क्या आप भी उन महान बिजनेस ओनर्स में से है जो नए कस्टमर्स के पीछे ऐसे भागते है जैसे शादी के बाद लोग अपनी हॉबीज के पीछे भागना भूल जाते है? अगर आप पुराने कस्टमर्स की इज्जत नहीं कर रहे तो बधाई हो आप अपने प्रॉफिट को खुद आग लगा रहे है। बिना कस्टमर इक्विटी समझे बिजनेस चलाना वैसा ही है जैसे बिना छेद वाली बाल्टी में पानी भरना।
आज हम रोबर्ट ब्लैटबर्ग की इस मास्टरक्लास बुक के जरिए जानेंगे कि कैसे आप अपने कस्टमर्स को महज एक नंबर नहीं बल्कि एक कीमती एसेट बना सकते है। चलिए समझते है वो ३ लेसन जो आपके बिजनेस की किस्मत बदल देंगे।
लेसन १ : कस्टमर कोई ट्रांजेक्शन नहीं बल्कि एक इन्वेस्टमेंट है।
दोस्तो, आज के दौर में ज्यादातर दुकानदार या बिजनेस चलाने वाले लोग पता है क्या सोचते है? उनका दिमाग बस इस बात पर टिका होता है कि भाई बस एक बार सामान बिक जाए और पैसा जेब में आ जाए। उसके बाद वो कस्टमर कौन है और कहाँ से आया है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता। यह सोच वैसी ही है जैसे कोई लड़का पहली डेट पर जाए और सोचे कि बस आज का बिल यह लड़की भर दे फिर चाहे ब्रेकअप ही क्यों न हो जाए। रोबर्ट ब्लैटबर्ग कहते है कि अगर आप भी ऐसा सोचते है तो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि अपनी बर्बादी का सामान पैक कर रहे है।
बुक हमें सिखाती है कि एक कस्टमर को हमेशा एक 'फाइनेंशियल एसेट' यानी एक निवेश की तरह देखना चाहिए। जैसे आप शेयर मार्केट में पैसा लगाते है और उम्मीद करते है कि वो सालो साल बढ़ता रहे वैसे ही एक कस्टमर भी होता है। जब कोई पहली बार आपकी दुकान या वेबसाइट पर आता है तो वो सिर्फ एक सेल नहीं दे रहा होता बल्कि वो आपको एक मौका दे रहा होता है कि आप उसे एक लॉन्ग टर्म प्रॉफिट मशीन में बदल दे।
मान लीजिए आपका एक छोटा सा कैफे है। एक कस्टमर आया और उसने १०० रुपये की कॉफी पी। अब एक आम दुकानदार सोचेगा कि चलो १०० रुपये आ गए बात खत्म। लेकिन एक स्मार्ट बिजनेस ओनर जो कस्टमर इक्विटी समझता है वो सोचेगा कि अगर यह बंदा हफ्ते में ३ बार आए और साल भर आता रहे तो यह मेरे लिए साल के १५००० रुपये से ज्यादा की वैल्यू रखता है। अब बताइए आप १०० रुपये के लिए उस कस्टमर से बदतमीजी करेंगे या १५००० रुपये के लिए उसे राजा की तरह ट्रीट करेंगे?
