क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो नेगोशिएशन के नाम पर सामने वाले को अपनी किडनी ऑफर कर देते हैं। अगर आप अभी भी उस पुराने विन विन वाले धोखे में फंसे हैं तो मुबारक हो आप अपनी सक्सेस को खुद ही चूना लगा रहे हैं। बिना नो कहे आप सिर्फ दूसरों के सपने पूरे कर रहे हैं।
जिम कैंप की किताब स्टार्ट विद नो हमें सिखाती है कि नेगोशिएशन कोई इमोशनल ड्रामा नहीं बल्कि एक माइंड गेम है। चलिए इस आर्टिकल में उन 3 लेसन को समझते हैं जो आपको एक मास्टर नेगोशिएटर बना देंगे।
लेसन १ : विन विन के चक्कर में अपना नुकसान मत करो
अक्सर जब हम किसी डील के लिए बैठते हैं तो हमारे दिमाग में एक ही भूत सवार होता है और वो है विन विन। हमें बचपन से सिखाया गया है कि बेटा ऐसा रास्ता निकालो कि तुम भी खुश और सामने वाला भी खुश। सुनने में तो यह किसी फिल्मी कहानी जैसा प्यारा लगता है लेकिन असल दुनिया में यह आइडिया एक बहुत बड़ा ट्रैप है। जिम कैंप कहते हैं कि जब आप विन विन की रट लगाते हैं तो आप असल में अपनी पोजीशन कमजोर कर रहे होते हैं। आप सामने वाले को यह सिग्नल दे रहे होते हैं कि भाई मैं तो समझौता करने के लिए बेताब हूँ।
सोचिए आप एक पुरानी कार बेचने निकले हैं जिसकी कीमत दो लाख रुपये है। अब सामने वाला बंदा आता है और कहता है कि भाई बजट थोड़ा टाइट है डेढ़ लाख में दे दो। अब आपके अंदर का वो विन विन वाला कीड़ा जाग जाता है। आप सोचते हैं कि चलो बेचारे का भी भला हो जाए और मेरी कार भी बिक जाए। आप मान जाते हैं। यहाँ हुआ क्या। सामने वाले ने तो अपनी जीत पक्की कर ली लेकिन आपने बिना लड़े ही अपने पचास हजार रुपये का दान कर दिया। यह विन विन नहीं बल्कि आपकी हार है। प्रोफेशनल दुनिया में लोग इस विन विन शब्द का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि वो आपको इमोशनली ब्लैकमेल करके आपसे अपनी मर्जी का काम निकलवा सकें।
जिम कैंप हमें समझाते हैं कि नेगोशिएशन कोई चैरिटी का काम नहीं है। जब आप विन विन की जिद पकड़ लेते हैं तो आप सामने वाले की जरूरतों को अपनी जरूरतों से ऊपर रखने लगते हैं। आप डरने लगते हैं कि कहीं सामने वाला नाराज न हो जाए या डील कैंसिल न कर दे। इसी डर का फायदा उठाकर सामने वाला आपको ऐसी जगह ले जाता है जहाँ सिर्फ उसका फायदा होता है। असली दुनिया में नेगोशिएशन एक कोल्ड वॉर की तरह है जहाँ हर कोई अपना किला बचाने की कोशिश कर रहा है। अगर आप अपना दरवाजा पहले ही खोल देंगे तो सामने वाला लूट कर ही जाएगा।
इस लेसन का असली मतलब यह है कि आपको अपनी वैल्यू और अपनी शर्तों पर अडिग रहना सीखना होगा। सामने वाला खुश है या नहीं यह उसकी जिम्मेदारी है आपकी नहीं। आपका काम है एक ऐसी डील करना जो आपके बिजनेस और आपके गोल्स के लिए सही हो। अगर आप सिर्फ दूसरों को खुश करने के लिए बिजनेस कर रहे हैं तो शायद आपको एक एनजीओ खोल लेना चाहिए था। प्रोफेशनल लाइफ में समझदारी इसी में है कि आप पहले अपनी जीत पक्की करें। जब आप विन विन की उम्मीद छोड़ देते हैं तो आप ज्यादा रिलैक्स महसूस करते हैं। आप बिना किसी दबाव के अपनी बात रख पाते हैं। याद रखिए जो इंसान सबको खुश करने की कोशिश करता है वो आखिर में खुद सबसे ज्यादा दुखी होता है। इसलिए इस विन विन के मीठे जहर से बचिए और अपनी शर्तों पर खेलना सीखिए।
