A Stake in the Outcome (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आपकी कंपनी के लोग सिर्फ सैलरी के लिए आते हैं और घड़ी देखकर भाग जाते हैं तो मुबारक हो। आप एक बिजनेस नहीं बल्कि एक एडल्ट डे केयर सेंटर चला रहे हैं। बिना ओनरशिप कल्चर के आपका बिजनेस उस नाव जैसा है जिसमें छेद आप भर रहे हैं और एम्प्लॉई मजे से किनारे का इंतजार कर रहे हैं।

आज हम जैक स्टैक की मशहूर किताब ए स्टेक इन द आउटकम से वह राज जानेंगे जो आपके एम्प्लॉई को असली पार्टनर बना देगा। क्या आप तैयार हैं अपने बिजनेस को एक ऑटोपायलट सक्सेस मशीन बनाने के लिए। चलिए गहराई से समझते हैं इस किताब के ३ बड़े लेसन।


लेसन १ : एम्प्लॉई को नौकर नहीं ओनर की तरह सोचना सिखाएं

ज्यादातर बिजनेस मालिक इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके एम्प्लॉई ऑफिस में सिर्फ टाइम पास करते हैं और जैसे ही शाम के ६ बजते हैं वे ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। अगर आपको भी लगता है कि आपकी टीम के लोग सिर्फ अपनी डेस्क पर बैठकर मंथली सैलरी का इंतजार कर रहे हैं तो गलती उनकी नहीं बल्कि आपकी है। जैक स्टैक कहते हैं कि जब तक किसी इंसान का उस काम में अपना कोई फायदा या हिस्सा नहीं दिखता तब तक वह कभी भी अपनी पूरी जान नहीं लगाएगा। आप उन्हें मोटिवेशनल स्पीच दे दें या फिर ऑफिस में मुफ्त की कॉफी पिला दें उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। असली बदलाव तब आता है जब आप उन्हें एक ओनर की तरह सोचना सिखाते हैं।

जरा सोचिए कि अगर आप किसी रेंट की कार को चला रहे हैं तो क्या आप उसके गड्ढों या उसके इंजन की उतनी चिंता करेंगे जितनी आप अपनी खुद की कार की करते हैं। बिल्कुल नहीं। आप तो बस उसे गंतव्य तक पहुंचाकर चाबी पकड़ाना चाहते हैं। यही हाल आपके बिजनेस का है। जब तक एम्प्लॉई को यह नहीं लगता कि कंपनी का मुनाफा उसका अपना मुनाफा है तब तक वह कभी भी कंपनी की छोटी छोटी बर्बादी को रोकने की कोशिश नहीं करेगा। ओनरशिप का मतलब सिर्फ कागजों पर शेयर देना नहीं होता बल्कि एक ऐसा माइंडसेट बनाना होता है जहां हर एम्प्लॉई को यह लगे कि अगर कंपनी डूबेगी तो उसका अपना घर भी डूबेगा।

मान लीजिए आपका एक छोटा सा कैफे है और आपका वेटर हर रोज दो चार कांच के गिलास तोड़ देता है। आप उसे चिल्लाएंगे या उसकी सैलरी काट लेंगे लेकिन इससे उसकी सोच नहीं बदलेगी। लेकिन अगर आप उसे यह समझा दें कि हर टूटा हुआ गिलास उसके साल के अंत में मिलने वाले बोनस को कम कर रहा है तो वह उन गिलासों को अपनी जान से भी ज्यादा संभलकर रखेगा। यही है ए स्टेक इन द आउटकम का असली जादू। जब आप लोगों को रिजल्ट में हिस्सेदार बनाते हैं तो वे काम को बोझ नहीं बल्कि अपना मिशन समझने लगते हैं। आपको ऐसी वर्क कल्चर बनानी होगी जहां हर कोई नंबर्स को समझे और बिजनेस की भाषा बोले।

