अगर आपको लगता है कि आप बहुत बिजी हैं और बिजनेस नहीं कर पा रहे हैं तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी का रास्ता खुद चुन रहे हैं। डेविड नीलमेन ने अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर के बावजूद आसमान छू लिया और आप बस बहाने बना रहे हैं। सच तो यह है कि आपको बिजनेस करना आता ही नहीं है।
डेविड नीलमेन की लाइफ हमें सिखाती है कि कैसे मुश्किल से मुश्किल हालातों में भी जीत हासिल की जाती है। इस आर्टिकल में हम फ्लाइंग हाई किताब के वो ३ लेसन देखेंगे जो आपकी सोच को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : कस्टमर के दर्द को अपना प्रॉफिट बनाओ
आज के दौर में अगर आप किसी एयरलाइन के कस्टमर केयर को फोन करें तो ऐसा लगता है जैसे आप किसी सरकारी दफ्तर में अपनी पेंशन की गुहार लगा रहे हैं। लोग आपको वेटिंग पर डाल देते हैं और पीछे से जो म्यूजिक बजता है वो आपकी बीपी बढ़ाने के लिए काफी है। डेविड नीलमेन ने इसी चिड़चिड़ाहट को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। जब उन्होंने जेटब्लू की शुरुआत की तो उनका विजन बहुत साफ था कि उन्हें सिर्फ हवाई जहाज नहीं उड़ाने हैं बल्कि उन्हें लोगों की इज्जत वापस लौटानी है। बड़ी एयरलाइंस को लगता था कि अगर वो आपको एक पैकेट मूंगफली दे रही हैं तो वो आप पर बहुत बड़ा एहसान कर रही हैं। डेविड ने इस घमंड को बीच रास्ते से काट दिया।
सोचिए आप एक ऐसी फ्लाइट में बैठे हैं जहां लेग रूम इतना कम है कि आपके घुटने आपकी ठुड्डी से टकरा रहे हैं। आप वहां एक योगा पोज में फंसे हुए हैं और एयरहोस्टेस ऐसे देख रही है जैसे आपने उसका उधार खाया हो। डेविड ने इस एक्सपीरियंस को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने लेदर सीट्स दीं और हर पैसेंजर के लिए पर्सनल टीवी स्क्रीन लगाई। उस समय लोग कहते थे कि भाई साहब आप चैरिटी खोल रहे हैं या बिजनेस। लेकिन डेविड जानते थे कि जब आप कस्टमर को वो देते हैं जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है यानी कि सुकून तो वो आपके पास बार बार लौटकर आता है।
एक बार की बात है जब एक फ्लाइट डिले हुई तो डेविड ने खुद जाकर पैसेंजर से माफी मांगी। आज के बॉस तो ऑफिस के केबिन से बाहर नहीं निकलते और यहां एक सीईओ खुद जाकर लोगों के गुस्से का सामना कर रहा था। यह कोई ड्रामा नहीं था बल्कि यह उनका तरीका था दुनिया को बताने का कि मेरे लिए मेरा बिजनेस मेरी ईगो से बड़ा है। अगर आप भी आज कोई बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं और आपका ध्यान सिर्फ पैसों पर है तो शायद आप अपनी कब्र खुद खोद रहे हैं। पैसा तो बायप्रोडक्ट है असली खेल तो कस्टमर की लाइफ से फ्रस्ट्रेशन कम करने का है।
जब बाकी कंपनियां अपनी सर्विस में कटौती करके दो पैसे बचाने की जुगाड़ में लगी थीं तब डेविड ने क्वालिटी पर दांव लगाया। उन्होंने दिखाया कि सस्ता होने का मतलब घटिया होना नहीं होता। उन्होंने बजट एयरलाइन को एक लग्जरी फील दिया। यही वो वजह थी कि लोग जेटब्लू के दीवाने हो गए। अगर आप भी अपने कॉम्पिटिशन को खत्म करना चाहते हैं तो बस वो एक चीज पकड़ लीजिए जिससे आपका कस्टमर सबसे ज्यादा परेशान है और उसे हल कर दीजिए। फिर देखिए कैसे दुनिया आपके पीछे लाइन लगाकर खड़ी होती है।
