Intuition at Work (Hindi)


अगर आप आज भी हर छोटे फैसले के लिए एक्सेल शीट खोलकर बैठ जाते हैं या गूगल बाबा से पूछते हैं कि लंच में क्या खाऊं तो मुबारक हो आप अपनी जिंदगी का कंट्रोल खो चुके हैं। बिना गट इंस्टिंक्ट के जीना मतलब बिना जीपीएस के घने जंगल में गाड़ी चलाना है जहाँ एक्सीडेंट पक्का है।

आज हम गैरी क्लाइन की किताब इंट्यूशन एट वर्क से सीखेंगे कि कैसे अपने अंदर के उस छुपे हुए सुपर पावर को जगाना है जो आपको भीड़ से अलग और फैसलों में तेज बनाता है। चलिए इन 3 बेहतरीन लेसन को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : एक्सपीरियंस ही इंट्यूशन का असली इंजन है।

क्या आपको लगता है कि इंट्यूशन कोई ऐसी दैवीय शक्ति है जो आसमान से अचानक आपके सिर पर गिरती है। अगर हाँ तो शायद आप अभी भी परियों की कहानियों में जी रहे हैं। गैरी क्लाइन हमें बहुत प्यार से समझाते हैं कि आपका यह जो गट फीलिंग वाला सिग्नल है ना यह असल में आपके दिमाग का एक बहुत ही चालाक डेटाबेस है। जब आप सालों तक किसी काम को घिस घिस कर करते हैं तो आपका दिमाग चुपचाप उन स्थितियों के पैटर्न्स को नोट करता रहता है। असल में इंट्यूशन कोई जादू नहीं बल्कि बहुत सारा एक्सपीरियंस है जो अब बिजली की रफ्तार से काम कर रहा है।

जरा सोचिए एक अनुभवी ड्राइवर के बारे में। वह सड़क पर अपनी कार चला रहा है और अचानक उसे लगता है कि सामने वाले ट्रक से दूर रहना चाहिए। उसने कोई गणित नहीं लगाया और ना ही कोई लंबा चौड़ा लॉजिक सोचा। उसे बस लगा कि कुछ गड़बड़ है और उसने ब्रेक पर पैर रख दिया। और क्या हुआ। दो सेकंड बाद वही ट्रक अचानक मुड़ गया। अब आप इसे जादू कहेंगे। नहीं जनाब यह उस ड्राइवर का सालों का एक्सपीरियंस है जिसने ट्रक की हल्की सी तिरछी चाल को भांप लिया जो एक नौसिखिया कभी नहीं देख पाता। नौसिखिया तो अभी भी म्यूजिक सिस्टम पर गाना बदलने में व्यस्त होता और फिर अस्पताल में अपनी किस्मत को कोस रहा होता।

हमारे ऑफिसों में भी यही होता है। कुछ लोग मीटिंग में बैठते ही बता देते हैं कि यह क्लाइंट हाथ से जाने वाला है या यह प्रोजेक्ट फेल होगा। हम उन्हें नेगेटिव कहते हैं लेकिन असल में उनका दिमाग उन पैटर्न्स को पहचान रहा होता है जो उन्होंने पिछले दस फेल प्रोजेक्ट्स में देखे थे। अगर आप चाहते हैं कि आपका इंट्यूशन भी अंबानी जैसा तेज हो जाए तो आपको उस फील्ड में पसीना बहाना होगा। बिना पसीना बहाए और बिना गलतियां किए अगर आप सोचते हैं कि आपको अंतर्यामी होने का वरदान मिल जाएगा तो भूल जाइए।

आजकल के इन्फ्लुएंसर्स आपको कहेंगे कि बस अपने दिल की सुनो। भाई साहब अगर दिल को कुछ पता ही नहीं है तो वह सिर्फ धड़केगा ही ना। फैसला तो दिमाग को लेना है और दिमाग तभी फैसला लेगा जब उसके पास अनुभवों की तिजोरी भरी होगी। इसलिए अपनी फील्ड के खिलाड़ी बनिए। जितनी ज्यादा स्थितियों से आप गुजरेंगे आपका इंट्यूशन उतना ही धारदार होगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे जिम में मसल्स बनाना। पहले दिन जाकर आप सौ किलो का वजन नहीं उठा सकते वैसे ही पहले दिन आपका गट इंस्टिंक्ट आपको सही रास्ता नहीं दिखाएगा। गलतियां कीजिए उनसे सीखिए और धीरे धीरे आप देखेंगे कि आपके फैसले बिना सोचे भी सही होने लगे हैं। जब लोग आपसे पूछेंगे कि भाई तुझे कैसे पता चला तो आप बस मुस्कुराकर कह सकते हैं कि यह तो बस गॉड गिफ्ट है। लेकिन असलियत तो आपको और आपकी उन काली रातों को पता है जो आपने एक्सपीरियंस बटोरने में लगाई हैं।


