क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सोचते हैं कि बड़ी ऑफिस और हजारों एम्प्लाइज मतलब बहुत ज्यादा सक्सेस है। बधाई हो आप अपनी बर्बादी के पेपर पर खुद साइन कर रहे हैं। जबकि दुनिया के स्मार्ट लोग छोटे बनकर बड़ा खेल रहे हैं और आप अभी भी पुराने भारी भरकम मॉडल में फंसे हैं।
आज के इस आर्टिकल में हम जोएल शुलमन की शानदार बुक गेटिंग बिगर बाय ग्रोइंग स्मॉलर का पूरा पोस्टमार्टम करेंगे। हम देखेंगे कि कैसे छोटी टीमें और स्मार्ट स्ट्रैटेजी बड़े कॉर्पोरेट जाइंट्स को धूल चटा रही हैं। चलिए बिजनेस के इन ३ जादुई लेसन को विस्तार से समझते हैं जो आपकी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : छोटी यूनिट्स का बड़ा धमाका
आजकल के दौर में सबको लगता है कि जितनी बड़ी फौज होगी उतनी ही बड़ी जीत होगी। लोग अपने ऑफिस के केबिन और एम्प्लाइज की गिनती बढ़ाकर छाती चौड़ी करते फिरते हैं। जोएल शुलमन अपनी बुक में सबसे पहले इसी गुब्बारे में सुई चुभोते हैं। असलियत तो यह है कि बड़ी कंपनियां अक्सर अपने ही वजन से दबकर मर जाती हैं। जैसे किसी शादी में अगर ५००० लोग आ जाएं और मैनेजमेंट सिर्फ दो लोग कर रहे हों तो वहां खाना कम और धक्का मुक्की ज्यादा होती है। ठीक वैसे ही जब बिजनेस बहुत बड़ा और भारी हो जाता है तो उसमें फैसले लेने की स्पीड कछुए से भी धीमी हो जाती है। लेखक कहते हैं कि अगर आपको वाकई में आसमान छूना है तो आपको छोटे छोटे टुकड़ों में बंटना होगा।
मान लीजिए आप एक बहुत बड़े और भारी भरकम हाथी को लेकर संकरी गलियों में रेस लगा रहे हैं। अब हाथी भाई साहब को मुड़ने के लिए भी आधा घंटा चाहिए और उनकी भूख का तो पूछिए ही मत। वहीं दूसरी तरफ एक छोटा सा खरगोश है जो कहीं से भी निकल जाता है और उसे पालना भी सस्ता है। बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है। जब आप अपनी बड़ी कंपनी को छोटी छोटी आत्मनिर्भर यूनिट्स में तोड़ देते हैं तो हर यूनिट एक छोटे स्टार्टअप की तरह काम करने लगती है। वहां कोई फालतू की मीटिंग्स नहीं होती और न ही बॉस के बॉस से परमिशन लेने का झंझट होता है।
भारत में भी हम देखते हैं कि कई बार एक छोटी सी चाय की टपरी वाला एक बड़े आलीशान रेस्टोरेंट से ज्यादा प्रॉफिट कमा ले जाता है। क्यों। क्योंकि टपरी वाले को पता है कि उसका कस्टमर क्या चाहता है और वह तुरंत बदलाव कर सकता है। वहीं बड़े रेस्टोरेंट में एक नया समोसा मेनू में जोड़ने के लिए भी बोर्ड मीटिंग बुलानी पड़ जाती है। शुलमन का यह मॉडल कहता है कि जब आप छोटे होते हैं तो आप जमीन से जुड़े रहते हैं। आपको पता होता है कि मार्केट में क्या चल रहा है। बड़ी कंपनियों के ईओ तो अक्सर अपनी एयर कंडीशन्ड ऑफिस की खिड़की से बाहर देखते रहते हैं और उन्हें पता ही नहीं चलता कि बाहर धूप है या बारिश।
इसलिए अगर आप अपने बिजनेस को सच में ग्रो करना चाहते हैं तो पहले यह सोचना बंद करिए कि बड़ा मतलब बेहतर। अपनी टीम को इतना छोटा रखिए कि हर कोई एक दूसरे का नाम जानता हो। जब टीम छोटी होती है तो जिम्मेदारी ज्यादा होती है। वहां कोई कोने में बैठकर सिर्फ सैलरी के इंतजार में गेम नहीं खेल सकता। वहां हर किसी को परफॉर्म करना ही पड़ता है क्योंकि उसकी मेहनत साफ दिखती है। यह लेसन हमें सिखाता है कि असली ग्रोथ साइज में नहीं बल्कि आपकी काम करने की फुर्ती और समझदारी में छुपी है। छोटे बनिए ताकि आप बिना किसी बोझ के तेजी से भाग सकें और मार्केट के बड़े खिलाड़ियों को पीछे छोड़ सकें।