लेसन २ : पुराने सिस्टम को लात मारो और टेक्नोलॉजी अपनाओ
बिजनेस की दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं जैसे उनके दादाजी की परचून की दुकान चलती थी। डेविड नीलमेन उनमें से नहीं थे। जब जेटब्लू खड़ी हो रही थी तब एयरलाइन इंडस्ट्री पत्थर के जमाने में जी रही थी। चारों तरफ कागजों का ढेर लगा रहता था और टिकट बुक करना मतलब किसी जंग को जीतने जैसा था। डेविड ने साफ कह दिया कि अगर हमें उड़ना है तो इस कचरे को जमीन पर ही छोड़ना होगा। उन्होंने ई टिकट यानी पेपरलेस टिकटिंग की शुरुआत की जो उस दौर में लोगों को किसी जादू जैसा लगता था।
सोचिए उस जमाने की बात जब लोग अपनी टिकट को तिजोरी में संभाल कर रखते थे क्योंकि अगर वो खो गई तो समझो आपकी यात्रा खत्म। डेविड ने इस डर को ही खत्म कर दिया। उन्होंने टेक्नोलॉजी का ऐसा जाल बुना कि सिस्टम स्मूथ हो गया और खर्चे कम हो गए। जो पैसा वो कागज और फालतू के स्टाफ पर बचा रहे थे वही फायदा उन्होंने कस्टमर को सस्ती टिकट के रूप में दे दिया। इसे कहते हैं दिमाग का सही इस्तेमाल। वरना हमारे यहां तो लोग आज भी फोटोकॉपी की दुकान ढूंढने में ही आधा दिन निकाल देते हैं और फिर कहते हैं कि बिजनेस में ग्रोथ नहीं हो रही है।
सिर्फ टिकट ही नहीं डेविड ने फ्लाइट के अंदर लाइव टीवी देकर सबको हैरान कर दिया। कल्पना कीजिए कि आप बादलों के ऊपर ३० हजार फीट की ऊंचाई पर बैठे हैं और आराम से अपना पसंदीदा शो देख रहे हैं। उस समय दूसरी एयरलाइंस के पास दिखाने के लिए सिर्फ एक पुराना घिसा पिटा वीडियो होता था जिसे देखकर आदमी सफर से पहले ही बोरियत से मर जाए। डेविड ने समझ लिया था कि इंसान को सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुंचना है बल्कि उसे उस सफर के दौरान बोरियत से भी बचना है।
डेविड का मानना था कि अगर आप टेक्नोलॉजी से डरते हैं तो आप बिजनेस करने के लायक ही नहीं हैं। उन्होंने अपनी कंपनी में ऐसे सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किए जिससे घर बैठे लोग कॉल सेंटर का काम कर सकें। इससे कंपनी का ऑफिस का खर्चा बच गया और एम्प्लॉई भी खुश रहे। जब बाकी कंपनियां बड़े बड़े ऑफिस के किराए भर रही थीं तब डेविड की टीम घर से बैठकर बिजनेस को टॉप पर पहुंचा रही थी। यह उस समय का वर्क फ्रॉम होम था जब लोगों को इंटरनेट की स्पेलिंग भी ठीक से नहीं पता थी।
अगर आप आज भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके अपना रहे हैं और सोच रहे हैं कि कोई करिश्मा होगा तो आप गलतफहमी में हैं। टेक्नोलॉजी कोई शौक नहीं बल्कि आज की जरूरत है। डेविड ने सिखाया कि जो कंपनी वक्त के साथ अपने सिस्टम को अपडेट नहीं करती वक्त उसे मार्केट से डिलीट कर देता है। उन्होंने हर उस चीज को बदला जो कस्टमर के लिए रुकावट थी। उन्होंने साबित किया कि अगर आप स्मार्ट हैं तो आप कम बजट में भी बड़े खिलाड़ियों की नींद उड़ा सकते हैं। इनोवेशन का मतलब सिर्फ नई मशीनें खरीदना नहीं है बल्कि अपनी सोच को नया करना है।