लेसन २ : मेंटल सिमुलेशन की पावर

क्या आपने कभी किसी दोस्त को वह मशहूर लाइन बोली है कि भाई मुझे पहले ही पता था कि ऐसा ही होगा। अगर हाँ तो आप या तो बहुत बड़े ज्योतिषी हैं या फिर आपका दिमाग अनजाने में मेंटल सिमुलेशन कर रहा था। गैरी क्लाइन कहते हैं कि सफल लोग किसी भी काम को असलियत में करने से पहले उसे अपने दिमाग के थिएटर में रिलीज कर देते हैं। इसे मेंटल सिमुलेशन कहते हैं। यह कोई दिन में सपने देखना नहीं है बल्कि यह एक तरह की दिमागी रिहर्सल है जहाँ आप देखते हैं कि आपके एक एक्शन का क्या रिएक्शन होगा।

मान लीजिए आपको अपने खडूस बॉस से सैलरी बढ़वाने के लिए बात करनी है। एक तरीका तो यह है कि आप सीधे जाकर धड़धड़ाते हुए बोल दें और फिर अगले पल अपना इस्तीफा टाइप कर रहे हों। दूसरा और स्मार्ट तरीका है मेंटल सिमुलेशन। आप अपनी कुर्सी पर बैठते हैं और आँखें बंद करके सोचते हैं कि जब मैं पैसे मांगूंगा तो बॉस का चेहरा कैसा होगा। अगर वह कहेगा कि अभी बजट नहीं है तो मेरा अगला जवाब क्या होगा। अगर वह गुस्सा हो गया तो मैं उसे कैसे शांत करूँगा। आप अपने दिमाग में अलग अलग सीन चलाते हैं। इससे फायदा यह होता है कि जब आप असल में बॉस के केबिन में जाते हैं तो आप किसी भी बाउंसर के लिए तैयार होते हैं।

लेकिन दिक्कत यह है कि हम में से ज्यादातर लोग मेंटल सिमुलेशन का इस्तेमाल सिर्फ यह सोचने में करते हैं कि अगर मेरी लॉटरी लग गई तो मैं कौन सी गाड़ी खरीदूंगा। भाई साहब यह सिमुलेशन नहीं यह मुंगेरी लाल के हसीन सपने हैं। असली पावर तब आती है जब आप मुश्किलों को इमेजिन करते हैं। एक प्रोफेशनल चेस प्लेयर को देखिए। वह अपनी चाल चलने से पहले दिमाग में अगले दस स्टेप्स देख लेता है कि अगर मैंने ऊंट यहाँ रखा तो सामने वाला घोड़ा कहाँ ले जाएगा। वह अपनी हार को दिमाग में पहले ही देख लेता है और इसीलिए वह असल में कभी नहीं हारता।

अगर आप किसी बिजनेस मीटिंग में जा रहे हैं या कोई नया स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं और आपने अपने दिमाग में उस प्लान की कमियां नहीं ढूंढी हैं तो आप बस अपनी बर्बादी का इंतजार कर रहे हैं। हमारा दिमाग एक बहुत ही पावरफुल सिम्युलेटर है लेकिन हम इसे कचरा सोचने में बर्बाद कर देते हैं। जब आप मेंटल सिमुलेशन करते हैं तो आपका इंट्यूशन आपको खुद ही रेड सिग्नल देने लगता है कि रुको यहाँ कुछ गड़बड़ लग रही है। यह प्रोसेस आपको उन गलतियों से बचाता है जो आपका कीमती वक्त और पैसा दोनों बर्बाद कर सकती थीं। तो अगली बार जब कोई बड़ा फैसला लेना हो तो सीधे मैदान में मत कूद जाइये। पहले अपने दिमाग के अखाड़े में लड़कर देख लीजिये कि आप टिक पाएंगे या नहीं। जो इंसान अपने दिमाग में जीत जाता है उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं हरा सकती क्योंकि उसने हारने के हर रास्ते को पहले ही ब्लॉक कर दिया होता है।


