क्या आप भी उन्हीं लोगों में से हैं जो सोचते हैं 'मैं क्रिएटिव नहीं हूँ'? मुबारक हो! आप हर रोज़ अपने करियर के ९०% बेस्ट आइडियाज़ को 'सेल्फ़-सेंसर' करके मार रहे हैं। जिस क्रिएटिविटी को आप ढूँढ रहे हैं, वो पहले से आपके दिमाग़ में है, बस उसे 'सही तरीक़े' से यूज़ करना नहीं आता। ज़्यादा देर मत कीजिए, इन तीन मज़ेदार लेसन्स से समझें कि कैसे आप क्रिएटिविटी की रेस में पीछे छूट रहे हैं।
Lesson : 'सही' जवाब के पीछे मत भागो, वरना 'बेस्ट' को मिस कर दोगे
जब कोई आपको गणित का सवाल देता है, तो आप क्या ढूँढते हैं? सिर्फ़ सही जवाब। जब कोई आपसे आपकी प्रॉब्लम पूछता है, तो आप क्या ढूँढते हैं? सिर्फ़ सही सोल्यूशन। यही हमारी परवरिश का सबसे बड़ा ट्रैप है। हमने अपने दिमाग़ को एक ऐसा रोबोट बना दिया है जो केवल 'यस' या 'नो' की कमांड पर चलता है। यह सोच कि हर प्रॉब्लम का केवल एक ही 'परफ़ेक्ट' जवाब होता है, हमारी क्रिएटिविटी को सीधा 'आईसीयू' में भेज देती है।
ज़रा सोचिए, अगर किसी इंजीनियर से कहा जाए कि 'फ़्लाइट बनाओ', और वो बोले, "सबसे 'सही' जवाब तो है कि इसे ट्रेन जैसा बना दूँ क्योंकि ट्रेन सबको पता है", तो क्या हम कभी उड़ पाते? नहीं! 'सही' जवाब अक्सर वह होता है जो सुरक्षित होता है, जो १०० लोगों ने पहले ही ट्राई कर लिया होता है। लेकिन, 'बेस्ट' जवाब हमेशा वहाँ छिपा होता है जहाँ कोई जाने की हिम्मत नहीं करता।
मान लीजिए, आपके घर में पार्टी है और आपको डेकोरेशन के लिए एक नया आइडिया चाहिए। आपका 'सही' जवाब क्या होगा? गुब्बारे और लाइट्स लगा दो। यही तो सब करते हैं। ये 'सही' है, क्योंकि ये सेफ़ है, और इसमें कोई रिस्क नहीं है।
अब एक क्रिएटिव दिमाग़ क्या सोचेगा? "इस बार मैं गुब्बारे नहीं, बल्कि घर के सारे पुराने अख़बारों से अलग-अलग जानवरों के स्कल्पचर बनाऊँगा।"
आपका दोस्त हँसेगा, बोलेगा, "क्या मज़ाक़ कर रहा है? ये तो ग़लत है, अजीब है।"
लेकिन, वो 'ग़लत' आइडिया ही आपकी पार्टी को 'टॉक ऑफ़ द टाउन' बना देगा। लोग याद रखेंगे।
रोजर वॉन ओक कहते हैं, 'सही' जवाब, यानी 'सेफ़ ज़ोन', आपकी क्रिएटिविटी को मार देता है। जब आप जान-बूझकर 'ग़लत' जवाबों की एक लंबी लिस्ट बनाते हैं, तो आपके दिमाग़ की बंद खिड़कियाँ खुल जाती हैं। आप ख़ुद से कहिए, "मुझे इस प्रॉब्लम के १० ऐसे सोल्यूशन ढूँढने हैं जो १००% फ़ेल हो जाएँगे।" जब आप ये करते हैं, तो आप अपने 'सेल्फ़-जजमेंट' को साइड में रख देते हैं। आप फ़ेल होने का डर छोड़ देते हैं। और तब, उन १० 'वाहियात' आइडियाज़ के बीच से ही, एक ऐसा 'हीरा' आइडिया निकल आता है, जिसे आपने कभी सोचा भी नहीं होगा।
हमें 'सही' होने का तनाव इतना ज़्यादा है कि हम नया ट्राई ही नहीं करते। लेकिन, अगर 'सही' होने का प्रेशर कम हो जाए, तो क्या होगा? अगर हम काम को भी खेल की तरह देखें? यही सोच हमें दूसरे लेसन की तरफ़ ले जाती है। क्योंकि, अगर आप हमेशा 'सीरियस' रहेंगे, तो आपका दिमाग़ कभी 'रिलैक्स' नहीं होगा। और बिना रिलैक्सेशन के, कोई 'धमाकेदार' आइडिया नहीं आता।
Lesson : सीरियस होना बंद करो, क्योंकि मस्ती करना टाइम पास नहीं, क्रिएटिविटी है
कितनी फ़नी बात है ना? हम घंटों तक सोचते रहते हैं कि कैसे अमीर बनें, कैसे बड़े बनें... पर सोचते-सोचते इतना थक जाते हैं कि आख़िर में वही 'घिसा-पिटा' तरीक़ा अपना लेते हैं। क्यों? क्योंकि हमने 'सीरियस' होने को 'प्रोफ़ेशनल' होना मान लिया है। अगर आप ऑफ़िस में १० मिनट हँस लिए, तो बॉस सोचेगा, "आज काम कम हो रहा है क्या?"
