क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस में नए आइडियाज के नाम पर सिर्फ अपनी कॉफी का कप बदलते हैं और सोचते हैं कि आप पिक्सर जैसी फिल्में बना लेंगे। सच तो यह है कि आपका डरपोक दिमाग और बेकार वर्क कल्चर आपकी क्रिएटिविटी का गला हर दिन घोंट रहा है और आपको पता भी नहीं चल रहा।
अगर आप अपनी लाइफ और काम में वही पुरानी घिसी पिटी चीजें दोहराते हुए थक चुके हैं तो एड कैटमुल की यह बातें आपकी आंखें खोल देंगी। चलिए देखते हैं वो ३ धांसू लेसन जो आपकी सोच का नजरिया पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : फेलर से मत डरो उसे गले लगाओ
ज्यादातर लोग लाइफ में ऐसे चलते हैं जैसे वो कांच के शोरूम में हाथी हों। उन्हें लगता है कि एक भी गलती हुई नहीं कि सारा करियर और इज्जत चकनाचूर हो जाएगी। हमारे समाज में गलती करना मतलब एक बहुत बड़ा पाप माना जाता है। स्कूल से लेकर ऑफिस तक हमें यही सिखाया गया है कि बस सही जवाब दो और आगे बढ़ो। लेकिन एड कैटमुल कहते हैं कि अगर आप गलती नहीं कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप कुछ भी नया नहीं कर रहे हैं। आप बस एक रोबोट की तरह पुरानी घिसी पिटी चीजें दोहरा रहे हैं। पिक्सर में भी जब 'टॉय स्टोरी २' बन रही थी तब उनसे ऐसी गलती हुई कि पूरी फिल्म का डेटा ही डिलीट हो गया। क्या उन्होंने वहां रोना धोना शुरू किया। नहीं। उन्होंने उस फेलर से सीखा और अपने सिस्टम को और मजबूत बनाया।
कल्पना कीजिए कि आप एक नए स्टार्टअप के मालिक हैं और आप चाहते हैं कि आपकी टीम दुनिया का सबसे अनोखा ऐप बनाए। लेकिन जैसे ही कोई एम्प्लॉई एक नया आइडिया लाता है जो थोड़ा रिस्की है आप उसे डांट कर चुप करा देते हैं। अब अगली बार वो बेचारा क्या करेगा। वो वही पुराना बोरिंग काम करेगा जो आपने उसे पिछले साल दिया था। यही तो समस्या है। हम फेलर को एक दुश्मन की तरह देखते हैं जबकि वो तो हमारा सबसे बड़ा टीचर है। अगर आप साइकिल चलाना सीखना चाहते हैं तो क्या आप बिना गिरे सीख सकते हैं। बिल्कुल नहीं। लेकिन जब बात बिजनेस या करियर की आती है तो हम चाहते हैं कि हम पहली बार में ही रॉकेट उड़ा दें। यह सोच ही आपकी क्रिएटिविटी की सबसे बड़ी दुश्मन है।
असली क्रिएटिविटी वहां पैदा होती है जहां गलती करने की आजादी होती है। आपको यह समझना होगा कि फेलर कोई अंत नहीं है बल्कि यह तो उस प्रोसेस का हिस्सा है जो आपको जीत की ओर ले जाता है। एड कैटमुल का मानना है कि मैनेजमेंट का काम रिस्क को रोकना नहीं है बल्कि रिस्क लेने के बाद जब चीजें खराब हों तो उन्हें संभालने की ताकत रखना है। अगर आप हारने के डर से कांपते रहेंगे तो आप कभी वो मास्टरपीस नहीं बना पाएंगे जिसका आप सपना देख रहे हैं। तो अगली बार जब आपसे कोई बड़ी भूल हो जाए तो अपनी शर्ट के कॉलर ऊपर करिए और कहिए कि चलो आज कुछ नया सीखा।
