क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो खुद को लीडर समझकर ऑफिस में बॉस की तरह ऑर्डर झाड़ते हैं और फिर हैरान होते हैं कि कोई आपकी इज्जत क्यों नहीं करता। सच तो यह है कि बिना वैल्यूज के आपकी लीडरशिप सिर्फ एक खोखली कुर्सी है जिसे लोग पीठ पीछे जोक समझते हैं।
हैरी क्रेमर की बुक फ्रॉम वैल्यूज टू एक्शन हमें वह कड़वा सच दिखाती है जिसे इग्नोर करके आप अपनी प्रोफेशनल लाइफ को धीरे धीरे बर्बाद कर रहे हैं। आइए उन ३ लेसन्स को समझते हैं जो आपको एक एवरेज बॉस से हटाकर एक असली लीडर बनाएंगे।
लेसन १ : सेल्फ रिफ्लेक्शन - खुद का एक्स-रे करना सीखो
आजकल की भागदौड़ वाली लाइफ में हम सब पागलों की तरह भाग रहे हैं। सुबह उठते ही फोन चेक करना और रात को सोते समय रील देखते हुए सो जाना हमारा नेशनल धर्म बन चुका है। हैरी क्रेमर कहते हैं कि अगर आप खुद को लीडर मानते हैं लेकिन दिन में १५ मिनट भी शांति से बैठकर खुद से बात नहीं करते, तो भाई आप लीडर नहीं बल्कि एक कंफ्यूज्ड रोबोट हैं। सेल्फ रिफ्लेक्शन का मतलब यह नहीं है कि आप हिमालय पर जाकर तपस्या करें। इसका सिंपल मतलब है कि आप अपनी वैल्यूज और अपने एक्शन्स के बीच का गैप चेक करें।
सोचिए आप ऑफिस में अपनी टीम को ज्ञान देते हैं कि 'टाइम की कदर करो' लेकिन खुद मीटिंग में १५ मिनट लेट पहुँचते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि बॉस हूं तो चलता है। लेकिन असलियत में आपकी टीम आपको देखकर मन ही मन 'गजनी' फिल्म का आमिर खान समझ रही है जिसे अपनी ही बातें याद नहीं रहतीं। जब तक आप खुद का मिरर टेस्ट नहीं करेंगे, तब तक दुनिया आपको सीरियसली नहीं लेगी। सेल्फ रिफ्लेक्शन आपको वह क्लैरिटी देता है जो आपको भीड़ से अलग करती है।
अक्सर लोग कहते हैं कि उनके पास टाइम नहीं है। भाई साहब, अगर आपके पास अपनी लाइफ के बारे में सोचने के लिए १५ मिनट नहीं हैं, तो आपकी लाइफ आपके हाथ में है ही नहीं। आप बस दूसरों के ऑर्डर्स और सिचुएशंस के गुलाम बन चुके हैं। एक असली वैल्यूज बेस्ड लीडर वह है जो अपनी गलतियों को पहचानने की हिम्मत रखता है। वह जानता है कि आज उसने कहाँ गुस्सा किया, कहाँ वह लालची बना और कहाँ उसने झूठ बोला। यह कोई मोरल साइंस की क्लास नहीं है बल्कि एक पावरफुल बिजनेस टूल है।
जब आप रोज खुद को एनालाइज करते हैं, तो आपकी डिसीजन मेकिंग पावर रॉकेट की तरह ऊपर जाती है। आपको पता होता है कि आप कौन सा प्रोजेक्ट क्यों ले रहे हैं। आप सिर्फ पैसों के पीछे नहीं भागते बल्कि अपने पर्पस को फॉलो करते हैं। याद रखिए, जो इंसान खुद को नहीं चला सकता, वह किसी कंपनी या टीम को क्या खाक चलाएगा। इसलिए फोन को साइड में रखिए और कभी कभी खुद से भी पूछ लीजिए कि 'भाई, तू कर क्या रहा है'। यह कड़वा जरूर लगेगा लेकिन आपकी ग्रोथ के लिए यह किसी कड़वी दवा से कम नहीं है।
लेसन २ : बैलेंस - हर सिक्के के दो नहीं बल्कि दस पहलू देखो
सेल्फ रिफ्लेक्शन के बाद जो सबसे बड़ी चीज आती है, वह है बैलेंस। अब बैलेंस का मतलब यह नहीं है कि आप ऑफिस में काम करते हुए एक पैर पर खड़े होकर योगा करें। हैरी क्रेमर यहाँ जिस बैलेंस की बात कर रहे हैं, वह है आपके दिमाग का बैलेंस। एक असली लीडर वह नहीं होता जो सिर्फ अपनी जिद पर अड़ा रहे कि 'जो मैंने कह दिया वही पत्थर की लकीर है'। भाई, आप कोई पुराने जमाने के फिल्म एक्टर नहीं हो, आप एक लीडर हो। बैलेंस का मतलब है कि किसी भी बड़े डिसीजन को लेने से पहले आप उसे हर मुमकिन नजरिए से देखें।
इमेजिन कीजिए कि आपकी कंपनी में एक नया प्रोजेक्ट आया है। अब आप एक्साइटमेंट में आकर अपनी टीम पर काम का पहाड़ तोड़ देते हैं क्योंकि आपको अपना बोनस दिख रहा है। लेकिन क्या आपने अपनी टीम के नजरिए से सोचा। क्या आपने यह सोचा कि मार्केट की हालत क्या है। अगर आप सिर्फ एक तरफा सोच रहे हैं, तो यकीन मानिए आप लीडरशिप की नहीं बल्कि तानाशाही की पटरी पर चल रहे हैं। बैलेंस का मतलब होता है 'ट्रू पर्सपेक्टिव'। इसका मतलब है कि आप यह समझें कि दुनिया सिर्फ आपके आसपास नहीं घूमती।
