आपकी टीम आपको पीठ पीछे गालियां दे रही है और आपको लग रहा है कि आप बड़े बॉस हैं। बधाई हो, आप लीडर नहीं सिर्फ एक टॉक्सिक मैनेजर हैं। अगर आप अभी भी अपनी कुर्सी और बोनस को अपनी टीम की खुशी से ऊपर रख रहे हैं, तो बहुत जल्द आप अकेले ऑफिस में अपनी ईगो के साथ बैठे होंगे।
इस आर्टिकल में हम साइमन सिनेक की लीडर्स ईट लास्ट बुक समरी इन हिंदी के जरिए समझेंगे कि एक असली लीडर अपनी टीम का भरोसा कैसे जीतता है। चलिए जानते हैं वे ३ बड़े लेसन जो आपकी लीडरशिप और टीम बिल्डिंग का नजरिया हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : सर्कल ऑफ सेफ्टी
इमेजिन कीजिए कि आप एक पुराने जमाने के कबीले के योद्धा हैं। रात का समय है और जंगल के खतरनाक जानवर आपके कबीले के चारों तरफ घूम रहे हैं। अगर आपके कबीले के लोग आपस में ही लड़ रहे हैं या एक दूसरे की टांग खींच रहे हैं, तो क्या आप उन बाहरी जानवरों से बच पाएंगे? बिल्कुल नहीं। यही हाल आज के कॉर्पोरेट ऑफिस का है। साइमन सिनेक कहते हैं कि एक लीडर का सबसे पहला काम अपनी टीम के चारों तरफ एक अभेद्य सुरक्षा का घेरा यानी सर्कल ऑफ सेफ्टी बनाना होता है।
अक्सर ऑफिस में क्या होता है? एम्प्लॉई को बाहर के कंपटीशन या मार्केट की मंदी से उतना डर नहीं लगता, जितना अपने बगल वाली डेस्क पर बैठे उस कलीग से लगता है जो उसकी चुगली बॉस से कर सकता है। जब ऑफिस के अंदर ही पॉलिटिक्स, डर और असुरक्षा का माहौल होता है, तो लोग अपनी पूरी एनर्जी खुद को बचाने में लगा देते हैं। वे इनोवेट नहीं करते, वे बस सर्वाइव करते हैं। वे काम नहीं करते, वे बस अपनी नौकरी बचाते हैं। अगर आपकी टीम में लोग एक दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहे हैं, तो समझ लीजिए कि आपने सर्कल ऑफ सेफ्टी को मजाक बना दिया है।
मान लीजिए एक कंपनी का सेल्स टारगेट पूरा नहीं हुआ। एक आम मैनेजर क्या करेगा? वह मीटिंग बुलाएगा, चिल्लाएगा और लोगों को नौकरी से निकालने की धमकी देगा। वह सोचेगा कि डर दिखाकर काम करवाया जा सकता है। लेकिन यहाँ वह गलत है। डर से लोग काम तो करेंगे, लेकिन वे आपसे नफरत भी करेंगे। वे अगली बार अपनी गलती छुपाएंगे ताकि आपकी डांट न खानी पड़े। वहीं एक असली लीडर क्या करेगा? वह अपनी टीम को बुलाकर कहेगा कि मुझे पता है मार्केट मुश्किल है, पर मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं। बताओ मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूं? जब एम्प्लॉई को यह पता होता है कि उसका बॉस उसकी पीठ पीछे खड़ा है और उसे किसी गलती पर सूली पर नहीं चढ़ाया जाएगा, तो वह अपनी जान लगा देता है।
कुछ मैनेजर्स को लगता है कि वे अपनी टीम के लिए ढाल हैं, जबकि असलियत में वे खुद ही वह सबसे बड़ा खतरा होते हैं जिससे टीम को बचने की जरूरत होती है। वे खुद को शेर समझते हैं, लेकिन अपनी ही टीम के लिए वह सर्कस के रिंग मास्टर बन जाते हैं जो कोड़े मारकर काम करवाता है। याद रखिए, अगर आपकी टीम रात को घर जाते समय टेंशन में है कि कल ऑफिस में कौन सा नया ड्रामा होगा, तो आपका सर्कल ऑफ सेफ्टी पंक्चर हो चुका है।
साइमन सिनेक हमें सिखाते हैं कि जब ऑफिस के अंदर सुरक्षा होती है, तभी टीम बाहर के दुश्मनों का मुकाबला कर पाती है। अगर आप चाहते हैं कि आपके लोग मिलकर बड़े से बड़े गोल को अचीव करें, तो पहले उन्हें यह महसूस कराइए कि वे आपके साथ सेफ हैं। जब भरोसा बढ़ता है, तो टीम वर्क अपने आप होने लगता है। इसके लिए आपको अपनी ईगो और अपना बोनस साइड में रखना पड़ेगा। क्योंकि असली लीडर वही है जो अपनी टीम के लिए खुद को दांव पर लगा देता है, न कि टीम को अपने फायदे के लिए दांव पर लगाता है। यह सर्कल ही वह जादू है जो एक साधारण टीम को लेजेंडरी टीम बना देता है।
लेसन २ : बायोलोजी ऑफ लीडरशिप