अब जरा अपनी लाइफ के बारे में सोचिए। आप कितनी बार सिर्फ इसलिए पीछे हट गए क्योंकि आपको लगा कि लोग क्या कहेंगे। क्या आपको लगता है कि दुनिया के बड़े इन्वेंटर्स ने पहली बार में ही बल्ब जला लिया था। नहीं भाई उन्होंने हजारों बार फेल होकर यह सीखा कि कौन सा तरीका काम नहीं करता। फेलर का मतलब यह नहीं है कि आप बेकार हैं इसका मतलब बस यह है कि आपको अभी थोड़ा और काम करने की जरूरत है। तो डरना छोड़िए और गिरना शुरू करिए क्योंकि जो गिरता है वही उठकर दौड़ना सीखता है।
लेसन २ : इंसान आइडिया से ज्यादा कीमती है
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। पहले वो जो समझते हैं कि एक जीनियस आइडिया मिल जाए तो रातों रात उनकी किस्मत बदल जाएगी। और दूसरे वो जो जानते हैं कि उस आइडिया को हकीकत में बदलने वाले लोग ही असली जादूगर हैं। एड कैटमुल ने एक बहुत कड़वी बात कही है जो शायद आपके ईगो को थोड़ा चुभ सकती है। वो कहते हैं कि अगर आप एक शानदार आइडिया किसी एवरेज टीम को देंगे तो वो उसे कचरा बना देंगे। लेकिन अगर आप एक घटिया आइडिया भी एक बेहतरीन टीम को दे दें तो वो या तो उसे ठीक कर देंगे या उसे छोड़कर कुछ ऐसा बना देंगे जो कमाल का होगा। हम अक्सर आइडियाज को किसी मंदिर की मूर्ति की तरह पूजने लगते हैं पर हम उन लोगों को भूल जाते हैं जो अपनी मेहनत और दिमाग से उस पत्थर में जान फूंकते हैं।
सोचिए आपके पास दुनिया का सबसे क्रांतिकारी बिजनेस प्लान है। आप एक ऐसी मशीन बनाना चाहते हैं जो चाय से सोना बना दे। अब आप इस आइडिया को लेकर पांच ऐसे लोगों के पास जाते हैं जो कामचोर हैं और जिन्हें आपस में बात करना भी नहीं आता। क्या आपको लगता है कि आपकी वो मशीन कभी शोरूम तक पहुंचेगी। बिल्कुल नहीं। वो लोग चाय पी जाएंगे और आपको चूना लगा देंगे। लेकिन वहीं अगर आपके पास पांच ऐसे टैलेंटेड और जुनूनी लोग हैं जिन्हें आप बस यह कहें कि हमें कुछ बड़ा करना है तो वो चाय से सोना नहीं तो कम से कम ऐसी चाय तो जरूर बना देंगे जिसे पीकर दुनिया वाह वाह कर उठेगी। असली ताकत विजन में नहीं बल्कि उस विजन को पालने वाले हाथों में होती है।
ज्यादातर कंपनियां अपनी पूरी एनर्जी और पैसा सिर्फ आइडिया खोजने में लगा देती हैं। वो भूल जाती हैं कि ऑफिस की दीवारों पर मोटिवेशनल पोस्टर लगाने से क्रिएटिविटी नहीं आती। क्रिएटिविटी आती है सही लोगों को एक साथ बिठाने से और उन्हें एक ऐसा माहौल देने से जहां वो अपनी बात बिना डरे कह सकें। पिक्सर में उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हम सिर्फ अच्छी कहानियां ढूंढते हैं। उन्होंने हमेशा यह कहा कि हम अच्छे लोगों को ढूंढते हैं और फिर वो लोग मिलकर अच्छी कहानियां बना लेते हैं। इंसान कोई सॉफ्टवेयर नहीं है जिसे आप एक बार इंस्टॉल करें और वो जिंदगी भर सही चलता रहे। इंसान एक जीता जागता एहसास है जिसे इज्जत और सही दिशा की जरूरत होती है।
