Alignment (Hindi)


अगर आपकी कंपनी के डिपार्टमेंट्स एक दूसरे से ऐसे लड़ रहे हैं जैसे बिग बॉस के कंटेस्टेंट्स, तो बधाई हो, आप डूबने की तैयारी कर रहे हैं। बिना एलाइनमेंट के काम करना मतलब बिना चप्पू के नाव चलाना है, जो बस गोल गोल घूमती है पर कहीं पहुंचती नहीं। क्या आप भी अपनी मेहनत को कचरे के डिब्बे में डालना एन्जॉय कर रहे हैं।

आज हम रॉबर्ट कैप्लन और डेविड नॉर्टन की बुक एलाइनमेंट से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपकी कंपनी के बिखरे हुए टुकड़ों को एक सुपर मशीन बना देंगे। चलिए इन ३ लेसन को गहराई से समझते हैं जो आपकी सक्सेस की चाबी हैं।


लेसन १ : एंटरप्राइज एलाइनमेंट - जब सब एक ही दिशा में भागें

कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसी बस में बैठे हैं जहाँ ड्राइवर को शिमला जाना है, कंडक्टर को गोवा की याद आ रही है और पैसेंजर पीछे से धक्का लगा रहे हैं क्योंकि इंजन ही गायब है। सुनने में यह किसी कॉमेडी फिल्म का सीन लगता है, लेकिन यकीन मानिए, ज्यादातर कंपनियों का हाल बिलकुल ऐसा ही है। रॉबर्ट कैप्लन और डेविड नॉर्टन अपनी बुक में सबसे पहले इसी एलाइनमेंट की बात करते हैं। वो कहते हैं कि अगर आपकी कंपनी की अलग अलग यूनिट्स एक ही सुर में गाना नहीं गा रही हैं, तो वो म्यूजिक नहीं बल्कि शोर पैदा कर रही हैं।

सोचिए एक ऐसी कंपनी के बारे में जहाँ हेड ऑफिस कुछ और प्लान बना रहा है और रीजनल ऑफिस अपनी अलग ही खिचड़ी पका रहा है। हेड ऑफिस कहता है कि हमें प्रीमियम कस्टमर्स चाहिए और सेल्स टीम डिस्काउंट बांटने में लगी है क्योंकि उन्हें अपना टारगेट पूरा करना है। यह एलाइनमेंट की कमी नहीं तो और क्या है। यह तो वही बात हुई कि आप जिम जा रहे हैं ताकि वजन कम हो सके, लेकिन वर्कआउट के बाद आप सीधे छोले भटूरे की दुकान पर लैंड कर रहे हैं। आपकी बॉडी और आपकी डाइट के बीच कोई एलाइनमेंट ही नहीं है। फिर आप ऊपर वाले को दोष देते हैं कि मेरी किस्मत ही खराब है।

एलाइनमेंट का मतलब यह नहीं है कि बस सबको एक मीटिंग में बिठाकर चाय पिला दी जाए और बोल दिया जाए कि सब साथ मिलकर काम करो। इसका असली मतलब है बैलेंस्ड स्कोरकार्ड का इस्तेमाल करके हर यूनिट के गोल को कंपनी के बड़े विजन से जोड़ना। जब तक आपकी कंपनी की हर ब्रांच यह नहीं जानती कि उनका छोटा सा काम पूरे ऑर्गनाइजेशन को कैसे फायदा पहुंचा रहा है, तब तक वो बस अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं, काम नहीं।

मान लीजिए एक बड़ा टेक स्टार्टअप है। फाउंडर चाहता है कि ऐप का एक्सपीरियंस दुनिया में सबसे बेस्ट हो। लेकिन कोडिंग टीम का फोकस सिर्फ बग्स फिक्स करने पर है और मार्केटिंग टीम सिर्फ डाउनलोड्स बढ़ाने में लगी है। यूजर ऐप डाउनलोड तो कर रहा है पर उसे इस्तेमाल करना उसके लिए किसी सजा से कम नहीं है। यहाँ सिनर्जी गायब है। अगर कोडिंग टीम को यह पता होता कि उनका हर एक कोड यूजर एक्सपीरियंस से जुड़ा है और मार्केटिंग टीम को यह पता होता कि उन्हें सिर्फ डाउनलोड्स नहीं बल्कि खुश यूजर्स चाहिए, तो कहानी कुछ और होती।