लेसन ३ : प्री मोर्टम तकनीक

आमतौर पर लोग क्या करते हैं। जब कोई प्रोजेक्ट पूरी तरह से डूब जाता है और पैसा पानी की तरह बह जाता है तब सब एक साथ बैठकर शोक सभा मनाते हैं और डिस्कस करते हैं कि आखिर गड़बड़ कहाँ हुई। इसे कहते हैं पोस्ट मोर्टम। लेकिन गैरी क्लाइन कहते हैं कि मरने के बाद डॉक्टर बनने से क्या फायदा। अगर आप सच में स्मार्ट हैं तो आपको प्री मोर्टम करना चाहिए। इसका मतलब है कि काम शुरू करने से पहले ही यह मान लेना कि वह काम बुरी तरह फेल हो चुका है और फिर उसकी वजहें ढूंढना।

सुनने में यह थोड़ा अजीब और डरावना लग सकता है लेकिन यह आपके इंट्यूशन को एक्टिवेट करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। मान लीजिये आपने अपनी जिंदगी की सारी जमा पूंजी लगाकर एक शानदार कैफे खोलने का फैसला किया है। अब आप जोश में हैं और आपको सब गुलाबी नजर आ रहा है। यहीं पर रुकिए। अपने दिमाग को एक साल आगे ले जाइये और इमेजिन कीजिये कि आपका कैफे बंद हो गया है और आपके पास फूटी कौड़ी भी नहीं बची है। अब ठंडे दिमाग से सोचिये कि ऐसा क्यों हुआ होगा। क्या खाना खराब था। क्या लोकेशन गलत थी। या फिर आपने उन कस्टमर्स को इग्नोर किया जो सिर्फ वाईफाई चलाने आते थे।

जब आप इस तरह से सोचते हैं तो आपके दिमाग की खिड़कियां खुल जाती हैं। अचानक आपको वो खतरे दिखने लगते हैं जिन्हें आपका ओवर कॉन्फिडेंस छुपा रहा था। यह तकनीक आपको नेगेटिव नहीं बनाती बल्कि आपको असलियत का आइना दिखाती है। हमारे समाज में सिखाया जाता है कि हमेशा पॉजिटिव सोचो। भाई साहब पॉजिटिव सोचकर तो लोग पहाड़ से बिना पैराशूट के भी कूद सकते हैं पर नतीजा तो सबको पता है। प्री मोर्टम आपको वह पैराशूट चेक करने पर मजबूर करता है।

यह लेसन हमें सिखाता है कि अपने इंट्यूशन को सिर्फ तारीफ सुनने का आदी मत बनाइये। उसे चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार कीजिये। जब आप टीम मीटिंग में बैठकर यह पूछते हैं कि दोस्तों मान लो यह प्लान फेल हो गया तो बताओ सबसे बड़ी वजह क्या होगी तो आप असल में सबकी दबी हुई शंकाओं को बाहर निकाल रहे होते हैं। यही वह जानकारी है जो आपके इंट्यूशन को और भी ज्यादा सटीक बनाती है। तो अगली बार जब कोई आपको कहे कि ऑल इज वेल तो उसे गैरी क्लाइन का यह लेसन जरूर सुना देना। क्योंकि जो इंसान अपनी हार को पहले ही देख लेता है उसे हराना नामुमकिन हो जाता है।


अगर आप अभी भी सिर्फ किस्मत के भरोसे बैठे हैं तो याद रखिये कि किस्मत भी उन्हीं का साथ देती है जिनका इंट्यूशन तैयार होता है। आज ही अपनी फील्ड में गहराई से उतरिये और अपने दिमाग के उस छुपे हुए उस्ताद को जगाइये। कमेंट में बताइये कि क्या आपने कभी अपनी गट फीलिंग की वजह से किसी बड़ी मुसीबत से खुद को बचाया है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हर फैसला लेने में घंटों लगाता है। चलिए साथ मिलकर अपने फैसलों को सुपरपावर बनाते हैं।

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