जब आप लोगों पर भरोसा करते हैं तो वो आपको वो नतीजे देते हैं जो कोई कंप्यूटर नहीं दे सकता। लेकिन हमारे यहाँ क्या होता है। बॉस को लगता है कि वो सबसे ज्यादा समझदार है। वो टीम को सिर्फ ऑर्डर्स देता है और उम्मीद करता है कि सब कुछ परफेक्ट हो। भाई साहब अगर आप ही सब जानते हैं तो आपने टीम क्यों रखी है। आईने के सामने खड़े होकर खुद से ही बातें कर लिया करें। एक लीडर का असली काम टैलेंटेड लोगों को ढूंढना और फिर उनके रास्ते से हट जाना है। जब आप अपनी टीम को अपनी राय थोपने के बजाय उन्हें खुद सोचने का मौका देते हैं तब जाकर कोई 'टॉय स्टोरी' या 'फाइंडिंग निमो' जैसी मास्टरपीस फिल्म बनती है।
तो अपनी सोच बदलिए। आइडियाज तो सड़कों पर बिखरे पड़े हैं पर उन आइडियाज को पंख देने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। अगर आपके पास सही टीम है तो आप रेगिस्तान में भी बर्फ बेच सकते हैं। लेकिन अगर आपकी टीम ही बिखरी हुई है तो आप चाहे सोने की चिड़िया ही क्यों न ले आएं वो उड़ ही जाएगी। अपनी टीम के हर मेंबर की ताकत को पहचानिए और उन्हें सिर्फ एक एम्प्लॉई की तरह नहीं बल्कि एक पार्टनर की तरह देखिए। क्योंकि अंत में जीत किसी कागज पर लिखे आइडिया की नहीं बल्कि साथ खड़े उन चंद लोगों की होती है।
लेसन ३ : कैन्डिड फीडबैक की ताकत
हम भारतीयों की एक बड़ी समस्या है। हम सच बोलने से ज्यादा 'जी हुज़ूर' कहने में यकीन रखते हैं। अगर बॉस ने एक बेकार सा प्रेजेंटेशन दिखाया है, तो भी हम पीछे बैठकर तालियां बजाते हैं और मन ही मन सोचते हैं कि इससे घटिया चीज आज तक नहीं देखी। एड कैटमुल कहते हैं कि अगर आप अपनी टीम में सच बोलने का साहस पैदा नहीं कर सकते, तो आपकी क्रिएटिविटी बस एक दिखावा है। पिक्सर में एक खास ग्रुप होता है जिसे 'ब्रेन ट्रस्ट' कहा जाता है। इनका काम किसी फिल्म की बुराई करना नहीं, बल्कि उस फिल्म की खामियों को ईमानदारी से सामने रखना है। इसे वो 'कैन्डर' यानी निष्पक्षता कहते हैं। बिना फिल्टर के बात करना।
सोचिए आपने एक बहुत महंगा सूट सिलाया है। आप आईने के सामने खड़े होकर खुद को दुनिया का सबसे हैंडसम इंसान समझ रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि उस सूट का रंग आप पर बिल्कुल नहीं जंच रहा। अब आपके पास दो तरह के दोस्त हैं। एक वो जो आपकी झूठी तारीफ करके आपको पार्टी में जोकर बनवा देगा। और दूसरा वो जो आपके मुंह पर कह देगा कि भाई यह कलर तुझ पर गंदा लग रहा है, इसे अभी बदल। अब आप ही बताइए, आपका असली शुभचिंतक कौन है। जाहिर है वही जो आपको कड़वा सच बोल रहा है। ऑफिस और लाइफ में भी यही होता है। हम मीठी बातों के चक्कर में अपनी मेहनत पर पानी फेर देते हैं।
