Growing Your Company's Leaders (Hindi)


क्या आप भी अपनी कंपनी को किसी डूबते हुए जहाज की तरह चला रहे हैं जहाँ कैप्टन के हटते ही सब कुछ डूब जाएगा। बधाई हो आप उन एवरेज लोगों की लिस्ट में टॉप पर हैं जो फ्यूचर की प्लानिंग के नाम पर सिर्फ लंच ब्रेक ही मैनेज कर पाते हैं। बिना सक्सेशन मैनेजमेंट के आपका बिजनेस बस एक तुक्का है जो कभी भी खत्म हो सकता है।

परेशान मत होइये क्योंकि आज हम रॉबर्ट फुल्मर और जय कोंगर की बुक से वो सीक्रेट्स जानेंगे जो आपकी कंपनी को एक अमर संस्था बना देंगे। आइये समझते हैं वे ३ लेसन जो आपको एक ऑर्डिनरी बॉस से एक लेजेंडरी लीडर मेकर बना देंगे।


लेसन १ : टैलेंट की खेती करना सीखिये वरना दुकान बंद कर दीजिये

दोस्तो, अक्सर लोग समझते हैं कि लीडरशिप का मतलब है ऑफिस में अपनी कुर्सी पर बैठकर ऑर्डर देना और चाय पीना। लेकिन रॉबर्ट फुल्मर कहते हैं कि असली लीडर वो नहीं है जो सबसे ज्यादा काम करता है बल्कि वो है जो अपने पीछे दस नए लीडर खड़े करता है। सोचिये आपकी कंपनी एक बगीचा है। अगर आप सिर्फ आज के फल खाकर सो जाएंगे और नए बीज नहीं बोएंगे तो अगले साल क्या खाएंगे। सक्सेशन मैनेजमेंट का सबसे पहला और बड़ा उसूल यही है कि टैलेंट को हर लेवल पर ढूंढना शुरू कीजिये। ज्यादातर मैनेजर क्या करते हैं। वे बस अपने फेवरेट एम्प्लॉई को ही प्रमोट करते हैं जो उनके लिए समोसे लाता है या उनकी हर बात पर हाँ में हाँ मिलाता है। यह लीडरशिप नहीं है यह तो बस एक छोटा सा ग्रुप है जो कंपनी को गड्ढे में ले जा रहा है।

असल में टैलेंट को पहचानना एक कला है। आपको अपनी टीम के हर इंसान को गौर से देखना होगा। क्या कोई ऐसा है जो मुश्किल समय में जिम्मेदारी लेता है। क्या कोई ऐसा है जो बिना कहे दूसरों की मदद करता है। यही वो लोग हैं जो कल आपकी जगह लेंगे। अगर आप सिर्फ टॉप लेवल पर बैठे लोगों की चिंता करेंगे और नीचे के लोगों को इग्नोर करेंगे तो आपकी कंपनी ताश के पत्तों के घर की तरह गिर जाएगी। एक रियल लाइफ एग्जांपल देखिये। मान लीजिये आपके पास एक छोटी सी सॉफ्टवेयर कंपनी है। आपका सबसे बेस्ट कोडर बीमार पड़ जाता है और प्रोजेक्ट की डेडलाइन कल है। अब आपकी हालत पतली हो रही है क्योंकि आपने कभी किसी दूसरे को वो काम सिखाया ही नहीं। आप खुद को बहुत बड़ा तोप समझ रहे थे कि सब कुछ मेरे कंट्रोल में है लेकिन असल में आपने अपनी ही कंपनी का गला घोंट दिया है।

ग्रेट ऑर्गेनाइजेशन कभी भी किसी एक इंसान के भरोसे नहीं चलतीं। वे एक ऐसा सिस्टम बनाती हैं जहाँ हर लेवल पर लीडर्स तैयार होते रहते हैं। इसे हम टैलेंट पूल कहते हैं। इसका मतलब है कि अगर कल को सीईओ को कोई एलियन उठा ले जाए तो भी कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिये। कंपनी में काम करने वाले हर इंसान को पता होना चाहिये कि उनके पास ऊपर जाने का मौका है। जब लोगों को दिखता है कि कंपनी उनके टैलेंट की कदर करती है तो वे दिल लगाकर काम करते हैं। और जो कंपनियां सिर्फ बाहर से बड़े बड़े नाम वाले मैनेजर लाती हैं वे अक्सर फेल हो जाती हैं क्योंकि उन नए लोगों को कंपनी के कल्चर का पता ही नहीं होता। वे बस अपनी भारी भरकम सैलरी लेते हैं और जब कंपनी डूबने लगती है तो सबसे पहले भाग जाते हैं। इसलिये अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस आपके बिना भी चलता रहे तो आज ही से अपनी टीम में टैलेंट की खेती करना शुरू कीजिये। वरना याद रखियेगा कि इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिन्होंने खुद को बहुत जरूरी समझा और आज उनका नाम लेने वाला भी कोई नहीं है।


