क्या आप अभी भी पुराने जमाने की कछुआ चाल वाली सर्विस दे रहे हैं? मुबारक हो, आप अपने कस्टमर्स को खुद चलकर अपने कॉम्पिटिटर के पास भेज रहे हैं। डिजिटल दुनिया में एक क्लिक की दूरी पर बैठा आपका दुश्मन आपके क्लाइंट्स को चुराने के लिए तैयार खड़ा है और आप सो रहे हैं। अगर आप नहीं चाहते कि आपका बिजनेस बस एक याद बनकर रह जाए तो संभल जाइए।
आज हम रोन जेमके और टॉम कॉनेलन की किताब ई सर्विस से ३ पावरफुल लेसन सीखेंगे जो आपके डूबते हुए बिजनेस को बचा सकते हैं।
Lesson : रिस्पॉन्स की स्पीड ही आपकी असली ताकत है
इमेजिन कीजिए कि आप एक बहुत ही महंगे रेस्टोरेंट में गए हैं। आपने मेन्यू देखा, वेटर को बुलाया, और अपना ऑर्डर दिया। अब आप भूखे प्यासे बैठे हैं और वेटर भाई साहब गायब हैं। १५ मिनट बीत गए, ३० मिनट बीत गए, और वेटर दूर खड़ा होकर आराम से मक्खियां मार रहा है। आपको कैसा लगेगा? जाहिर है, आपका मन करेगा कि उसी वक्त वहां से उठें और बगल वाले ढाबे पर जाकर पराठे खा लें। डिजिटल दुनिया में आपका कस्टमर भी ठीक इसी हालत में है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे बगल वाले ढाबे पर जाने के लिए अपनी कुर्सी से उठना भी नहीं पड़ता। उसे बस एक नया टैब खोलना है और वह आपके कॉम्पिटिटर की गोद में जाकर बैठ जाएगा।
किताब ई सर्विस के लेखक रोन जेमके और टॉम कॉनेलन हमें बड़ी सादगी से समझाते हैं कि ऑनलाइन बिजनेस की दुनिया में 'सब्र' नाम की चिड़िया उड़ चुकी है। अगर आप अपने कस्टमर की क्वेरी या ईमेल का जवाब देने में २४ घंटे लगा रहे हैं, तो आप उसे ये बता रहे हैं कि भाई तू मेरे लिए इम्पोर्टेन्ट नहीं है। आज के जमाने में स्पीड ही भगवान है। अगर आपका रिस्पॉन्स टाइम खराब है, तो आपकी सर्विस चाहे दुनिया में सबसे बेस्ट हो, कोई उसे देखने नहीं रुकेगा।
मान लीजिए हमारे दोस्त बंटी जी ने ऑनलाइन एक टीशर्ट ऑर्डर की। अब टीशर्ट का साइज थोड़ा छोटा निकल आया। बंटी ने कस्टमर केयर को ईमेल किया कि भैया इसे बदल दो। अब कंपनी का रिस्पॉन्स आता है तीन दिन बाद। तब तक बंटी उस टीशर्ट को अपने छोटे भाई को गिफ्ट कर चुके हैं और किसी दूसरी साइट से नई टीशर्ट मंगवा चुके हैं। तीन दिन बाद कंपनी का ईमेल पढ़कर बंटी का रिस्पॉन्स क्या होगा? वही, जो हम सबका होता है—गालियां! और वो कंपनी? बंटी के लिए वो अब मर चुकी है।
लोग अक्सर गलती यह करते हैं कि वे अपनी वेबसाइट को सजाने में करोड़ों खर्च कर देते हैं, लेकिन जब बात एक सिंपल चैटबॉट या क्विक रिस्पॉन्स टीम की आती है, तो वे कंजूसी करने लगते हैं। लेखक कहते हैं कि डिजिटल दुनिया में कॉम्पिटिशन सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है। अगर आपने कस्टमर को वेट करवाया, तो आप सिर्फ एक सेल नहीं खो रहे, आप अपना ब्रांड नेम मिट्टी में मिला रहे हैं।
सच्चाई तो ये है कि जब कोई बंदा ऑनलाइन शॉपिंग करता है या कोई सर्विस ढूंढता है, तो उसके दिमाग में डोपामाइन का लेवल हाई होता है। वह एक्साइटेड होता है। उस एक्साइटमेंट के दौरान अगर आप उसे 'थैंक यू, हम आपको दो दिन में बताएंगे' वाला मैसेज चिपका देते हैं, तो उसकी सारी एक्साइटमेंट ठंडी पड़ जाती है। आपको उस मोमेंट को पकड़ना है। अगर आप तुरंत रिस्पॉन्स देते हैं, तो कस्टमर को लगता है कि 'वाह, ये लोग तो मेरा इंतजार ही कर रहे थे'। यही वह फीलिंग है जो उसे आपका परमानेंट कस्टमर बनाती है।