लेसन २ : नो बोलने की पावर को समझो
ज्यादातर लोग नेगोशिएशन की टेबल पर 'नो' सुनने से ऐसे डरते हैं जैसे किसी ने भूत देख लिया हो। हमें लगता है कि अगर सामने वाले ने 'नो' कह दिया तो मतलब खेल खत्म और पैसा हजम। लेकिन जिम कैंप कहते हैं कि असली नेगोशिएशन तो शुरू ही तब होता है जब पहली बार 'नो' सुनाई देता है। जब तक हर कोई 'हां-हां' कर रहा है तब तक आप सिर्फ हवा में बातें कर रहे हैं। 'हां' अक्सर एक बहुत बड़ा झूठ होता है जिसे लोग सिर्फ पीछा छुड़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। क्या आपने कभी किसी सेल्समैन को सिर्फ इसलिए 'हां' कहा है ताकि वह आपके घर के दरवाजे से हट जाए। बस वही बात यहाँ भी लागू होती है।
सोचिए आप अपने बॉस के पास सैलरी बढ़ाने की रिक्वेस्ट लेकर गए। आपने अपनी पूरी मेहनत की कहानी सुनाई और बॉस ने मुस्कुराकर कह दिया कि 'हां बिल्कुल हम इस पर विचार करेंगे'। आप खुश होकर बाहर आ गए और मिठाई बांट दी। लेकिन तीन महीने बीत गए और सैलरी का एक रुपया नहीं बढ़ा। यहाँ उस 'हां' ने आपको अंधेरे में रखा। वहीं अगर बॉस सीधा 'नो' बोल देता तो कम से कम आपको पता होता कि समस्या कहाँ है। आप पूछ सकते थे कि क्या कमी रह गई और मुझे क्या सुधारना होगा। 'नो' बोलने से सारी बकवास साफ हो जाती है और असली मुद्दा टेबल पर आ जाता है।
जिम कैंप का मानना है कि आपको सामने वाले को भी 'नो' बोलने की पूरी आजादी देनी चाहिए। जब आप सामने वाले से कहते हैं कि 'अगर आपको यह डील पसंद नहीं है तो आप बेझिझक नो बोल सकते हैं' तो अचानक से सारा तनाव गायब हो जाता है। सामने वाले को लगता है कि आप उसे फंसाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। जब लोग सुरक्षित महसूस करते हैं तभी वो अपनी असली जरूरतें और डर आपके सामने रखते हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी दोस्त से उधार मांगते वक्त पहले ही कह दें कि 'भाई अगर पैसे न हों तो साफ मना कर देना कोई दिक्कत नहीं है'। इससे आपका दोस्त बहाने बनाने की जगह आपको सच बताएगा।
नेगोशिएशन में 'नो' एक दीवार नहीं बल्कि एक दरवाजा है। यह आपको मौका देता है यह समझने का कि सामने वाला असल में चाहता क्या है। जब आप 'नो' बोलते हैं तो आप अपनी बाउंड्री सेट करते हैं। इससे आपकी इज्जत बढ़ती है। लोग उन लोगों को ज्यादा सीरियसली लेते हैं जिनके पास अपनी राय होती है और जो हर बात पर जी-हुजुरी नहीं करते। अगर आप हर बात पर गर्दन हिलाते रहेंगे तो दुनिया आपको एक सस्ता कालीन समझकर उस पर चलकर निकल जाएगी। इसलिए 'नो' को अपना दुश्मन नहीं बल्कि अपना सबसे पक्का दोस्त बनाइए। यह आपको उन डील्स से बचाएगा जो आगे चलकर आपके गले की हड्डी बन सकती थीं।
लेसन ३ : अपनी जरूरतों को कंट्रोल में रखो
