अगर आपको लगता है कि सिर्फ मेहनत करके और हर महीने सैलरी बचाकर आप बिलेनियर बन जाएंगे तो बधाई हो आप एक बहुत ही मीठे धोखे में जी रहे हैं। टाइटन्स की तरह पैसा कमाना आपके बस की बात नहीं क्योंकि आप तो अभी भी पुराने रूल्स के गुलाम बने बैठे हैं।
चलिए आज मार्टिन फ्रिडसन की किताब हाउ टू बी ए बिलेनियर के जरिए उस कड़वे सच का सामना करते हैं जो आपको अमीर बनने से रोक रहा है। इस आर्टिकल में हम उन 3 बड़े लेसन्स पर चर्चा करेंगे जो मिडिल क्लास माइंडसेट की धज्जियां उड़ा देंगे।
Lesson : पुराने रूल्स को तोड़ना और इनोवेशन का असली खेल
अगर आप सोचते हैं कि दुनिया के सबसे अमीर लोग बहुत ही शरीफ और रूल्स फॉलो करने वाले बच्चे रहे होंगे तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। मार्टिन फ्रिडसन अपनी किताब में साफ कहते हैं कि अगर आप वही कर रहे हैं जो सब कर रहे हैं तो आपको वही मिलेगा जो सबको मिल रहा है यानी औसत दर्जे की लाइफ। बिलेनियर बनने का पहला रूल ही यही है कि आपको पुराने और घिसे पिटे रूल्स को तोड़ना पड़ेगा। इसे हम अपनी देसी भाषा में जुगाड़ नहीं बल्कि सिस्टम को हिला देने वाला इनोवेशन कहते हैं।
जरा सोचिए अगर धीरूभाई अंबानी ने भी पुराने ढर्रे पर चलकर सिर्फ एक छोटी सी नौकरी की होती तो क्या आज रिलायंस का इतना बड़ा साम्राज्य होता? बिल्कुल नहीं। उन्होंने मार्केट के गैप को समझा और उन रूल्स को चुनौती दी जो दूसरों को डराते थे। बिलेनियर वो नहीं होता जो रेस में सबसे तेज दौड़ता है बल्कि वो होता है जो रेस का ट्रैक ही बदल देता है। लोग अक्सर कहते हैं कि भाई रिस्क मत लो डूब जाओगे। लेकिन सच तो यह है कि सबसे बड़ा रिस्क कोई रिस्क न लेना ही है। अगर आप सुरक्षित खेलेंगे तो आप बस सर्वाइव करेंगे ग्रो नहीं।
यहाँ एक मजेदार और कड़वा उदाहरण लेते हैं। हमारे मोहल्ले के शर्मा जी को ही देख लीजिए। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी फिक्स्ड डिपॉजिट और सरकारी स्कीमों के भरोसे काट दी ताकि बुढ़ापा सुरक्षित रहे। अब उनका बुढ़ापा तो सुरक्षित है लेकिन वो कभी बिलेनियर बनने का सपना भी नहीं देख पाए क्योंकि उन्होंने कभी सिस्टम से बाहर निकलकर कुछ नया करने की हिम्मत ही नहीं की। दूसरी तरफ वो लड़का जो कॉलेज ड्राप आउट था और जिसने अपने गैरेज में बैठकर कुछ ऐसा बनाया जिसे लोग पागलपन कहते थे आज वो दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है।
इनोवेशन का मतलब यह नहीं कि आप कोई रॉकेट साइंस ही बनाएं। इसका मतलब है किसी पुरानी समस्या का एक ऐसा नया समाधान ढूंढना जो लोगों की जिंदगी आसान कर दे। जब सब लोग घोड़ा गाड़ी चला रहे थे तब किसी ने कार बनाने का सोचा। जब सब लोग चिट्ठियां लिख रहे थे तब किसी ने ईमेल और मैसेजिंग का सोचा। यह सोच ही आपको भीड़ से अलग करती है। अगर आप अपनी जॉब या छोटे से बिजनेस में वही कर रहे हैं जो पिछले दस साल से हो रहा है तो बॉस आप बिलेनियर बनने की लिस्ट से बाहर हैं।