ज्यादातर लीडर्स को लगता है कि एलाइनमेंट अपने आप हो जाएगा। उन्हें लगता है कि उनके एम्प्लॉई अंतर्यामी हैं और उनके दिमाग की बात समझ जाएंगे। पर भाई साहब, एम्प्लॉई हैं, ज्योतिषी नहीं। जब तक आप पेपर पर अपना स्कोरकार्ड नहीं उतारते और हर किसी को उनकी जिम्मेदारी नहीं समझाते, तब तक आपकी कंपनी एक टूटी हुई साइकिल की तरह है जिसका पैडल कहीं और है और चैन कहीं और। एलाइनमेंट वो गोंद है जो इन सब टुकड़ों को जोड़कर एक रॉकेट बनाता है।

बिना एलाइनमेंट के आप चाहे कितनी भी मेहनत कर लें, आप बस जगह पर खड़े होकर कदमताल कर रहे हैं। आप थकेंगे भी, पसीना भी आएगा, लेकिन पहुंचेंगे कहीं नहीं। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि आपकी कंपनी सच में ग्रो करे, तो सबसे पहले सबको एक ही ट्रैक पर लाइए। वरना वही होगा जो हर फ्लॉप फिल्म के साथ होता है - प्रोड्यूसर का पैसा डूबेगा और ऑडियंस यानी आपके कस्टमर कहीं और चले जाएंगे।


लेसन २ : डिपार्टमेंटल सिनर्जी - साइलोस को तोड़ो और पार्टनर बनो

अगर आपकी कंपनी के अलग अलग डिपार्टमेंट्स के बीच बातचीत का लेवल भारत-पाकिस्तान जैसा है, तो समझ लीजिए कि आप सिनर्जी नहीं बल्कि तबाही की ओर बढ़ रहे हैं। अक्सर कंपनियों में एक अजीब सी दीवार होती है जिसे लेखक 'साइलोस' कहते हैं। सेल्स वालों को लगता है कि मार्केटिंग वाले सिर्फ फालतू के पोस्टर बनाते हैं और मार्केटिंग वालों को लगता है कि सेल्स वाले उनकी ब्रांड इमेज की धज्जियां उड़ा रहे हैं। वहीं IT वाले कोने में बैठकर सोच रहे होते हैं कि ये दोनों ही पागल हैं। यह सिनर्जी का सबसे बड़ा दुश्मन है।

सोचिए एक शादी का फंक्शन है। कैटरिंग वाले ने बहुत ही लजीज खाना बनाया है, लेकिन डेकोरेशन वाले ने टेंट ही नहीं लगाया। अब मेहमान बारिश में भीगते हुए पनीर टिक्का खा रहे हैं। क्या आप इसे एक सक्सेसफुल इवेंट कहेंगे। बिलकुल नहीं। कंपनी में भी यही होता है। जब तक हर डिपार्टमेंट एक दूसरे की ताकत नहीं बनता, तब तक कस्टमर को वो वैल्यू नहीं मिलती जिसके लिए उसने पैसे दिए हैं। लोग अक्सर अपनी अपनी टेरिटरी बचाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वो कंपनी का बड़ा फायदा भूल जाते हैं। यह तो वही बात हुई कि क्रिकेट मैच में बॉलर इसलिए खुश हो रहा है कि बैट्समैन जीरो पर आउट हो गया, जबकि दोनों एक ही टीम में हैं।

नॉर्टन और कैप्लन कहते हैं कि सिनर्जी तब पैदा होती है जब '१ प्लस १' मिलकर २ नहीं बल्कि ११ बन जाते हैं। इसका मतलब है कि जब सेल्स, ऑपरेशन्स और सपोर्ट टीम मिलकर काम करती हैं, तो वो ऐसी वैल्यू क्रिएट करती हैं जो कोई भी अकेला डिपार्टमेंट नहीं कर सकता। लेकिन असलियत में क्या होता है। सेल्स टीम कस्टमर से ऐसे वादे कर लेती है जिसे पूरा करने के लिए ऑपरेशन्स टीम को अपनी किडनियां बेचनी पड़ जाएं। फिर जब काम बिगड़ता है, तो सब एक दूसरे पर उंगली उठाने लगते हैं। यह सीन किसी पुरानी बॉलीवुड फिल्म के झगड़े जैसा होता है जहाँ अंत में सब बर्बाद हो जाता है।