नेगोशिएशन की टेबल पर जो सबसे पहले अपनी जरूरत या बेचैनी दिखा देता है समझो उसकी हार पक्की है। जिम कैंप इसे 'नीडीनेस' कहते हैं। जब आप सामने वाले को यह महसूस करा देते हैं कि आपको यह डील हर हाल में चाहिए वरना आपका घर नहीं चलेगा तो आप उसे अपने हाथ में एक हंटर थमा देते हैं। अब वह आपको अपनी मर्जी से नचाएगा। असल में नेगोशिएशन एक ऐसा खेल है जहाँ आपको यह दिखाना पड़ता है कि आप इस डील के बिना भी बहुत खुश हैं। अगर आप किसी प्यासे हिरण की तरह पानी की तलाश में दिखेंगे तो सामने वाला शिकारी बनकर आपका फायदा उठाएगा।
कल्पना कीजिए कि आप एक बहुत बड़े क्लाइंट के साथ मीटिंग कर रहे हैं। आप अंदर से डरे हुए हैं क्योंकि पिछले दो महीने से आपकी कोई सेल नहीं हुई है। आप बार-बार घड़ी देख रहे हैं और हर दो मिनट में क्लाइंट से पूछ रहे हैं कि 'सर क्या हम डील फाइनल करें'। आपकी यह घबराहट क्लाइंट को साफ दिख रही है। उसे समझ आ गया है कि आप मजबूर हैं। अब वह अपनी ऐसी शर्तें रखेगा जिन्हें सुनकर आपके पसीने छूट जाएंगे लेकिन अपनी मजबूरी की वजह से आपको 'हां' कहना पड़ेगा। वहीं अगर आप रिलैक्स होकर बैठते और ऐसा दिखाते कि आपके पास और भी बहुत सारे ऑप्शन हैं तो शायद कहानी कुछ और होती।
जिम कैंप कहते हैं कि अपनी जरूरतों को घर की अलमारी में बंद करके मीटिंग में जाना चाहिए। आपको खुद को यह समझाना होगा कि मुझे यह डील 'चाहिए' नहीं बल्कि मुझे इस डील को 'इवैल्यूएट' करना है। जब आपकी चाहत खत्म हो जाती है तो आपके अंदर का डर भी मर जाता है। आप सवाल पूछना शुरू करते हैं। आप चेक करते हैं कि क्या यह क्लाइंट आपके लायक है भी या नहीं। जब आप सामने वाले से सवाल पूछते हैं तो पावर आपके हाथ में आ जाती है। यह वैसा ही है जैसे डेटिंग की दुनिया में होता है। जो जितना ज्यादा पीछे पड़ता है लोग उससे उतना ही दूर भागते हैं। लेकिन जो अपनी लाइफ में मस्त रहता है लोग उसकी तरफ खींचे चले आते हैं।
तो अगली बार जब आप किसी बड़ी डील के लिए जाएं तो अपने अंदर के उस भूखे बच्चे को शांत रखें। सामने वाले को यह महसूस होने दें कि आप वहाँ सिर्फ उसकी मदद करने या एक सही बिजनेस पार्टनर ढूंढने आए हैं। अगर बात नहीं बनी तो भी आपको कोई गम नहीं होगा। यह एटीट्यूड आपको एक ऐसी ताकत देता है जिसका मुकाबला कोई भी चालाक नेगोशिएटर नहीं कर सकता। याद रखिए आपकी सबसे बड़ी कमजोरी आपकी अपनी जरूरत है। उसे कंट्रोल करना सीख लिया तो समझो आपने दुनिया जीत ली।
दोस्तों, जिम कैंप की यह किताब हमें सिखाती है कि नेगोशिएशन कोई लड़ाई नहीं बल्कि एक प्रोसेस है जहाँ 'नो' बोलना और सुनना दोनों ही आपको जीत की तरफ ले जाते हैं। अपनी वैल्यू को कभी कम मत समझिए और न ही किसी डील के पीछे पागलों की तरह भागिए। अपनी शर्तों पर जिएं और अपनी शर्तों पर ही बिजनेस करें।
आज से ही अपनी लाइफ में 'नो' बोलने की प्रैक्टिस शुरू करें। क्या आप कभी किसी ऐसी डील में फंसे हैं जहाँ आपने मजबूरी में 'हां' कह दिया था। अपने अनुभव नीचे कमेंट्स में जरूर शेयर करें ताकि हम सब एक दूसरे की गलतियों से सीख सकें। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो सबको खुश करने के चक्कर में अपना नुकसान कर बैठता है। चलिए साथ मिलकर एक मास्टर नेगोशिएटर बनते हैं।
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