क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस में बारह घंटे गधे की तरह घिसने के बाद भी प्रमोशन की लाइन में सबसे पीछे खड़े रहते हैं। मुबारक हो आप अपनी ज़िंदगी और समय दोनों को कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। जब दुनिया स्मार्ट वर्क से ऐश कर रही है तब आप सिर्फ बिजी दिखने का नाटक कर रहे हैं।
इस आर्टिकल में हम रॉबर्ट पोज़ेन की एक्सट्रीम प्रोडक्टिविटी से वो ३ लेसन सीखेंगे जो आपकी सुस्त लाइफस्टाइल को बदल देंगे। तैयार हो जाइए क्योंकि अब मेहनत कम और रिजल्ट्स ज्यादा मिलने वाले हैं।
लेसन १ : रिजल्ट पर फोकस करें न कि घंटों पर
आज की भागदौड़ वाली लाइफ में हम सबको लगता है कि जो इंसान ऑफिस में सबसे लेट तक बैठता है वही सबसे बड़ा सुपरस्टार है। लेकिन रॉबर्ट पोज़ेन कहते हैं कि भाई आप सुपरस्टार नहीं बल्कि एक बहुत बड़े कन्फ्यूज़न में जी रहे हैं। आपका बॉस आपसे प्यार आपके चेहरे के लिए नहीं बल्कि आपके काम के रिजल्ट्स के लिए करता है। लेकिन हम इंडियंस की आदत है कि हम काम से ज्यादा बिजी दिखने पर जोर देते हैं। अगर आप भी सुबह नौ से रात नौ बजे तक अपनी कुर्सी से चिपके रहते हैं और फिर भी काम खत्म नहीं होता तो यकीन मानिए आप मेहनत नहीं बल्कि सिर्फ अपना टाइम पास कर रहे हैं।
सोचिए आपके पास एक जिम ट्रेनर है जो रोज तीन घंटे जिम में गप्पें मारता है और दूसरा ट्रेनर है जो सिर्फ बीस मिनट की इंटेंस वर्कआउट करवाता है। आप किसे पैसे देंगे। ज़ाहिर है उसे जो आपको बॉडी बनाकर दे। रॉबर्ट पोज़ेन का पहला लेसन यही है कि अपने दिमाग से 'इनपुट' वाला भूत उतार फेंकिए और 'आउटपुट' पर ध्यान दीजिए। आप कितने घंटे काम कर रहे हैं यह कोई नहीं पूछने वाला। लोग सिर्फ यह देखेंगे कि आपने अंत में दिया क्या।
मान लीजिए आप एक सेल्स मैनेजर हैं। अब आप पूरे दिन सौ बेकार की कॉल्स कर सकते हैं और शाम को थककर चूर हो सकते हैं। या फिर आप सिर्फ दस ऐसी क्वालिटी कॉल्स कर सकते हैं जिनसे डील पक्की हो जाए। जो इंसान सौ कॉल्स करके हाथ खाली बैठा है वो दुनिया की नज़र में मेहनती हो सकता है लेकिन बैंक बैलेंस उसका बढ़ेगा जिसने स्मार्ट तरीके से दस कॉल्स पर फोकस किया।
सर्कस के गधे और रेस के घोड़े में यही फर्क होता है। गधा दिन भर बोझा ढोता है और अंत में उसे सिर्फ घास मिलती है। घोड़ा सिर्फ कुछ मिनट भागता है और जीत का सेहरा पहनता है। आपको तय करना है कि आपको इस कॉर्पोरेट सर्कस का हिस्सा बनना है या अपनी फील्ड का चैंपियन।
ज्यादातर लोग अपनी टू डू लिस्ट को किसी राशन की दुकान की लिस्ट जैसा बना देते हैं। उसमें पचास काम होते हैं और पूरा एक भी नहीं होता। पोज़ेन कहते हैं कि अपने दिन की शुरुआत में ही खुद से पूछिए कि आज वो कौन सा एक काम है जो अगर हो गया तो मेरा दिन सफल माना जाएगा। जब आप रिजल्ट पर फोकस करते हैं तो फालतू की मीटिंग्स और फालतू के मेल्स अपने आप गायब होने लगते हैं।
घंटों कुर्सी तोड़ना बंद कीजिए। रिजल्ट्स लाना शुरू कीजिए। क्योंकि अंत में आपकी सैलरी आपकी मेहनत के लिए नहीं बल्कि आपकी वैल्यू के लिए बढ़ती है। और वैल्यू तभी आती है जब आप दुनिया को कुछ ठोस करके दिखाते हैं।
अगला लेसन इससे भी ज्यादा मजेदार होने वाला है क्योंकि वहां हम सीखेंगे कि कैसे हम पढ़ने और लिखने के नाम पर अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं।
लेसन २ : पढ़ने की कला (स्मार्ट रीडिंग)