कैन्डिड फीडबैक का मतलब किसी की बेइज्जती करना नहीं होता। इसका मतलब होता है प्रोजेक्ट को बेहतर बनाने की नीयत से सच कहना। जब पिक्सर में कोई फिल्म बनती है, तो शुरुआत में वो बहुत ही साधारण होती है। लेकिन जब 'ब्रेन ट्रस्ट' के लोग साथ बैठते हैं और एक-एक सीन की बाल की खाल निकालते हैं, तब जाकर वो हीरा तराशा जाता है। वहां कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। वहां सिर्फ कहानी बड़ी होती है। अगर डायरेक्टर की कोई बात गलत है, तो एक जूनियर एम्प्लॉई भी उसे टोक सकता है। क्या आपके ऑफिस में या आपकी जिंदगी में ऐसा माहौल है। या फिर वहां भी चापलूसी का ओलंपिक चल रहा है।
सच्चाई यह है कि हम सबको फीडबैक से डर लगता है। हमें लगता है कि अगर किसी ने हमारे काम में कमी निकाली, तो वो हमारी काबिलियत पर शक कर रहा है। भाई साहब, थोड़ा रिलैक्स कीजिए। आपका काम आप नहीं हैं। अगर काम में कोई कमी है, तो उसे सुधारा जा सकता है, लेकिन अगर आपकी नियत ही सच सुनने की नहीं है, तो आप कभी ग्रो नहीं कर पाएंगे। एड कैटमुल बताते हैं कि एक लीडर के तौर पर उनकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि लोग अपनी राय देने में सुरक्षित महसूस करें। अगर लोग डरेंगे, तो वो सच छुपाएंगे। और जब सच छुपता है, तो डिजास्टर पैदा होता है।
तो आज से एक नियम बना लीजिए। अपनी लाइफ में कुछ ऐसे लोग जरूर रखिए जो आपको आईना दिखा सकें। जो आपकी हां में हां न मिलाएं बल्कि आपको आपकी गलतियां बताएं। और जब कोई आपको आपकी कमी बताए, तो उस पर गुस्सा होने के बजाय उसे थैंक यू बोलिए। क्योंकि वो आपको फेल होने से बचा रहा है। क्रिएटिविटी कोई अकेले कमरे में बैठकर की जाने वाली तपस्या नहीं है। यह तो लोगों के साथ मिलकर, बहस करके और एक दूसरे के आइडियाज को चैलेंज करके निकलने वाला अमृत है। अगर आप पिक्सर जैसी सफलता चाहते हैं, तो सबसे पहले चापलूसी की दुकान बंद करिए और सच सुनने का जिगरा पैदा करिए।
क्रिएटिविटी इंक सिर्फ एक किताब नहीं है, यह एक रास्ता है यह समझने का कि बड़ी चीजें कैसे बनाई जाती हैं। चाहे वो फिल्म हो, बिजनेस हो या आपकी खुद की जिंदगी। फेलर को अपना दोस्त बनाइए, सही लोगों को अपने साथ जोड़िए और हमेशा सच का साथ दीजिए। याद रखिए, दुनिया उन लोगों को याद नहीं रखती जिन्होंने कभी कोई गलती नहीं की, बल्कि उन्हें याद रखती है जिन्होंने अपनी गलतियों से सीखकर कुछ ऐसा बनाया जिसने इतिहास रच दिया।
तो अब आपकी बारी है। क्या आप आज से अपनी टीम या अपनी लाइफ में कड़वा सच सुनने के लिए तैयार हैं। कमेंट में हमें जरूर बताएं कि इन ३ लेसन में से कौन सा लेसन आपको सबसे ज्यादा पसंद आया और आप इसे अपनी लाइफ में कैसे लागू करेंगे। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो खुद को बहुत बड़ा क्रिएटिव समझते हैं पर सच सुनने से भागते हैं। चलिए मिलकर एक बेहतर और क्रिएटिव कम्युनिटी बनाते हैं।
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