लेसन २ : ओनरशिप माइंडसेट और जिम्मेदारी का असली खेल
दूसरे लेसन में जोएल शुलमन एक ऐसी कड़वी सच्चाई बताते हैं जिसे सुनकर शायद कई बॉसेस को मिर्ची लग जाए। वह कहते हैं कि अगर आप अपने एम्प्लाइज को भेड़ बकरियों की तरह हांकेंगे तो वह आपकी कंपनी को कसाईखाना ही समझेंगे। ज्यादातर कंपनियों में लोग सुबह ९ बजे ऑफिस इसलिए नहीं आते कि उन्हें कंपनी को नंबर १ बनाना है। वह सिर्फ इसलिए आते हैं ताकि शाम के ६ बजें और वह अपनी अटेंडेंस लगाकर घर भाग सकें। लेखक कहते हैं कि अगर आपको वाकई में ग्रो करना है तो आपको अपने लोगों के अंदर ओनरशिप माइंडसेट यानी मालिक वाली सोच पैदा करनी होगी। जब इंसान को लगता है कि यह काम मेरा है तब वह उसे दिल से करता है वरना तो बस खानापूर्ति ही होती है।
सोचिए आपके घर में एक किराएदार रहता है और दूसरी तरफ आपका अपना खुद का घर है। किराएदार शायद दीवार पर कील ठोकते वक्त एक बार भी नहीं सोचेगा कि पेंट खराब हो रहा है। लेकिन आप अपने घर की एक खरोंच देखकर भी दुखी हो जाते हैं। बिजनेस में भी यही होता है। जब आप अपनी कंपनी को छोटे टुकड़ों में बांटते हैं और उस छोटी टीम के लीडर को पूरी आजादी देते हैं तो वह उसे अपने बच्चे की तरह पालता है। उसे पता होता है कि अगर यह यूनिट डूबी तो क्रेडिट भी उसी का जाएगा और अगर प्रॉफिट हुआ तो रिवॉर्ड भी सबसे पहले उसे ही मिलेगा। यहाँ एम्प्लाइज सिर्फ सैलरी के लिए नहीं बल्कि अपनी इज्जत और हिस्सेदारी के लिए लड़ते हैं।
भारत के शर्मा जी के बेटे को ही देख लीजिए। वह मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है लेकिन उसे खुद नहीं पता कि जो कोड वह लिख रहा है उसका अंत में क्या इस्तेमाल होगा। वह बस एक मशीन का पुर्जा बनकर रह गया है। लेकिन वही शर्मा जी का बेटा जब खुद का छोटा सा स्टार्टअप शुरू करता है तो वह दिन रात एक कर देता है। क्यों। क्योंकि अब वह मालिक है। जोएल शुलमन का मॉडल इसी ताकत को कॉर्पोरेट जगत में लाने की बात करता है। वह कहते हैं कि हर छोटे यूनिट को अपना प्रॉफिट और लॉस खुद मैनेज करने दीजिए। उन्हें यह पावर दीजिए कि वह अपने फैसले खुद ले सकें।
अक्सर बड़े कॉर्पोरेट घरानों में लोग जिम्मेदारी से ऐसे बचते हैं जैसे पुलिस को देखकर बिना हेलमेट वाला बाइक सवार। एक फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल तक जाने में हफ्तों लगा देती है क्योंकि कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहता। लेकिन छोटे और ओनरशिप वाले मॉडल में लोग रिस्क लेते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि रिस्क के बिना बड़ा रिवॉर्ड नहीं मिलेगा। यहाँ कोई यह नहीं कह सकता कि यह मेरा काम नहीं है। यहाँ हर काम सबका है क्योंकि मंजिल एक है। जब हर एम्प्लॉय खुद को कंपनी का छोटा सा पार्टनर समझने लगता है तो कंपनी की ग्रोथ रॉकेट की तरह ऊपर जाती है। याद रखिए जब तक लोग सिर्फ पैसे के लिए काम करेंगे वह आपको सिर्फ अपना वक्त देंगे। लेकिन जब वह ओनरशिप के लिए काम करेंगे तो वह आपको अपना टैलेंट और वफादारी दोनों देंगे।
लेसन ३ : सिम्प्लिसिटी का जादू और कॉम्प्लेक्सिटी से आजादी