जैक स्टैक ने अपनी कंपनी एसआरसी में यही किया था। उन्होंने देखा कि जब लोगों को बिजनेस की बारीकियां समझ आने लगीं तो उन्होंने ऐसे ऐसे तरीके खोजे जिससे कंपनी का खर्चा कम हुआ और मुनाफा बढ़ गया। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि सीधा सा इंसानी स्वभाव है। हम उसी चीज का ख्याल रखते हैं जिसे हम अपना मानते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपके एम्प्लॉई भी आधी रात को उठकर कंपनी के बारे में सोचें तो पहले उन्हें यह अहसास दिलाना होगा कि इस खेल में उनकी अपनी खाल भी दांव पर लगी है।

बिना किसी हिस्सेदारी के आप उनसे वफादारी की उम्मीद वैसे ही कर रहे हैं जैसे किसी अनजान इंसान से अपनी जायदाद की रखवाली करने की उम्मीद करना। यह सुनने में थोड़ा कड़वा लग सकता है लेकिन हकीकत यही है कि दुनिया स्वार्थ पर चलती है। अगर आप अपने एम्प्लॉई के स्वार्थ को कंपनी के विजन के साथ जोड़ दें तो आपको कभी भी उन्हें काम के लिए टोकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे खुद आगे बढ़कर जिम्मेदारियां लेंगे और आपको एक बॉस से ज्यादा एक लीडर की तरह सम्मान देंगे। क्या आप वाकई अपनी टीम को वह हक देने के लिए तैयार हैं जो उन्हें एक ओनर की तरह फील कराए।


लेसन २ : ओपन बुक मैनेजमेंट और नंबर्स का खेल

अगर आप अपने बिजनेस के प्रॉफिट और लॉस को एक तिजोरी में बंद करके रखते हैं जैसे वह आपकी दादी का खानदानी हार हो तो यकीन मानिए आप अपने एम्प्लॉई को अंधेरे में रख रहे हैं। जैक स्टैक का मानना है कि बिजनेस एक खेल है और जैसे किसी भी खेल में स्कोरबोर्ड के बिना मजा नहीं आता वैसे ही बिना फाइनेंशियल जानकारी के काम करना बोरियत भरा है। जब आपके एम्प्लॉई को यह पता ही नहीं होता कि कंपनी कितना कमा रही है या कितना खो रही है तो वे अपने मन में यह मान लेते हैं कि आप तो नोट छाप रहे हैं और उन्हें सिर्फ मूंगफली दे रहे हैं। फिर चाहे आपका बिजनेस घाटे में ही क्यों न चल रहा हो।

ओपन बुक मैनेजमेंट का मतलब यह नहीं है कि आप हर किसी को अपनी पर्सनल बैंक डिटेल्स दे दें। इसका मतलब है कंपनी के उन नंबर्स को शेयर करना जिनका असर उनके काम पर पड़ता है। मान लीजिए आपकी एक आईटी कंपनी है और आपकी टीम को पता ही नहीं है कि एक क्लाइंट के जाने से कंपनी को कितना बड़ा झटका लगता है। उनके लिए वह सिर्फ एक प्रोजेक्ट का अंत होगा लेकिन अगर उन्हें पता हो कि उस क्लाइंट के जाने से अगले महीने का रेंट देना मुश्किल हो जाएगा तो वे उस क्लाइंट को भगवान की तरह पूजेंगे। जब लोग नंबर्स देखते हैं तो उनमें डर नहीं बल्कि जिम्मेदारी का अहसास जागता है।

