Change the Culture, Change the Game (Hindi)


क्या आप भी अपनी घिसी पिटी कंपनी कल्चर के साथ चिपके रहकर यह उम्मीद कर रहे हैं कि आपका बिजनेस रॉकेट की तरह उड़ जाएगा। सच तो यह है कि बिना कल्चर बदले आप बस अपनी नाकामी का इंतज़ार कर रहे हैं और आपके कॉम्पिटिटर आपकी इसी सुस्ती पर हंस रहे हैं।

आज हम रोजर कॉनर्स और टॉम स्मिथ की मास्टरपीस चेंज द कल्चर चेंज द गेम के बारे में बात करेंगे। यह आर्टिकल आपको सिखाएगा कि कैसे आप अपनी टीम में जोश भरकर असली रिजल्ट्स और अकाउंटेबिलिटी ला सकते हैं। चलिए इन ३ लेसन को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : रिजल्ट्स पिरामिड ही असली गेम चेंजर है

अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर रिजल्ट्स नहीं मिल रहे तो बस काम करने का तरीका या 'एक्शन' बदल दो और सब ठीक हो जाएगा। लेकिन भाई साहब यह तो वही बात हुई कि बीमारी जड़ में है और आप पत्ते पर मरहम लगा रहे हैं। रोजर कॉनर्स और टॉम स्मिथ हमें समझाते हैं कि असली खेल 'रिजल्ट्स पिरामिड' के सबसे निचले हिस्से से शुरू होता है। इस पिरामिड के चार लेवल हैं: एक्सपीरियंस, बिलीफ, एक्शन और रिजल्ट्स। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम या आपकी लाइफ में कुछ बड़ा बदलाव आए तो आपको सिर्फ ऊपर के एक्शन नहीं बदलने होंगे बल्कि नीचे जाकर लोगों के 'एक्सपीरियंस' को बदलना होगा।

मान लीजिए आपकी कंपनी में एक मैनेजर है जो हर छोटी गलती पर चिल्लाता है। अब एम्प्लॉई का 'एक्सपीरियंस' क्या हुआ। उसे लगा कि यहाँ नया आईडिया देना मतलब डांट खाना है। इस एक्सपीरियंस से उसका 'बिलीफ' यानी विश्वास बन गया कि चुपचाप बैठे रहो और बस उतना ही करो जितना कहा जाए। नतीजा क्या हुआ। 'एक्शन' के नाम पर उसने क्रिएटिविटी बंद कर दी और 'रिजल्ट्स' में आपकी कंपनी का इनोवेशन जीरो हो गया। अब आप चाहे उसे कितनी भी मोटिवेशनल स्पीच दे दें या उसे डरा दें कि काम करो वरना निकाल देंगे वह अंदर से नहीं बदलेगा। क्योंकि उसका पुराना कड़वा एक्सपीरियंस उसके दिमाग में घर कर चुका है।

मान लीजिए आप जिम जाते हैं और पहले ही दिन वहां के ट्रेनर ने आपसे इतना भारी वजन उठवा लिया कि अगले तीन दिन आप बिस्तर से नहीं उठ पाए। अब आपका एक्सपीरियंस क्या रहा। जिम मतलब दर्द और टॉर्चर। अब आपका बिलीफ बन गया कि एक्सरसाइज मेरे बस की बात नहीं है। अब आप चाहे दुनिया के सबसे महंगे जूते खरीद लें या बेस्ट डाइट चार्ट बना लें यानी चाहे जितने 'एक्शन' बदल लें आप जिम नहीं जाएंगे क्योंकि आपका 'बेस' ही हिल चुका है।