मान लीजिए एक ई-कॉमर्स कंपनी है। मार्केटिंग टीम ने बहुत भारी 'दिवाली सेल' अनाउंस कर दी। लाखों लोग साइट पर आ गए। लेकिन IT टीम को इसके बारे में पता ही नहीं था और सर्वर क्रैश हो गया। जो कस्टमर खुश होकर शॉपिंग करने आए थे, वो अब सोशल मीडिया पर कंपनी को गालियां दे रहे हैं। यहाँ मार्केटिंग और IT के बीच सिनर्जी का जीरो लेवल था। अगर इनके बीच एलाइनमेंट होता, तो IT टीम पहले से तैयारी रखती और कंपनी करोड़ों का मुनाफा कमाती। पर नहीं, हमें तो सरप्राइज देना पसंद है, भले ही वो सरप्राइज कंपनी का दिवाला निकाल दे।

सिनर्जी लाने के लिए आपको डिपार्टमेंट्स के बीच के इन साइलोस को हथौड़े से तोड़ना होगा। आपको उन्हें यह समझाना होगा कि अगर कंपनी डूबेगी, तो सब साथ में डूबेंगे। ऐसा नहीं होगा कि सिर्फ मार्केटिंग वाली नाव डूबेगी और सेल्स वाले मजे से तैरते रहेंगे। बैलेंस्ड स्कोरकार्ड यहाँ एक कॉमन लैंग्वेज का काम करता है। यह सबको एक ही नक्शा थमा देता है ताकि कोई उत्तर तो कोई दक्षिण की तरफ न भागे।

जब आपके डिपार्टमेंट्स एक दूसरे के साथ सिनर्जी में काम करते हैं, तो आपकी कंपनी एक स्मूथ स्पोर्ट्स कार की तरह चलती है। बिना इसके, आप एक ऐसी पुरानी खटारा बस हैं जिसका गियर डालने पर हॉर्न बजता है और ब्रेक मारने पर लाइट जलती है। अगर आप चाहते हैं कि आपके कस्टमर्स आपके ब्रांड के फैन बनें, तो पहले अपने घर के अंदर के झगड़े खत्म कीजिए और सिनर्जी पर फोकस कीजिए।


लेसन ३ : बोर्ड और एम्प्लॉई एलाइनमेंट - जब विजन हकीकत बनता है

अक्सर कंपनियों में एक बहुत बड़ा मजाक होता है। बोर्ड रूम के अंदर एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर बड़े बड़े विजन बनाए जाते हैं, मिशन स्टेटमेंट लिखे जाते हैं और ऐसी भारी भरकम अंग्रेजी बोली जाती है जिसे सुनकर डिक्शनरी भी शर्मा जाए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब वो विजन उस एम्प्लॉई तक पहुंचता है जो ग्राउंड फ्लोर पर असली काम कर रहा है। बोर्ड को लगता है कि वो दुनिया बदलने वाले हैं, और एम्प्लॉई को लगता है कि उसे बस अपनी शिफ्ट खत्म करके घर जाना है। इन दोनों के बीच का गैप ही वो खाई है जहाँ बड़े बड़े बिज़नेस गिरकर ढेर हो जाते हैं।

सोचिए एक जहाज का कप्तान चिल्ला रहा है कि हमें उत्तर की ओर जाना है, लेकिन नीचे जो लोग इंजन चला रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं कि उत्तर किधर है। वो बस कोयला झोंकने में लगे हैं क्योंकि उन्हें इसी बात की सैलरी मिलती है। रॉबर्ट कैप्लन और डेविड नॉर्टन कहते हैं कि जब तक टॉप मैनेजमेंट की स्ट्रेटेजी एक आम एम्प्लॉई के डेली रूटीन का हिस्सा नहीं बनती, तब तक वो स्ट्रेटेजी सिर्फ एक रद्दी का कागज है। एलाइनमेंट का मतलब है कि सफाई करने वाले से लेकर CEO तक, हर किसी को पता हो कि उनका काम कंपनी के बड़े सपने में कैसे फिट बैठता है।