अब बात करते हैं उस बीमारी की जिसे हम बड़े गर्व से 'इन्फॉर्मेशन गैदरिंग' कहते हैं। रॉबर्ट पोज़ेन कहते हैं कि आप में से ज्यादातर लोग ऑफिस में सिर्फ इसलिए बैठे रह जाते हैं क्योंकि आपको लगता है कि हर ईमेल और हर रिपोर्ट का एक-एक शब्द पढ़ना आपकी जन्मसिद्ध जिम्मेदारी है। अगर आप एक दो पेज की रिपोर्ट को उपन्यास की तरह चाट रहे हैं तो समझ लीजिये कि आप अपनी प्रोडक्टिविटी का गला घोंट रहे हैं। रॉबर्ट का दूसरा लेसन बहुत सीधा है कि हर चीज़ पढ़ने के लायक नहीं होती।
मान लीजिये आप अपनी शादी के लिए लड़का या लड़की देखने गए हैं। क्या आप वहां जाकर उनके घर की दीवारों का पेंट और किचन के डिब्बों की गिनती करने बैठेंगे। बिल्कुल नहीं। आप सीधा काम की बात करेंगे कि भाई खानदान कैसा है और इंसान की फितरत कैसी है। लेकिन काम के मामले में हम उलटा करते हैं। हम पूरी दुनिया की जानकारी बटोरना चाहते हैं और जो असली मुद्दा होता है उसे भूल जाते हैं।
पोज़ेन की 'स्मार्ट रीडिंग' टेक्निक कहती है कि सबसे पहले अंत पढ़िए। किसी भी लंबी रिपोर्ट को शुरू करने से पहले उसका कन्क्लूजन देखिये। अगर आपको अंत ही समझ नहीं आया या वो आपके काम का नहीं है तो पूरी रामायण पढ़ने का क्या फायदा। हम इंडियंस की आदत है कि हम अखबार भी हेडलाइन से ज्यादा विज्ञापनों में इंटरेस्ट लेते हैं। ऑफिस में यह आदत आपको ले डूबेगी।
कल्पना कीजिये कि आपके बॉस ने आपको एक सौ पेज की मार्केट रिसर्च फाइल भेजी है। अब एक आम इंसान इसे पहले पन्ने से पढ़ना शुरू करेगा और तीसरे पन्ने तक पहुँचते-पहुँचते उसे नींद आने लगेगी। लेकिन एक 'एक्सट्रीमली प्रोडक्टिव' इंसान सीधा समरी देखेगा और उन ग्राफ्स पर नज़र डालेगा जो उसके प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। पंद्रह मिनट में काम खत्म और बाकी का टाइम चाय और गप्पों के लिए।
लिखने के मामले में भी हम कम नहीं हैं। एक छोटा सा ईमेल लिखने के लिए हम ऐसे शब्दों का चुनाव करते हैं जैसे हमें नोबेल प्राइज मिलने वाला हो। रॉबर्ट कहते हैं कि लिखने से पहले सिर्फ दो मिनट सोचिये कि आप कहना क्या चाहते हैं। अगर आपका विज़न क्लियर है तो आप दस लाइन का मेल दो लाइन में खत्म कर सकते हैं। जो बात सीधे तरीके से कही जा सकती है उसे जलेबी की तरह घुमाने का शौक सिर्फ उन लोगों को होता है जिनके पास काम कम और टाइम ज्यादा होता है।
याद रखिये कि आपकी आँखें और आपका दिमाग बहुत कीमती हैं। इन्हें हर फालतू डेटा के कचरे से मत भरिये। जब आप छाँटना सीख जाते हैं कि क्या पढ़ना है और क्या छोड़ना है तब आप असल में दूसरों से चार कदम आगे निकल जाते हैं। आप इन्फॉर्मेशन के गुलाम नहीं बल्कि उसके मास्टर बन जाते हैं।
अब जब आप पढ़ना और लिखना सीख गए हैं तो अगले लेसन में हम बात करेंगे कि कैसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स को चुटकियों में निपटाया जाता है ताकि आप शाम को जल्दी घर जाकर अपनी असली ज़िंदगी जी सकें।
लेसन ३ : लिखने से पहले सोचें
अब आते हैं उस मुकाम पर जहाँ अच्छे-अच्छे सुरमा ढेर हो जाते हैं। वो है बड़े प्रोजेक्ट्स और मुश्किल काम। हम में से ज्यादातर लोग 'प्रोक्रैस्टिनेशन' यानी काम टालने के डॉक्टर बन चुके हैं। जब भी कोई बड़ा काम सामने आता है तो हम उसे देख कर ऐसे डरते हैं जैसे सामने यमराज खड़े हों। फिर हम क्या करते हैं। हम उस बड़े काम को छोड़कर छोटे-छोटे फालतू काम करने लगते हैं जैसे कि डेस्क साफ़ करना या फिर बिना मतलब के मेल्स का रिप्लाई देना। रॉबर्ट पोज़ेन कहते हैं कि अगर आप मुश्किल काम से भाग रहे हैं तो आप कभी भी एक्सट्रीमली प्रोडक्टिव नहीं बन सकते।