अगले लेसन में हम देखेंगे कि कैसे सिर्फ स्पीड काफी नहीं है, बल्कि उस स्पीड के साथ थोड़ा अपनापन जोड़ना भी जरूरी है, ताकि कस्टमर को लगे कि वह किसी रोबोट से नहीं, बल्कि एक इंसान से बात कर रहा है।
Lesson : पर्सनल टच और कस्टमाइजेशन का जादू
क्या आपने कभी गौर किया है कि जब आप अपने मोहल्ले की उस पुरानी किराने वाली दुकान पर जाते हैं, तो वो दुकानदार आपको देखते ही मुस्कुराकर कहता है, "अरे शर्मा जी, नमस्ते! आपकी वाली चाय पत्ती आज ही आई है।" बस, वहीं आप पिघल जाते हैं। भले ही पास के बड़े मॉल में डिस्काउंट मिल रहा हो, पर आप शर्मा जी की दुकान ही जाएंगे। क्यों? क्योंकि वहाँ आपको एक 'इंसान' होने का अहसास मिलता है, सिर्फ एक 'कस्टमर' होने का नहीं। डिजिटल दुनिया में हम अक्सर इसी अहसास को भूल जाते हैं।
रोन जेमके और टॉम कॉनेलन अपनी किताब ई सर्विस में कहते हैं कि स्क्रीन के पीछे बैठा कस्टमर डेटा का एक टुकड़ा नहीं है। वह हाड़-मांस का इंसान है जिसे अपनी पहचान प्यारी है। आज के दौर में अगर आप अपने कस्टमर को "डियर कस्टमर" कहकर ईमेल भेज रहे हैं, तो यकीन मानिए आप उसे सीधा अपने कॉम्पिटिटर की बाहों में धकेल रहे हैं। आज का जमाना 'वन साइज फिट्स ऑल' का नहीं है। अगर आप सबको एक ही लाठी से हांकेंगे, तो कस्टमर भी आपको एक ही झटके में ब्लॉक कर देगा।
मान लीजिए हमारे प्यारे चिंटू जी ने पिछले महीने एक फिटनेस ऐप से जिम का सामान मंगवाया था। अब कंपनी उन्हें अगले महीने 'प्रेग्नेंसी विटामिन्स' के डिस्काउंट कूपन भेज रही है। अब चिंटू जी अपना सिर पीटें या कंपनी का? ये होता है डेटा का गलत इस्तेमाल। अगर वही ऐप चिंटू जी को उनकी पसंद के हिसाब से प्रोटीन पाउडर या नए डंबल के सुझाव देता, तो शायद चिंटू जी अपनी अगली सैलरी वहीं उड़ा देते।
लेखक हमें समझाते हैं कि कस्टमाइजेशन का मतलब सिर्फ नाम लिखना नहीं है। इसका मतलब है कस्टमर की आदतों को समझना। अगर कोई आपकी वेबसाइट पर बार-बार एक ही तरह की चीजें देख रहा है, तो उसे वही दिखाओ जो उसे पसंद है। उसे लगना चाहिए कि "भाई, इस वेबसाइट को तो मेरे दिल की बात पता है!" जब आप किसी को उसकी पसंद का कुछ दिखाते हैं, तो वह आपकी सर्विस नहीं, बल्कि एक एक्सपीरियंस खरीदता है।
सच्चाई तो ये है कि आज के इंटरनेट के जंगल में हजारों ऑप्शंस मौजूद हैं। लोग उस ब्रांड के पास रुकना पसंद करते हैं जो उन्हें 'स्पेशल' फील कराए। जब आप अपने यूजर को उसकी पिछली पसंद के आधार पर कुछ सजेस्ट करते हैं, तो आप उसका समय बचा रहे होते हैं। और याद रखिए, डिजिटल दुनिया में समय बचाना ही सबसे बड़ा पुण्य है।
लेकिन सावधान! पर्सनल टच का मतलब यह भी नहीं कि आप कस्टमर के बेडरूम तक घुस जाएं और उसे डरा दें। प्राइवेसी का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। आपको एक दोस्त की तरह पेश आना है, किसी जासूस की तरह नहीं। जब आप सही बैलेंस बना लेते हैं, तो आपका कस्टमर सिर्फ सामान नहीं खरीदता, बल्कि वह आपके ब्रांड का वफादार बन जाता है।
अगले लेसन में हम बात करेंगे उस सिचुएशन की जिससे हर बिजनेस डरता है—कस्टमर की नाराजगी। हम सीखेंगे कि कैसे एक गुस्से वाले कस्टमर को अपना सबसे बड़ा फैन बनाया जा सकता है।
Lesson : शिकायतों को वफादारी में बदलने का मौका