लेसन २ : लीडर खरीदे नहीं जाते बल्कि घर में ही बनाए जाते हैं

मार्केट में आज एक बहुत बड़ा फैशन चल पड़ा है। जब भी किसी कंपनी को बड़ा लीडर चाहिये होता है तो वे किसी महंगी रिक्रूटमेंट एजेंसी को फोन घुमाते हैं और किसी दूसरी कंपनी का स्टार प्लेयर चुराने की कोशिश करते हैं। रॉबर्ट फुल्मर और जय कोंगर कहते हैं कि यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप पड़ोसी का सजा सजाया गमला चुराकर अपने आंगन में रख लें। वह बाहर से तो अच्छा दिखेगा पर उसकी जड़ें आपके घर की मिट्टी में नहीं होंगी। सक्सेशन मैनेजमेंट का असली जादू 'बिल्ड' करने में है 'बाय' करने में नहीं। जो कंपनियां बाहर से लीडर लाती हैं वे अक्सर कल्चरल शॉक का शिकार हो जाती हैं। नया बॉस आता है अपनी नई अकड़ लेकर आता है और पुराने वफादार एम्प्लॉई को ऐसे देखता है जैसे वे किसी म्यूजियम के अवशेष हों। नतीजा क्या होता है। कलह और बर्बादी।

सोचिये आप एक बहुत बड़े फाइव स्टार होटल के मालिक हैं। अब अगर आप किसी ऐसे मैनेजर को बाहर से लाते हैं जिसने कभी आपकी किचन की गर्मी नहीं झेली या जिसे यह नहीं पता कि आपका सबसे पुराना कस्टमर बिना नमक की दाल पसंद करता है तो वो क्या ही लीडरशिप करेगा। वो बस एक्सेल शीट पर नंबर देखेगा और लोगों को फायर करेगा। इसके उलट अगर आप अपने उसी वेटर या शेफ को तैयार करते हैं जो पिछले दस साल से आपके साथ खड़ा है तो उसे कंपनी की नस नस का पता होगा। उसे पता होगा कि जब मशीन खराब होती है तो उसे लात कहाँ मारनी है। यही वो बारीक समझ है जो कॉम्पिटिटिव एडवांटेज पैदा करती है।

अक्सर बॉस लोग अपनी टीम को सिखाने से डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर मैंने इसे सब सिखा दिया तो यह मेरी ही कुर्सी छीन लेगा। भाई साहब अगर आपकी टीम का बंदा आपकी कुर्सी छीनने लायक बन गया है तो इसका मतलब है कि आप एक शानदार लीडर हैं। अब समय है कि आप खुद एक बड़ी कुर्सी पर बैठें और उसे अपनी पुरानी जगह दें। लेकिन नहीं हमें तो अपनी गद्दी से ऐसा लगाव है जैसे वो फेविकोल से चिपकी हो। ग्रेट ऑर्गेनाइजेशन इस डर को पालने के बजाय एक 'मेंटरशिप कल्चर' बनाती हैं। वे अपने टॉप एग्जीक्यूटिव्स को बोनस इस बात पर नहीं देतीं कि उन्होंने कितना प्रॉफिट कमाया बल्कि इस बात पर देती हैं कि उन्होंने कितने नए लीडर्स को प्रमोट होने के काबिल बनाया।

अगर आप आज भी इस इंतजार में हैं कि कोई मसीहा बाहर से आएगा और आपकी कंपनी की किस्मत बदल देगा तो आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। मसीहा आपकी टीम के बीच ही कहीं बैठा है बस आपने उसे पहचानने और तराशने की जहमत नहीं उठाई। असल में बाहर से टैलेंट लाना एक शॉर्टकट है और शॉर्टकट हमेशा लॉन्ग टर्म में भारी पड़ते हैं। अपनी कंपनी के अंदर ही वो आग ढूंढिये और उसे हवा दीजिये। जब एक एम्प्लॉई देखता है कि उसका सीनियर उसे आगे बढ़ते देखना चाहता है तो उसकी वफादारी की गारंटी कंपनी को मिल जाती है। और यकीन मानिये आज के जमाने में टैलेंट से ज्यादा कीमती वफादारी है जो किसी भी मार्केट से खरीदी नहीं जा सकती।