मान लीजिए एक बहुत बड़ी होटल चैन का बोर्ड तय करता है कि उनका नया विजन है 'अल्टीमेट कस्टमर डिलाइट'। अब वेटर को यह बात कैसे समझ आएगी। अगर आप उसे जाकर भारी भरकम भाषण देंगे, तो वो आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने उससे उसकी जायदाद मांग ली हो। लेकिन अगर आप उसे बैलेंस्ड स्कोरकार्ड के जरिए समझाएं कि उसकी एक मुस्कान और समय पर खाना सर्व करना सीधे कंपनी की रेटिंग और उसके बोनस से जुड़ा है, तो उसे अपना मकसद मिल जाएगा। एलाइनमेंट का मतलब है विजन का अनुवाद उस भाषा में करना जो एम्प्लॉई को समझ आती है, यानी 'उसका क्या फायदा है'।

ज्यादातर कंपनियां इस मामले में किसी ऐसी शादी की तरह काम करती हैं जहाँ दूल्हे को पता ही नहीं कि फेरे कब होने हैं। मैनेजमेंट को लगता है कि उन्होंने एक ईमेल भेज दिया तो सबको सब कुछ समझ आ गया। भाई साहब, लोग अपने घर का राशन कार्ड नहीं पढ़ते, आपका लंबा चौड़ा ईमेल कौन पढ़ेगा। आपको एम्प्लॉई के पर्सनल गोल्स को कंपनी के गोल्स के साथ जोड़ना होगा। जब एम्प्लॉई को यह दिखने लगता है कि कंपनी की तरक्की में उसकी भी तरक्की छुपी है, तो उसे मोटिवेट करने के लिए आपको किसी बाहर के स्पीकर की जरूरत नहीं पड़ती। वह खुद एक रॉकेट बन जाता है।

बिना इस एलाइनमेंट के, आपके एम्प्लॉई सिर्फ घड़ी की सुइयां देखते रहेंगे कि कब पांच बजें और कब वो इस जेल से रिहा हों। अगर आप चाहते हैं कि वो आपके विजन के लिए पसीना बहाएं, तो पहले उन्हें उस विजन का हिस्सा बनाइए। उन्हें लगना चाहिए कि वो सिर्फ एक मशीन का पुर्जा नहीं हैं, बल्कि उस मशीन के ड्राइवर हैं। जब बोर्ड की सोच और एम्प्लॉई का एक्शन एक हो जाता है, तभी असली मैजिक होता है और कंपनी एक लेजेंडरी ब्रांड बनती है।

तो क्या आप अपनी टीम को सिर्फ काम पर बुला रहे हैं या उन्हें एक मिशन पर भेज रहे हैं। याद रखिए, बिना एलाइनमेंट के आप सिर्फ भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं, टीम नहीं। और भीड़ से दंगे होते हैं, बिजनेस नहीं चलता। अब समय है अपने बोर्ड रूम से बाहर निकलने का और हर एक एम्प्लॉई के हाथ में वो स्कोरकार्ड थमाने का जो उन्हें उनकी मंजिल तक ले जाए।


दोस्तों, एलाइनमेंट कोई एक दिन का काम नहीं है, यह एक कल्चर है। अगर आप भी अपनी टीम या कंपनी में वही पुरानी खींचातानी महसूस कर रहे हैं, तो आज ही बैठिए और देखिए कि कहाँ तार टूटे हुए हैं। इस आर्टिकल को अपने उस मैनेजर या दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा कहता है कि 'टीम साथ काम नहीं करती'। हो सकता है, आपकी एक शेयरिंग उनकी कंपनी की दिशा बदल दे। कमेंट्स में बताएं कि आपके ऑफिस में सबसे बड़ी समस्या क्या है।

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