क्या आपको पता है कि आपकी लीडरशिप आपके दिमाग में चल रहे कुछ केमिकल्स का खेल है। साइमन सिनेक हमें बताते हैं कि हमारा शरीर चार मुख्य केमिकल्स से चलता है। एंडोर्फिन, डोपामाइन, सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन। पहले दो यानी एंडोर्फिन और डोपामाइन सेल्फिश केमिकल्स हैं। जब आप जिम में पसीना बहाते हैं या अपने फोन पर कोई नोटिफिकेशन देखते हैं, तो आपको जो खुशी मिलती है, वह इन्हीं की देन है। ऑफिस के कॉन्टेक्स्ट में कहें तो जब आपको मोटा बोनस मिलता है या आपका कोई छोटा सा टारगेट पूरा होता है, तो डोपामाइन आपको हाई देता है। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि यह खुशी बहुत कम समय के लिए होती है। यह उस नशे की तरह है जिसे पाने के लिए आप बार-बार भागते हैं, पर कभी तृप्त नहीं होते।
असली लीडरशिप बाकी के दो केमिकल्स यानी सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन पर टिकी होती है। ये निस्वार्थ केमिकल्स हैं। सेरोटोनिन तब रिलीज होता है जब हमें गर्व महसूस होता है कि कोई हमें पसंद कर रहा है या हमारी इज्जत कर रहा है। जब एक लीडर स्टेज पर खड़े होकर अपनी कामयाबी का क्रेडिट अपनी पूरी टीम को देता है, तो पूरी टीम के दिमाग में सेरोटोनिन का लेवल बढ़ जाता है। वहीं ऑक्सीटोसिन वह केमिकल है जो प्यार, दोस्ती और गहरे भरोसे से पैदा होता है। यह वह एहसास है जो आपको बताता है कि आपका बॉस आपके लिए अपनी जान भी दे सकता है।
अब जरा अपने ऑफिस के माहौल को देखिए। यहाँ ज्यादातर मैनेजर डोपामाइन के दीवाने होते हैं। उन्हें बस नंबर्स चाहिए, ग्राफ ऊपर जाना चाहिए, चाहे उसके लिए टीम की मानसिक शांति का कचरा ही क्यों न हो जाए। वे अपनी टीम को मशीनों की तरह इस्तेमाल करते हैं ताकि उन्हें अपना रिवॉर्ड मिल सके। ऐसे मैनेजर्स को लगता है कि वे बहुत स्मार्ट हैं, लेकिन असल में वे अपनी टीम के अंदर ऑक्सीटोसिन का गला घोंट रहे होते हैं। जब टीम में ऑक्सीटोसिन नहीं होता, तो कोई किसी की मदद नहीं करता। हर कोई बस अपना काम खत्म करके घर भागने की फिराक में रहता है।
मान लीजिए ऑफिस में फ्री पिज्जा पार्टी रखी गई है। एक डोपामाइन वाला मैनेजर सबसे पहले लाइन में लगेगा और सबसे बड़ी स्लाइस उठाकर अपने केबिन में जाकर खा लेगा। उसे बस अपनी भूख और अपने मजे से मतलब है। लेकिन एक असली लीडर वह है जो तब तक नहीं खाएगा जब तक उसकी टीम के आखिरी बंदे को भी पिज्जा न मिल जाए। यही इस किताब का टाइटल भी है कि लीडर्स ईट लास्ट। जब लीडर अपनी टीम को खुद से पहले रखता है, तो टीम के अंदर ऑक्सीटोसिन का सैलाब आ जाता है। उन्हें लगता है कि उनका लीडर उनकी परवाह करता है।
हैरानी की बात यह है कि आज के जमाने में लोग इमोशन्स को कमजोरी समझते हैं। लेकिन सच तो यह है कि इंसान की बायोलोजी लाखों सालों से नहीं बदली है। हमें आज भी वही सुरक्षा और अपनापन चाहिए जो गुफाओं में रहने वाले आदिमानव को चाहिए था। अगर आप एक लीडर के तौर पर अपनी टीम को सिर्फ टारगेट चेज करने वाला कुत्ता बनाकर रखेंगे, तो वे कभी भी आपको दिल से इज्जत नहीं देंगे। वे बस आपकी सैलरी के गुलाम बनकर रहेंगे। लेकिन जिस दिन आप उनके साथ एक इमोशनल बॉन्ड बनाएंगे, उस दिन वे आपके लिए वह कर दिखाएंगे जो कोई मशीन या पैसा नहीं करवा सकता। तो अगली बार जब आप मीटिंग में बैठे हों, तो सोचिए कि आप डोपामाइन बांट रहे हैं या ऑक्सीटोसिन।
लेसन ३ : लीडरशिप एक चॉइस है
लीडरशिप कोई ऐसी चीज नहीं है जो आपको आपके विजिटिंग कार्ड पर छपे ऊंचे पद से मिलती है। साइमन सिनेक बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रैंक और अथॉरिटी होना अलग बात है और लीडर होना बिल्कुल अलग। हमारे समाज में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि जिसके पास पावर है, वही लीडर है। लेकिन हकीकत में, लीडरशिप एक चॉइस है, एक चुनाव है जो आप हर रोज करते हैं। यह चुनाव है अपनी सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर अपनी टीम की जरूरतों को देखने का। अगर आप अपनी टीम के लोगों का ख्याल रखने की जिम्मेदारी उठाते हैं, तो आप लीडर हैं, भले ही आपके पास कोई बड़ी डिग्री या केबिन न हो।