लेकिन, दुनिया के कई महान आइडियाज़ किसी 'सीरियस' बोर्ड मीटिंग में नहीं, बल्कि कॉफ़ी ब्रेक के दौरान, बाथरूम में या बच्चों के साथ खेलते हुए आए हैं।
वॉन ओक इसे 'प्ले' (Play) कहते हैं, और वो कहते हैं, 'प्ले इज़ नॉट फ़्रिवोलस' (खेल-कूद/मस्ती करना बेकार नहीं है)। यह आपके दिमाग़ का 'पार्टी टाइम' है। जब आपका दिमाग़ स्ट्रेस से दूर होता है, तभी वह बेधड़क होकर चीज़ों को मिक्स-मैच करता है। 'प्ले' ही वो जादुई माहौल है जहाँ एक 'ग़लत' बात से एक 'सही' आइडिया पैदा हो जाता है।
एक बार एक कंपनी को अपने प्रोडक्ट के लिए एक नया लोगो (Logo) बनाना था। ग्राफ़िक डिज़ाइनर ५ दिन से माथापच्ची कर रहा था, पर कोई 'शानदार' चीज़ नहीं बन रही थी। एक दिन उसका बेटा एक ब्लॉक (Block) वाले गेम से खेल रहा था। लड़का ब्लॉक को उल्टा-सीधा जोड़ रहा था।
पिता ने बेटे से मज़ाक़ में कहा, "यार, तू इन ब्लॉक को जोड़कर दिखा दे, तो मेरा लोगो बन जाएगा।"
बेटे ने दो ब्लॉक को ऐसे जोड़ा कि वो दिखने में किसी 'इत्तेफ़ाक़' वाले आर्ट पीस जैसा लग रहा था। पिता को झटका लगा। अरे वाह! यह तो वही 'एब्सर्ड' शेप है जो मेरे लोगो के लिए बिल्कुल सही है।
देख रहे हैं आप? एक बच्चे के 'खेल' ने एक प्रोफ़ेशनल की 'सीरियस' प्रॉब्लम सॉल्व कर दी।
आपको अपने 'भीतर के बच्चे' को बाहर निकालना होगा। अगली बार जब आप किसी प्रॉब्लम पर अटक जाएँ, तो ५ मिनट के लिए अपने काम को साइड में रख दीजिए। कोई मज़ाक़िया वीडियो देखिए, कोई अजीब सा गाना सुनिए, या अपनी पुरानी डायरी में लिखी कोई बचकानी बात पढ़िए। ये 'टाइम पास' नहीं है, ये आपके दिमाग़ को वॉर्म-अप दे रहा है।
जब आप अपने दिमाग़ को 'फ़ालतू' सोचने की आज़ादी देते हैं, तभी आप ऐसी चीज़ें देख पाते हैं जो 'सीरियस' रहते हुए कभी नहीं दिखतीं। यही 'हल्कापन' आपको अगले लेसन के लिए तैयार करता है। क्योंकि जब आप 'खेलते' हैं, तो आप ग़लतियाँ करने से डरते नहीं हैं। आप जानते हैं कि खेल में गिरना भी मस्ती का हिस्सा है। अब सवाल यह है कि उस 'गिरने' को 'उठने' में कैसे बदला जाए।
Lesson : गिरो, पर वहीं पड़े मत रहो; आपकी ग़लतियाँ 'डेटा' हैं, फ़ेलियर नहीं
हम सबने बचपन से एक ही बात सुनी है: 'ग़लती करने की गुंजाइश नहीं है।' स्कूल हो या घर, ग़लती होते ही हमें शर्मिंदा महसूस कराया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि बड़े होकर हम ग़लती करने से इतना डरते हैं कि नया ट्राई ही नहीं करते। हम 'फ़ेलियर' शब्द से इतनी नफ़रत करते हैं कि जैसे ही कोई काम बिगड़ता है, हमारा अंदर का जज बोलता है, "देखा, मैंने कहा था ना, तू इसके लायक़ नहीं है।" यह डर हमें इतना पीछे खींच लेता है कि हम दूसरा क़दम उठाने से पहले ही हार मान लेते हैं।