अक्सर लोग नए कस्टमर लाने के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पानी की तरह पैसा बहाते है। एड्स चलाते है और डिस्काउंट देते है। लेकिन जैसे ही कस्टमर अंदर आता है उसे छोड़ देते है। यह वैसा ही है जैसे आप एक बहुत महंगी कार खरीदे और उसे कभी सर्विसिंग पर न भेजे। धीरे धीरे वो कार कबाड़ बन जाएगी। ठीक वैसे ही अगर आप अपने मौजूदा कस्टमर्स का ख्याल नहीं रखेंगे तो आपकी मार्केट वैल्यू जीरो हो जाएगी।
कस्टमर की हालत आजकल उस दामाद जैसी हो गई है जिसे शादी के दिन तो खूब वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है लेकिन एक साल बाद उसे कोई पानी तक नहीं पूछता। अगर आप अपने बिजनेस में कस्टमर को वो वीआईपी फील लगातार देते रहेंगे तो वो आपकी इक्विटी यानी आपकी वैल्यू को बढ़ाता रहेगा। याद रखिए एक खुश कस्टमर आपके लिए फ्री में मार्केटिंग करता है और एक दुखी कस्टमर आपकी पुश्तैनी साख पर कालिख पोत देता है। इसलिए आज से ही हर सेल को एक ट्रांजेक्शन समझना बंद करे और उसे एक कीमती एसेट की तरह पालना शुरू करे।
लेसन २: हर कस्टमर एक बराबर नहीं होता।
सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया है कि 'कस्टमर भगवान होता है'। लेकिन सच तो यह है कि हर भगवान को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद एक जैसा नहीं होता। कुछ कस्टमर्स आपके लिए असली वरदान होते है और कुछ ऐसे होते है जो सिर्फ आपका सिर दर्द बढ़ाने के लिए पैदा हुए होते है। रोबर्ट ब्लैटबर्ग इस बुक में बड़े साफ शब्दों में कहते है कि अगर आप अपने हर कस्टमर पर एक जैसा टाइम और पैसा बर्बाद कर रहे है तो आप बिजनेस के सबसे बड़े अनाड़ी है।
जरा सोचिए आपके पास दो दोस्त है। एक वो जो हर पार्टी में आपके साथ खड़ा रहता है और आपकी मदद करता है। दूसरा वो जो सिर्फ तब फोन करता है जब उसे उधार चाहिए होता है। क्या आप दोनों को बराबर इज्जत देंगे? बिल्कुल नहीं। तो फिर बिजनेस में यह गलती क्यों? कुछ कस्टमर्स ऐसे होते है जो आपके प्रोडक्ट्स की कद्र करते है और बिना झिकझिक किए सही दाम देते है। वहीं कुछ ऐसे 'महान' लोग भी होते है जो दो रुपये के डिस्काउंट के लिए आपका आधा घंटा खा जाते है और अंत में बिना कुछ खरीदे चले जाते है।
कुछ कस्टमर्स उस रिश्तेदार की तरह होते है जो घर आते ही वाईफाई का पासवर्ड पूछते है और फिर सारा दिन मुफ्त का नेट चलाकर आपकी बुराई भी करते है। ऐसे कस्टमर्स पर पैसा खर्च करना यानी एक्विजिशन कॉस्ट लगाना घाटे का सौदा है। बुक हमें सिखाती है कि आपको अपने कस्टमर्स को अलग अलग कैटेगरी में बाँटना चाहिए। जो कस्टमर आपको सबसे ज्यादा प्रॉफिट दे रहे है उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट दीजिए। उन्हें लॉयल्टी रिवार्ड्स दीजिए और उनका खास ख्याल रखिए।
बाकी जो कस्टमर सिर्फ सेल के वक्त प्रकट होते है और फिर गायब हो जाते है उन्हें बस उतना ही भाव दीजिए जितना वो डिजर्व करते है। इसे कहते है 'सेगमेंटेशन'। अगर आप अपनी सारी एनर्जी उन १० परसेंट कस्टमर्स पर लगाएंगे जो आपके बिजनेस का ८० परसेंट मुनाफा लाते है तो आपकी ग्रोथ रॉकेट की तरह ऊपर जाएगी। लेकिन अगर आप उस भीड़ को खुश करने में लगे रहे जो कभी आपकी वैल्यु नहीं समझेगी तो आप बस एक थके हुए सेल्समैन बनकर रह जाएंगे।