बिलेनियर बनने के लिए आपको अपनी आंखों पर चढ़ी उस पट्टी को उतारना होगा जो समाज ने आपको पहनाई है। वो पट्टी जो कहती है कि डिग्री लो नौकरी करो और रिटायर हो जाओ। टाइटन्स कभी इस लाइन में खड़े नहीं होते। वो अपनी खुद की लाइन बनाते हैं। वो उन जगहों पर हाथ डालते हैं जहाँ दूसरे जाने से कतराते हैं। यह एक ऐसा माइंडसेट है जहाँ आप फेलियर से नहीं डरते बल्कि आप इस बात से डरते हैं कि कहीं आप पूरी जिंदगी एक आम इंसान बनकर न रह जाएं।
याद रखिए मार्केट कभी भी मेहनत के पैसे नहीं देता बल्कि मार्केट वैल्यू के पैसे देता है। और सबसे ज्यादा वैल्यू तब क्रिएट होती है जब आप कुछ ऐसा करते हैं जो पहले किसी ने न किया हो या कम से कम उस तरीके से न किया हो। तो क्या आप तैयार हैं उन रूल्स को आग लगाने के लिए जो आपको आगे बढ़ने से रोक रहे हैं? क्योंकि असली पैसा तो उसी आग की तपिश में छिपा है जिसे दुनिया पागलपन कहती है।
Lesson : रिस्क लेने का असली जिगरा और कैलकुलेटेड दांव
अगर आपको लगता है कि बिलेनियर बनना किसी लॉटरी या किस्मत का खेल है तो भाई साहब आप अभी भी परियों की कहानियों में जी रहे हैं। मार्टिन फ्रिडसन कहते हैं कि बिना रिस्क के कोई भी बड़ा अंपायर खड़ा नहीं हुआ है। लेकिन यहाँ एक कैच है। बिलेनियर वो नहीं होता जो बिना सोचे समझे कुएं में कूद जाए बल्कि वो होता है जो पहले कुएं की गहराई नापता है और फिर ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ छलांग लगाता है। इसे कहते हैं कैलकुलेटेड रिस्क।
जरा अपने आसपास देखिये। हमारे प्यारे पिंटू भैया को ही ले लीजिये। उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी एक ऐसे बिजनेस में लगा दी जिसके बारे में उन्हें ए बी सी डी भी नहीं पता था बस इसलिए क्योंकि उनके पड़ोसी का वो काम चल पड़ा था। नतीजा? तीन महीने में दुकान बंद और पिंटू भैया अब वापस उसी नौकरी की तलाश में हैं जिससे वो भागना चाहते थे। यह रिस्क नहीं यह बेवकूफी है। टाइटन्स ऐसा नहीं करते। वो रिस्क लेते हैं डेटा और रिसर्च के दम पर।
बिलेनियर बनने के लिए आपको अपने डर से दोस्ती करनी होगी। जब वारेन बफेट या एलन मस्क जैसे लोग करोड़ों डॉलर का दांव लगाते हैं तो उनकी रातों की नींद नहीं उड़ती क्योंकि उन्होंने अपना होमवर्क पूरा किया होता है। वो जानते हैं कि अगर यह प्लान फेल भी हुआ तो उनके पास प्लान बी तैयार है। आम आदमी रिस्क लेने से इसलिए डरता है क्योंकि उसे लगता है कि अगर पैसा डूब गया तो दुनिया क्या कहेगी? जबकि बिलेनियर सोचता है कि अगर मैंने यह रिस्क नहीं लिया तो मैं दुनिया को क्या मुंह दिखाऊंगा?