हकीकत तो यह है कि बहुत से एम्प्लॉई को लगता है कि अगर कंपनी १ करोड़ का रेवेन्यू कर रही है तो पूरे १ करोड़ मालिक की जेब में जा रहे हैं। उन्हें रेंट टैक्स बिजली का बिल और मार्केटिंग के खर्चे का कोई अंदाजा नहीं होता। जब आप उनके सामने बैलेंस शीट खोलकर रख देते हैं तो उन्हें समझ आता है कि बिजनेस चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने घर का बजट अपनी पत्नी या बच्चों को बताते हैं ताकि वे फिजूलखर्ची न करें। जब टीम को पता चलता है कि हर बचाया हुआ पैसा कंपनी की सेहत सुधारता है तो वे खुद ब खुद बिजली के स्विच बंद करने लगेंगे और फालतू के खर्चों पर लगाम लगाएंगे।

कई बॉस सोचते हैं कि अगर उन्होंने प्रॉफिट दिखा दिया तो एम्प्लॉई सैलरी बढ़ाने की मांग करेंगे। लेकिन सच तो यह है कि जब आप उन्हें नंबर्स सिखाते हैं तो वे यह भी समझते हैं कि सैलरी बढ़ाने के लिए प्रॉफिट को कितना और बढ़ाना पड़ेगा। वे आपके साथ मिलकर उस लक्ष्य को पाने के लिए लड़ेंगे। जैक स्टैक कहते हैं कि हर इंसान में एक नेचुरल कॉम्पिटिटिव स्पिरिट होती है। जब आप उन्हें एक टारगेट देते हैं और उसे ट्रैक करने का मौका देते हैं तो वे उसे एक चैलेंज की तरह लेते हैं। वे सिर्फ काम नहीं करते बल्कि वे उस स्कोरबोर्ड को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं।

बिना नंबर्स के काम करना वैसा ही है जैसे आप बिना मीटर वाली टैक्सी चला रहे हों। न आपको पता है आप कहां जा रहे हैं और न ही यह पता है कि किराया कितना बनेगा। ऐसी स्थिति में केवल कंफ्यूजन और अविश्वास पैदा होता है। जब आप पारदर्शिता लाते हैं तो आप अपनी टीम को यह मैसेज देते हैं कि मुझे तुम पर भरोसा है। और जब आप लोगों पर भरोसा करते हैं तो वे आपको निराश नहीं करते। वे बिजनेस के उतार चढ़ाव को समझने लगते हैं और मुश्किल समय में आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं। क्या आपका स्कोरबोर्ड आपकी टीम के लिए तैयार है।


लेसन ३ : लॉन्ग टर्म वेल्थ और भविष्य की हिस्सेदारी

ज्यादातर कंपनियां अपने एम्प्लॉई को सिर्फ आज की रोटी का जुगाड़ देती हैं। आप उन्हें सैलरी देते हैं, वो अपना बिल भरते हैं और अगले महीने फिर उसी चूहा दौड़ में शामिल हो जाते हैं। लेकिन जैक स्टैक कहते हैं कि अगर आप चाहते हैं कि आपके लोग कंपनी को अपना समझें, तो आपको उनके भविष्य की चिंता करनी होगी। केवल दिवाली बोनस या महीने की पगार से वफादारी नहीं खरीदी जा सकती। असली ओनरशिप तब आती है जब एक एम्प्लॉई को यह दिखने लगे कि १० साल बाद जब वह रिटायर होगा या कंपनी छोड़ेगा, तो उसके पास एक ऐसी संपत्ति होगी जो उसने खुद अपने हाथों से बनाई है।

इस दुनिया में हर कोई अमीर बनना चाहता है, लेकिन एक साधारण एम्प्लॉई के पास वेल्थ बनाने के साधन बहुत कम होते हैं। जब आप अपनी कंपनी में प्रॉफिट शेयरिंग या स्टॉक ओनरशिप जैसे प्लान लाते हैं, तो आप उन्हें केवल एक जॉब नहीं बल्कि एक इन्वेस्टमेंट दे रहे होते हैं। सोचिए, एक सफाई कर्मचारी भी अगर यह जान ले कि कंपनी की ग्रोथ के साथ उसकी अपनी नेट वर्थ बढ़ रही है, तो वह झाड़ू भी किसी आर्टिस्ट की तरह लगाएगा। वह सिर्फ धूल साफ नहीं कर रहा होगा, वह अपने भविष्य की कीमत बढ़ा रहा होगा। और जो लोग यह नहीं समझते, वे वही हैं जो ऑफिस के टॉयलेट में बैठकर रील्स देखते हैं और सोचते हैं कि कंपनी भाड़ में जाए, मुझे क्या।

