन्ना देखो, तो समझ लीजिए आपका सिस्टम पूरी तरह फेल है।
याद रखिए, आप कोई लाइब्रेरी नहीं चला रहे हैं, आप अपना घर और ऑफिस चला रहे हैं। जितनी कम कैटेगरीज होंगी, उतनी ही ज्यादा शांति होगी। जब आप यह सिंपल सिस्टम बना लेते हैं, तब असली चुनौती आती है उन कागजों की जो रोज नए आते हैं और आपके काम का हिस्सा होते हैं। उन्हें कैसे संभालना है, यह हम अगले लेसन में देखेंगे।
Lesson : एक्शन फाइल्स और रेफरेंस फाइल्स का जादुई बटवारा
अब आता है असली खिलाड़ी वाला मूव। स्टेफनी कल्प कहती हैं कि हमारे टेबल पर पड़े कागजों में दो तरह के कैरेक्टर होते हैं। एक वो जो शांति से कोने में पड़े रहना चाहते हैं और दूसरे वो जो शोर मचाते हैं कि मुझे अभी देखो, मेरा बिल भरो या मेरा जवाब दो। हम क्या गलती करते हैं। हम इन दोनों को एक ही ढेर में मिला देते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस कागज पर हमें तुरंत एक्शन लेना था, वह उन कागजों के नीचे दब जाता है जिन्हें हमें सिर्फ संभाल कर रखना था।
लेखिका का बहुत ही जबरदस्त सुझाव है, अपनी दुनिया को दो हिस्सों में बांट दो - एक्शन फाइल्स और रेफरेंस फाइल्स। एक्शन फाइल्स वो हैं जिन पर आपको काम करना है, जैसे कि वह बिल जिसकी लास्ट डेट कल है या वह फॉर्म जिसे भरकर ऑफिस ले जाना है। रेफरेंस फाइल्स वो हैं जिन्हें आप साल में एक बार शायद देखते भी नहीं, जैसे घर की रजिस्ट्री या पुराने टैक्स रिकॉर्ड्स।
हमारे गुप्ता जी को ले लीजिए। गुप्ता जी के पास एक ही बास्केट है जिसमें सब कुछ है। अब सोमवार की सुबह उन्हें एक क्लाइंट को कॉल करना था जिसका नंबर एक पर्ची पर लिखा था। लेकिन वह पर्ची कहाँ है। वह तो पिछले साल की दिवाली वाली फोटो के नीचे दबी पड़ी है। गुप्ता जी पागलों की तरह पूरा घर सिर पर उठा लेते हैं और अंत में पता चलता है कि वह पर्ची तो रद्दी के अखबार में चली गई। अगर गुप्ता जी के पास एक अलग एक्शन फोल्डर होता, तो उनका सोमवार इतना खराब नहीं होता।
स्टेफनी कहती हैं कि आपको अपनी डेस्क पर एक इन बॉक्स रखना चाहिए जहाँ सिर्फ वो कागज आएं जिन पर अभी फैसला लेना बाकी है। एक बार आपने फैसला ले लिया कि इसे संभाल कर रखना है, तो उसे तुरंत रेफरेंस फाइल में डाल दो। डेस्क पर केवल वही रहे जिस पर आज काम होना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किचन में खाना बनाते समय सिर्फ वही मसाले बाहर रखते हैं जिनकी जरूरत है, वरना पूरी किचन कबाड़खाना लगने लगती है।
सर्कस के शेर की तरह इन कागजों को अपने इशारों पर नचाना सीखो। अगर आप हर कागज को यह इजाजत दे देंगे कि वह आपकी डेस्क पर कहीं भी बैठ जाए, तो आप कभी काम नहीं कर पाएंगे, बस उन कागजों को हटाते ही रह जाएंगे। अपनी प्रायोरिटी सेट करो। जब आप अपनी डेस्क को इस तरह साफ रखते हैं, तो आपका दिमाग भी तेजी से काम करता है।
अंत में बस इतना याद रखिए कि कागज सिर्फ एक जरिया है, आपकी जिंदगी का मकसद नहीं। स्टेफनी कल्प की यह किताब हमें रद्दी से आजादी दिलाती है ताकि हम अपनी एनर्जी फालतू के कामों में नहीं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने में लगा सकें। अब उठिए और उस कागजी पहाड़ पर अपनी जीत का झंडा गाड़ दीजिए।
तो दोस्तों, क्या आप तैयार हैं अपने घर और ऑफिस से इस पेपर क्लटर को हमेशा के लिए विदा करने के लिए। याद रखिए, एक साफ डेस्क सिर्फ एक साफ जगह नहीं है, बल्कि एक साफ और प्रोडक्टिव दिमाग की निशानी है। आज ही अपनी टेबल का एक कोना पकड़िए और उसे ऑर्गनाइज करना शुरू कीजिए।
हमें कमेंट्स में जरूर बताएं कि आपके घर का कौन सा कोना सबसे ज्यादा रद्दी से भरा है और आप उसे कब साफ करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसकी टेबल हमेशा किसी पुराने सरकारी दफ्तर जैसी लगती है।
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