लेसन ३ : सक्सेशन मैनेजमेंट कोई इवेंट नहीं बल्कि एक लाइफस्टाइल है

ज्यादातर कंपनियों की सबसे बड़ी बीमारी यह है कि वे तब जागती हैं जब आग लग चुकी होती है। जब सीईओ इस्तीफा देता है या रिटायर होता है तब बोर्ड मेंबर्स ऐसे भागते हैं जैसे किसी ने मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर मार दिया हो। रॉबर्ट फुल्मर और जय कोंगर साफ कहते हैं कि सक्सेशन मैनेजमेंट कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप साल में एक बार मीटिंग रूम में बैठकर फाइल पर साइन करके खत्म कर दें। यह एक जिंदा प्रोसेस है जो हर दिन हर मिनट आपकी कंपनी के डीएनए में होना चाहिये। अगर आप इसे सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति समझते हैं तो यकीन मानिये आपकी कंपनी का भविष्य उतना ही धुंधला है जितना कोहरे में बिना हेडलाइट वाली गाड़ी का रास्ता।

सोचिये आप एक बहुत बड़े क्रिकेट कोच हैं। क्या आप वर्ल्ड कप के फाइनल वाले दिन तय करेंगे कि कौन सा नया खिलाड़ी टीम में आएगा। बिल्कुल नहीं। आप सालों पहले से अंडर १९ के खिलाड़ियों पर नजर रखते हैं उन्हें ट्रेनिंग देते हैं और छोटे मैचों में खिलाकर उनका दम चेक करते हैं। बिजनेस में भी यही करना होता है। आपको एक ऐसा पाइपलाइन बनाना होगा जहाँ से लगातार लीडर्स निकलकर बाहर आएं। इसे 'कंटीन्यूअस लर्निंग' कहते हैं। अगर आपकी कंपनी में लोग वही पुराना घिसा पिटा काम कर रहे हैं और कुछ नया नहीं सीख रहे हैं तो समझ जाइये कि आपकी पाइपलाइन जाम हो चुकी है। और जाम पाइपलाइन से सिर्फ बदबू आती है रिजल्ट्स नहीं।

यहाँ पर असली खेल डेटा और फीडबैक का है। ग्रेट ऑर्गेनाइजेशन सिर्फ अंदाजे पर नहीं चलतीं। वे बकायदा ट्रैक करती हैं कि कौन सा एम्प्लॉई किस स्किल में मास्टर हो रहा है। वे उन्हें ऐसी चुनौतियां देती हैं जो उन्हें उनके कंफर्ट जोन से बाहर निकालें। जैसे कि किसी जूनियर को एक बड़े प्रोजेक्ट का लीडर बना देना और फिर देखना कि वो दबाव में कैसे खेलता है। अगर वो गिरता है तो उसे उठाने के लिये मेंटर्स होने चाहिये न कि उसे नौकरी से निकालने के लिये शिकारी। जब आप फेलियर को सीखने का हिस्सा बना देते हैं तभी असली लीडर्स का जन्म होता है।

अक्सर लोग बहाना बनाते हैं कि हमारे पास इन सब चीजों के लिये टाइम नहीं है। भाई साहब अगर आपके पास अपनी कंपनी का भविष्य सुरक्षित करने के लिये टाइम नहीं है तो आपके पास बर्बाद होने के लिये बहुत टाइम बचेगा। सक्सेशन मैनेजमेंट को अपनी कंपनी की संस्कृति बना लीजिये। इसे लंच ब्रेक या सैलरी देने जितना नॉर्मल बना दीजिये। जब आपकी पूरी ऑर्गेनाइजेशन को यह पता होता है कि यहाँ ग्रोथ का एक साफ रास्ता है और लीडरशिप सिर्फ कुछ खास लोगों की जागीर नहीं है तब जाकर एक ऐसी टीम तैयार होती है जिसे दुनिया की कोई भी मंदी या कॉम्पिटिशन हिला नहीं सकता।

अब समय आ गया है कि आप अपनी डायरी खोलें और खुद से पूछें कि अगर कल आप ऑफिस नहीं गए तो क्या आपकी कंपनी वैसी ही रफ्तार से चलेगी। अगर जवाब ना है तो दोस्त आपने बिजनेस नहीं बस एक नौकरी पैदा की है जहाँ आप खुद के ही गुलाम हैं। उठिये और आज ही से अपने उत्तराधिकारियों को तैयार करना शुरू कीजिये। यही एक सच्चे लीडर की सबसे बड़ी जीत और सबसे बड़ी विरासत होती है।


अगर आप भी अपनी कंपनी को एक मजबूत बरगद का पेड़ बनाना चाहते हैं जिसकी जड़ें सदियों तक टिकी रहें तो आज ही अपनी टीम के साथ बैठिये और उनके करियर का रोडमैप तैयार कीजिये। याद रखिये एक महान लीडर वो नहीं जो भीड़ इकट्ठी करता है बल्कि वो है जो अपनी भीड़ में से लीडर ढूंढ निकालता है। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो मैनेजर तो बन गए हैं लेकिन लीडर बनना अभी बाकी है।

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