अगर आप किसी ऑर्गनाइजेशन में लीडर हैं तो आपको ऐसे एक्सपीरियंस क्रिएट करने होंगे जो लोगों के पुराने गलत बिलीफ को तोड़ सकें। जब तक लोगों को यह महसूस नहीं होगा कि उनके नए आइडियाज की कद्र की जाती है तब तक वे रिस्क नहीं लेंगे। आपको जानबूझकर ऐसे पल पैदा करने होंगे जहाँ लोग सुरक्षित महसूस करें। जब उनका एक्सपीरियंस बदलेगा तो वे यकीन करने लगेंगे कि हां यहाँ बदलाव मुमकिन है। फिर उनके एक्शन खुद-ब-खुद बदल जाएंगे और जो रिजल्ट्स आप सालों से ढूंढ रहे थे वे एक झटके में आपके सामने होंगे। बिना फाउंडेशन बदले बिल्डिंग खड़ी करने की कोशिश करना सिर्फ बेवकूफी है और कुछ नहीं।


लेसन २ : अकाउंटेबिलिटी का मतलब सजा नहीं जिम्मेदारी है

हमारे यहाँ जब भी कोई 'अकाउंटेबिलिटी' शब्द सुनता है तो उसे लगता है कि अब किसी की बलि चढ़ने वाली है। लोग सोचते हैं कि अगर काम बिगड़ा तो उंगली किस पर उठेगी बस वही अकाउंटेबिलिटी है। लेकिन इस बुक के ऑथर्स कहते हैं कि यह तो बहुत ही घटिया सोच है। असली अकाउंटेबिलिटी 'विक्टिम साइकिल' से बाहर निकलने का नाम है। जब कुछ गलत होता है तो ज्यादातर लोग एक दूसरे पर उंगली उठाने लगते हैं या किस्मत को दोष देने लगते हैं। वे कहते हैं कि मार्केट खराब था या क्लाइंट ही पागल था। यह सब बहानेबाजी है और इसे लेखक 'बिलो द लाइन' बिहेवियर कहते हैं।

असली विनर हमेशा 'अबव द लाइन' रहते हैं। इसका मतलब है कि चाहे सिचुएशन कितनी भी खराब हो आप खुद से पूछते हैं कि 'अब मैं क्या कर सकता हूं'। इसे एक ऑफिस के देसी एग्जांपल से समझते हैं। मान लीजिए एक इम्पोर्टेंट प्रेजेंटेशन के समय इंटरनेट चला गया। एक आम इंसान क्या करेगा। वह हाथ जोड़कर बैठ जाएगा और कहेगा कि भाई वाईफाई खराब है मैं क्या करूं। यह है विक्टिम मोड। वहीं एक असली अकाउंटेबल बंदा अपने फोन का हॉटस्पॉट ऑन करेगा या पहले से ही ऑफलाइन बैकअप तैयार रखेगा। वह सिचुएशन को कंट्रोल करता है न कि सिचुएशन उसे कंट्रोल करती है।

लोग अक्सर जिम्मेदारी से ऐसे भागते हैं जैसे पड़ोस के डरावने कुत्ते से। उन्हें लगता है कि जिम्मेदारी लेना मतलब गले में मुसीबत डालना है। लेकिन सच तो यह है कि जब आप जिम्मेदारी लेते हैं तभी आपके पास पावर आती है। अगर आप कहते हैं कि मेरी नाकामी के लिए सरकार या बॉस जिम्मेदार है तो आपने अपनी लाइफ का रिमोट कंट्रोल उनके हाथ में दे दिया है। अब आप बस एक कठपुतली हैं। क्या आप वाकई अपनी जिंदगी के साथ यह मजाक करना चाहते हैं।

अकाउंटेबिलिटी का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी टीम को डराकर रखें कि 'अगर रिजल्ट नहीं आया तो सैलरी कटेगी'। बल्कि आपको ऐसा कल्चर बनाना है जहाँ हर कोई खुद से यह सवाल पूछे कि क्या मैंने अपना बेस्ट दिया। जब लोग काम को अपनी मर्जी से करते हैं न कि किसी के डर से तब मैजिक होता है। यह सिर्फ ऑफिस के लिए नहीं बल्कि आपकी पर्सनल लाइफ के लिए भी उतना ही सच है। अगर आप आज भी अपनी नाकामियों के लिए अपने बचपन या अपने हालात को कोस रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप गेम के बाहर खड़े हैं। लाइन के ऊपर आइये और अपनी कहानी खुद लिखिये क्योंकि बहाने बनाने वालों को मेडल नहीं मिलते सिर्फ सांत्वना मिलती है और सांत्वना से पेट नहीं भरता।


