अगर आपको लगता है कि आप बहुत मेहनत कर रहे हैं और फिर भी आपका बिजनेस या करियर ठप पड़ा है तो बधाई हो। आप अपनी मेहनत और टाइम दोनों कचरे में डाल रहे हैं। जब तक आपके पास स्टीव जॉब्स जैसा विजन नहीं है तब तक आप बस एक भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे।
आज हम लीएंडर काहनी की किताब इनसाइड स्टीव्स ब्रेन से वह सीक्रेट्स जानेंगे जिन्होंने एप्पल को दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड बनाया। तैयार हो जाइये उन 3 बड़े लेसन के लिए जो आपकी सोच को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : परफेक्शन का जुनून - जो दिखता है और जो नहीं दिखता
स्टीव जॉब्स कोई मामूली इंसान नहीं थे। वह एक ऐसे कलाकार थे जिन्हें कंप्यूटर के डिब्बे के अंदर का सर्किट बोर्ड भी उतना ही सुंदर चाहिए था जितना कि बाहर का कांच। अब आप सोचेंगे कि भाई डिब्बा तो बंद रहना है फिर अंदर की सफाई की क्या जरूरत है? यही तो फर्क है एक एवरेज इंसान में और एक लीजेंड में। हम लोग अक्सर क्या करते हैं? घर की सफाई करनी हो तो सारा कचरा सोफे के नीचे या अलमारी के पीछे धकेल देते हैं। हमें लगता है कि जब तक मेहमानों को नहीं दिख रहा तब तक सब बढ़िया है। लेकिन स्टीव जॉब्स के लिए परफेक्शन कोई दिखावा नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी थी।
इस किताब में बताया गया है कि जब पहला मैक कंप्यूटर बन रहा था तब स्टीव ने इंजीनियर्स को सर्किट बोर्ड की चिप्स दोबारा डिजाइन करने को कहा था। वजह? क्योंकि वे चिप्स दिखने में अच्छी नहीं लग रही थीं। इंजीनियर बेचारे अपना सिर खुजलाने लगे कि सर यह तो अंदर रहेगा इसे देखेगा कौन? स्टीव का जवाब सीधा था कि एक बढ़िया कारपेंटर कभी भी कैबिनेट के पीछे वाले हिस्से में घटिया लकड़ी इस्तेमाल नहीं करता जिसे कोई देख न सके। उसे खुद पता होता है कि उसने क्या बनाया है।
असली लाइफ में हम अक्सर "चलता है" वाले एटीट्यूड के साथ जीते हैं। आप अपनी ऑफिस की रिपोर्ट बना रहे हैं और आपने सोचा कि चलो फॉन्ट थोड़ा टेढ़ा है तो क्या हुआ डेटा तो सही है ना? बस यहीं आप मार खा जाते हैं। स्टीव जॉब्स जानते थे कि अगर आप छोटी चीजों में लापरवाही करेंगे तो वह धीरे-धीरे आपके पूरे काम की क्वालिटी को दीमक की तरह खा जाएगी।
एप्पल के प्रोडक्ट्स इतने महंगे और प्रीमियम क्यों लगते हैं? क्योंकि उन्होंने हर उस पेंच और तार पर ध्यान दिया है जिसे शायद आप कभी देखेंगे भी नहीं। यह जुनून ही आपको एक भीड़ से अलग बनाता है। अगर आप अपने काम में वह क्वालिटी नहीं ला पा रहे जो आपको खुद सुकून दे तो समझ लीजिये कि आप बस टाइम पास कर रहे हैं। स्टीव का दिमाग इसी तरह काम करता था। उनके लिए परफेक्शन का मतलब था कि अगर आप कोई चीज बना रहे हैं तो उसे इतना बेहतरीन बनाओ कि भगवान भी उसे देखकर कहें कि वाह क्या बात है। यह लेसन हमें सिखाता है कि महान बनने के लिए आपको उन चीजों पर भी मेहनत करनी होगी जिन्हें दुनिया शायद कभी नोटिस न करे पर आपकी आत्मा को पता हो कि आपने अपना बेस्ट दिया है।