मान लीजिए आपको एक बहुत ही कड़वी दवाई पीनी है और साथ में एक मीठा रसगुल्ला भी खाना है। एक समझदार इंसान पहले दवाई गटक जाएगा और फिर रसगुल्ले का मज़ा लेगा। लेकिन हम क्या करते हैं। हम पहले रसगुल्ला खाते हैं और फिर पूरी दोपहर उस कड़वी दवाई के डर में गुजार देते हैं। ऑफिस में भी हम यही करते हैं। सुबह-सुबह जब दिमाग ताज़ा होता है तब हम सोशल मीडिया चेक करते हैं और जब दोपहर तक बैटरी डाउन हो जाती है तब हम सबसे मुश्किल प्रोजेक्ट उठाते हैं। फिर नतीजा क्या निकलता है। चिड़चिड़ापन और खराब क्वालिटी का काम।
पोज़ेन का तीसरा लेसन है कि अपने सबसे डरावने काम को सबसे पहले निपटाएं। इसे वो 'ईटिंग द फ्रॉग' के नाम से भी जानते हैं। अगर आपने सुबह-सुबह एक जिंदा मेंढक खा लिया तो पूरे दिन उससे बुरा आपके साथ कुछ नहीं होगा। प्रोफेशनल लाइफ में आपका 'मेंढक' वो क्लाइंट कॉल या वो प्रेजेंटेशन हो सकती है जिससे आपको डर लगता है।
एक और मज़ेदार बात। बड़े प्रोजेक्ट्स को लेकर हम अक्सर 'परफेक्शन' के चक्कर में फंसे रहते हैं। हमें लगता है कि जब तक सब कुछ परफेक्ट नहीं होगा हम शुरू नहीं करेंगे। रॉबर्ट कहते हैं कि भाई आप भगवान नहीं हैं। पहले एक खराब ड्राफ्ट ही सही लेकिन कुछ तो लिखिए। जब आप एक बार शुरू कर देते हैं तो मोमेंटम बन जाता है। जो काम आपको पहाड़ लग रहा था वो धीरे-धीरे मिट्टी का ढेर लगने लगता है।
अपनी लाइफ को छोटे-छोटे स्लॉट्स में बांटिये। अगर आप सोचते हैं कि आप लगातार आठ घंटे काम करेंगे तो आप खुद को धोखा दे रहे हैं। हमारा दिमाग एक मशीन नहीं है जिसे बस ऑन कर दिया और चलता रहा। हर नब्बे मिनट के बाद एक छोटा ब्रेक लीजिये। उस ब्रेक में चाय पीजिये या बस छत को देखिये लेकिन काम के बारे में मत सोचिये। इससे आपका दिमाग फिर से चार्ज हो जाता है और आप अगले राउंड के लिए तैयार रहते हैं।
याद रखिये कि जो लोग बहुत बिजी दिखते हैं ज़रूरी नहीं कि वो बहुत कामयाब भी हों। असली कामयाबी इसमें है कि आप अपने काम को इस तरह मैनेज करें कि काम आपकी ज़िंदगी पर हावी न हो जाए। रॉबर्ट पोज़ेन की यह किताब हमें यही सिखाती है कि मेहनत गधे जैसी नहीं बल्कि घोड़े जैसी होनी चाहिए।
तो दोस्तों, अब वक्त आ गया है अपनी कुर्सी से उठने का और इन लेसन्स को अपनी लाइफ में उतारने का। अगर आप अभी भी इस आर्टिकल को पढ़कर सिर्फ सोच रहे हैं तो मुबारक हो आप फिर से टाइम वेस्ट कर रहे हैं। अभी के अभी अपनी लिस्ट निकालिये और उस एक सबसे मुश्किल काम को खत्म कर डालिये।
हैंडल करें अपनी लाइफ को एक प्रो की तरह क्योंकि आपका समय आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। इसे किसी फालतू मीटिंग या बेकार के डर में मत गंवाइये।
अगर आपको लगता है कि इस आर्टिकल ने आपकी आँखों से 'बिजी रहने का पर्दा' हटा दिया है तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा ऑफिस में ओवर टाइम करता रहता है। नीचे कमेंट में हमें बताइये कि वो कौन सा एक काम है जिसे आप आज ही खत्म करने वाले हैं। चलिए मिलकर इंडिया को और ज्यादा प्रोडक्टिव बनाते हैं।
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