याद रखिए बिजनेस कोई चैरिटी नहीं है। यहाँ आपका समय और रिसोर्सेज कीमती है। स्मार्ट बनिए और पहचानिए कि कौन सा कस्टमर आपके बिजनेस की असली 'इक्विटी' है और कौन सिर्फ एक 'लायबिलिटी'। सबको खुश करने की कोशिश में आप खुद को और अपने मुनाफे को दुखी कर लेंगे। इसलिए अपने बेस्ट कस्टमर्स को गले लगाइए और टाइम वेस्ट करने वालों को प्यार से टाटा बाय-बाय कह दीजिए।
लेसन ३: एक्विजिशन और रिटेंशन का सही बैलेंस।
बिजनेस की दुनिया में एक बहुत बड़ी बीमारी है जिसे मै 'न्यू कस्टमर सिंड्रोम' कहता हू। इसमें हर कंपनी बस नए लोग जोड़ने की होड़ में लगी रहती है। उन्हें लगता है कि जितने ज्यादा नए चेहरे उतनी ज्यादा तरक्की। यह सोच वैसी ही है जैसे कोई इंसान नया घर तो खरीदता जाए लेकिन पुराने घर की छत टपक रही हो तो उस पर ध्यान ही न दे। रोबर्ट ब्लैटबर्ग इस बुक में साफ चेतावनी देते है कि नए कस्टमर लाना (Acquisition) जरूरी है लेकिन पुराने कस्टमर को रोके रखना (Retention) ही असली अमीरी है।
जरा ठंडे दिमाग से सोचिए। एक नए कस्टमर को अपनी दुकान तक खींचकर लाने में आपको एड्स पर पैसा खर्च करना पड़ता है उसे डिस्काउंट देना पड़ता है और बहुत ज्यादा पापड़ बेलने पड़ते है। लेकिन एक पुराना कस्टमर जो आप पर भरोसा करता है उसे दोबारा सामान बेचने के लिए आपको जीरो रुपये खर्च करने पड़ते है। ह्यूमर के साथ कहूँ तो नया कस्टमर पटाना उस पहली डेट जैसा है जहाँ आपको अच्छे कपड़े पहनने पड़ते है और महंगा डिनर खिलाना पड़ता है। जबकि पुराना कस्टमर उस पुराने दोस्त जैसा है जिसके सामने आप लोअर टी शर्ट में भी बैठ जाए तो वो बुरा नहीं मानता और आपकी कद्र करता है।
अक्सर कंपनियां नए लोगो को लुभाने के लिए तो भारी डिस्काउंट दे देती है लेकिन अपने पुराने और वफादार कस्टमर्स को वही पुराना भाव देती है। यह तो सरासर नाइंसाफी है। अगर आपका पुराना कस्टमर देख ले कि नए वाले को वही चीज सस्ती मिल रही है तो वो आपसे रिश्ता तोड़ लेगा। और याद रखिए एक पुराने कस्टमर को खोना यानी अपनी जेब से नोटों की गड्डी को आग लगाना। बुक का मुख्य सार यही है कि आपको अपनी 'कस्टमर इक्विटी' बढ़ाने के लिए इन दोनों के बीच बैलेंस बनाना होगा।
आपको अपनी मार्केटिंग बजट का एक बड़ा हिस्सा उन लोगो पर खर्च करना चाहिए जो पहले से आपके साथ है। उन्हें 'थैंक यू' नोट भेजिए उन्हें स्पेशल एक्सेस दीजिए या बस कभी हाल चाल पूछ लीजिए। जब कस्टमर को लगता है कि आपकी नजर में उसकी वैल्यू सिर्फ एक बिल तक सीमित नहीं है तो वो आपका परमानेंट फैन बन जाता है। असली प्रॉफिट मार्केटिंग के शोर में नहीं बल्कि कस्टमर की लॉयल्टी के सन्नाटे में छिपा होता है। जो बिजनेस अपने पुराने कस्टमर्स के दिल में जगह बना लेता है उसे मंदी का डर कभी नहीं सताता।
दोस्तो, बिजनेस सिर्फ सामान बेचना नहीं बल्कि भरोसे की एक चेन बनाना है। अगर आप आज से अपने कस्टमर्स को सिर्फ एक ट्रांजेक्शन की तरह देखना बंद कर देंगे तो यकीन मानिए आपकी ग्रोथ को कोई नहीं रोक पाएगा। क्या आप आज से अपने पुराने कस्टमर्स को वो इज्जत देंगे जिसके वे हकदार है? कमेंट्स में जरूर बताए कि आप अपने बिजनेस में कस्टमर को खुश रखने के लिए क्या नया करने वाले है। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करे जो बिजनेस में सिर्फ नए लोगो के पीछे भाग रहे है और अपना नुकसान कर रहे है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#CustomerEquity #BusinessGrowth #MarketingStrategy #CustomerRetention #DYBooks
_