रिस्क लेना एक मसल की तरह है जिसे आपको धीरे धीरे ट्रेन करना पड़ता है। शुरुआत छोटे छोटे दांव से कीजिये। अगर आप अपनी पूरी लाइफ सेविंग को एक झटके में किसी अनजानी जगह लगा रहे हैं तो आप बिजनेस नहीं जुआ खेल रहे हैं। टाइटन्स की खास बात यह होती है कि वो उस समय भी रिस्क लेते हैं जब पूरी दुनिया डर के मारे दुबक कर बैठी होती है। जैसे 2008 की मंदी में जब सब लोग अपनी प्रॉपर्टी बेच रहे थे तब असली खिलाड़ियों ने उसे कोड़ियों के दाम पर खरीदा और बाद में बिलेनियर बन गए।
एक और कड़वा सच सुनिए। मिडिल क्लास में हमें सिखाया जाता है कि बेटा जितना चादर हो उतने ही पैर फैलाओ। लेकिन बिलेनियर माइंडसेट कहता है कि अगर चादर छोटी है तो बड़ी चादर खरीदो या फिर खुद की चादर बनाने की फैक्ट्री डाल दो। यह सोच ही आपको उस कंफर्ट जोन से बाहर निकालती है जो असल में एक सुनहरी जेल है। अगर आप अपनी सुरक्षित नौकरी और फिक्स्ड सैलरी के मोह में फंसे रहेंगे तो आप कभी उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाएंगे जहाँ से दुनिया छोटी नजर आती है।
रिस्क लेने का मतलब यह भी है कि आप फेल होने के लिए तैयार रहें। मार्टिन फ्रिडसन ने अपनी किताब में कई ऐसे टाइटन्स का जिक्र किया है जो एक बार नहीं बल्कि कई बार दिवालिया हुए। लेकिन उनमें और एक आम इंसान में फर्क यह था कि वो हार मानकर घर नहीं बैठे। उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और फिर से एक बड़ा दांव खेला। अगर आप गिरकर उठने का हौसला नहीं रखते तो बिलेनियर बनने का ख्वाब देखना छोड़ दीजिये।
अंत में याद रखिये कि दुनिया में सबसे बड़ा रिस्क वो है जिसे आपने कभी लिया ही नहीं। वो आइडिया जो आपके दिमाग में ही मर गया क्योंकि आप डर गए थे। वो बिजनेस जो आपने कभी शुरू ही नहीं किया क्योंकि आपको लगा कि अभी सही समय नहीं है। टाइटन्स सही समय का इंतजार नहीं करते वो समय को अपने हिसाब से मोड़ देते हैं। तो क्या आपमें वो जिगरा है कि आप अपनी किस्मत पर दांव लगा सकें?
Lesson : मोनोपोली का जादू और मार्केट पर अपनी धाक जमाना
अगर आप सोच रहे हैं कि एक छोटी सी दुकान खोलकर और पड़ोस वाले गुप्ता जी से कम्पटीशन करके आप बिलेनियर बन जाएंगे, तो भाई साहब, आप अभी भी गली क्रिकेट खेल रहे हैं और सपना वर्ल्ड कप का देख रहे हैं। मार्टिन फ्रिडसन अपनी किताब में एक बहुत ही कड़वी लेकिन सच्ची बात कहते हैं: बिलेनियर कभी भी बराबरी की लड़ाई नहीं लड़ते। वो हमेशा ऐसी जगह ढूंढते हैं जहाँ या तो कोई न हो, या फिर वो खुद इतने पावरफुल बन जाएं कि कोई उनके सामने टिक ही न सके। इसे कहते हैं मोनोपोली यानी एकछत्र राज।
जरा अपने मोबाइल फोन को देखिये। आप या तो एंड्राइड चला रहे होंगे या आईफोन। क्या आपने कभी सोचा है कि तीसरी कोई बड़ी चॉइस आपके पास क्यों नहीं है? क्योंकि इन कंपनियों ने मार्केट पर अपनी ऐसी पकड़ बना ली है कि नया खिलाड़ी आने से पहले दस बार सोचता है। बिलेनियर बनने का असली सीक्रेट यही है कि आपको भीड़ का हिस्सा नहीं बनना, बल्कि वो भीड़ जिस तरफ जा रही है, उस रास्ते का टोल नाका बन जाना है। जब तक आप कम्पटीशन में फंसे रहेंगे, आप केवल अपनी दाल-रोटी का जुगाड़ करेंगे। लेकिन जब आप मार्केट को डोमिनेट करेंगे, तब आप दौलत के पहाड़ खड़े करेंगे।