लेसन ३ : अपनी कमजोरी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाओ
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो अपनी कमियों का रोना रोते रहते हैं और दूसरे वो जो उन कमियों को अपनी सीढ़ी बना लेते हैं। डेविड नीलमेन को ADHD था यानी ऐसी स्थिति जिसमें इंसान एक जगह ध्यान नहीं लगा पाता। स्कूल के दिनों में उन्हें शायद बेकार समझा जाता होगा और लोग कहते होंगे कि यह लड़का तो लाइफ में कुछ नहीं कर पाएगा। लेकिन डेविड ने अपनी इस तथाकथित बीमारी को एक सुपरपावर में बदल दिया। उनका दिमाग इतना तेज चलता था कि वो एक साथ दस चीजें सोच सकते थे। जहां एक आम आदमी एक समस्या पर अटक जाता है वहां डेविड का दिमाग उसके पांच समाधान निकाल चुका होता था।
जरा सोचिए अगर डेविड भी बाकी लोगों की तरह अपनी इस कंडीशन को लेकर किसी कोने में बैठकर उदास होते तो क्या आज हम उनके बारे में बात कर रहे होते। बिल्कुल नहीं। उन्होंने अपनी इस बेचैनी को इनोवेशन की आग बना दिया। उन्हें रुकना पसंद नहीं था और यही वजह थी कि वो हमेशा कुछ नया करने के लिए छटपटाते रहते थे। अगर आपके अंदर भी कोई ऐसी बात है जिसे दुनिया कमजोरी कहती है तो शायद वही आपकी सबसे बड़ी ताकत है। बस आपको उसे सही दिशा में मोड़ना आना चाहिए। वरना दुनिया तो आपको हर मोड़ पर यह बताने के लिए खड़ी है कि आप में क्या क्या कमी है।
डेविड ने कभी हार नहीं मानी। जब उन्हें उनकी ही बनाई कंपनी से निकाल दिया गया तब भी उन्होंने हार मानकर घर बैठने के बजाय एक नई एयरलाइन शुरू कर दी। यह जिगर हर किसी के पास नहीं होता। हमारे यहाँ तो लोग एक छोटी सी नौकरी जाने पर ऐसे टूट जाते हैं जैसे उनकी जिंदगी का आखिरी दिन हो। डेविड ने दिखाया कि सक्सेस का रास्ता सीधा नहीं होता बल्कि उसमें बहुत सारे टेढ़े मेढ़े मोड़ आते हैं। असली खिलाड़ी वही है जो हर मोड़ पर अपनी गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दे न कि ब्रेक मारकर बैठ जाए। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि आपका पास्ट या आपकी फिजिकल लिमिटेशन आपका फ्यूचर तय नहीं करतीं।
आज की जनरेशन को लगता है कि सब कुछ पहली बार में ही परफेक्ट होना चाहिए। लेकिन सच तो यह है कि परफेक्शन एक धोखा है। डेविड ने अपनी गलतियों से सीखा और हर बार पहले से ज्यादा मजबूती के साथ वापसी की। उनकी लाइफ एक फिल्म की तरह है जहां हीरो गिरता है फिर उठता है और फिर सबको हैरान कर देता है। अगर आप भी कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो अपनी कमियों से दोस्ती कर लीजिए। उन्हें गले लगाइए और दुनिया को दिखाइए कि जो आपकी कमजोरी थी वही आज आपकी कामयाबी का राज है।
उम्मीद है डेविड नीलमेन की यह कहानी आपको सोफे से उठकर कुछ करने के लिए मजबूर कर देगी। अब वक्त आ गया है कि आप अपने बहानों की पोटली बांधकर फेंक दें और अपने सपनों की उड़ान भरें। याद रखिए आसमान उन्हीं के लिए खुला है जिनके पास उड़ने का हौसला है और जो गिरने से नहीं डरते।
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