तीसरे लेसन में जोएल शुलमन उस बीमारी की बात करते हैं जो लगभग हर बढ़ते हुए बिजनेस को लग जाती है और वह है बेवजह की पेचीदगी यानी कॉम्प्लेक्सिटी। जैसे ही कोई कंपनी थोड़ी बड़ी होती है वह फालतू के नियम कायदे और प्रोसीजर का ऐसा जाल बुन देती है कि उसमें असली काम ही दम तोड़ देता है। लेखक का मानना है कि असल समझदारी चीजों को बढ़ाने में नहीं बल्कि उन्हें सिंपल रखने में है। अगर आपका बिजनेस मॉडल इतना मुश्किल है कि उसे समझाने के लिए आपको पांच पीपीटी स्लाइड्स और दो एक्सपर्ट्स की जरूरत पड़ रही है तो समझ लीजिए कि आप गलत रास्ते पर हैं। सादगी में ही असली ताकत है क्योंकि इसे स्केल करना आसान होता है।
इस बात को समझने के लिए अपने मोहल्ले की उस परचून की दुकान को याद कीजिए जो पिछले ३० सालों से शान से चल रही है। वहां कोई हाई टेक सॉफ्टवेयर नहीं है और न ही कोई बहुत बड़ा मैनेजमेंट स्ट्रक्चर। लेकिन दुकानदार को पता है कि किस डिब्बे में क्या रखा है और किस कस्टमर को उधार देना है। दूसरी तरफ बड़े मॉल्स को देखिए जहां एक चॉकलेट खरीदने के लिए भी आपको तीन अलग काउंटर्स के चक्कर काटने पड़ते हैं और अंत में बिलिंग मशीन खराब निकलती है। शुलमन कहते हैं कि जब आप छोटे यूनिट्स में काम करते हैं तो आप इस फालतू के तामझाम से बच जाते हैं। वहां फोकस सिर्फ रिजल्ट पर होता है न कि इस पर कि रिपोर्ट का फोंट साइज क्या है।
अक्सर देखा गया है कि कॉर्पोरेट वर्ल्ड में लोग काम कम करते हैं और काम करने का दिखावा ज्यादा करते हैं। दिन भर मीटिंग्स होती हैं यह डिस्कस करने के लिए कि अगली मीटिंग कब होगी। इसे शुलमन कॉर्पोरेट कचरा कहते हैं। जब आप चीजों को सिंपल रखते हैं तो कम्युनिकेशन एकदम साफ होता है। छोटे ग्रुप्स में बातें सीधे चेहरे पर कही जाती हैं जिससे गलतफहमियों की कोई जगह नहीं बचती। सादगी का मतलब यह नहीं है कि आप मॉडर्न टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल न करें बल्कि इसका मतलब यह है कि टेक्नोलॉजी आपकी मदद के लिए होनी चाहिए न कि आपका काम बढ़ाने के लिए।
जोएल शुलमन का यह नया ग्रोथ मॉडल हमें सिखाता है कि बड़ा बनना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन बड़ा दिखने की चाहत में अपनी फुर्ती खो देना बहुत बड़ी बेवकूफी है। असली विनर वही है जो हाथी जैसा बड़ा तो हो लेकिन उसके अंदर एक चीते जैसी फुर्ती और एक छोटे स्टार्टअप जैसी भूख बरकरार हो। अगर आप अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे और हर लेवल पर सादगी और ओनरशिप को बढ़ावा देंगे तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती। बिजनेस कोई रॉकेट साइंस नहीं है बशर्ते आप उसे अपनी ईगो के कारण पेचीदा न बनाएं।
तो दोस्तों, यह थे जोएल शुलमन की किताब गेटिंग बिगर बाय ग्रोइंग स्मॉलर के वो अनमोल लेसन जो आपकी बिजनेस और करियर की सोच को पूरी तरह बदल सकते हैं। याद रखिए सफलता का रास्ता हमेशा भारी भरकम रास्तों से नहीं बल्कि छोटी और समझदारी भरी गलियों से होकर गुजरता है। क्या आप भी अपने काम या बिजनेस में बहुत ज्यादा कॉम्प्लेक्सिटी झेल रहे हैं। आज ही बैठिए और सोचिए कि आप अपनी कौन सी तीन चीजों को छोटा और सिंपल बना सकते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो बड़े ऑफिस का सपना तो देखते हैं लेकिन छोटे मैनेजमेंट की ताकत को भूल जाते हैं। कमेंट में हमें बताएं कि आपको इन ३ लेसन्स में से सबसे अच्छा कौन सा लगा।
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