लेकिन, क्रिएटिविटी का रूल बिल्कुल उल्टा है। वॉन ओक की फिलॉसफ़ी में, 'फ़ेलियर' नहीं होता, सिर्फ़ 'डेटा' होता है। हाँ, डेटा! जब आप कोई ग़लती करते हैं, तो आप फ़ेल नहीं होते। आप सिर्फ़ एक बहुत ज़रूरी जानकारी पाते हैं: "ये तरीक़ा काम नहीं करेगा।" और यह जानकारी आपको 'सही' तरीक़े के एक क़दम और क़रीब ले जाती है।
अगर आप 'आउट ऑफ़ द बॉक्स' सोच रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप वह कर रहे हैं जो किसी ने नहीं किया। और जब आप बिना मैप के सफ़र करते हैं, तो रास्ता भटकना तो तय है। यही रास्ता भटकना आपकी क्रिएटिविटी का GPS है।
मान लीजिए, आपने अपनी पहली 'ऑनलाइन क्लास' शुरू की। आपने रात-दिन एक करके अपना पहला वीडियो रिकॉर्ड किया, एडिट किया, और अपलोड कर दिया। पर वीडियो इतना बोरिंग निकला कि पहले १० सेकंड में ही लोग बंद करके भाग गए।
'आम आदमी' सोचेगा: "बस, अब सब बंद कर दो। मैं ऑनलाइन पढ़ाने के लायक़ नहीं हूँ। मैंने अपना समय और पैसा बर्बाद कर दिया।" (ये है फ़ेलियर माइंडसेट)
'क्रिएटिव' आदमी क्या सोचेगा? "ओह, ये तो मज़ा आ गया! मुझे 'डेटा' मिला! इस वीडियो से मैंने सीखा कि: १. मेरी लाइटिंग ख़राब थी, २. मेरी आवाज़ बहुत धीमी थी, और ३. १० सेकंड बाद मैंने एक ऐसा मज़ाक़ कर दिया जो किसी को समझ नहीं आया। चलो! अब मेरे पास ३ ऐसी चीज़ें हैं जो अगली बार मैं ठीक करूँगा। यह तो एक बहुत महंगा और बहुत अच्छा फ़ीडबैक है!" (ये है क्रिएटिव माइंडसेट)
ग़लती तब बुरी है जब आप उसे अपने 'व्यक्तित्व' का हिस्सा बना लेते हैं ('मैं एक फ़ेलियर हूँ')। ग़लती तब वरदान है जब आप उसे 'प्रोसेस' का हिस्सा बना लेते हैं ('ये स्टेप काम नहीं किया')।
आपको अपनी ग़लतियों के साथ 'दोस्ती' करनी होगी। उन्हें अपनाओ, उनसे सीखो, और उन्हें अपनी अगली सफलता का सीक्रेट हथियार बनाओ। जब तक आप ग़लती को एक सीखने का मौक़ा मानते रहेंगे, आप कभी रुकेंगे नहीं। और जो रुकता नहीं, वही आगे बढ़ता है।
पहला लेसन आपको 'सही' के डर से आज़ाद करता है। दूसरा लेसन आपको 'खेल' के मज़े से आज़ाद करता है। और यह तीसरा लेसन आपको 'ग़लती' के डर से आज़ाद करता है। जब ये तीनों डर आपके दिमाग़ से निकल जाते हैं, तब जाकर आपकी असली, अनस्टॉपेबल क्रिएटिविटी बाहर आती है।
अब बस बहुत हो गया सोचना! आज एक काम कीजिए। अपने किसी एक बड़े ड्रीम को उठाइए। अब जान-बूझकर उस ड्रीम को पूरा करने के तीन सबसे वाहियात, बेतुके और फ़ेल होने वाले सोल्यूशन सोचिए। उन्हें ज़ोर से बोलिए और हँसिए। फिर, उन्हीं तीन वाहियात सोल्यूशन को देखकर पूछिए, "इसमें 'सही' क्या हो सकता है?" कौन जानता है, आपका अगला 'मिलियन डॉलर' आइडिया आपके किसी 'वाहियात' मज़ाक़ में ही छिपा हो! इस सफ़र की शुरुआत आपने किस 'ग़लत' आइडिया से की, हमें कमेंट्स में ज़रूर बताइए!
-----
अगर आप इस बुक की पूरी गहराई में जाना चाहते हैं, तो इस बुक को यहाँ से खरीद सकते है - Buy Now
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#Creativity #Innovation #MindsetShift #DYBooks #ThinkDifferent
_