अक्सर लीडर्स को लगता है कि उन्हें सब पता है। यह ईगो का चश्मा पहनकर वो ऐसे फैसले लेते हैं जिससे बाद में कंपनी का दिवाला निकल जाता है। एक वैल्यूज बेस्ड लीडर हमेशा अपनी टीम के छोटे से छोटे मेंबर से भी इनपुट लेता है। वह जानता है कि शायद जो बात उसे नहीं दिख रही, वो ऑफिस के उस कोने में बैठे इंटर्न को दिख रही हो। बैलेंस का मतलब यह भी है कि आप अपनी पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींचें। अगर आप रात को २ बजे अपनी टीम को ईमेल भेज रहे हैं, तो आप बहुत बड़े मेहनती नहीं बल्कि एक 'वर्कहोलिक विलेन' बन रहे हैं जो दूसरों की शांति छीन रहा है।
जब आप चीजों को बैलेंस करना सीख जाते हैं, तो आपकी रिस्पेक्ट बढ़ जाती है। लोग जानते हैं कि आपके पास कोई समस्या लेकर जाएंगे तो आप उसे फेयर तरीके से सुनेंगे। आप सिर्फ अपने फायदे के लिए दूसरों का गला नहीं काटेंगे। असली बैलेंस तब आता है जब आप मुश्किल वक्त में भी शांत रहकर यह सोच सकें कि 'इसमें सबका भला क्या है'। याद रखिए, एक तराजू तभी काम का होता है जब वह बैलेंस हो। वरना टेढ़ा तराजू तो सिर्फ सब्जी मंडी में धोखा देने के काम आता है, लीडरशिप में नहीं।
लेसन ३ : जेन्युइन ह्यूमिलिटी - ईगो को डस्टबिन में डालना सीखो
अगर आपको लगता है कि ऑफिस की केबिन में बैठकर चिल्लाने से या अपनी लग्जरी कार की चाबी टेबल पर पटकने से आप बड़े बन गए हैं, तो भाई आप गलतफहमी के शिकार हैं। हैरी क्रेमर कहते हैं कि असली लीडरशिप का सीक्रेट है जेन्युइन ह्यूमिलिटी यानी सच्ची विनम्रता। अब इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप सबसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांगते फिरें। इसका सीधा मतलब यह है कि आप यह याद रखें कि आप जहाँ भी पहुँचे हैं, उसमें सिर्फ आपकी मेहनत नहीं बल्कि किस्मत और आपकी टीम का भी बड़ा हाथ है।
सोचिए आपकी टीम ने एक बड़ा टारगेट अचीव किया। अब मीटिंग में आप स्टेज पर खड़े होकर सीना ठोककर कह रहे हैं कि 'यह सब मेरी स्ट्रेटेजी का कमाल है'। यकीन मानिए, उस वक्त आपकी टीम ताली तो बजा रही होगी लेकिन उनके दिल से आपके लिए सिर्फ 'बददुआएं' निकल रही होंगी। एक असली लीडर वह है जो जीत का सेहरा अपनी टीम के सिर बांधता है और जब हार होती है, तो सबसे आगे खड़ा होकर जिम्मेदारी लेता है। लेकिन आजकल के ज्यादातर लीडर्स का हाल तो यह है कि क्रेडिट लेते समय वो 'बाहुबली' बन जाते हैं और गलती होने पर 'मिस्टर इंडिया' बनकर गायब हो जाते हैं।
ह्यूमिलिटी का मतलब यह भी है कि आप अपनी कमियों को स्वीकार करें। अगर आपको कोई चीज नहीं पता, तो साफ कह दीजिए कि 'मुझे नहीं पता, चलो साथ मिलकर सीखते हैं'। ऐसा कहने से आप छोटे नहीं होंगे बल्कि आपकी टीम की नजर में आपकी इज्जत १० गुना बढ़ जाएगी। जब आप ईगो को साइड में रखकर काम करते हैं, तो लोग आपके लिए नहीं बल्कि आपके साथ काम करना चाहते हैं। ईगो एक ऐसी बीमारी है जो आपको अंदर से खोखला कर देती है और आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे स्मार्ट इंसान हैं। जबकि सच तो यह है कि स्मार्ट इंसान वह है जिसे पता है कि उसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।
अंत में याद रखिए, आपकी पोजीशन, आपकी सैलरी और आपका टाइटल सब कुछ टेंपरेरी है। जो चीज टिकेगी, वो है आपकी वैल्यूज और आपका व्यवहार। अगर आप एक वैल्यूज बेस्ड लीडर बनना चाहते हैं, तो आज से ही इन तीन प्रिंसिपल्स को अपनी लाइफ में उतारना शुरू कीजिए। सेल्फ रिफ्लेक्शन से खुद को पहचानिए, बैलेंस से दुनिया को देखिए और ह्यूमिलिटी से लोगों का दिल जीतिए। क्योंकि अंत में लोग यह याद नहीं रखेंगे कि आपने कितना पैसा कमाया, बल्कि यह याद रखेंगे कि आपने उन्हें कैसा महसूस कराया। अब फैसला आपका है कि आप एक बॉस बनकर रिटायर होना चाहते हैं या एक लीडर बनकर लोगों की यादों में जिंदा रहना चाहते हैं।
जागिए और एक्शन लीजिए क्योंकि दुनिया को मैनेजर्स की नहीं, असली लीडर्स की जरूरत है।
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