सोचिए, हम उन लोगों को लीडर क्यों कहते हैं जो युद्ध के मैदान में सबसे आगे चलते हैं? इसलिए नहीं कि वे सबसे ताकतवर होते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने फैसला किया है कि वे अपनी जान जोखिम में डालकर अपने साथियों को बचाएंगे। कॉर्पोरेट की दुनिया में भी यही नियम लागू होता है। जब मुश्किल समय आता है, जब बजट कम होता है या छंटनी की बात आती है, तो असली लीडर अपनी टीम को बचाने के लिए अपना बोनस छोड़ देता है। वहीं, जो लोग सिर्फ पद के भूखे होते हैं, वे अपनी टीम को कुर्बान कर देते हैं ताकि उनकी अपनी कुर्सी सलामत रहे। ऐसे लोगों के पास शायद अथॉरिटी हो, पर उनके पास कभी किसी का दिल नहीं होता।
एक साहब हैं जो खुद को बहुत बड़ा लीडर मानते हैं क्योंकि उनके पास एक अलग केबिन है और वे सबसे महंगी कार में आते हैं। वे ऑफिस आते ही अपनी टीम पर चिल्लाना शुरू कर देते हैं ताकि सबको पता चले कि बॉस कौन है। लेकिन जैसे ही वे केबिन से बाहर जाते हैं, उनकी टीम उनके नाम का मजाक उड़ाती है। क्या वह वाकई लीडर हैं? नहीं, वह बस एक कुर्सी पर बैठे हुए डिक्टेटर हैं। असली लीडरशिप वह है जब आप ऑफिस में कदम रखें और आपकी टीम को डर नहीं, बल्कि यह महसूस हो कि अब काम आसान हो जाएगा क्योंकि उनका सपोर्ट सिस्टम आ गया है।
जब लोग लीडरशिप की ट्रेनिंग लेने के लिए महंगे कोर्स करते हैं, लेकिन अपने जूनियर को एक 'थैंक यू' कहने में उनकी ईगो आड़े आ जाती है। उन्हें लगता है कि नरमी दिखाने से उनकी इज्जत कम हो जाएगी। जबकि सच यह है कि इंसानियत ही सबसे बड़ी लीडरशिप स्किल है। जब आप अपनी टीम के किसी मेंबर से उसके काम के अलावा उसके घर-परिवार या उसकी परेशानियों के बारे में पूछते हैं, तो आप उसे यह बता रहे होते हैं कि वह आपके लिए सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि एक इंसान है। और यकीन मानिए, जब इंसान को इज्जत मिलती है, तो वह पत्थर को भी काटकर रास्ता बना देता है।
अंत में, यह समझ लीजिए कि लीडरशिप मुफ्त में नहीं आती। इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। वह कीमत है अपना स्वार्थ त्यागना। वह कीमत है दूसरों की गलती की जिम्मेदारी खुद लेना और कामयाबी का सारा श्रेय टीम को दे देना। अगर आप यह कीमत चुकाने को तैयार हैं, तभी आप खुद को लीडर कहने के हकदार हैं। दुनिया में मैनेजर्स की कमी नहीं है, पर लीडर्स की बहुत कमी है। फैसला आपका है कि आप सिर्फ एक बॉस बनकर रिटायर होना चाहते हैं या एक ऐसा लीडर बनना चाहते हैं जिसके जाने के बाद भी लोग उसकी मिसाल दें।
लीडर्स ईट लास्ट हमें याद दिलाती है कि हमारी सबसे बड़ी ताकत पैसा या टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि एक दूसरे के प्रति हमारा भरोसा है। अगर आप भी चाहते हैं कि आपकी टीम या आपका स्टार्टअप आसमान की ऊंचाइयों को छुए, तो आज से ही अपने लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेना शुरू करें। याद रखिए, जब आप अपनी टीम का ध्यान रखेंगे, तो टीम आपके बिजनेस का ध्यान अपने आप रखेगी।
क्या आप अपनी टीम के लिए आखिरी स्लाइस खाने को तैयार हैं? इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त या बॉस के साथ शेयर करें जिसे एक असली लीडर बनने की जरूरत है। कमेंट में बताएं कि आपके हिसाब से एक अच्छे लीडर की सबसे बड़ी खूबी क्या होती है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#Leadership #TeamBuilding #SimonSinek #Motivation #SuccessTips
_