लेसन २ : सादगी ही असली सोफिस्टिकेशन है - कम में ज्यादा का जादू
आजकल की दुनिया में हमें लगता है कि अगर हम किसी चीज में बहुत सारे फीचर्स डाल देंगे तो वह बहुत महान बन जाएगी। लोग मोबाइल खरीदने जाते हैं तो देखते हैं कि उसमें पचास तरह के फालतू बटन और सेटिंग्स हों। लेकिन स्टीव जॉब्स का दिमाग इसके बिल्कुल उल्टा चलता था। उनके लिए असली टैलेंट यह नहीं था कि आप क्या जोड़ सकते हैं बल्कि यह था कि आप क्या हटा सकते हैं। स्टीव का मानना था कि सादगी पाना सबसे मुश्किल काम है क्योंकि इसके लिए आपको बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ती है ताकि आप उलझन को खत्म कर सकें।
जरा सोचिये उस दौर के बारे में जब म्यूजिक प्लेयर आते थे। उनमें सौ तरह के बटन होते थे और गाना ढूंढने के लिए आपको पी एच डी करनी पड़ती थी। फिर आया आईपॉड। सिर्फ एक गोल चक्का और बीच में एक बटन। लोग हंसने लगे कि भाई यह क्या खिलौना बना दिया है? पर यही तो स्टीव का जादू था। उन्होंने यूजर को उन फालतू बटनों की जेल से आजाद कर दिया जिनकी उसे कभी जरूरत ही नहीं थी। हमारे रियल लाइफ में भी यही हाल है। हम अपनी जिंदगी को इतना कॉम्प्लिकेटेड बना लेते हैं कि असली गोल ही भूल जाते हैं। हम दस तरह के बिजनेस आइडिया पर एक साथ काम करना चाहते हैं और अंत में हाथ कुछ नहीं आता।
स्टीव जब एप्पल में वापस आए थे तो कंपनी सैकड़ों प्रोडक्ट्स बना रही थी। उन्होंने क्या किया? उन्होंने एक बड़ा सा क्रॉस बनाया और कहा कि हम बस चार चीजें बनाएंगे। इसे कहते हैं फोकस। अगर आप अपनी लाइफ में हर किसी को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं या हर ट्रेंड के पीछे भाग रहे हैं तो समझ लीजिये कि आप अपनी एनर्जी को नाले में बहा रहे हैं। स्टीव ने सिखाया कि "ना" कहना सीखना होगा। आपको अपने काम से वह हर चीज हटानी होगी जो जरूरी नहीं है।
एप्पल का डिजाइन इतना साफ सुथरा क्यों होता है? क्योंकि वे आपके दिमाग पर बोझ नहीं डालना चाहते। एक छोटा बच्चा भी आईपैड चलाना सीख जाता है क्योंकि उसमें कोई फालतू कचरा नहीं है। हम अक्सर अपनी बातचीत में और अपने काम में बहुत ज्यादा दिखावा और भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि हम स्मार्ट लगें। लेकिन असली स्मार्ट वह है जो एक मुश्किल बात को भी इतना सरल बना दे कि एक आम इंसान उसे समझ सके। सादगी कोई कमजोरी नहीं है बल्कि यह उस इंसान की निशानी है जिसने अपने काम पर इतनी मास्टरी कर ली है कि उसे अब तामझाम की जरूरत नहीं है। अगर आपका प्रोडक्ट या आपकी सर्विस किसी की लाइफ को आसान नहीं बना रही तो आप बस एक और शोर मचाने वाली मशीन हैं।
लेसन ३ : यूजर एक्सपीरियंस - प्रोडक्ट नहीं इमोशन बेचो
स्टीव जॉब्स को कभी भी सिर्फ एक डिब्बा या मशीन बेचने में दिलचस्पी नहीं थी। उनका पूरा फोकस इस बात पर था कि जब कोई इंसान उस प्रोडक्ट को पहली बार छुए या इस्तेमाल करे तो उसे कैसा महसूस हो। एप्पल के स्टोर में जब आप घुसते हैं तो आपको वहां सेल्समैन पीछे नहीं पड़ता बल्कि आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास होता है। स्टीव जानते थे कि लोग फीचर्स भूल जाते हैं पर वे कभी नहीं भूलते कि आपने उन्हें कैसा फील कराया।