लेसन ३ : फीडबैक को अपना हथियार बनाइए

ज्यादातर कंपनियों में फीडबैक का मतलब होता है साल में एक बार होने वाला वो ड्रामा जिसे 'परफॉरमेंस अप्रेजल' कहते हैं। वहां बॉस बैठता है और आपको बताता है कि आपने पिछले बारह महीनों में क्या क्या कांड किए हैं। रोजर कॉनर्स कहते हैं कि यह तरीका पूरी तरह से बेकार है। अगर आप कल्चर बदलना चाहते हैं तो आपको 'रीयल टाइम फीडबैक' की आदत डालनी होगी। लोग अक्सर सच बोलने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सामने वाला बुरा मान जाएगा या उनकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। लेकिन सच तो यह है कि बिना कड़वे सच के कोई भी टीम बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकती।

इसे एक शादी वाली सिचुएशन से समझते हैं। मान लीजिए आप किसी शादी में गए हैं और आपके दांत में पालक का टुकड़ा फंस गया है। आपका सबसे अच्छा दोस्त वह है जो आपको तुरंत बता दे कि भाई जरा शीशा देख ले। लेकिन अगर आपका दोस्त यह सोचे कि 'अरे बुरा मान जाएगा' और आपको न बताए तो आप पूरी पार्टी में उस पालक के साथ घूमते रहेंगे और लोग आप पर हंसते रहेंगे। बाद में जब आपको पता चलेगा तो आप अपने दोस्त को ही कोसेंगे कि तूने बताया क्यों नहीं। बिजनेस में भी यही होता है। अगर आप अपनी टीम को उनकी गलतियां समय पर नहीं बता रहे हैं तो आप उनका भला नहीं कर रहे बल्कि उनके करियर के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

एक अच्छा कल्चर वह है जहाँ लोग फीडबैक मांगने के लिए खुद आगे आएं। इसे 'फीडबैक सीकिंग' बिहेवियर कहते हैं। जब आप अपनी टीम से पूछते हैं कि 'मैं अपनी लीडरशिप कैसे सुधार सकता हूं' तो आप उन्हें यह पावर देते हैं कि वे खुलकर बात कर सकें। अक्सर ईगो बीच में आ जाता है। हमें लगता है कि हमें सब पता है। लेकिन याद रखिए कि खुद की पीठ पर क्या लगा है वह सिर्फ दूसरा ही देख सकता है। अगर आप फीडबैक को एक तोहफे की तरह लेना शुरू कर दें तो आप अपनी ग्रोथ की स्पीड को दस गुना बढ़ा सकते हैं।

अंत में बस इतना समझ लीजिए कि कल्चर कोई ऐसी चीज नहीं है जो एक दिन में बदल जाए। यह हर छोटे एक्शन और हर बातचीत का नतीजा है। अगर आप वही पुराने तरीके अपनाते रहेंगे तो रिजल्ट्स भी वही पुराने और बोरिंग मिलेंगे। अपनी कंपनी और अपनी लाइफ का गेम बदलने के लिए आपको आज ही अपनी सोच और अपने काम करने के तरीके में बड़े बदलाव करने होंगे। वरना दुनिया तो बढ़ ही रही है आप बस पीछे बैठकर दूसरों की कामयाबी पर तालियां बजाते रह जाएंगे। क्या आप सच में अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ दूसरों के लिए तालियां बजाने में गुजारना चाहते हैं।

जाग जाइए और जिम्मेदारी लीजिए। बदलाव की शुरुआत आपसे ही होती है।

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