कई बिजनेस मालिक अपने एम्प्लॉई से ऐसी उम्मीद करते हैं जैसे वे उनके बचपन के लंगोटिया यार हों और बिना किसी फायदे के कंपनी के लिए जान दे देंगे। मेरे भाई, यह कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं है। हकीकत में हर इंसान के पीछे एक परिवार है जिसकी जरूरतें बढ़ रही हैं। अगर आप उन्हें भविष्य की सुरक्षा नहीं देंगे, तो कोई और कंपनी उन्हें ५ हजार ज्यादा देकर उड़ा ले जाएगी। और तब आप बैठकर वफादारी पर प्रवचन देंगे। जैक स्टैक का मॉडल कहता है कि जब एम्प्लॉई को लॉन्ग टर्म वेल्थ में स्टेक मिलता है, तो वह कंपनी के छोटे मोटे उतार चढ़ाव से घबराता नहीं है। वह एक इन्वेस्टर की तरह सोचता है और लंबी रेस का घोड़ा बनता है।

जरा उस एम्प्लॉई के बारे में सोचिए जो आपकी कंपनी में १० साल से है। क्या उसके पास इतना पैसा जुड़ा है कि वह गर्व से कह सके कि यह कंपनी मेरी मेहनत से यहाँ पहुंची है और आज मैं भी इसका फल चख रहा हूं। अगर नहीं, तो आपकी ओनरशिप कल्चर सिर्फ कागजों पर है। जब आप लोगों को आउटकम यानी नतीजे में हिस्सा देते हैं, तो आप असल में अपनी सरदर्दी कम कर रहे होते हैं। अब आपको हर बात पर नजर रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हर एम्प्लॉई अब खुद अपना बॉस बन चुका है। उसे पता है कि कंपनी की बर्बादी उसकी अपनी तिजोरी में लगा सेंध है।

यह बात समझ लीजिए कि एक महान कंपनी वह नहीं है जिसका टर्नओवर अरबों में है, बल्कि वह है जिसके लोग यह कहें कि हम सब इसके मालिक हैं। जैक स्टैक और बो बर्लिंगहम की यह किताब हमें सिखाती है कि बिजनेस सिर्फ पैसा बनाने की मशीन नहीं, बल्कि साथ मिलकर वेल्थ बनाने का एक जरिया है। अगर आप आज अपनी टीम के हाथ में मशाल थमाएंगे, तो कल वे अंधेरे में भी आपके बिजनेस का रास्ता रोशन करेंगे। क्या आप अपनी सल्तनत अकेले चलाना चाहते हैं या एक ऐसी सेना बनाना चाहते हैं जो जीत में बराबर की हकदार हो। फैसला आपका है।


तो दोस्तों, क्या आप अब भी अपने बिजनेस को एक तानाशाही की तरह चलाना चाहते हैं या फिर जैक स्टैक के इस ओनरशिप मॉडल को अपनाकर एक लेजेंडरी टीम बनाना चाहते हैं। याद रखिए, अकेला इंसान सिर्फ दुकान चला सकता है, लेकिन एक ओनरशिप माइंडसेट वाली टीम साम्राज्य खड़ा करती है। नीचे कमेंट में बताएं कि आपको इन ३ लेसन में से कौन सा सबसे ज्यादा पसंद आया और क्या आप अपनी कंपनी में ओपन बुक मैनेजमेंट शुरू करने की हिम्मत रखते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपने एम्प्लॉई से परेशान हैं, शायद उनकी लाइफ बदल जाए।

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