अक्सर बिजनेस में लोग पागलों की तरह स्पेसिफिकेशन के पीछे भागते हैं। मेरा कैमरा इतने मेगापिक्सल का है या मेरी कार में इतने हॉर्स पावर का इंजन है। लेकिन स्टीव का विजन अलग था। उन्होंने कभी नहीं कहा कि आईपॉड में 5 जीबी की हार्ड ड्राइव है। उन्होंने कहा कि "आपकी जेब में एक हजार गाने"। देखिये कितना बड़ा फर्क है। उन्होंने एक टेक्निकल चीज को एक इमोशन बना दिया। हम अपनी लाइफ में भी यही गलती करते हैं। अगर आप किसी को इम्प्रेस करना चाहते हैं या अपना कोई आईडिया बेचना चाहते हैं तो आप उसे लॉजिक से समझाने लगते हैं। जबकि दुनिया जज्बात से चलती है।
इस किताब में बताया गया है कि स्टीव आईफोन की अनबॉक्सिंग यानी डिब्बा खोलने के एक्सपीरियंस पर भी हफ्तों तक माथापच्ची करते थे। डिब्बा खुलने की आवाज कैसी होगी? ढक्कन कितनी धीरे से ऊपर आएगा? अब आप कहेंगे कि भाई डिब्बा तो कचरे में जाना है फिर इतनी मेहनत क्यों? क्योंकि स्टीव जानते थे कि ग्राहक का प्यार उसी पहले सेकंड से शुरू होता है। अगर वह पहला अहसास घटिया है तो अंदर का प्रोडक्ट चाहे सोने का ही क्यों न हो ग्राहक का मन खट्टा हो जाएगा।
क्या आप अपनी सर्विस या अपने काम में अपने क्लाइंट को वह "वाओ" मोमेंट दे पा रहे हैं? अगर नहीं तो आप बस सर्वाइव कर रहे हैं। स्टीव का दिमाग कस्टमर की नब्ज पहचानता था। वे ऐसे प्रोडक्ट्स बनाते थे जिनकी लोगों को जरूरत थी पर उन्हें खुद पता नहीं था। उन्होंने टेक्नोलॉजी को इंसानी टच दिया। उन्होंने मशीनों को सिर्फ औजार नहीं बल्कि हमारे शरीर का एक हिस्सा बना दिया। यह लेसन हमें सिखाता है कि अगर आप जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो लोगों के दिलों में जगह बनाइये उनके दिमाग में नहीं। जब आप किसी की लाइफ में वैल्यू ऐड करते हैं और उन्हें स्पेशल फील कराते हैं तो वह इंसान सिर्फ आपका ग्राहक नहीं बनता बल्कि आपका फैन बन जाता है। और एक फैन जो कर सकता है वह एक ग्राहक कभी नहीं कर पाएगा।
स्टीव जॉब्स का दिमाग कोई जादू की छड़ी नहीं था बल्कि उनके पास एक अटूट जिद्द थी। वह जिद्द जिसने दुनिया को देखने का हमारा नजरिया ही बदल दिया। आज खुद से एक सवाल पूछिए कि क्या आप भी "चलता है" वाली जिंदगी जी रहे हैं या आपके अंदर भी कुछ ऐसा बनाने का जुनून है जो सदियों तक याद रखा जाए? परफेक्शन सादगी और इमोशन को अपनी लाइफ का हिस्सा बनाइये। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप भी स्टीव के इन उसूलों से अपनी लाइफ बदलना चाहते हैं तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो बस भीड़ के पीछे भाग रहे हैं। कमेंट में बताइये कि इन तीनों में से कौन सा लेसन आपको सबसे ज्यादा झकझोर गया। याद रखिये इतिहास वही रचते हैं जो दुनिया को बदलने का पागलपन रखते हैं।
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