इमेजिन कीजिए कि आपने ऑनलाइन एक बहुत ही महंगा स्मार्टफोन मंगवाया। आप बड़े एक्साइटेड थे, लेकिन जैसे ही डिब्बा खोला, अंदर से फोन की जगह ईंट का टुकड़ा निकला। आपका खून खौलने लगा, आपने तुरंत कस्टमर केयर को फोन लगाया और वहां से जवाब आता है, "सर, हम चेक करके ७ वर्किंग डेज में बताएंगे।" अब उस वक्त आपका मन करेगा कि उसी ईंट से अपना लैपटॉप तोड़ दें। यही वह मोमेंट है जहां या तो एक बिजनेस हमेशा के लिए खत्म हो जाता है, या फिर वह एक ऐसा वफादार कस्टमर बना लेता है जो जिंदगी भर उसका गुणगान करेगा।
रोन जेमके और टॉम कॉनेलन अपनी किताब ई सर्विस में एक बहुत ही कड़वा सच बताते हैं। वे कहते हैं कि गलतियां तो हर बिजनेस से होंगी, क्योंकि हम इंसान हैं और हमारी बनाई मशीनें भी फेल हो सकती हैं। लेकिन असली विनर वह है जो उस गलती को 'रिकवरी' में बदल दे। इसे 'सर्विस रिकवरी पैराडॉक्स' कहते हैं। इसका मतलब है कि एक ऐसा कस्टमर जिसकी प्रॉब्लम को आपने बहुत अच्छे से और जल्दी सॉल्व किया है, वह उस कस्टमर से ज्यादा वफादार होता है जिसे कभी कोई प्रॉब्लम आई ही नहीं।
मान लीजिए हमारे दोस्त गोलू जी ने एक ऑनलाइन फूड ऐप से पिज्जा मंगवाया। पिज्जा आया ३० मिनट लेट और वो भी एकदम ठंडा। गोलू जी ने ऐप पर शिकायत की। अब कंपनी के पास दो रास्ते थे। पहला, वो गोलू जी को ५ रुपये का डिस्काउंट कूपन पकड़ा देते जिसे गोलू जी कूड़ेदान में डाल देते। दूसरा रास्ता जो कंपनी ने चुना—उन्होंने गोलू जी को तुरंत फोन किया, माफी मांगी, उनके पैसे रिफंड किए और साथ ही १० मिनट के अंदर एक गरमा-गरम 'कॉम्प्लीमेंट्री' पिज्जा उनके घर भिजवा दिया।
अब गोलू जी का गुस्सा तो गायब हो ही गया, साथ ही अब वो ऑफिस में हर किसी को बता रहे हैं कि "भाई, ये कंपनी कितनी बढ़िया है!" यही तो जादू है। जब आप अपनी गलती मानते हैं और उसे सुधारने के लिए उम्मीद से ज्यादा करते हैं, तो कस्टमर को लगता है कि आप सच में उसकी परवाह करते हैं।
लेखक समझाते हैं कि ई सर्विस में 'सुनना' ही सबसे बड़ी सर्विस है। डिजिटल दुनिया में जब कोई शिकायत करता है, तो वह चीख-चीख कर आपको बता रहा होता है कि "देखो भाई, तुम्हारे सिस्टम में यहाँ छेद है, इसे भर लो।" अगर आप उसे अनसुना करते हैं, तो वह सोशल मीडिया पर जाकर आपकी बैंड बजा देगा। लेकिन अगर आप उसे तुरंत और प्यार से हैंडल करते हैं, तो वही नाराज कस्टमर आपका सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर बन जाता है।
तो कहानी का सार यही है—स्पीड से रिस्पॉन्स दो, हर कस्टमर को स्पेशल फील कराओ और जब गलती हो जाए, तो उसे सुधारने में कंजूसी मत करो। अगर आपने ये तीन चीजें मास्टर कर लीं, तो आपका कॉम्पिटिटर चाहे आपसे एक क्लिक क्या, एक इंच की दूरी पर भी क्यों न हो, वह आपका बाल भी बांका नहीं कर पाएगा।
दोस्तो, डिजिटल दुनिया में बिजनेस करना किसी युद्ध से कम नहीं है। यहाँ सिर्फ वही टिकेगा जो अपने कस्टमर के दिल में जगह बनाएगा। याद रखिए, कस्टमर सिर्फ सामान नहीं खरीदता, वह भरोसा खरीदता है। अगर आप वह भरोसा बनाए रखने में कामयाब रहे, तो आपकी सक्सेस को कोई नहीं रोक सकता। आज से ही अपने बिजनेस में इन लेसन्स को अपनाइए और देखिए कैसे आपका छोटा सा काम एक बड़ा ब्रांड बन जाता है।
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