यहाँ हमारे बचपन के दोस्त चिंटू का उदाहरण लेते हैं। चिंटू ने देखा कि शहर में मोमोस की दुकान खूब चल रही है, तो उसने भी एक ठेला लगा लिया। अब उसके बगल में दस और ठेले लग गए। अब चिंटू दिन भर डिस्काउंट देता रहता है और थक हार कर घर जाता है। यह है कम्पटीशन की आग जिसमें मुनाफा जलकर राख हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ एक स्मार्ट खिलाडी आता है, जो मोमोस की ऐसी मशीन बनाता है जो पूरे शहर के ठेलों को माल सप्लाई करती है। अब सब मेहनत कर रहे हैं और पैसा उस मशीन वाले के पास जा रहा है। यह है असली बिलेनियर माइंडसेट।
टाइटन्स हमेशा एंट्री बैरियर खड़ा करते हैं। यानी वो कुछ ऐसा करते हैं जिसे कॉपी करना दूसरों के लिए नामुमकिन या बहुत महंगा हो जाए। चाहे वो बड़ी टेक्नोलॉजी हो, बहुत बड़ा नेटवर्क हो या फिर कोई ऐसा ब्रांड जिसे लोग आंख बंद करके ट्रस्ट करें। अगर आपका बिजनेस ऐसा है कि कोई भी कल सुबह उठकर आपके जैसा काम शुरू कर सकता है, तो समझ जाइये कि आपकी कुर्सी कभी भी छिन सकती है। बिलेनियर वो होता है जो अपनी कुर्सी के चारों तरफ गहरी खाई खोद देता है ताकि कोई पास भी न फटक सके।
इसका मतलब यह नहीं कि आप गलत तरीके अपनाएं, बल्कि इसका मतलब यह है कि आप अपनी वैल्यू इतनी बढ़ा दें कि कम्पटीशन बेमानी हो जाए। जब अमेज़न ने शुरू किया था, तब लोग कहते थे कि ऑनलाइन किताबें कौन खरीदेगा? लेकिन जेफ बेजोस ने एक ऐसा इकोसिस्टम बना दिया कि आज आप सुई से लेकर हवाई जहाज तक सब वहीं ढूंढते हैं। उन्होंने मार्केट को हराया नहीं, बल्कि मार्केट को अपनी उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया।
अक्सर लोग कहते हैं कि भाई सबको साथ लेकर चलो। लेकिन बिजनेस की दुनिया में अगर आप सबको साथ लेकर चलेंगे, तो आप कभी सबसे आगे नहीं निकल पाएंगे। आपको अपनी एक ऐसी टेरिटरी बनानी होगी जहाँ आपके रूल्स चलते हों। जब आप अपनी फील्ड के बेताज बादशाह बन जाते हैं, तब पैसा आपके पीछे भागता है, आप पैसे के पीछे नहीं। तो क्या आप अभी भी चिंटू की तरह डिस्काउंट देने में बिजी हैं, या फिर आप वो अंपायर बनाने की सोच रहे हैं जहाँ आपकी मर्जी के बिना पत्ता भी न हिले?
तो दोस्तों, बिलेनियर बनना कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक सोची-समझी स्ट्रैटजी है। क्या आप आज भी उन्हीं पुराने रूल्स के भरोसे बैठे हैं जो आपको सिर्फ एक औसत जिंदगी दे सकते हैं? या फिर आपमें वो आग है कि आप रिस्क लेकर अपनी खुद की मोनोपोली खड़ी करें? नीचे कमेंट्स में हमें जरूर बताएं कि इन 3 लेसन्स में से कौन सा लेसन आपकी लाइफ बदल सकता है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे लगता है कि वो सिर्फ मेहनत करके अमीर बन जाएगा। याद रखिये, दुनिया सिर्फ जीतने वालों को याद रखती है, कोशिश करने वालों को तो लोग नाम भी नहीं पूछते। आज ही एक्शन लें और अपने टाइटन बनने के सफर की शुरुआत करें।
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